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Thursday, January 10, 2013

ये गठरियाँ



बिस्तर से उठने का उसका मन नहीं था पर उसने अपने  आप को समेटा और उठ खड़ी हुई ...सिलवटें देखकर चेहरे पर मुस्कान दौड़ गई एक ब्लैक कॉफ़ी के लिए कदम रसोई की तरफ बढ़ गए ... पिछले तीन सालों से वो अपने मन की ज़िन्दगी जी रही थी जहां दिन उसकी मर्ज़ी के थे और रातें भी उसकी मर्ज़ी की ...उसकी मर्ज़ी ...
अपनी उम्र के लगभग 3 दशक उसने अपनी मर्ज़ी समझने में लगा दिए ... जो वो अपनी मर्ज़ी समझती थी वो वास्तव में उसकी नहीं दुनिया की मर्ज़ी थी और वो एक कठपुतली। अस्पताल में लोगों की ज़िन्दगी मौत का फैसला लेने वाली ...अपने फैसले लेने में इतनी दयनीय स्थिति में पहुँच जाती के उसको खुद यकीन नहीं आता के वो एक डॉक्टर है ...उसकी योग्यता एक तरफ और नारी होना दूसरी तरफ ...

कर्त्तव्य ,मर्यादा ,सही ,गलत ,विवेक ,संस्कार ,धर्म ,त्याग,शील  की गठरियाँ जो एक -एक करके उसको सौपी गई थी दादी -नानी ,मासी -चाची जैसे अपनों के द्वारा और आज वो धरोहर बोझ की तरह हो गई थी, जब वो अपने बारे में सोचना चाहती तो ये गठरियाँ  उस पर हमला कर देती और वो एक अपराध भाव से भर उठती ...ये ग्लानि  धीरे धीरे उसे निगल लेती और फिर वो इंसान से नारी में तब्दील हो जाती ...

पिता के जाने के बाद  घर की जिम्मेदारियों के बीच वो अपने को भुला चुकी थी ...समय बीत रहा था।कैलेण्डर में सालों के बदलने के साथ वो भी अपने में परिवर्तन महसूस कर रही थी। अच्छी नौकरी थी भाई बहन भी सेटल होने की राह पर थे ..पर अभी भी सब अधपका था ...शामें तो ठीक थी पर रातें उसे बेचैन कर देती ...ये बेचैनी उस नीली आँखों वाले डॉक्टर के अस्पताल में आने के बाद कुछ ज्यादा बढ़ गई थी ..उसकी आँखों में उतरता आकर्षण ..उसके दिल की धड़कने तेज कर देता। कोई इतना सहज और सरल कैसे हो सकता है ...बिना बनावट अपनी बात कह देता ...कई बार वो अपनी पसंद भी जाहिर कर चुका था , और वो भी तो उसे पसंद करने लगी थी .. उसका दिल किसी तरुनी की मानिंद धड़क उठता ...मचल जाता मुझे बस वही नीली आँखे चाहिए ..ओ मुझे प्यार और सम्मान से देखती है ...

उसी पल वो  गठरियाँ एक एक कर खुल कर पसर जाती ...उनके ढेर के बीच वो नीली आँखे ना जाने कहाँ खो जाती ....

घर पर बात करने का कोई मतलब नहीं था ...एक बार सोचा पर जानती थी ...भाई के भीतर का मर्द जाग उठेगा ... सब अचानक ज़िम्मेदार हो उठेंगे और अपनी ये गठरियाँ खोलकर उसकी गठरियों को और भारी कर देंगे ..के वो फिर उठ भी नहीं पाएगी,जहां अपने गोत्र में शादी करने पर जान का खतरा हो वहाँ किसी  की बात करना खुदको और उसको खतरे में डालने से ज्यादा कुछ नहीं था ....

एक दिन वही घटा जिसके घटने के  इंतज़ार में पिछले कुछ दिनों से थी  उन नीली आँखों ने जुबां खोल दी एक लाल गुलाब के साथ उस गुलाब की खुशबू से एक पल वो कस्तूरी हो उठी काश ... इस दुनिया में बस मैं वो और ये गुलाब रह जाये ..सब गायब हो जाए ..होंठो पे मुस्कान और आँखों में आंसू ... सामने एक मासूम चेहरा जो एक "हाँ" सुनने को बेचैन है
उसके लिए प्रेम दो दिलो दो इंसानों के बीच का रिश्ता था ...पर ये जानती थी उसके यहाँ प्रेम ही अपराध है, अपनी ज़िन्दगी का इतना बड़ा फैसला वो खुद नहीं ले सकती थी।। दिल हाँ कह रहा था पर गठरियो के बोझ तले वो हाँ किसी सिसकी सी दब गई ...
"मुझे थोडा समय दो " वो संयत होकर बोली
"यू कैन टेक योर टाइम स्वीटहार्ट " उसने उसे हौले से गले लगाकर कहा
वो पिघलते पिघलते बची ...
एक पल में सितार सी हो गई वो ...कुछ था दिल में जो बगावत कर रहा था खुद से अपने आप से ...आईने के सामने देर तक निहारती रही खुद को उसने मुझे पसंद किया क्योंकि मैं, मैं हूँ हर महीने घर पैसे लाने वाली मशीन नहीं, आज वो अपने आप को जानना चाहती थी ..मैं कौन हूँ क्या चाहती हूँ ...किसी ने कभी नहीं पूछा पर आज वो खुद से सवाल कर रही थी बंद कमरे में कई तूफ़ान उठे और बिखर गए ... एक एक कर कई गठरियो से सवाल उठे और उसने उनका सामना किया ...अभी तो ये सवाल खुद से पूछ रही थी ...पर जब ये सवाल उसके अपनों के मुह से बरसेंगे ..आंसू और गुस्से के साथ ...तब ...तब
"देखा जाएगा " उसने खुद को जवाब दिया ..
आज वो बागी हो उठी थी अपने लिए अपनी ख़ुशी के लिए ...जानती थी लोग स्वार्थी कहेंगे ...ताने देंगे, कोसेंगे कह देगी मुझे माफ़ करो छोड़ दो ...
क्रासिंग से दो गुलाब खरीदे .... एक ले जाकर अपनी टेबल पर लगाया ..एक पूरी हिम्मत के साथ उसे सौंप दिया
"यू डिड इट " वो शरारत से मुस्कुरा रहा था
फिर बातों के लम्बे सिलसिले में कितने कॉफ़ी के प्याले खाली हुए भरे ..याद नहीं ....आज वो बोल रहा था ... और ये मुग्ध सी उसका चेहरा देख रही थी ...
जिन लम्हों में वो खुद को अकेला पा रही थी ...उन पलों को भी वो समझ रहा था .. वो सिर्फ प्यार और साथ चाहता था ... और रिश्ता जब मैं चाहू ....पुरुष के दोस्ती भरे रूप से वो अनजान थी ...पिता ,भाई, रिश्तेदार सबको उसने कलफ लगी अकड़ के साथ ही देखा था ... वो माहोल ही एसा था वहां ....इस नीली आँखों वाले साथी का मिलना किसी शहजादे से मिलने से कम नहीं था ....
वो खुश थी ,जिन पलों में वो उसका हाँथ थामकर निश्चिन्त ही जाना चाहती ... अक्सर गठरिया जीवित हो उठती ... डराती चिल्लाती ...कभी सिनेमा हाल में ,कभी पिकनिक में ... वो एक एक कर उनको अपने से अलग कर रही थी ... रेत से फिसलते वक़्त के दरमियाँ वो कुछ चमकीले टुकड़े अपने लिए बचाना सीख रही थी
प्यार में होना आपके चेहरे को फेशियल सा असर देता है और शरीर को स्पा सा सुकून ...होंठो से बरबस निकल पड़ने वाले गीतों के मुखड़े और अंतरे चुगली कर देते है,
तो जीने दो ना उसे ....

एक रोज़  ... वो अपने शहजादे के साथ  घर से निकल आई, एक छोटे से आशियाने में जहां वो अपनी मर्ज़ी से रह सके ...जिम्मेदारियों के साथ खुद भी जी सके बिना डरे फैसले ले सके, उसके हाँथ और पैर काँपे नहीं ...उन गठरियों को देहरी के बाहर छोड़ दिया, आज वो भारी कदमो से नहीं बल्कि आत्मविश्वास से चल रही थी, दिनों के पंख लगे और रातें मादक हो उठी ... प्यार से सराबोर हो उठी ...प्यार पा रही थी और प्यार बाँट रही थी .... निखर रही थी ,
सपनीले दिनों में एक नन्ही किलकारी गूँज उठी उसकी फरिश्तों सी  मासूमियत ने पत्थर दिलो को भी मोम कर दिया ... टूटे रिश्ते जुड़ गए ... उसके साथ बुरा घटने का इंतज़ार करते करते कुछ सो कॉल्ड शुभचिंतक आशा खो बैठे ......

रात वो नीली आंखे कुछ कह रही थी ... उन्हें फ़रिश्ते का  साथ देने के लिए एक परी चाहिए थी ....
"हाँ वो परी ही होगी, आकाश दूँगी मैं उसे ... गठरियों की बजाय एक टोकरी सौपूंगी खुद चुनेगी " बुदबुदाकर कब एकाकार हो गई खुद ना जान पाई


Tuesday, September 25, 2012

ये मोहब्बत जो ना कराये थोडा


ये मोहब्बत जो ना कराये थोडा 

अभी अभी मिली खबर के अनुसार एक हसीना का का दिल एक हसीं पर आ गया है अब आप कहेंगे इसमें क्या खास है दिलों का कारोबार तो आम है ...हसीन/हसीना लगना पूरी तरह दिल का मामला है इसमें दोनों पार्टी का वास्तव में हसीन होना मायने नहीं रखता ... लड़का भी बेनजीर है और लड़की भी हिना की तरह सुर्ख उफ़ ..क्या कहें मुल्क के मुल्क फ़िदा है यहाँ तक हमारे कृष्णा पर भी ऐसी मोहनी डाली है के बेचारे खुद माया में फंस गए है ... बेचारे अब्बू जान की जान सांसत में फसी है क्या क्या संभाले घर-आँगन दोनों आफत में है ... अब मोम और आग को साथ रखोगे तो यही होना है और भारतीय उपमहाद्वीप प्रेम के मामले में बहुत उपजाऊ है ..यहाँ प्यार बस प्यार देखता है उसे शादी ...उसके साथ जुडी आबादी ..धर्म जाति और आजकल जेंडर कुछ दिखाई नहीं देता . अब सारे चैनल एक सुर में राग बिलावल बजायेंगे और खुद भी झूमेंगे और जनता को भी झुमायेंगे ...भस्मासुर टाइप कहानी नहीं हो गई जो हथियार विदेशो को तबाह करने के लिए तैयार किया था बस ...वापस खुद पर चल गया... इनकी माने तो दोनों प्रेमी कुछ सुनने को तैयार नहीं है... 

अंधे इश्क के कहाँ सुनते है 
दिन रात आह भरा करते है 
अक्स दिलबर का आँखों में
भरे बाज़ार मजनू बने फिरते है 
रिश्ते पुराने अजीब लगते है 
अजनबी सबसे करीब लगते है 
फूंककर आशियाँ हँसते है 
यही दिलो को नसीहत करते है 
चाहो कहो दीवाना या आशिक 
हर रोज़ नई  हद से गुज़रते है 
अब्बू कहे या अम्मी समझाए 
बिगड़े ऐसे कहाँ सुधरते है 
रंग-ए-हिना चढ़ जाए दिलपर 
दाग बड़े गहरे पड़ा करते है 
सुर सधे जब मोहब्बत वाला 
राग विलाबल में  तान भरते है 

Thursday, March 17, 2011

होली ....

होली ..हर उम्र में होली का अपना मज़ा होता है ..मन फागुन की बयार में बौराने लगता है आज भी बौइरा रही हूँ पर तुम पता नहीं कहा हो ..शायद कंधे पर लैपटॉप डाले ऑफिस की तरफ जा रहे होगे ...या अपनी शॉप पर बैठे होगे ..तुम कहाँ हो और आज क्या कर रहे हो मुझे कुछ भी नहीं पता पर हर होली  दिल में टीस जरूर दे जाती है ..... मेरी भटकी आँखों को कई बार ... निलय ने पकड़ा है  "किसे ढूंढ रही हो सपना " और मैं मज़ाक में कहती हूँ "जब तुम सामने हो तो मुझे किसी को ढूँढने की जरूरत नहीं ....
आज बरसो बाद सिगरेट पीने की इच्छा हो रही है ..मन कर रहा है दो कश भरु और और मुह से धुएं के साथ अपने अन्दर से तुम्हे भी बाहर निकाल दूं .. तुम्हारी यादें कसैली सी लगने लगी है ..तुमने जब हांथों में रंग लेकर मेरी तरफ पहली बार शरारत से देखा था तो सच मानो मेरे गाल भी उतने ही बेताब थे जितने तुम्हारे हाँथ ...और मैं बिलकुल नहीं चाहती थी कोई मेरे गालों पर तुमसे पहले गुलाल लगाये ...सारी रात इसी इंतज़ार में थी ...तुम कौन सा रंग लगाओगे ... सुर्ख लाल ..जो मैं तुम्हारे हांथो से अपनी मांग में देखना चाहती  थी ,चमकीला  हरा जो शायद मेरी कलाइयों में चूड़ी बन खनकेगा ..पीला जो हांथो में हल्दी बन सजेगा या फिर रुपहला मेरे सपनों की तरह.
तुम जब मेरी ज़िन्दगी में शामिल होने लगे थे तब बहुत कच्ची उम्र में थी मैं ..अल्हड पर तुमको देखते ही मानो किस अनुशासन से बंध जाती थी ..कितनी बार सोचती तुम कुछ कहो ..पर नहीं इसी अबोले पलो के बीच दिवाली से होली आ गई ....और मेरे मन में आकर्षण के बीज में अंकुर फूटने लगे ..कभी कभी जब तुम्हे सोचती तो शारीर से ना जाने कैसी सोंधी सी महक उठती और मैं कस्तूरी मृग की तरह बौरा उठती .... सब जादू सा लगता ...सपने सा ..सपना का सपना ...
तुम जब मेरी तरफ रंग लगाने के लिए बढे ..तो मैं सकुचा रही थी पर ..ये अनुभव बिलकुल वैसा नहीं था ...मेरे कोमल सपने एक पल में कुचल गए ...तुम्हारे हांथो में काला रंग था जो तुम बड़ी कठोरता से मेरे मुह पर मेरे गले पर लगा रहे थे ..और तुम्हारे दोस्तों की आवाजें "छोड़ना मत " ,"मौके का फायदा उठा यार ", "तेरी तो सेटिंग है "... कानो में पिघले सीसे की तरह उतर रहे थे मैं अपने को छुड़ाने की कोशिश कर रही थी ..बीच बीच में उठती ..शराब की तीव्र गंध में जो कस्तूरी  खोई वो आज तक नहीं  मिली ....
उस होली ने छोड़ा मुह पर काला रंग जिसको कितना उतारने की कोशिश की पर आज भी ..कहीं मन के कोने में रह गया है ..जो हर होली रंगों को देखते ही पूरे अस्तित्व को अँधेरे में डाल देता है ........
आज फिर होली है हर तरफ रंग है निलय आने जाने वालो को बोल रहे है सपना को रंग पसंद नहीं है ..और गुलाल के टिके लगा रहे है ...निलय के मनपसंद त्यौहार पर मेरा ना होना उसे मायूस तो करता है पर कभी भी उसने जबरदस्ती नहीं की ..जब भी वो नए शादीशुदा जोड़ो को होली में मस्ती करते देखता तो उसकी उम्मीद भरी आँखे मेरी तरफ उठ जाती ..ये हमारी शादी के बाद दूसरी होली है ..मैं निलय का चेहरा देख रही हूँ ...कितना प्यार करता है मुझे ...कितना सुरक्षित महसूस करती हूँ उसकी बाहों में ....और मैं किस के लिए  लिए निलय को तकलीफ दे रही हूँ जिससे मेरा कोई रिश्ता भी नहीं है 
अचानक सारी कालिमा ख़त्म होने लगती है और थाली में सजे रंग मानो आवाज़ देते है आओ और सजा लो हमें अपनी ज़िन्दगी में ..मेरे हांथो में गुलाबी रंग लिए मैं निलय पर टूट पड़ती हूँ और बिना उसे संभलने का मौक़ा दिए रंगों में सराबोर कर डालती  हूँ ... निलय की आँखों में कई रंग तैर जाते है ..भौचक्का .... विस्मय ...आश्चर्य .. शरारत ..फिर...  कितनी देर हम दोनों होली खेलते  रहे याद नहीं....इस होली की यादें ऐसी बनी की अब शायद कोई और होली कभी याद ना आये .....



--
Sonal Rastogi

Monday, January 24, 2011

आकर्षण

(वर्जित की कामना  ..मानव मन की चाह रही है ...बस यही कहती है ये कहानी ...इसको एक बार फिर पोस्ट कर रही हूँ)

ये तन ऐसा है जो मन के हिसाब से चलता है पर दिमाग की बिलकुल नहीं सुनता, आज मेरा मन पता नहीं क्या क्या सोच रहा है शादी के आठ साल बाद आज ये इतना बेचैन क्यों है ,कितनी खुशहाल ज़िन्दगी चल रही है घर परिवार भरा पूरा है, ऐसा कुछ नहीं जिसकी कमी हो ,प्यार करने वाला पति दो प्यारे प्यारे बच्चे, बचा समय में घर पर पास के बच्चों को पेंटिंग और क्राफ्ट सिखा लेती हूँ, पूरे हफ्ते सब अपने में व्यस्त रहते है और रविवार को सारा दिन मस्ती...मेरी ज़िन्दगी ऐसी ही चलती रहती अगर मेरी मुलाक़ात इनके बचपन के दोस्त वैभव से नहीं होती....








वैभव और उसकी पत्नी मेधा ट्रान्सफर होकर लखनऊ आये तो उन्होंने इनसे संपर्क किया , अपने बचपन के दोस्त को करीब पाकर ये भी बहुत खुश थे, तीन दिनों में उनकी शिफ्टिंग और सब कुछ सेट हो गया, दोनों का स्वभाव बहुत अच्छा था, हमारा उनसे मिलना अक्सर होने लगा,बच्चों का मन भी उनके बेटे विशाल में रम गया......





मैंने और मेधा ने लगभग सब कुछ बाँट लिया अपनी रुचियाँ अपने सपने ,अपने विचार वैभव और ये भी हमारी बातों में बहुत रस लेते...दिन बीते होली आ गई, हम सारे होली की प्लानिंग करने लगे बच्चे तो हद से ज्यादा उत्साहित थे ,हमारे घर में होली का कार्यक्रम रखा गया , सुबह सुबह सब एक दुसरे के रंग लगाने में लग गए,मैंने मेधा को रंग लगाया और होली की बधाई दी,फिर मैं वैभव को रंग लगाने बड़ी और मैंने उनके गालों पर रंग मॉल दिया फिर क्या था वैभव और इन्होने मिलकर मुझे बुरी तरह से रंग लगाया..रंग लगवाते हुए अचानक मुझे वैभव का स्पर्श कुछ अजीब सा लगने लगा, मैं सहज नहीं हो पा रही थी मैंने वैभव की तरफ देखा तो उसकी आँखों में कुछ अजीब सी चमक थी......तभी बच्चे आ गए और हमारा रंग लगाने का कार्यक्रम ख़त्म हो गया...





होली तो चली गई पर अकेले में मुझे वो स्पर्श अचानक याद आता और मेरे मन में वैसी ही गुदगुदी होती जैसी शायद इनके पहले स्पर्श से हुई थी...वैभव अब भी आते पर मैं अब उतनी सहज नहीं रह पाती...उसकी आँखों में मेरे लिए आकर्षण साफ़ दिखता मेरे जन्मदिन पर मुझे हाँथ मिलाकर विश करते समय उसने मेरा हाँथ ज़रा जोर से दबा दिया और सर से पाँव तक मैं सिहर गई..





मेरे होंठों पर एक रहस्यमयी सी मुस्कान हमेशा रहने लगी, हमारी विवाहित ज़िन्दगी में जो ठंडापन आ रहा था वो कुछ कम होने लगा..मैं जब इनको स्पर्श करती या ये मुझको बाँहों में लेते तो मेरे मन में अचानक वैभव की छवि आ जाती और मैं और जोश के साथ इनसे लिपट जाती, ये मुझे छेड़ते क्या बात है आजकल तुम बदली बदली सी लगने लगी हो...मैं अपने मन में भी वैभव के लिए आकर्षण महसूस कर रही थी..दिमाग कह रहा था "क्यों अपना बसाया परिवार उजाड़ रही है " पर दिल ओ सपने बुन रहा था "इसमें बुराई क्या है किसी को मैंने बताया थोड़े ही है".........





मन हमेशा से ऐसा पाने को लालायित रहता है जो वर्जित हो मैंने कितनी बार कल्पना में अपने को वैभव की बाहों में देख लिया था और मन का चोर कहता था अगर ये सच में हो गया तो कैसा रहेगा,क्या वैभव भी ऐसा ही सोचते है मेरे बारे में ....





क्रिसमस की छुटियों आ गई और हमदोनो परिवारों नें मनाली जानें का कार्यक्रम बना लिया...सच कहूं इनके साथ जाने से ज्यादा मेरा मन वैभव के पास होने के एहसास से खुश था पैतीस साल की उम्र में मुझ में सोलह साल की लड़की सा अल्हडपन आ गया था,सारे रास्ते हम हंसी मज़ाक करते गए बीच बीच में वैभव मुझपर एक प्यार भरी निगाह डाल देता,...दोनों शायद अपने अपने दिल के हांथों मजबूर हो रहे थे, और इस सब में ये भूल बैठे थे की हमारे साथ हमारे जीवन साथी भी हैं ,जो शायद इस बदलाव को महसूस कर रहे थे....





मेधा बहुत समझदार थी, एक स्त्री होने की वजह से उसकी छठी इन्द्रिय ज्यादा सक्रिय थी, शाम को ये और वैभव जब बच्चों को झूले पर ले गए तो मैं और मेधा अकेले बातें करने लगे,





मेधा बोली " नीतू बहुत ठण्ड हो रही है इससे अच्छा हम लखनऊ में ही रहते "





मैंने उसकी बात को मज़ाक में लेकर बोला "क्यों क्या मज़ा नहीं आ रहा ..इतना अच्छा मौसम इतना सुकून मेरा तो यहाँ से जाने का मन ही नहीं कर रहा लगता है बस समय यहीं रुक जाए "





"यही अंतर होता है नीतू किसी को एक एक पल भारी सा लगता है और किसी के लिए समय के पंख लग जाते है " मेधा ने दार्शनिक से संदाज़ में बोला





"तेरे मन में क्या है मुझको तो बता सकती है " मैंने अपने मन के चोर को दबा कर पूछा





"नीतू मैं थोड़े समय से वैभव में बदलाव महसूस कर रही हूँ, मेरा भ्रम भी हो सकता है,मुझे कभी कभी लगता है जैसे ये मेरे साथ होकर भी एरे साथ नहीं है " मेधा के गेहुएं चेहरे पर चिंता की लकीर खीच गई





मेरा चेहरा फक पड़ गया ऐसा लगा बीच बाज़ार में निर्वस्त्र हो गई हूँ ,अबी तक दिमाग की बातों को दिल सामने आने नहीं दे रहा था पर अब दिमाग दिल पर हावी होने लगा " अगर मेधा नें वैभव में परिवर्तन महसूस किया है तो इन्होने भी तो महसूस किया होगा " मेरी हिम्मत नहीं पड़ रही थी की मैं मेधा से निगाह मिलाऊं .





"मैडम होटल चलें बहुत थक गया हूँ " सामने से इन्होने मुस्कुराते हुए कहा "तुमको क्या हुआ " इन्होने मेरा उतरा चेहरा देखकर पूछा "





"मैं भी बहुत थक गई हूँ " मैंने सकपका कर जवाब दिया





मयंक सो गए पर मेरी आँखों से नींद तो कोसों दूर थी "मैं क्या करने जा रही थी ,अपना पति ,अपने बच्चे अपनी दोस्ती सब कुछ इतने सारे रिश्ते एक पल के आकर्षण पर दांव पर लगा रही थी " मेरी आँखों से आंसू बह निकले और मैंने अपने पास लेते हुए मयंक को देखा जो बच्चों जैसी निश्तित्ता के साथ सोये हुए थे अचानक मैं माक से लिपट गई ,मयंक नें मुझे रजाई में खीच लिया और मैं उनके सीने से लग कर सो गई .....





सुबह जब आँख खुली तो मन हल्का हो चुका था आसमान के साथ मन से भी बादल छंट चुके थे, मुझे सुकून था मैंने अभी कुछ खोया नहीं था अब मुझे वैभव को भी उस आकर्षण से बाहर निकालना था जिसके चलते हम दोनों अपने रिश्तों में ज़हर घोलने चले थे....





"आज स्कीइंग करने चलते है " वैभव नें मेरी तरफ देखते हुए कहाँ बच्चे भी हाँ में हाँ मिलाने लगे





"अगर आप लोगों को प्रॉब्लम ना हो आप लोग बच्चों को लेकर चले जाओ, आज हमारा मूड होटल में ही रहने का है" मैंने रोमांटिक अंदाज़ में मयंक के गले में बाहें डालते हुए कहा.





"आप अपना सेकंड हनीमून मनाइए बच्चे हमारे साथ चले जायेंगे, मयंक आज नीतू मैडम मूड में है ज़रा संभल कर " मेधा ने मुस्कराते हुए अपनी दाई आँख दबा दी...





मयंक,मेरे और मेधा के ठहाके गूँज उठे और शायद वैभव भी मेरा इशारा समझ गया और मुस्कुरा दिया...





Friday, November 19, 2010

मैं काजल हो जाती हूँ

 
मुझे जलना भा रहा है
मैं तो यूँही जल जाती हूँ 
तुम शमा बनोगे बोलो ना
मैं परवाना हो  जाती हूँ
तेरी खुशबू मन को भाये
मुझे मस्त करो और बहकाए
तुम कली बनो और इठलाओ
मैं भंवरा बन मंडराती हूँ
इतनी दीवानी चाहत में
मुझको मेरा होश नहीं
तुम मुक्त पवन के झोके से
और मैं आँचल हो  जाती हूँ
तुम हो प्यासे मैं रस से भरी
फिर रहे अधूरे अधूरे क्यों
तुम फैला दो अपनी बाहें
और मैं बादल हो जाती हूँ
तुम कितने भोले भाले से
जी भर देखूं तो नज़र लगे
मुझको भर लो तुम आँखों  में
और मैं काजल हो जाती हूँ
 
 
 
 

Sunday, September 26, 2010

चलो मैं बे-वफ़ा हो जाती हूँ

इतनी नजदीकी अच्छी नहीं


चलो कुछ खफा हो जाती हूँ

अपना ही मज़ा है बेचैन करने का

चलो मैं बे-वफ़ा हो जाती हूँ



तेरे सामने आऊं भी नहीं

तुझे महसूस हर लम्हा रहूँ

मांगे तू भी साथ मेरा शिद्दत से

चलो मैं खुदा सी हो जाती हूँ



कब तक नशीली रात सी रहूँ

होंठो पे छिपी बात सी रहूँ

जान जाए ये ज़माना मुझको

चलो चटख सुबह सी हो जाती हूँ



जितना जानो उतना उलझ जाओ

इतना उलझो ना सुलझ पाओ

ना जाने किस वक्त ज़रुरत पड़े

चलो मैं दुआ सी हो जाती हूँ



कभी देखो तो अनजान लगूं

कभी दिल की मेहमान लगूं

एक झलक देख लो तो दीवाने हो जाओ

चलो मैं उस अदा सी हो जाती हूँ

Monday, June 28, 2010

दिन हरजाई

कुछ तन्हाई

एक रजाई

बदन तोडती

एक अंगडाई

ठन्डे हाँथ

तपती साँसे

अंगीठी से

गायब गरमाई

मौन मुखर

मुखरित आँखे

मौन अधर

मुखरित जम्हाई

सहज नेह

असहज हो तुम

असहजता को

दे आज बिदाई

रात ढली

तुम आये

जल्दी ढलता

दिन हरजाई

Wednesday, June 23, 2010

इश्क पर लिखूंगी


इश्क पर लिखूंगी ,

हुस्न पर लिखूंगी
दिलों के होने वाले,
हर जश्न पर लिखूंगी

दर्द पर लिखूंगी

मैं आह पर लिखूंगी
जुल्फों की घनी
पनाह पर लिखूंगी

चाँद पर लिखूंगी

और रात पर लिखूंगी
दो जोड़ी आँखों की
हर बात पर लिखूंगी

शमा पर लिखूंगी
मैं परवाने पर लिखूंगी
जलते बुझते
हर अफ़साने पर लिखूंगी

खिड़की पर लिखूंगी
मैं झलक पर लिखूंगी
रात भर ना सोई
उस पलक पर लिखूंगी

जब तक है धड़कन
और गर्म है साँसे
मोहब्बत मोहब्बत
दिन रात मैं लिखूंगी

Sunday, May 23, 2010

मेरी तौबा (लघुकथा )

"कुछ सोच रही हो " मैंने उसका हाँथ हौले से दबाकर पूछा

"नहीं तो " नेहा के चेहरे पर शरारत की लहर दौड़ गई
अब वो आसानी से बताएगी नहीं ,जब तक मैं उससे ८ -१० बार पूछ नहीं लूँगा .
चार सालों से जानते है एक दुसरे को ऑफिस में मिले,दोस्त बने फिर एहसास हुआ हम अपना रिश्ता दोस्ती से आगे ले जा सकते है ...दो महीने बाद शादी है .
"अब तुम क्या सोच रहे हो वरुण " उसने बच्चों की तरह मेरे गाल चिकोटते हुए कहा .
"क्या हम शादी कर के ठीक कर रहे है ?" मैंने हौले से उससे पूछा
"बड़ी जल्दी पूछ लिया दो महीने बाद पूछते " उसने तुनक कर जवाब दिया
बस इसी अदा पर तो मैं अपनी ज़िन्दगी वार सकता था.
"अरे इतना बड़ा फैसला ले रहे है ज़िन्दगी का कही कुछ भूल हो गई तो बस सारी ज़िन्दगी तबाह " मैंने अपनी हसी दबाते हुए कहा.
"मिस्टर वरुण, अगर कोई फैसला लेना है तो अभी ले लो, ये शादी करनी है या नहीं " नेहा कुछ तल्ख़ हो उठी.
"मैं तो तुम्हारे भले के लिए ही कह रहा था " मैं उसके सब्र का थोडा और इम्तेहान लेने के मूड में था.
"अगर ऐसा है तो ये सब अभी ख़त्म करते है इसी में मेरा भला है,वैसे भी मुझे भी लगता है शायद लम्बे समय तक ये रिश्ता ना निभा पाऊं, मेरे पापा भी यही कह रहे थे ,बस मैं समझ नहीं पा रही थी बात कैसे शुरू करूँ " नेहा ने भरे गले से बोलती जा रही थी
" तुम्हारे मन में भी यही शंका है ना , चलो मैं सोच रही थी तुम्हारा दिल कैसी दुखाऊं" नेहा ने राहत की सांस लेते हुए कहा

अब सदमें में आने की बारी मेरी थी नेहा की आवाज़ कही दूर कुएं से आती लग रही थी,नेहा को खोने के ख़याल से दिल बैठ गया
"मैं तो मज़ाक कर रहा था " मेरी आवाज़ काँप रही थी
नेहा मेरा चेहरा गौर से देख रही थी
"मैं भी तो मज़ाक कर रही थी " नेहा खिलखिला कर हंस पड़ी .
मैंने घबराकर उसको गले से लगा लिया, सब शांत था बस हमारी धडकनों का शोर था .
मेरा दिल कह रहा था
"इस लड़की से मजाक ,मेरी तौबा "

Thursday, May 13, 2010

दिल में उतर रही हूँ मैं


कितना संभल कर चल रही हूँ मैं

फिर भी ना जाने क्यों फिसल रही हूँ मैं

आइना हर रोज़ दिखाता है निशाँ नए

इस कदर ना जाने क्यों बदल रही हूँ मैं

जब से चढ़ी है नज़र में खुमारी

किसी के दिल में उतर रही हूँ मैं

कल सरी महफ़िल शमा कतरा गई मुझसे

या खुदा इस कदर निखर रही हूँ मैं

मेरी साँसे मदहोश करती है उन्हें

इस गुरुर से अभी तक उबर रही हूँ मैं

"सोनल" ये सारे आसार है मर्ज़-ए-मुहब्बत के

कुछ हवा बहकी है कुछ बिगड़ रही हूँ मैं


Tuesday, May 11, 2010

प्रेम के क्षण (१)


काँप गई

आलिंगन में
उन्मुक्तता है
इस बंधन में
पंख लगे है
धडकनों को
उबरू कैसे
इस उलझन से


कितने मादक कितने मोहक

नैन तुम्हारे
मौन में भी कितने मुखर
नैन तुम्हारे
इन नैनो ने विकल किया
ये तो सोये
पर जागे रात रात भर
नैन हमारे


दिन-ब-दिन

तुम चढ़ रहे हो
सीढ़िया सफलता की
मैं थक रही हूँ
नहीं चल पाती
उस रफ़्तार से
शायद मैं फिर
जुटा सकूँ
कतरा कतरा हिम्मत
जो हाँथ थाम लो
तुम प्यार से

Sunday, April 25, 2010

कायर(कहानी)

एक


आज समाजशास्त्र की किताब पढ़ते हुए ,मेरा शारीर तो वही रह गया और मन पंख लगा कर उड़ गया, जरुरी पंक्तिया रेकंकित करते हुए न जाने कब किताब के आखिरी पन्ने पर तुम्हे उकेरने लगा,मुझे हमेशा ऐसा लगता है, तुम्हे मेरे से अच्छा कोई भी तस्वीर में नहीं उतार सकता,

शुरुवात तुम्हारी आँखों से की कितनी गहरी ,रेखाए तो खींच दी पर उनकी शरारत और भोलापन...चलो वो मेरी नज़र में है वैसे भी तस्वीर अपने लिए बना रहा हूँ .

