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Tuesday, May 21, 2013

बवाल है बवाल है !

बवाल है बवाल है
बड़ा अजब हाल है
लापता से तंत्र में
ये कौम बेहाल है

पटरी से उतर गई
मालामाल कर गई
मामा की रेल है 
भांजा निहाल है

राष्ट्र के गले पड़े
राष्ट्रीय दामाद है
मौन है सारे देवता 
खुजली है खाज है 


नेता भी भीतर है
अभिनेता भी जेल में
भारतीय कारागार अब
राष्ट्रीय ससुराल है

बैट बॉल छोड़कर
गड्डियों का खेल है
खेल खिलाडियों का
अब ठिकाना जेल है

सबके बंद कान है
जनता हैरान है
समझ लो भैया ये
भारत निर्माण है

Tuesday, April 23, 2013

काबुलीवाले ! अब मत आना

मैंने कभी नहीं सोचा था मैं ये रचनाएँ पोस्ट करुँगी, जिन मासूम चेहरों पर सिर्फ बेफिक्री होनी चाहिए उनके साथ हर जगह वेहशीपन हो रहा है,चाहें अपने हो या पराये, घरों में अनाथालयों में सब जगह वही हाल है, इस पोस्ट पर कमेंट बंद रख रहीं हूँ  :-(

(१ )
काबुलीवाले !
अब मत आना
तुम्हारी पोटली डराती है
तुम्हारा स्पर्श चौंकाता है
बहेलिये से लगते हो
छिप जाते है खरगोश से
मासूम किन्ही कोनो में 
किलकारी अब सिसकी है 
चहकना सुबकने सा है
(२)
जिन खिलौनों को
उनके बनाने वाले
ठुकरा देते है
उन्हें पाने वाले
मनचाहा खेलते है
तुम कहते हो
ईश्वर है
(३)
सुना है प्रभु
काम बहुत बढ़ गया है
धरती पर विभाग
शिफ्ट कर रहे हो
सदा के लिए
नर्क को नया
नाम दिया था
"अपना घर "
तो बताते तो सही

Monday, April 1, 2013

अगली बहार तक ...

बड़ी बड़ी इमारतों से गुज़रते हुए ...गमलों में मुहं उठाये नन्हे पौधे अक्सर रास्ता रोक लेते है ..मनो कह रहे हो पनपने के लिए पूरी ज़मीन नहीं थोड़ी मिटटी की दरकार है ...हां अगर और बढ़ना  है तो अपनी ज़मीन खुद  पानी होगी ....
 
हाइवे पर तेज रफ़्तार गाडी दौडाते हुए ....डिवाइडर पर डटे गुलाबी फूलों से लदे मंझोले कद के शूरवीर जो गर्म काले धुंए के थपेड़े खाकर भी लहलहाते हुए से लगते है,हर लम्हा बिना रुके रात दिन अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ते हुए,अपने इस युद्ध के बीच एक नज़र मुझपर भी डालते है   "हमसे भी कमज़ोर हो क्या ".. ....
 
पार्किंग के कोने में .... सबकी नज़र बचाकर कोई ऊपर आ रहा है पहले बाहें निकली है हरी नर्म मुलायम ..जैसे बच्चे बिना नाम ,मज़हब के पैदा होते है वैसे ही वो दो पत्तियां भी अनचीन्ही है ..
 
ज़मीन पर बिखरे पीले निराश पत्ते ..जानते थे मौसम के साथ उनका भी यही हश्र होना है पेड़ों ने भी उनकी विदाई का शोक मनाया कुछ दिन पर ज़िन्दगी रुकी नहीं ..फूट  पड़ी मोटे डंठलों में ,कठोरता को भेद कर मखमल से चमकीले पत्ते ...
 
पीपल सुलग रहा है ....खिड़की के ठीक सामने पीपल के जुड़वां पेड़ अचानक अपना रूप बदल के अचंभित कर रहे है ...वे हरे ...भूरे ना वे सुनहले हो उठे है अनूठे सच में बेहद अनूठे, सुबह उनको निहारना क्योंकि गर्म सुबहों में वे काई के रंग को लपेट लेंगे और ये स्वर्णिम आभा लुप्त हो जायेगी ...

