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Wednesday, December 29, 2010

अरे बाबा सब झोलम-झोल

तोड़ो गुल्लक
निकालो सिक्के
चन्दा जैसे
गोल गोल
पिछला साल
गया खर्चीला
इस बरस तो
तोल के बोल
मीठे खट्टे
तीखे तीखे
जिए कितने
पल अनमोल
हिसाब निन्यानबे का
मिलता ही नहीं
अरे बाबा
सब झोलम-झोल

Wednesday, December 22, 2010

ये दरवाजे !!


मुझे कहानिया बहुत पसंद है ..सड़क पर चलती कहानिया ,पालने में पलती कहानिया सब बेहद लुभाती है ...किसी से कहूं तो पागल कहेगा पर हर चीज़ मुझसे बात करती है ..सबके पास कहने को बहुतकुछ है ...पर मेरे पास वक़्त कम रहता है ..कल नाराज़ होकर घर के दरवाजे ने रोक लिया ...कितनी जल्दी में रहती हो ..दो पल तो रुक जाया करो ... मेरा जुड़ाव है तुझसे वरना कभी नहीं कहता तुझे ..जब तेरी माँ गोद में लेकर तुझे घर के अन्दर आई थी तबसे ... अब क्या करती ठहर गई ..हीर वही कहानी सुनने का शौक ....हाँथ लगते ही एहसास हुआ जब दादी अंतिम यात्रा पर जा रही थी तब इसी दरवाजे को पकड़ कर कितना रोई थी इसने ही तो सहारा दिया था ..
भाभी जब दुलहन बन आई थी तब सारे नेग रस्में इसी दरवाजे के सामने हुए ...सब बातों का गवाह है ये ...जब भाई नाराज़ होकर घर छोड़ कर गया तो पापा ने गुस्से में यही दरवाजा कितनी डोर से बंद किया था ..फिर आधे घंटे बाद से फिर दरवाजे पर उसके आने का इंतज़ार .....
उफ़ ....पर इसी दरवाजे से मेरा हाँथ भी तो दबा था और मैंने कितना मारा था इस दरवाजे को ...माँ गोद में लेकर घंटों बहलाती रही थी मुझे ..अरे वो दर्द तो फिर से ज़िंदा हो गया ....
ये दरवाजा गवाह है हर आगमन और प्रस्थान का.. चाहे अनचाहे हर मेहमान का ....जितना ये घर के अन्दर की बातें जानता है उतनी बहार की दुनिया की असलियत भी ...अन्दर होने वाली महाभारत को छिपा जाता है ....पैसे की तंगी ...मनमुटाव सब छिपे रहते है ...सिहर गई ये सोच् अगर ये दरवाजे ना होते तो ........



Tuesday, December 21, 2010

सर्द मौसम

चटक चांदनी
फीकी सुबहें
मौसम का
अंदाज़ है
सुबह हवा ने
...बतलाया था
सूरज कुछ
नाराज़ है
धुंध लपेटे
चुप पड़ा है
बड़ा बिगड़ा
नवाब है
 

Tuesday, December 7, 2010

ये जो मेरा चेहरा है


(१)
ये जो मेरा चेहरा है
खुशियों से जड़ा  है
हर वक़्त खिलखिलाहट
जैसे झुण्ड चहका है
आँखों में सितारों सी
चमक सदा है
इतनी लम्बी मुस्कराहट
हर लम्हा फ़िदा है
सदा दमकते है
मोती जिनके बीच
उसने कभी लबों को
सीप सा भी कहा है
मुस्कान के साथ पड़ते
गालों में गढढे
आँखों के करीब
दो पर्बत से उठते
 मेरे चेहरे का वजूद
सबसे अलहदा है
(२)
ये जो मेरा चेहरा है
दर्द का फलसफा है
हर वक़्त सिसकियों की
गूँज से भरा है
आँखों से रिसती
सीलन इस दिल की
हर लम्हा यहाँ
सावन सा ही रहा है
आँखों के पास पड़े
स्याही के घेरे
देखे न जैसे
उजले सवेरे
मायूसी मेरे
वजूद का हिस्सा है

Monday, December 6, 2010

टीवी मेरी तौबा

आज बहुत फुर्सत में थे तो सोचा कुछ समय का खून किया जाए ,आखिर कितना भी सदुपयोग करे एक दिन तो टाइम पूरा होना ही है ..तो बस अपने हांथो में रिमोट थमा और शुरू हो गए ..बाप रे भावनाओं का सैलाब उमड़ पड़ा, सारी दुनिया उलट पुलट हो गई ..और हमको अपने आप पर इतनी शर्म आई की क्या कहे ..हमको तो पता ही नहीं क्या क्या हो रहा है हमारे देश में बाल विवाह ,सतीप्रथा,अग्नि परीक्षा ,गंगा की धीज... इसमें से कुछ तो हमने सुना था इतिहास में दर्ज है पर भला हो टीवी का जो हम आज जान पाए पर डर भी लगा कही मेरी सासू मां गर यही देखती हुई और कहा "ज़रा अंगारों पर चल कर या नदी में डूब कर पवित्रता साबित कर फिर "


घबरा कर चैनल बदल दिया सारा मौसम गुलाबी हो गया खूबसूरत सी नायिका अकडू सा हीरो एक दुसरे को प्यार से देखते हुए ..गुदगुदी तो हमारे भी दिल में हुई ..पर ये गुदगुदी धीरे धीरे खीज में बदलने लगी क्या करते ...पूरा ३ मिनट २२ सेकेण्ड एक दुसरे को घूरते रहे और ठंडी आहें भरते रहे ..हमको विशवास हो गया पेमेंट ना मिलने से dialog लेखक बीच में भाग गया है ...

फिर थोड़ी -थोड़ी देर में हर तरफ वही नज़ारा भारी साड़िया,कुंदन के जेवर दिल फुंक कर रह गया जहाँ हम सारा दिन ऑफिस से घर की चक्की में पिसे रहते है वहीँ ये महँ देवियाँ आराम से घर में नौकरों को किसी न किसी त्यौहार की तैयारी के लिए बनने वाली मिठाई की लिस्ट समझा रही होती है ...

बहुत सुन रहे थे की आजकल रेअल्टी शोज़ में सच्चाई दिखाते है तो बस इसी उम्मीद में एक चर्चित कार्यक्रम देखने बैठ गए ..शुक्र है अकेले थे अगर परिवार साथ में होता तो शायद तुरंत चैनल बदलते और कहीं छोटे बच्चे होते तो वो हर बीप पर मतलब पूछ कर बैठना मुहाल कर देते.. हमारे बचपन में ११ बजे के बाद दूरदर्शन पर आने वाली फिल्मे भी इनके प्राइम टाइम status को छू नहीं सकती ...

न्यूज चैनल लगाने की हिम्मत की तो कहीं "मुन्नी के बदनाम होने की चर्चा " ,तो कहीं "शीला की जवानी पर गोष्ठी" देख हमको अपने तुच्छ होने का एहसास हुआ और हम अपना सा मुह लेकर वापस लैपटॉप पर आ गए,और फैसला किया जब तक हम इतनी समझ नहीं पैदा कर ले, रिमोट हाँथ में नहीं लेंगे और अगर लेंगे भी तो बस dusting के लिए ...

Tuesday, November 30, 2010

तेरी बाते जामुन जामुन

कुछ तुम  पागल 
कुछ मैं पागल 
 साथ बटोरें
चल  कुछ बादल
कभी तुम अंधड़
कभी मैं बिजली
कहीं तुम गरजे
कहीं मैं तड़की
जब तुम रूठे
कुछ तुम बरसे
जब मैं बिगड़ी  
कुछ  मैं पिघली
तेरी बाते
जामुन जामुन 
मेरी बाते
इमली इमली
दिन बीता
तुझे मनाते
रूठी रूठी
रात भी छिटकी
आओ अब तो 
साथ निभाओ
कहती है
पाँव की चुटकी

Thursday, November 25, 2010

मुझसे भी तो बाटों चाँद

पतला पतला काटों चाँद
मुझसे भी तो बाटों चाँद
ओस बन टपके आंसूं
ऐसे तो ना डाटों चाँद

सिन्दूरी सुबह कजरारी रात
अपना रंग भी छाटों चाँद

करवा चौथ पे तू भी देखे
इस धरती पर कितने चाँद

बरसे जो सिक्को की माफिक
बारातों में लूटो चाँद
लटके लटके थके नहीं तुम
कभी तो नभ से टूटो चाँद


Friday, November 19, 2010

मैं काजल हो जाती हूँ

 
मुझे जलना भा रहा है
मैं तो यूँही जल जाती हूँ 
तुम शमा बनोगे बोलो ना
मैं परवाना हो  जाती हूँ
तेरी खुशबू मन को भाये
मुझे मस्त करो और बहकाए
तुम कली बनो और इठलाओ
मैं भंवरा बन मंडराती हूँ
इतनी दीवानी चाहत में
मुझको मेरा होश नहीं
तुम मुक्त पवन के झोके से
और मैं आँचल हो  जाती हूँ
तुम हो प्यासे मैं रस से भरी
फिर रहे अधूरे अधूरे क्यों
तुम फैला दो अपनी बाहें
और मैं बादल हो जाती हूँ
तुम कितने भोले भाले से
जी भर देखूं तो नज़र लगे
मुझको भर लो तुम आँखों  में
और मैं काजल हो जाती हूँ
 
 
 
 

Wednesday, November 10, 2010

मैं आ रही हूँ

Jaisalmer

कुछ लम्हे चुराकर
रेत में दबाने जा रही हूँ
रेत में डूबकर
ज़िन्दगी पाने जा रही हूँ
बवंडर यादों का
समंदर वादों का
सुनहरी शाम को
गुनगुनाने जा रही हूँ
हवा ने बुलाया है
नया रुख दिखाया है
सीमेंट में घुट ना जाए
सपनो को धुप
दिखाने जा रही हूँ
सुना है तन्हाई भी
गीत गाती है वहां
समय की घडी
रुक जाती है वहां
दफ़न होकर भी
मुक्त नहीं होते
उन सायों में
समाने जा रही हूँ
 

मैं आ रही हूँ

Wednesday, November 3, 2010

अबकी दिवाली ना जाए खाली

अबकी दिवाली ना जाए खाली


मुझको तारो से सजा दो

तारे गर हो दूर बहुत तो

दो चार हीरे ही तुम ला दो

दीप सजे तो रात सुनहरी

दीपमालिका मुझे बना दो

लौ से मैं कहीं झुलस ना जाऊं

सोने के कंगन गड़वा दो

जगमग जगमग हर घर आँगन

द्वार द्वार पर सजी रंगोली

रंग अगर मिटने डर हो

सतरंगी चूनर दिलवा दो

जितना चाहूं उतना पाऊं

जितना पाऊं उतना चाहूं

बनी रहूँ मैं तेरी प्रेयसी

ऐसा कुछ मंतर पढवा दो

Wednesday, October 27, 2010

बेबस और आवारा चाँद

एक शाम का राजा होता
हर कोई दुलराता है
कब आएगा कब आएगा
कह कर टेर लगाता है
सबकी आँखे नभ पर चिपकी
अपने रंग दिखाता चाँद  
कितना ख़ास हूँ आज की रात मैं
सोच सोच इतराता चाँद
अभी तलक तो नभ में लटका
सबका था राजदुलारा चाँद 
खिड़की खिड़की झाँक रहा अब
बेबस और आवारा चाँद
 

Monday, October 25, 2010

ऐसे करवाचौथ मनाऊं


मेहँदी रचाऊं
रूप सजाऊं
बांध पायल
तुझे रिझाऊं
गहरी आँखे
गहरा काजल
तुझे पिया मैं
कहाँ बसाऊं
रात सी वेणी
चाँद का गजरा
लट का बादल
बिखरा बिखरा
चाँद सा मुखड़ा
चाँद की बाली
आई रात
सुहागों वाली
चाँद पिया और
चाँद हूँ  मैं भी
ऐसे करवाचौथ
मनाऊं

Thursday, October 21, 2010

इसी का नाम प्यार है

खामोश कीचड़ की तरह


वजूद से लिपट गए हो

तुम्हारे नाम के छीटों से

आज भी आँचल दागदार है

भरे ज़माने में रुसवा हुए

निगाह ना उठा पाए

तुम हँस के कहते हो

इसी का नाम प्यार है

Tuesday, October 12, 2010

नवरात्र

नवरात्र !


(शीतला माता ,गुडगाँव )

देवी के दिन इन दिनों का अलग ही उत्साह रहता है एक नारी के जीवन में ,इतनी शक्ति महसूस होती है इनदिनों पूछो मत हर उम्र में अलग रंग लाता है ये त्यौहार ,साल में दो बार, बचपन में जहाँ हलवा पूरी,दही जलेबी,रंगीन चुनरी और चमचमाते और खनखनाते सिक्को का आकर्षण ,तरुणाई में नौ दिन के व्रत ,देवी उपासना और सुरगा सप्तशती का पाठ.

साल के बाकी दिनों से कितना विरोधाभास दीखता है समाज में इन दिनों ,जहाँ साल भर लड़कियों को हे द्रष्टि से देखा जाता है वहीँ इनदिनों ढूंढ मच जाती है कन्याओं के लिए ...वाह रे समाज ,जिनका पैर पूजन करते है उन्ही के घर में पैदा होने पर उदासी का माहौल बना लेते है ( सोच बदल रही है पर मंजिल अभी भी दूर है ).

इन दिनों माँ अपनी कृपा के सारे द्वार खोल देती है जितना मांगो उससे ज्यादा मिलता है , रोज़ की उठापठक बस हाँथ जोड़कर काम चला लेते है कम से कम नवरात्र के बहाने ही सही साल में दो बार,थोड़ा आध्यात्मिक हो जाते है तो मन को शान्ति मिल जाती है .

आप सभी को नवरात्र बहुत बहुत शुभ हो

Wednesday, October 6, 2010

रहस्यमयी

"लिखना जरूरी है क्या उसने सिगरेट के धुएं  से छल्ला बनाते हुए कहा"


"तुम्हारे लिए जैसे सांस लेना ज़रूरी है वैसे ही मेरे लिए लिखना"
"कैसा महसूस करते हो कोई रचना जब स्वरुप लेती है" ,अब वो एक पत्रकार की तरह बात कर रही थी
बहुत उलझा हुआ,करेक्टरहै ये प्रिया भी ,आज तक समझ नहीं पाया ,अगर उसके पंख होते तो शायद अब तक आसमान में होती एक आज़ाद परिंदे में और उसमें बस पंखो का ही अंतर था, एक डाल से दूसरी बिना किसी क्षोभ के गिल्ट के ,

"जीवन नदी की तरह है इसपर जितने पुल और बाँध बनोगे इसकी गति उतनी मंथर होगी और एक दिन जीवन समाप्त "
बाप रे लेखक तो मैं नाम का हूँ अगर वो अपने ख़याल लिखने लगे तो रातो-रात स्टार बन जाए .................
रात से याद आया उसको रात बहुत पसंद है, अँधेरी सूनसान, कहती है अपने को जानने का सही मौक़ा मिलता है रात को ...नीरव, इन्ही नीरवता भरी रातों में जब हम दोनों एकाकार होते है तब मुझे उसके मन में पसरा सन्नाटा और करीब से दिखता है हाँ मैं देख सकता हूँ ,सब साफ़ साफ़

वो ऐसी क्यों है हमेशा पुछा पर नहीं जान पाया ...हस देती "तुम मेरा वर्तमान हो ना तो अतीत के पीछे क्यों पड़ते हो,कब्र खोदकर सड़ी बदबूदार लाश बाहर मत निकालो वर्तमान भी मुश्किल हो जाएगा."

पर मैं इस चंचल नदी का स्त्रोत जानना चाहता था,ऐसी मुझे कभी कोई नहीं मिली ,इतनी निर्लिप्त की उसके इस निर्लिप्त स्वरुप से निकलने का मन ही ना करे ..गज़ब का आकर्षण, हफ़्तों बिता दिये उसके साथ सोते जागते पर मोह बढता गया ,और साथ में जिज्ञासा भी.

उसने कुछ शर्ते रखी थी साथ आने से पहले , कभी अतीत पर कोई सवाल नहीं करना ,रिश्ते में बाँधने की कोई कोशिश मत करना....
मुझे अक्सर वो शिवानी की नायिका सी लगती ..खूबसूरत,स्वतंत्र, रहस्यमयी
कई बार मैंने उसे कहा चल मैं तेरी कहानी लिखता हूँ ,उसका जवाब हमेशा एक था जिस दिन मेरी कहानी लिखो हमारे रिश्ते पर समाप्त लिख देना.
अब मेरी जिज्ञासा इस हद तक बढ़ गई थी की मैं उसकी सभी वर्जनाओं को भी पार करना चाहता था आखिर ऐसा क्या है उसके अतीत में ????

उस रहस्यमयी के कमरें में इतिफाक से कहूं या जानकर...कलम ढूंढते हुए कुछ तसवीरें कुछ पन्ने हाँथ लग गए,और सच अनावृत हो गया..मैंने सच में एक कब्र खोद दी थी जिसमें से इतनी सड़ांध उठ रही थी की सांस घुटने लगी ...और वो तो इस सड़ांध के साथ जी रही थी ...

"कम उम्र में व्याह दी गई थी,दो गर्भपात, मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना. जीवन साथी बेहद शक्की,घर से बाहर जाता तो ताला लगाकर,मायके मित्रों से सारे सम्बन्ध ख़त्म करवा दिए..... ये नरक चलता रहता एक दिन एक्सिडेंट के बाद बिल्लाख बिलख कर रोई ,दुनिया उसके आंसू दुःख के समझ रही थी ,उसको विशवास नहीं हो रहा था की अब वो आज़ाद थी..."

तभी वो अब किसी बंधन में पढ़ना नहीं चाहती ..एक दम दिल में आया उसको गले से लगाकर कहूं मैं हूँ ना,मैं तुम्हारे जीवन में खुशियाँ लाउंगा,जो चाहो जैसा चाहो,मैं साथी बनूँगा ....

"नहीं माने ना तुम " वो सामने खड़ी थी ,मुस्कुराते हुए ..मैंने सोचा उसको गुस्सा होना चाहिए था पर वो तो हस रही थी ...
"तुमने आखिर समाप्त लिख ही दिया ना " उसने कुछ तल्ख़ स्वर में कहा और तेज़ क़दमों से निकल गई ....

उस रहस्यमयी को रोकने के लिए मैंने हाँथ तो उठाया पर रोक नहीं पाया ...

Friday, October 1, 2010

चले जाओ यहाँ से तुम

बुझा दो चांदनी को तुम



के मेरा जिस्म जलता है


हवा के सर्द झोकों  से


आँख में दर्द तिरता है


सुलग उठे जो तारे भी


पिघल के छुप गए बादल


छुपा दो नर्म फूलो को


झलक से नील पड़ता है


लगा दो पाबंदी हसने पे


औ curfew गीत गाने पे


कोई कोयल जो गर कूके


कानो में सीसा पिघलता है


तुम्हारे प्यार के किस्से


तुम्हारी चाशनी बातें


चले जाओ यहाँ से तुम


के मेरा दम भी घुटता है














Sunday, September 26, 2010

चलो मैं बे-वफ़ा हो जाती हूँ

इतनी नजदीकी अच्छी नहीं


चलो कुछ खफा हो जाती हूँ

अपना ही मज़ा है बेचैन करने का

चलो मैं बे-वफ़ा हो जाती हूँ



तेरे सामने आऊं भी नहीं

तुझे महसूस हर लम्हा रहूँ

मांगे तू भी साथ मेरा शिद्दत से

चलो मैं खुदा सी हो जाती हूँ



कब तक नशीली रात सी रहूँ

होंठो पे छिपी बात सी रहूँ

जान जाए ये ज़माना मुझको

चलो चटख सुबह सी हो जाती हूँ



जितना जानो उतना उलझ जाओ

इतना उलझो ना सुलझ पाओ

ना जाने किस वक्त ज़रुरत पड़े

चलो मैं दुआ सी हो जाती हूँ



कभी देखो तो अनजान लगूं

कभी दिल की मेहमान लगूं

एक झलक देख लो तो दीवाने हो जाओ

चलो मैं उस अदा सी हो जाती हूँ

Tuesday, September 21, 2010

क्रमश: आगे क्या ?

"अरे काका सठियाय गए हो का ? तनी आपन भेस तो देखा " लल्लन ने चौकते हुए कहा,
 "अब इ ससुरा लड़का लोग चैन से रहने भी नहीं देत है आप से मतलब रखे तो ठीक " मन में बडबडाते हुए बिसेसर काका बोले.
"का हुई गवा " गाँव के सबसे बड़े ठलुआ और बिसेसर के हमउम्र निहाल चाचा ने हुक्का गुदगुदाते हुए पूछा,

"तनी काका का भेस तो देखा ,ज़िन्दगी भर सूती कुरता और धोती में निकाल दीन अब साठ के हों को है तो पालिस्टर की शर्ट पैंट पहिन के घूम रहे हैं ".

"साठ के हुई हैं तोहार बाप, हमार तो अभे पचपन भी पूरे नहीं हुए हैं " बिसेसर बाबु तिलमिला गए और जलती निगाओ से लल्लन को देखा तो मुह में खैनी दाबे मुस्कुरा रहा था.

"अरे बिसेसर तोहार तो रंगे दूसरो लग रहो हैं " अब निहाल की भी हसी छुट गई

"आज भोर में ना जाने कौन मनहूस का चेहरा देख लिए थे जो ,जे मनहूस सामने पड़ गए अब ससुर के नाती सामने से हट भी नहीं रहे है , मिस जी इंतज़ार कर रही होंगी " बिसेसर जी के चेहरे से बेचैनी साफ़ झलक रही थी

"कहीं जाय को देर हो रही हो तो हम अपनी फटफटिया पर अभई छोड़ देते है " लल्लन ने जले पर नमक डालते हुए कहा.पर बिसेसर ने अनसुना कर अपने कदम तेजी से प्रौढ़ शिक्षा केंद्र की तरफ बढा दिए .

दो महीने से बिसेसर बाबु स्कूल पढने जा रहे थे और स्कूल में पढाई से ज्यादा उनका ध्यान मिस जी में लगने लगा था,
बड़े भैया,भाभी के गुजरने के बाद उन्होंने दोनों बच्चों की ज़िम्मेदारी अपने सर पर उठा ली,उनको शहर भेजा उनकी पढाई का इन्तेजाम और सारी व्यवस्था करने में उम्र इतनी तेजी से निकल गई शादी के बारे में सोचने का समय ही नहीं मिला,बच्चे अपने में व्यस्त हो गए, काम सँभालने के लिए नौकर चाकर थे ही.
जब जिम्मेदारियां ख़तम हुई तो बिसेसर बाबु को अपने अकेले होने का एहसास सालने लगा, तो बच्चों ने जिद की आप पढ़ लिख लो तो आप का समय भी कटेगा और काम सँभालने में आसानी हो जायेगी.
मिस जी कितनी समझदार हैं कितना आसानी से हमार परेसानी समझ जाती है ,कितना बेर एक प्रश्न पुछो कबही नराज़ नहीं होती, कौनुह अच्छे परिवार से हुई हैं बड़ी संस्कार वाली है, जे गाँव-देहात की लुगाइन की तरह नहीं...कपडा भी सलीका से पहिनती है....मन में सोचते हुए बिसेसर स्कूल पहुँच गए,
क्रमश:
"इस कहानी के लिए मुझे इससे अच्छा शीर्षक नहीं मिला,यहाँ तक तो लिख गई आगे क्या करूँ भ्रमित हूँ ,आप भी अंत लिख डालिए ,मैं अकेली क्यों परेशान हूँ ?

Friday, September 10, 2010

दिल को निचोड़ कर

दिल को निचोड़ कर दर्द सुखा दिया


दो बूँद टपकी थी पोछा लगा दिया

शिकन बहुत थी करवटों की चादर पर

जोश की इस्त्री से उसको मिटा दिया

नमक की लकीरें पलकों के मुहाने पे

भाप की गर्मी से उड़ा दिया

मुए अरमान चिपक गए कलेजे से

आह भरी और सब पिघला दिया

उनका आसरा था वो आये भी नहीं

हमने भी हमसफ़र को अजनबी बना दिया

कुछ लकीरों ने कुछ हालात ने तय किया

अच्छे खासे इंसान को आशिक बना दिया

Saturday, September 4, 2010

पिघलते है युही अक्सर

पिघलते है युही अक्सर


तेरे आगोश में हम भी

सुलगकर राख होते है

कभी ज्यादा कभी कम भी

युही जब सर्द मौसम में

तन्हाई सताती है

झुलस जाते है अन्दर तक

छू जाए जो शबनम भी

तेरे नज़दीक होने से

गुनगुनाती है मेरी धड़कन

नए से सुर उमड़ते है

कुछ तीव्र कुछ मध्यम भी

छाए हो आकाश में बादल

तेरे आने की आहट हो

सिहर उठते है दस्तक से

मेरे दर भी और दामन भी

Tuesday, August 31, 2010

कान्हा मांगू तेरा संग

हर रूप
हर रंग
कान्हा मांगू
तेरा संग
शिशु तुमसा
ममतत्व जगाये
सखा तुमसा
दौड़ा आये
प्रिय तुमसा
नेह बढाए
साथी तुमसा
हर वचन निभाये
चरणों में जब
नयन लगाऊं
ये जीवन
सार्थक हो जाए
"आपसभी को कृष्णजन्मोत्सव की शुभकामनाये "

Thursday, August 19, 2010

द्रुपदसुता "याज्ञसेनी " के लिए .....

नियति और दुर्गति का यदि संयोग देखना हो तो द्रुपद पुत्री कृष्णा (द्रौपदी) से सजीव कोई उदहारण नहीं है, उसकी स्वयं की नियति के साथ वह कुरुवंश के पतन की नियति भी बनी .....



"जीता उसने जिसको मन हारी

इश्वर की थी वो आभारी

बंटी अन्नं के दानो सी वो

टूटी बिखरी नियति से हारी

पिता गर्व का विषय थी वो

जन परिहास का विषय बनी

कुलटा,पतिता बहुपुरुष गामिनी

आक्षेपों की भेंट चढ़ी

पुन: सहेजा पुन: समेटा

बनी वंश की जीवन शक्ति

नग्न धरा पर सोई वो

तज विलास,वैभव आसक्ति

अपनों के हांथो छली सदा

अनुत्तरित हर प्रश्न रहा

द्यूत  में कैसे दाव लगी

रानी से दासी क्यों बनी

जिनके हांथो आशीष मिले

चीरहरण वो देखते रहे

अपमान की अग्नि से

दग्ध ह्रदय

हर पीड़ा कृष्ण से कहे

सखी थी लीलाधर की

फिर इतने कष्ट क्यों सहे

(क्रमश:)

जितनी बार चित्रा चतुर्वेदी जी की महाभारती पढ़ती हूँ उतना अधिक मन एं सम्मान बढ़ जाता है द्रुपदसुता "याज्ञसेनी " के लिए

Monday, August 16, 2010

ये धोखा है प्यार नहीं

एक कच्ची सी नज़्म लिखी


जो पकने को तैयार नहीं

मैं शमा बनी वो परवाना

वो जलने को तैयार नहीं

आहें भी भरी आंसू भी बहे

दिल मिलने को तैयार नहीं

आज़ादी दी और पंख दिए

वो उड़ने को तैयार नहीं

सब जग छोड़ा जिनकी खातिर

वो जुड़ने को तैयार नहीं

पर्वत से अकड़े बैठे है

वो झुकने को तैयार नहीं

हमको पक्का यकीन है

ये धोखा है प्यार नहीं

Wednesday, August 11, 2010

हम तो छप गए ...रवीश जी को बहुत बहुत धन्यवाद

- Guest column - Vimarsh - LiveHindustan.com


सच में कभी नहीं सोचा था दिल की बातें जो यूँ ही ब्लॉग पर डाल देती हूँ एक दिन खबर बन छप जायेंगी ...
आज का दिन आश्चर्य से भरा हुआ रहा ..जब पता चला मेरे ब्लॉग की चर्चा हिन्दुस्तान पर हुई है ...
खुद को ख़ुशी और परिवार को गर्व ......
आइये मेरी ख़ुशी में शामिल हो जाइए .. उत्साह तो आप सब ने बढाया है सदा ..

Tuesday, August 10, 2010

तू ही मुझे संवार दे

कुछ वियोगी मन हुआ
तन भी ना अब साथ दे
कोई ऐसा पल नहीं
जो मन को मेरे साध दे

साध मन की थी कभी
खुशिया सराहे फिर मुझे
बुझ गए आंसू में सब
दीप जितने थे जले

मुश्किल हूँ मैं
या वक़्त मुश्किल है मेरा
मिलता भी नहीं कभी
जब साथ मांगती हूँ तेरा

मैं इतनी बुरी ना थी
पर भली कब तक रहूँ
मन है पीड़ा से भरा
दर्द अब किससे कहूं

क्या कभी होगा प्रलय
टूट कर बह जाउंगी
मैं अपने जीवन का
अवशेष मात्र रह जाउंगी

नेह की बूंदे कभी कुछ

मुख पे मेरे डाल दे
बहुत बिखरी हूँ प्रिये
तू ही मुझे संवार दे

Saturday, August 7, 2010

ये सावन मन भाये ना ...

ये सावन


मन भाये ना

बदरा तुमको

लाये ना

दूर बिदेस में

बैठे तुम

सौतन कहीं

लुभाए ना

बाट निहारे

नैन दुखे

पीर हमारी

कौन सुने

काली आँखे

काली रात

उसपर उस

डायन की घात

मन तो

ऐसा ऐसा है

जाने

कैसा कैसा है

कोई टोना

डाल ना दे

तुमको मुझसे

टाल ना दे

जितनी डाह

है प्रेम में

उतना तो

अगन जलाये ना

Wednesday, August 4, 2010

अबकी बारिश में क्या क्या होगा

अबकी बारिश में क्या क्या होगा


हर कदम पर गड्ढा बना होगा

मौत को खुला आमंत्रण है

कदम कदम पे मेनहोल खुला होगा



घरो में नलों की टोटिया सूखी

सडको पे नदी- नालो का समां होगा

फ़रियाद करोगे भी तो किससे

प्रशासन तो सो रहा होगा



करनी पे शायद पछताए

भ्रष्ट नेता सुधर जाए

आज दिल्ली में खुला है पाताल का रास्ता

कल हर गली में खुला होगा

Monday, August 2, 2010

चेहरे पे चेहरा चढ़ाया है मैंने


हर सुबह आईने से


मुखातिब होता हूँ

किसी रोज़ तो

सही सूरत दिखलायेगा

चेहरे पे चेहरा

चढ़ाया है मैंने

एक रोज़ तो

ये उतर जाएगा

जो कहता है मुझसे

मैं सबसे भला हूँ

उसी का बुरा अक्सर

मैंने किया है

जो आया मरहम

की उम्मीद लेकर

बड़ा जख्म उसको

मैंने दिया है

हमेशा तो मेरी

ये फितरत नहीं थी

इस शहर ने शायद मुझे

कुछ और बना दिया है

Thursday, July 29, 2010

रात अधूरी ....

चिंदी चिंदी


टुकड़ा टुकड़ा

रात को जोड़ा

चाँद को पकड़ा

रूठा रूठा
हाथ  से छूटा

वो भूरा

बादल का टुकड़ा

कुछ बड़े

तारे चिपकाए

कुछ छोटे

यूँही छितराए

रात की रानी

मांग के लाये

काजल भरकर

नैन जलाये

लोरी गाकर

जग सुलाया

बनी प्रेयसी

तुझे बुलाया

अब काहे

मीलों की दूरी

आओ तुमबिन

रात अधूरी

Monday, July 26, 2010

एक डुबकी गंग धार में

एक डुबकी गंग धार में


कांवर के त्यौहार में

तन मन सब धुल जाए

हर हर गंगे हो जाए

सावन के उस मेले में

मन भर पाओ धेले में

सारा आँचल भर जाए

जय बम भोले हो जाए

दूध दही और शहद

धतूरा भांग और मृग-मद

बेलपत्रि सी चढ़ जाऊं

शायद मैं भी तर जाऊं

घर से इतनी दूरी है

ऐसी ही मजबूरी है

चुल्लू भर आचमन लिया

शायद मैं भी तर जाऊं

Saturday, July 24, 2010

लिखो ना.......(2)

लिखो ना.......


महका बेला

बिखरा काजल

हुई पिया की

बहका आँचल

लिखो ना ....

मधुमास में

मधुमय रातें

प्रेम पगी थी

मीठी बातें

लिखो ना.....

लड़ना चिढना

और रुलाना

देना ताने

फिर मनाना

लिखो ना .....

कितने पल

कितनी बातें

हमने बांटी

कितनी सौगातें

प्रेम तुम्हारा

साथ तुम्हारा

मुझपर ये

विश्वास तुम्हारा

एक सम्मोहन

एक आकर्षण

कर डाला

सबकुछ अर्पण

इतना प्यार

संवर गई मैं

लिखा ह्रदय पर

नाम तुम्हारा

Wednesday, July 21, 2010

लिखो ना ..

लिखो ना ..


पहली मुलाकात

हलकी हरारत

तेज़ धड़कन

आँखों में शरारत

लिखो ना ...

पहली छुअन

हलकी सरसराहट

तेज़ साँसे

बेहद घबराहट

लिखो ना ....

छोटी शामें

लम्बी रातें

बेबाक बे-तकल्लुफ

मीठी बातें

लिखो ना ...

सात फेरे

साथ मेरे

गूंजी शहनाई

नम बिदाई

लिखो ना ...

नया आँगन

सिमटी दुल्हन

कोरे रिश्ते

जुड़ते दिलसे

(जारी .... अभी बहुत लिखना है )

Sunday, July 18, 2010

रजनीगंधा बन महक उठूँ

मैं सोने सी कुछ आग सी

कभी चमक उठूँ कभी दहक उठूँ

ना जाने किस पल लहक उठूँ

दरिया को संग बहा लूं मैं

बिन मेघ भी जल बरसा लूं मैं

दुनिया के तंग घरौंदे में

गौरया बन मैं चहक उठूँ

खुद के रहस्य में उलझी मैं

टूट गई ना सुलझी मैं

ना जाने कोई किस रात में

ध्रुव तारे सी चमक उठूँ

खुशबू मेरे तन का हिस्सा

हर रंग मुझी से बावस्ता

ना जाने कब किस क्यारी में

रजनीगंधा बन महक उठूँ

Thursday, July 15, 2010

तुझसे दिल लगने के बाद

माना है वो बिगड़ने के बाद


बरसा है बादल सुलगने के बाद

कभी सामने आना गवारा नहीं था

आज हटते नहीं है निखरने के बाद

पानी मखमल सा सुर्ख लगता है

उनके दरिया में उतरने के बाद

बात है मीठी  या जबां मीठी है

जवाब आयेगा चखने के बाद

चाँद से हैं  या चाँद रात से है

खुलेगा राज़ हिजाब पलटने के बाद

क्या हैं कीमत मेरे प्यार की

हिसाब मिलेगा शायद मेरे बिकने के बाद

अंगडाई से क़यामत ना आ जाए

कौन बचेगा ज्वार उतरने के बाद

गुमसुमी हरारत बेहोशी और दीवानापन

सारे रोग लगे है तुझसे दिल लगने के बाद

कितने है मेरे मुरीद सिवा उनके

जानेगा ज़माना जनाजा उठने के बाद

Tuesday, July 13, 2010

ये हश्र एक रोज़ होना ही था

कितनी बेचैन गुजरी है रात

उमस भी हद से ज्यादा थी

पसीना और आंसू एक साथ बहे

घुटन जान लेने पर आमादा थी

तुम सोये सुकून से

हर रिश्ता तोड़ जो आये थे

हम पोटली लिए बैठे रहे लम्हों की

हमारे आँचल में छोड़ आये थे

चार आँखों का नसीब तय हुआ

दो को हँसना दो को रोना था

बड़ा गुरूर था अपनी मोहब्बत का

ये हश्र एक रोज़ होना ही था

Wednesday, July 7, 2010

!! बिना जुर्म सज़ा पाई है !!

समाज में आये दिन होने वाले एसिड अटैक पर आधारित.....

चुनरी सहेज दी है

जो गुडिया को उढाई थी

कद बढ़ते ना जाने कब

मेरे सर पर सरक आई थी

माँ ने सितारे टांके थे

मन्नतों के दुआओं के

काला टीका लगाया था

दूर रहे बुरी बलाओं से

पर .....................

आते जाते बुरी नज़र गड गई

एक पल के हादसे में

उसकी रंगत उजाड़ गई

दुआए ना बचा सकी

मेरा चेहरा तेज़ाब से

आज भी मवाद रिसता है

चुनरी के ख्वाब से

आज..........................



चीथड़े समेटकर

डस्टबिन में डाले है

झुलसी थी रात

आगे तो उजाले है

अतीत के निशाँ आईने में

रोज़ देखना दुखदाई है

कैसी मुजरिम हूँ मैं

जो बिना जुर्म सज़ा पाई है

Saturday, July 3, 2010

पहली बारिश और हम तुम....

सिमटे सिमटे


सीले सीले

आधे सूखे

आधे गीले

पहली  बारिश

और हम तुम

सुलगे सुलगे

दहके दहके

थोड़े संभले

थोड़े बहके

पहली  बारिश

और हम तुम

चाय की प्याली

गर्म पकोड़े

मुंह  में भरते

सी सी करते

पहली बारिश

और हम तुम

सावन आये

सावन जाए

जिया करेंगे

संग रहेंगे

पहली  बारिश

और हम तुम

Thursday, July 1, 2010

१ जुलाई , १ साल,१०० वी पोस्ट "राँझा राँझा ना कर हीर "

सौवी पोस्ट लिखने जा रही हूँ ये तो पता था पर आज १ जुलाई को मेरे ब्लॉग का साल पूरा हो रहा है ये अनायास पता चला .... बीज तो अंकुरित हो गया कुछ नन्ही -नन्ही कोंपलें भी दीख रही है ...मन खुश है ..अरे दोहरी ख़ुशी है ... बस आप लोग शुभकामनाये और आशीर्वाद दीजिये .....
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जब पहली बार तुमसे निगाह मिली थी तो शायद उस पल मेरी पलक बहुत देर में झपकी थी,जब दुबारा तुम्हे पलट कर देखा को दिल इतनी जोर से धड़क रहा था की कोई मेरी साइड में खड़े होकर मेरी धड़कन सुन सकता था, माथे पर पसीने की बूंदे,हाँथ पाँव ठन्डे ..सारे हार्ट अटैक के लक्षण.




उसके बाद महीनो तक तुम दिखे नहीं तुम्हारी शक्ल धुंधली सी सी होने लगी ,तुम्हे भूल गई ये तो नहीं कहूँगी पर भीड़ में कई बार तुम्हे ढूँढा जरूर, कमबख्त उम्र का ये मोड़ होता ही ऐसा है पूरी तरह केमिकल लोचा ,,,


कालेज का पहला दिन,कुछ घबराहट कुछ रोमांच सहेलियों के साथ अपनी क्लास ढूंढ रही थी,अचानक दिल मनो १२ वी मजिल से ग्राउंड फ्लोर पर बिना लिफ्ट गिर गया, तुम रैगिंग के लिए सामने थे ...उफ़ तुम क्या बोल रहे थे एक शब्द पल्ले नहीं पड़ रहा था... सारी दुनिया समझ रही थी मैं नर्वस हूँ पर क्यों ..ये तो तुमको भी नहीं पता....


अचानक ....कुछ सोचते हुए मुई लम्बी सी मुस्कान होंठो पर खेल गई ..तुमने नोटिस किया और सबके सामने एकदम बोल दिया "अरे क्लोसअप स्माइल " .सबकी निगाहें मुझ पर और मैं गडी जा रही थी ....


उस रात घंटो तुम्हारे ख्यालों के साथ करवट बदलती रही ..ब्लू शर्ट में बहुत सही लग रहे थे तुम ,बालों का स्टाइल कुछ ओके सा ही पर चलता है,हाँथ में मोती की अंगूठी .. गुस्सा बहुत आता है क्या ?


रात और सुबह के बीच का फासला कुछ घंटो का ही था और मैं फिर तैयार थी कालेज के लिए .... पर नामुराद ऑटो हड़ताल पर ...आज ही ये होना था फिर सन्डे ...दो दिन कितने मुश्किल थे क्या बताऊँ


सोमवार की सुबह ,शिव जी को हाँथ जोड़े ...आईने के सामने थोड़ा ज्यादा वक़्त लगाया,आज बाल कुछ ज्यादा मुलायम लगे ..चेहरा भी चमक रहा था ,कहीं पढ़ा था प्यार आपको और खूबसूरत बना देता है ..पर तुमको कैसी लगती हूँ ये ज्यादा improtant हैं .................... कोई मौक़ा नहीं छोड़ा मैंने तुम्हारे करीब आने का ... कभी नोट्स ,कभी हेल्प ..कभी कभी लगता तुम भी मुझे पसंद करते हो ..पर बोलना तो चाहिए ..


शायद मुझे ही प्रपोज मारना पडेगा .......... कही कोई और ना आ जाए तेरे मेरे बीच में ..


हर आशिक को लगता है किसी को पता नहीं चलेगा पर कमबख्त छुपता कहाँ है मानसी ने पकड़ लिया एक दिन ..क्या बात है मैम...कहाँ निगाहें और दिल अटका बैठी हो ......... दिल की लिफ्ट फिल १२ वी से बसेमेंट में ..धडाम चोरी पकड़ी गई ...कोई नहीं एक सांस में बता दिया उसको ...


पहले उसने बेहताशा हँसना शुरू किया


.."तुझे और कोई नहीं मिला ",


उसके बाद मैं बहुत देर तक इमोशनल रोलर कोस्टर पर सवार रही . हे भगवान् मुझे यही मिला था .. अगर मेरी सौत कोई लड़की होती तो लड़ भी जाती ...पर यहाँ तो रांझा रांझे पे मर रहा है ..........रांझा रांझा ना कर हीर
"न वो रांझा था ना मैं हीर थी

जो हुआ  वो तकदीर थी
 लम्हा जब गुजरा
दिल के दाग में हलकी पीर थी "

अपनी स्टोरी द एंड ..

Monday, June 28, 2010

दिन हरजाई

कुछ तन्हाई

एक रजाई

बदन तोडती

एक अंगडाई

ठन्डे हाँथ

तपती साँसे

अंगीठी से

गायब गरमाई

मौन मुखर

मुखरित आँखे

मौन अधर

मुखरित जम्हाई

सहज नेह

असहज हो तुम

असहजता को

दे आज बिदाई

रात ढली

तुम आये

जल्दी ढलता

दिन हरजाई

Wednesday, June 23, 2010

इश्क पर लिखूंगी


इश्क पर लिखूंगी ,

हुस्न पर लिखूंगी
दिलों के होने वाले,
हर जश्न पर लिखूंगी

दर्द पर लिखूंगी

मैं आह पर लिखूंगी
जुल्फों की घनी
पनाह पर लिखूंगी

चाँद पर लिखूंगी

और रात पर लिखूंगी
दो जोड़ी आँखों की
हर बात पर लिखूंगी

शमा पर लिखूंगी
मैं परवाने पर लिखूंगी
जलते बुझते
हर अफ़साने पर लिखूंगी

खिड़की पर लिखूंगी
मैं झलक पर लिखूंगी
रात भर ना सोई
उस पलक पर लिखूंगी

जब तक है धड़कन
और गर्म है साँसे
मोहब्बत मोहब्बत
दिन रात मैं लिखूंगी

Sunday, June 20, 2010

साँसों को सिसकने नहीं देते

अपने दर्द को


आँखों में उभरने नहीं देते

उभर भी आये तो

गालों पे बिखरने नहीं देते

इस जद्दोजहद में

भारी हो जाता है दिल

सँभालते है खुदको

धडकनों को सुबकने नहीं देते

मुस्कान गहरी होती जाती है

बढती तकलीफ के साथ

ठहाको में दबा देते है

साँसों को सिसकने नहीं देते

बहुत कोशिशे होती है

हमदर्दों की ,हमराहों की

दिल की उस गहराई में 

हम किसी को उतरने नहीं देते

Thursday, June 17, 2010

पहली उड़ान है सपनो की

जबसे उसने हथेली में

 उगा चाँद देखा है
मैंने उसकी आँखों में
उभरता अरमान देखा है

निकली है पहली बार वो
तनहा सफ़र पर
नाजुक परो ने उसके 
विस्तृत आसमान देखा है

पहली उड़ान है सपनो की
साथ दुआए है अपनों की
माँ  की आँखों में आज
सुकून और इत्मीनान देखा है

Friday, June 11, 2010

मेरी खुद से ही ठन जाती है

कुछ और हुआ मैं करती थी


कुछ और ही अब बन बैठी हूँ

सुन लो तुम्हारे आकर्षण में

खुद से ही लड़ बैठी हूँ

जुल्फ मेरी सुनती ही नहीं

और आंचल भी बेलौस उड़े

जब होंठ मेरे थर्राते है

मुस्काते हो तुम मौन खड़े

माथे पे पसीने की बूंदे

मोती सी दमकने लगती है

बढती धड़कन के साथसाथ

अब सांस दहकने लगती है

तुमने क्या सोचा खो दूँगी

खुद को इस हलचल में

मुझको तुम पा जाओगे

चाहत के उस एक पल में

माना पलकें ऊपर उठने में

मन भर बोझ उठाती है

खुद को वापस पाने में अक्सर

मेरी खुद से ही ठन जाती है

Wednesday, June 9, 2010

कल रुत तुमको तरसाए

नभ में उमड़े घन बड़े


बिजली भी बिन बात लड़े

तुम भी रूठे-रूठे से

बोलो कैसे बात बढे

बूंदे छेड़े जब मुझको

हवा दिखाए रंग नए

तुम्हे लगा मैं भूल गई

तुम भी तो थे संग खड़े

मेघ सदा बरसाए मद

जब तुम मेरे साथी हो

कैसे ना मदहोश हो हम

नयन तुम्हारे साकी हो

ऐसा ना हो तन भीगे

मन सूखा  सा रह जाए

आज मुझे तड़पाते हो

कल रुत तुमको तरसाए

Saturday, June 5, 2010

मेरे बिना (कहानी)

शाम से अब तक तीन डिब्बी सिगरेट फूंक चुका हूँ ,मुह का स्वाद इतना कडुवा हो चुका है की सामान्य में मुह का स्वाद कैसा होता है याद ही नहीं ...शायद यही कडवाहट मेरी रगों में भी घुल गई है, बिना झुंझलाए बात नहीं कर पाता हूँ, विधि दो तीन बार खाने को पूछ चुकी है, प्लेट चम्मच की आवाज़ आ रही है शायद वो खाना खा रही है ...मेरे बिना ....


दो बज रहे है,कमरे में अन्धेरा है नीली रौशनी फैली है,एक कोने में सिमट कर लेटी है ,विधि हमेशा से ऐसे ही सोती है ,मेरे बिना कभी सोने नहीं जाती थी ,मान कर मनुहार कर कैसे भी लैपटॉप बंद करवा देती,पिछली बार कितनी बुरी तरह झिड़क दिया था ,सहम कर चली गई थी आँखों में दर्द उतर आया था मैंने अनदेखा कर दिया, पता नहीं सोई है या बहाना कर रही है..... नहीं सो चुकी है वो

मेरे बिना........

सुबह आँख देर से खुली ,विधि कमरे में नहीं है ..पता नहीं क्यों उठ कर उसको देखने लगा टेबल पर चिट्ठी पड़ी है ...विधि की तरह अल्पभाषी ... पर सटीक

"जानती हूँ तुम परेशान हो ,पर तुम्हारे बताये बिना तो नहीं जान पाउंगी, इस तरह तुम अपने आप को और मुझे दोनों को तकलीफ दे रहे हो ,सुख का समय साथ बिताया है हमने, फैसला तुम्हारा है,इस दौर का सामना कैसे करना है ... मेरे साथ या मेरे बिना ."



तुम्हारे बिना कभी नहीं ...विधि , मैं बुदबुदाता हुआ विधि को बाहों में भर लेता हूँ

Thursday, June 3, 2010

बाद मुद्दत के पहलू में सनम आया है

हंसकर जबसे गले लगाया है

चाँद आँखों में उतर आया है
पड़े गालों में दो भंवर गहरे
डूबकर कौन उबर पाया है

कुछ हया अदा में शामिल है
और कुछ अदा से शर्माती भी है
झिड़क देती है शरारत से
कभी तेवर नए दिखाती भी है

उँगलियों से सुलझा देती है
कभी जुल्फों में मुझे उलझाया है
कोई बात नहीं बस ख़ामोशी रहे
बाद मुद्दत के पहलू में सनम आया है

Wednesday, June 2, 2010

जब कविता रचनी होती है

जब कविता रचनी होती है


मत पूछो क्या क्या करते है

हर लम्हा हर पल हम

किस वेदना** से गुज़रते है


भावो से मिलते शब्द चुने

लय गति के संयोजन से

तुक मिला मिला कर गीत बुने

सार्थक रचने के प्रयोजन से


कभी लगा पहली पंक्ति हलकी

अंतिम वाली भारी है

माध्यम पंक्ति स्वयं बन गई

जिसके हम बलिहारी है


रचना को ठेल ब्लॉग पर

राहत की साँसे भरते है

आप जब कुछ लिखते है

तो क्या ऐसा ही करते है



**यहाँ प्रसव वेदना लिखना चाह रही थी

Monday, May 31, 2010

बंद लिफाफे में गुलाब आता है

आज भी ....


ख़त लिखते है तो जवाब आता है

बंद लिफाफे में गुलाब आता है

देख कर उनको भारी हो जाती है पलकें

रुखसार पर रंग लाल छाता है

अब भी.....

खस गर्मियों में लगा कर निकलते है

सुबह- शाम दोनों वक़्त संवरते है

कलफ लगी सूती चुन्नी की ओट से

मूंगे से सुर्ख लब दमकते हैं

पर....

वो ना आया जिससे वादा था

यकीन जिसपर खुदा से ज्यादा था

आज ज़माने भर की मजबूरियां जताता है

कल जो चाँद लाने पर आमादा था

Friday, May 28, 2010

बहुत गर्म दोपहरी है

उन्होंने समेट कर जुल्फे


ढीला सा जुडा बनाया है

जो इठलाता हुआ

गर्दन पे सरक आया है

मेरी साँसे उसके

खुलने पर ही ठहरी है

अब साए को तरसाओ मत

बहुत गर्म दोपहरी है

Tuesday, May 25, 2010

उफ़ गर्मी (कहानी )

चिपचिपी गर्मी ,तपती धरती ,आग उगलता आसमान ,ना रुकने वाला पसीना .. उस पर तवे पर पड़ी रोटी को सेकना, मीरा की झुंझलाहट बढती जा रही थी ...सारे घर में इन्वेर्टर का कनेक्शन है एक रसोई में छोटा सा पॉइंट लगवा देते तो कम से कम टेबल फेन लगा कर काम तो हो जाता .


पर किसी को कहाँ पड़ी है मेरी, दिन के २४ में से १० घंटे तो रसोई में ही निकल जाते है ..इतनी उमस नहाया बिना नहाया सब एक बराबर. गला भी सूख रहा है सब टी वी के सामने बैठे है,किसी से इतना भी नहीं होता के एक ग्लास पानी ही पिला दे.

ये भी शाम को ऑफिस से लौटते है तो ऐसा दिखाते है मानो ये तो काम करके आये है और मैं बिस्तर पर पड़ी पड़ी आराम कर रही हूँ . सारा दिन A C में बैठ कर आते है.

जितनी तेज गैस की लौ थी उतनी तेजी से मीरा के मन में विचार जल रहे थे, बचपन से ही गर्मी का मौसम उसे सख्त नापसंद था, पसीने में भीगने का ख़याल ही उसका मन घबरा देता, शादी के बाद जिम्मेदारियों को संभालने में उसने कमी नहीं की पर .. तपन से भरे ये चार महीने उसकी जान निकार देते ,ख़ास कर रसोई में जाना ..शादी के दस साल बाद थोड़ी सहन करने की ताकत तो आ गई थी पर अब भी कभी कभी मन बेचैन हो उठता ,फिर कोई अच्छा नहीं लगता.

विचारों में खोई थी अचानक एहसास हुआ किसी ने आँचल खींचा, देखा तो तीन साल की प्यारी सी सुमी खड़ी थी

"मम्मा इधल आओ " तुतलाते हुए हुए मीरा को बुलाया
"बेटा मम्मा अभी काम ख़त्म कर के आती है " मीरा ने बोला
"प्लीज़ एक मिनट " सुमी ने लाड से बोला
मीरा झुकी "बोल बच्चा क्या बात है "
"देथो मेले हाँथ कितने ठन्डे है " अपने हाँथ मीरा के गाल पर लगा दिए
"आपतो गलमी लग रही होगी ना, ठंडा ठंडा कूल कूल "
सुमी के भोलेपन में मीरा  सब भूल गई

Sunday, May 23, 2010

मेरी तौबा (लघुकथा )

"कुछ सोच रही हो " मैंने उसका हाँथ हौले से दबाकर पूछा

"नहीं तो " नेहा के चेहरे पर शरारत की लहर दौड़ गई
अब वो आसानी से बताएगी नहीं ,जब तक मैं उससे ८ -१० बार पूछ नहीं लूँगा .
चार सालों से जानते है एक दुसरे को ऑफिस में मिले,दोस्त बने फिर एहसास हुआ हम अपना रिश्ता दोस्ती से आगे ले जा सकते है ...दो महीने बाद शादी है .
"अब तुम क्या सोच रहे हो वरुण " उसने बच्चों की तरह मेरे गाल चिकोटते हुए कहा .
"क्या हम शादी कर के ठीक कर रहे है ?" मैंने हौले से उससे पूछा
"बड़ी जल्दी पूछ लिया दो महीने बाद पूछते " उसने तुनक कर जवाब दिया
बस इसी अदा पर तो मैं अपनी ज़िन्दगी वार सकता था.
"अरे इतना बड़ा फैसला ले रहे है ज़िन्दगी का कही कुछ भूल हो गई तो बस सारी ज़िन्दगी तबाह " मैंने अपनी हसी दबाते हुए कहा.
"मिस्टर वरुण, अगर कोई फैसला लेना है तो अभी ले लो, ये शादी करनी है या नहीं " नेहा कुछ तल्ख़ हो उठी.
"मैं तो तुम्हारे भले के लिए ही कह रहा था " मैं उसके सब्र का थोडा और इम्तेहान लेने के मूड में था.
"अगर ऐसा है तो ये सब अभी ख़त्म करते है इसी में मेरा भला है,वैसे भी मुझे भी लगता है शायद लम्बे समय तक ये रिश्ता ना निभा पाऊं, मेरे पापा भी यही कह रहे थे ,बस मैं समझ नहीं पा रही थी बात कैसे शुरू करूँ " नेहा ने भरे गले से बोलती जा रही थी
" तुम्हारे मन में भी यही शंका है ना , चलो मैं सोच रही थी तुम्हारा दिल कैसी दुखाऊं" नेहा ने राहत की सांस लेते हुए कहा

अब सदमें में आने की बारी मेरी थी नेहा की आवाज़ कही दूर कुएं से आती लग रही थी,नेहा को खोने के ख़याल से दिल बैठ गया
"मैं तो मज़ाक कर रहा था " मेरी आवाज़ काँप रही थी
नेहा मेरा चेहरा गौर से देख रही थी
"मैं भी तो मज़ाक कर रही थी " नेहा खिलखिला कर हंस पड़ी .
मैंने घबराकर उसको गले से लगा लिया, सब शांत था बस हमारी धडकनों का शोर था .
मेरा दिल कह रहा था
"इस लड़की से मजाक ,मेरी तौबा "

Thursday, May 20, 2010

लौकी पी रहे है लौकी खा रहे है

(बैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता के लिए एक व्यंग रचा था आपसब के साथ बाँट लेती हूँ )



बड़ी दर्द भरी कहानी है हमारी ,ऐसा युद्ध लड़ा है जैसा ..पूछो मत .ताई जी के बेटे की शादी का कार्ड देखकर ..कितने पकवानों के थाल आँखों के सामने घूम गए थे ..आँखे इमरती..तो दिल में रसगुल्ले फूट रहे थे ..कचोरी और आलू की सब्जी की खुशबू तो मनो निगोड़ी नाक को कहा से आने लगी थी ...पिछली बार माठ नहीं चख पाई थी,इस बार तो सारी कसर निकालूंगी , मरे शहर की शादियों में देसी चीज़ों को तरस ही जाओ ..हमें नहीं भाता कांटिनेंटल,


पतिदेव को भी समझा दिया जाने का इरादा बता दिया.. हवाई टिकेट करवाए तो बजट का बाजा बजना ही था ..