तुम कैमरे से शर्माती क्यों हो सोचती हो तुम्हारी रुसवाई ना हो जाए पर तुम मेरे लिए बस एक युवा देह नहीं हो तुम्हारे लिए मेरा आकर्षण हमारे शरीरों के पुष्पित होने से पहले का है ,मैं समझाता हूँ तो तुम झिड़क कर कहती हो "सारे लड़के एक से ही होते है ", मुझे देखो महसूस करो मैं सब जैसा नहीं हूँ ....

प्रेमी नहीं अब मैं तुम्हारा उपासक बन गया हूँ,तुम्हारी एक मुस्कराहट से उम्र काट सकता हूँ .



दो

तुम सिसक रही हो ,मैं तुम्हारे आंसूं भी नहीं पोछ पा रहा हूँ ,कितने सवाल तुम्हारी आँखों में है ,सदमें में आ गया था जब तुमने कहा था एक नया रिश्ता तुम्हारे अन्दर सांस लेने लगा है,तुमने कितने विश्वास से कहा था मुझसे चलो ज़िन्दगी शुरू करेंगे और मैं आसमान से ज़मीन पर एक पल में आ गया था ,मेरी दोनों बहने अभी कुँवारी है ...रिश्ते कैसे होंगे ,जॉब भी नहीं है ...पढ़ाई का एक साल भी बाकी है अभी कैसे ...

तुम होठ वक्र करके कहती हो "कैसे " ये तुमने उस समय क्यों नहीं सोचा जब ..अपने वासना रहित प्रेम का विश्वास दिला कर मुझसे समर्पण माँगा था और कहा था "मैं सब जैसा नहीं हूँ " कायर

तीन

बाइस साल बीत गए .. तुम आज सामने खड़ी हो एक स्वनाम धन्य लेखिका ,समाज सेविका के रूप में जिसका जीवन वृत अपने आप में उदाहरण बन गया,अपनी संतान को बहुरास्ट्रीय कंपनी के उच्च पद पर बैठा कर स्वयं ज़मीन से जुड़ गई,हिंदी दिवस पर तुम्हारे सम्मान में ये आयोजन है ,मुझे स्वागत भाषण देना है , मेरे हाँथ काँप रहे है अतीत तेजी से आँखों के सामने घूम रहा है. तुम गुलदस्ता स्वीकार करती हो ..तम्हारे होंठो पर वह वक्र मुस्कराहट दौड़ जाती है .

मैं बौना होता जा रहा हूँ ..तुम्हारा कद आसमान छू रहा है ...मैं विचार शून्य हो गया हूँ ,तुम्हारे सामने खड़ा नहीं हो पा रहा .....मैं धीमे क़दमों से निकल जाता हूँ .... एक कायर की तरह

Thursday, November 19, 2009

आकर्षण

ये तन ऐसा है जो मन के हिसाब से चलता है पर दिमाग की बिलकुल नहीं सुनता, आज मेरा मन पता नहीं क्या क्या सोच रहा है शादी के आठ साल बाद आज ये इतना बेचैन क्यों है ,कितनी खुशहाल ज़िन्दगी चल रही है घर परिवार भरा पूरा है, ऐसा कुछ नहीं जिसकी कमी हो ,प्यार करने वाला पति दो प्यारे प्यारे बच्चे, बचा समय में घर पर पास के बच्चों को पेंटिंग और क्राफ्ट सिखा लेती हूँ, पूरे हफ्ते सब अपने में व्यस्त रहते है और रविवार को सारा दिन मस्ती...मेरी ज़िन्दगी ऐसी ही चलती रहती अगर मेरी मुलाक़ात इनके बचपन के दोस्त वैभव से नहीं होती....



वैभव और उसकी पत्नी मेधा ट्रान्सफर होकर लखनऊ आये तो उन्होंने इनसे संपर्क किया , अपने बचपन के दोस्त को करीब पाकर ये भी बहुत खुश थे, तीन दिनों में उनकी शिफ्टिंग और सब कुछ सेट हो गया, दोनों का स्वभाव बहुत अच्छा था, हमारा उनसे मिलना अक्सर होने लगा,बच्चों का मन भी उनके बेटे विशाल में रम गया......


मैंने और मेधा ने लगभग सब कुछ बाँट लिया अपनी रुचियाँ अपने सपने ,अपने विचार वैभव और ये भी हमारी बातों में बहुत रस लेते...दिन बीते होली आ गई, हम सारे होली की प्लानिंग करने लगे बच्चे तो हद से ज्यादा उत्साहित थे ,हमारे घर में होली का कार्यक्रम रखा गया , सुबह सुबह सब एक दुसरे के रंग लगाने में लग गए,मैंने मेधा को रंग लगाया और होली की बधाई दी,फिर मैं वैभव को रंग लगाने बड़ी और मैंने उनके गालों पर रंग मॉल दिया फिर क्या था वैभव और इन्होने मिलकर मुझे बुरी तरह से रंग लगाया..रंग लगवाते हुए अचानक मुझे वैभव का स्पर्श कुछ अजीब सा लगने लगा, मैं सहज नहीं हो पा रही थी मैंने वैभव की तरफ देखा तो उसकी आँखों में कुछ अजीब सी चमक थी......तभी बच्चे आ गए और हमारा रंग लगाने का कार्यक्रम ख़त्म हो गया...


होली तो चली गई पर अकेले में मुझे वो स्पर्श अचानक याद आता और मेरे मन में वैसी ही गुदगुदी होती जैसी शायद इनके पहले स्पर्श से हुई थी...वैभव अब भी आते पर मैं अब उतनी सहज नहीं रह पाती...उसकी आँखों में मेरे लिए आकर्षण साफ़ दिखता मेरे जन्मदिन पर मुझे हाँथ मिलाकर विश करते समय उसने मेरा हाँथ ज़रा जोर से दबा दिया और सर से पाँव तक मैं सिहर गई..


मेरे होंठों पर एक रहस्यमयी सी मुस्कान हमेशा रहने लगी, हमारी विवाहित ज़िन्दगी में जो ठंडापन आ रहा था वो कुछ कम होने लगा..मैं जब इनको स्पर्श करती या ये मुझको बाँहों में लेते तो मेरे मन में अचानक वैभव की छवि आ जाती और मैं और जोश के साथ इनसे लिपट जाती, ये मुझे छेड़ते क्या बात है आजकल तुम बदली बदली सी लगने लगी हो...मैं अपने मन में भी वैभव के लिए आकर्षण महसूस कर रही थी..दिमाग कह रहा था "क्यों अपना बसाया परिवार उजाड़ रही है " पर दिल ओ सपने बुन रहा था "इसमें बुराई क्या है किसी को मैंने बताया थोड़े ही है".........


मन हमेशा से ऐसा पाने को लालायित रहता है जो वर्जित हो मैंने कितनी बार कल्पना में अपने को वैभव की बाहों में देख लिया था और मन का चोर कहता था अगर ये सच में हो गया तो कैसा रहेगा,क्या वैभव भी ऐसा ही सोचते है मेरे बारे में ....


क्रिसमस की छुटियों आ गई और हमदोनो परिवारों नें मनाली जानें का कार्यक्रम बना लिया...सच कहूं इनके साथ जाने से ज्यादा मेरा मन वैभव के पास होने के एहसास से खुश था पैतीस साल की उम्र में मुझ में सोलह साल की लड़की सा अल्हडपन आ गया था,सारे रास्ते हम हंसी मज़ाक करते गए बीच बीच में वैभव मुझपर एक प्यार भरी निगाह डाल देता,...दोनों शायद अपने अपने दिल के हांथों मजबूर हो रहे थे, और इस सब में ये भूल बैठे थे की हमारे साथ हमारे जीवन साथी भी हैं ,जो शायद इस बदलाव को महसूस कर रहे थे....


मेधा बहुत समझदार थी, एक स्त्री होने की वजह से उसकी छठी इन्द्रिय ज्यादा सक्रिय थी, शाम को ये और वैभव जब बच्चों को झूले पर ले गए तो मैं और मेधा अकेले बातें करने लगे,


मेधा बोली " नीतू बहुत ठण्ड हो रही है इससे अच्छा हम लखनऊ में ही रहते "


मैंने उसकी बात को मज़ाक में लेकर बोला "क्यों क्या मज़ा नहीं आ रहा ..इतना अच्छा मौसम इतना सुकून मेरा तो यहाँ से जाने का मन ही नहीं कर रहा लगता है बस समय यहीं रुक जाए "


"यही अंतर होता है नीतू किसी को एक एक पल भारी सा लगता है और किसी के लिए समय के पंख लग जाते है " मेधा ने दार्शनिक से संदाज़ में बोला


"तेरे मन में क्या है मुझको तो बता सकती है " मैंने अपने मन के चोर को दबा कर पूछा


"नीतू मैं थोड़े समय से वैभव में बदलाव महसूस कर रही हूँ, मेरा भ्रम भी हो सकता है,मुझे कभी कभी लगता है जैसे ये मेरे साथ होकर भी एरे साथ नहीं है " मेधा के गेहुएं चेहरे पर चिंता की लकीर खीच गई


मेरा चेहरा फक पड़ गया ऐसा लगा बीच बाज़ार में निर्वस्त्र हो गई हूँ ,अबी तक दिमाग की बातों को दिल सामने आने नहीं दे रहा था पर अब दिमाग दिल पर हावी होने लगा " अगर मेधा नें वैभव में परिवर्तन महसूस किया है तो इन्होने भी तो महसूस किया होगा " मेरी हिम्मत नहीं पड़ रही थी की मैं मेधा से निगाह मिलाऊं .


"मैडम होटल चलें बहुत थक गया हूँ " सामने से इन्होने मुस्कुराते हुए कहा "तुमको क्या हुआ " इन्होने मेरा उतरा चेहरा देखकर पूछा "


"मैं भी बहुत थक गई हूँ " मैंने सकपका कर जवाब दिया


मयंक सो गए पर मेरी आँखों से नींद तो कोसों दूर थी "मैं क्या करने जा रही थी ,अपना पति ,अपने बच्चे अपनी दोस्ती सब कुछ इतने सारे रिश्ते एक पल के आकर्षण पर दांव पर लगा रही थी " मेरी आँखों से आंसू बह निकले और मैंने अपने पास लेते हुए मयंक को देखा जो बच्चों जैसी निश्तित्ता के साथ सोये हुए थे अचानक मैं माक से लिपट गई ,मयंक नें मुझे रजाई में खीच लिया और मैं उनके सीने से लग कर सो गई .....


सुबह जब आँख खुली तो मन हल्का हो चुका था आसमान के साथ मन से भी बादल छंट चुके थे, मुझे सुकून था मैंने अभी कुछ खोया नहीं था अब मुझे वैभव को भी उस आकर्षण से बाहर निकालना था जिसके चलते हम दोनों अपने रिश्तों में ज़हर घोलने चले थे....


"आज स्कीइंग करने चलते है " वैभव नें मेरी तरफ देखते हुए कहाँ बच्चे भी हाँ में हाँ मिलाने लगे


"अगर आप लोगों को प्रॉब्लम ना हो आप लोग बच्चों को लेकर चले जाओ, आज हमारा मूड होटल में ही रहने का है" मैंने रोमांटिक अंदाज़ में मयंक के गले में बाहें डालते हुए कहा.


"आप अपना सेकंड हनीमून मनाइए बच्चे हमारे साथ चले जायेंगे, मयंक आज नीतू मैडम मूड में है ज़रा संभल कर " मेधा ने मुस्कराते हुए अपनी दाई आँख दबा दी...


मयंक,मेरे और मेधा के ठहाके गूँज उठे और शायद वैभव भी मेरा इशारा समझ गया और मुस्कुरा दिया...