फूल और प्रेम .... फूल और प्रेम कब एक दुसरे का पर्याय हुए ये तो नहीं जानती पर ये जानती हूँ कुछ तो कोमल सा प्रस्फुटित हो उठता है इन रंगबिरंगे दूतों को देखकर,पिछली रातों में जब हवा बादलों से बिगड़ रही थी ...बादल के दिल से आंसू नहीं पत्थर बरस रहे थे ,मेरे आँगन के उदार पेड़ ने ...एक पीली चादर बिछा दी इंतज़ार की

और मैं ... इतनी जीवंत चीज़ों में मैं भला निर्जीव कैसे रहूँ ...लड़ते ,जूझते अपनी ज़मीन तलाशते ,अपने रास्ते बनाते सोने सी चमकते ,जी ही लूंगी अगली बहार तक ...


Thursday, March 28, 2013

बेवजह

जिरह-ए-जुल्फ में उलझा हुआ हूँ
बेवजह शानो पर बिखरा हुआ हूँ
पास होकर भी दूरियां मीलों की
हूँ अश्क़, आँख से फिसला हुआ हूँ

अधूरी ग़ज़ल का मिसरा हुआ हूँ
कहीं ख़याल में अटका हुआ हूँ
किस लम्हा मुकम्मल हो जाऊं
हूँ ग़ज़ल, बहर से भटका हुआ हूँ

यूँ अपने आप से बिगड़ा हुआ हूँ
छोड़ दुनिया आज तनहा खड़ा हूँ
सामने आँखों के अँधियारा घना है  
हूँ सितारा,राह से भटका हुआ हूँ

कल तुझमें डूबकर तुझसा हुआ हूँ
सांस की उस छुअन से तप रहा हूँ
मुझको रोक ले ख़ाक होने से पहले
हूँ शरारा, ईमान से बुझता हुआ हूँ

Tuesday, March 26, 2013

होली है


काका बौराते फिरे
काले करके बाल
कोई नवयौवना
रंग दे अबके साल

बत्तीसी सेट किये
काकी रही मुसकाय
फागुन सजी फुहार
देवर नाही आय

ससुराल साली बसे
वे जीजा मालामाल
पास पडोसी ताक रहे
दिल में बड़ा मलाल

फ़गुआये भये  बावरे 
खूब चढ़ाई भांग 
चुनर ओढ़ बाबा रचे 
नार नवल का स्वांग 

जो रोये सो रो रहे 
जो गाये सो गाये 
नौटंकी घर घर सजी 
कौन किसे समझाए 

कोई छेड़े राग भैरवी 
कोई छेड़े राग मल्हार 
होली है में डूब गया 
सारा सुर संसार 


Wednesday, March 20, 2013

तू,तेरा अक्स


शोर था साँसों का
दिल में सन्नाटा
तेरे जाने के बाद
तू उग रही है यहाँ
जम रही है काई सी
आईने पे लगी बिंदी में
टेबल पर चूड़ियों में
पड़े सूखे गजरे में

छोड़ गई हो जानकर
चादर के आगोश में
बालों के नर्म  गुच्छे
कुछ टूटे लाल नाखून 
दुपट्टे से बिछड़े मोती
पायल से खफा घुँघरू
कप पर गुलाबी निशान
कमरे में इत्र -ए -ख़स

जागा हूँ उस दिन से
पलक भी झपकी नहीं
के तुम लौट ना जाओ
खडका कर कुण्डी कहीं
आहट सुनना चाहता हूँ
तुम्हे छूना चाहता हूँ
कहते है राख से भी
जन्म जाते है लोग
गर पुकारो दिल से




Thursday, March 14, 2013

सुनो ! भारत भाग्य विधाताओ


सुनो !
भारत भाग्य विधाताओ
शहीदों की चिताओं से
दूर रखना काले हाँथ
कलंकित करेंगे शहादत ,

तुम्हारे शरीर से उठती
सड़ांध दम घोट देगी
उनकी आत्माओ का
तुम तुष्टिकरण में रहो
देसी विदेसी आकाओं के

ना तुम्हारा आँगन रोया
ना सूनी हुई तुम्हारी देहरी
तुम बस गिनो गिन्नियां
बंद आँखों से लगातार
लथपथ चेहरे मत देखो

हम फिर सौंप देंगे
तुम्हारे हाँथ बागडोर
अपने भविष्य की
क्योंकि खो चुके है
अपनी आवाज़ शक्ति
और
स्व: