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Friday, July 29, 2016

बेतरतीब मैं (२९. ०७. १६ )




(१ )
प्यासे शहर ने बारिश की दुआ मांगी और इस बार आसमान का दिल पिघला नहीं बल्कि फट पड़ा, झूले पड़ी आम की डालें टूट गई, बूंदों में भीगने वाले नन्हे नन्हे कोंपल हवा और पानी के थपेड़े झेल झेल के बेहोश हो गए
इस सावन ने ज़मीन को तृप्त नहीं किया बस रौंद  दिया

(२)
जब चली ठंडी हवा  जब उठी काली घटा मुझको ए  जाने वफ़ा तुम याद आये ....... 

आज आसमान जब बादलों की सियाही लपेट कर काला हुआ तो दिल तेरा साथ पाने को मचल उठा हमारी ज़िन्दगी से शाम वैसे ही लापता है तो भरी दोपहर हुई शाम को बस जी लेने का जी हो उठा, उस ज़माने में तो सात समंदर पार कर दो प्रेमी मिल लेते थे आज इन शीशे की इमारतों को पार करना दुश्वार है

(३ )
सुनो ! बारिश तुम्हें क्या याद दिलाती हैं

मुझे हरियाली ,गर्म भुट्टे ,चाय और मस्ती तुम्हे?
मुझे जलभराव ,गड्ढे जाम ,गन्दगी और मक्खियां
उसके बाद एक अपनी बारिश की रूमानियत में गम हो गया
और दूसरा शाम को घर समय से पहुँचने की फ़िक्र में

(४)

जा बरसो मेह खेतों में
जहाँ बीज का निखरे रूप 
जा बरसों मेह उन गाँवों में
जहाँ सूखे पड़े ताल कूप
जा बरसो मेह मरुथल में
जहाँ धरा तपाती नित धूप
आ बरसों मेह मेरे आँगन    
सजा लूँ में अपना रूप






Thursday, July 28, 2016

लाडली १  (२८.०७। १६ )

हम किस हालात में लिखते है ? जब हम रीते होते है या जब भावनाएं छलक उठती है अपने बारे में सोचूं तो अज़ीब लगेगा बरसो से लिखने के बाद भी आज भी अनजान हूँ कब  कैसे लिख पाती हूँ किसी साल १०० से ऊपर ब्लॉग पोस्ट तो कोई साल पूरी तरह सूना।
सृजन तो चल रहा है साथ में क्षरण भी चल रहा है पर ब्लॉग पर पोस्ट के रूप में दर्ज नहीं हो पा रहा, आखिर एक शाम बारिश में रचना फूट पड़ी आसमान से बरसता रस मेरे भीतर के कवि  को सींच गया  अब जो शुरू हुआ है वो रुकने नहीं देना है ,






अपनी लाडली के नाम

तुमको बारिशें सौंप रही हूँ
भीगने से घबराना मत
छतरी के पीछे शरमाकर
खुदको कभी छुपाना मत
जो मन भाये बादल गढना
जीवन में सकुचाना मत
तुमको जीवन सौंप रही हूँ
जीने से घबराना मत