नई साड़ी का प्लान छोड़ कर अपनी अलमारी में से कुछ पहने का सोचा ...भाई साब यही तो हो गया लोचा..पता नहीं चोली कुछ छोटी सी लगी सोचा नाप के देखते हैं ..भाई वो तो बिगड़ गई कोहनी पर जा कर अड़ गई ..हमको स्थिति का आभास तो था पर इतने बुरे हालात होंगे इसका अंदाज़ ना था....एक एक करके सब नाप डाले ..पर ....
पतिदेव रात को आये तो बिस्तर पर बिखरे कपडे देख कर घबराए "कोई चोरी हो गई क्या ".
हमने आँखों में आंसू भर कर पूछा आपने बताया क्यों नहीं , वो मुस्कुरा कर बोले

"प्रिये माना तुम कामिनी से गजगामिनी के पथ पर अग्रसर हो
पर मेरे प्रेम को कोई कमी नहीं पाओगी
बहुत बड़ा है दिल मेरा
हर साइज़ में फिट हो जाओगी "
हमने भी मन में ठान लिया बात में छिपे व्यंग को पहचान लिया ,स्लिम्मिंग सेंटर के चक्कर लगा रहे है लौकी पी रहे है लौकी खा रहे है,
अब हम मोह माया से ऊपर उठ गए है ,तुच्छ मिठाई ,भठूरे,पूरी ,टिक्की पाव भाजी सब हमको सिर्फ कैलोरी मात्र नज़र आते है,पर देखते है ये संन्यास हम कबतलक निभाते है,जितनी मंद गति से हमारा वजन घट रहा है उससे १०० गुना तीव्र गति से पतिदेव के बटुए से नोट.
पर ये सब हमारा उत्साह नहीं घटा पायेंगे ..शादी में तो हम वही साडी पहन कर जायेंगे ,जो नई फोटू खिचवायेंगे ब्लॉग पर लगायेंगे ...आप सब को दिखाएँगे

Monday, May 17, 2010

क्षणिकाए (दर्द)


वो लड़की

झांकती  झरोखे से

शायद कही धोखे से

उसकी झलक दिख जाए

सारी तृष्णा मिट जाए



वो लड़का

कुछ बेखयाल सा

बिगड़े सुरत-ए-हाल सा

रस्सी सा एठा है

सबसे खफा बैठा है



चार आँखे

दो पथ निहारती

दो सबकुछ वारती

शायद एक हो जाए

एक दूजे में खो जाए



दो अर्थियां

जिन्होंने जन्मा था

उन्होंने मारा है

जाति का एहसान

ऐसे उतारा है

Friday, May 14, 2010

कंधा (कहानी )

उन दोनों का रिश्ता बेहद अजीब था शादी के बीस साल के बाद भी एक अबोलापन था जो दोनों के बीच पसरा रहता ...हर काम मशीन की तरह से चल रहा था ,इस रोबोटिक ज़िन्दगी में भावनाए शायद शुरू से नदारद थी .सुबह उठने से रात सोने तक सब कुछ तय था .


एसा नहीं था की वो बहुत खुश थी या वो बहुत सुकून में था पर दोनों के बीच बहुत लंबा फासला था,परिवारों ने जोड़ा था इस बेमेल रिश्ते का बंधन, वो शहर का प्रतिष्ठित डॉक्टर और ये गाँव की कम पढ़ी लिखी पर समझदार लड़की ,जो बहुत जल्दी ये समझ गई थी की उनके जीवन में उसकी कितनी जगह है, पर रिश्ता तो था न तो बीज भी पड़े पर कभी फूल नहीं बन पाए, दो बार माँ बनते बनते रह गई बच्चेदानी कमजोर थी उसकी किस्मत की तरह. वो उसका कन्धा चाहती थी रोने के लिए पर सफ़ेद कड़क शर्ट पर उसका स्पर्श कभी पहुँच नहीं पाया ,कई बार शर्ट हांथो में पकड़ कर रोई थी ,बल्कि ज्यादातर अपनी सारी बातें उनकी शर्ट से ही कर लेती,जब से उसने ऐसा करना शुरू किया उसका मन हल्का रहने लगा,रात के अंधेरों में तन से तो वो डॉक्टर साहिब के साथ होती पर मन शर्ट के साथ, उसमे आये परिवर्तन वो महसूस तो करते पर पूछ नहीं पाते,एक साथी एक कंधे की तलाश उसकी कल्पना की दुनिया में समाप्त हो गई थी कभी कभी वो जवाब भी सुन लेती. अकेले कमरे में बात करने पर कई बार लोगो को उसकी मानसिक स्थिति पर शक होता ,सो वो कमरा बंद करके रहती .वो खुश थी अपनी दुनिया में

एक दिन सुबह डॉक्टर साहब अखबार पढ़ रहे थे ,और वो प्रेस वाले से कपडे ले रही थी,कपडे गिनते ही उसकी चीख निकल गई...शर्ट प्रेस वाले की गलती से जल गई थी,एक पल में वो अपने होश खो बैठी ...उसके मुह से ना जाने क्या क्या बातें निकल रही थी ..सभी स्तब्ध थे . डॉक्टर स्साहिब ने उसको रोकने की कोशिश की ...वो बेहोश हो चुकी थी .

अवसाद का अजगर उसे पूरी तरह से निगल चुका था ,मन और तन से बेहद कमज़ोर हो चुकी थी ,इतने सालों में पहली बार डॉक्टर साहिब ने उसे गौर से देखा था ..वो अपने व्यक्तित्व की परछाई मात्र रह गई थी...डॉक्टर साहिब उससे पूछना चाहते थे पर कोई सूत्र नहीं मिल रहा था बात शुरू कहाँ से करे . ग्लानि का बोझ ज़बान को हिलने नहीं दे रहा था,उसकी इस हालत के ज़िम्मेदार वो ही तो थे

"ये तुम्हारे साथ कब से हो रहा है " बड़ी मुश्किल से उन्होंने पूछा .

उसकी अवसाद भरी आँखों में पीड़ा की लहर दौड़ गई एक सुकून का सितारा चमका और बुझ गया. और सितारे के साथ उसकी जीवन ज्योति भी .



बहुत बड़ा दिन था आज जिस कंधे के लिए वो सारी उम्र तरसी थी ,उसको वो कंधा ही नहीं मिला था बल्कि उनकी आँखों में कुछ पश्चाताप के आंसू भी .

Thursday, May 13, 2010

दिल में उतर रही हूँ मैं


कितना संभल कर चल रही हूँ मैं

फिर भी ना जाने क्यों फिसल रही हूँ मैं

आइना हर रोज़ दिखाता है निशाँ नए

इस कदर ना जाने क्यों बदल रही हूँ मैं

जब से चढ़ी है नज़र में खुमारी

किसी के दिल में उतर रही हूँ मैं

कल सरी महफ़िल शमा कतरा गई मुझसे

या खुदा इस कदर निखर रही हूँ मैं

मेरी साँसे मदहोश करती है उन्हें

इस गुरुर से अभी तक उबर रही हूँ मैं

"सोनल" ये सारे आसार है मर्ज़-ए-मुहब्बत के

कुछ हवा बहकी है कुछ बिगड़ रही हूँ मैं


Tuesday, May 11, 2010

प्रेम के क्षण (१)


काँप गई

आलिंगन में
उन्मुक्तता है
इस बंधन में
पंख लगे है
धडकनों को
उबरू कैसे
इस उलझन से


कितने मादक कितने मोहक

नैन तुम्हारे
मौन में भी कितने मुखर
नैन तुम्हारे
इन नैनो ने विकल किया
ये तो सोये
पर जागे रात रात भर
नैन हमारे


दिन-ब-दिन

तुम चढ़ रहे हो
सीढ़िया सफलता की
मैं थक रही हूँ
नहीं चल पाती
उस रफ़्तार से
शायद मैं फिर
जुटा सकूँ
कतरा कतरा हिम्मत
जो हाँथ थाम लो
तुम प्यार से

Thursday, May 6, 2010

चाँद को बख्श दो

सुन सुन के आशिकी के तराने


पक गया है

चाँद को बख्श दो

वो थक गया है

शक्ल जब अपने यार की

चाँद से मिलाते है

आसमान में चाँद मिया

देख देख झल्लाते है

अपनी सूरत पहचानने में

दम उनका चुक गया है

चाँद को बख्श दो

वो थक गया है

बे- बात की बात

सारी रात किया करते है

हाल-ए-दिल सुना कर

जबरदस्ती

चाँद का सुकून

पीया करते है

तन्हाई,बेवफाई ,आशनाई

के किस्सों से

उसका माथा दुःख गया है

चाँद को बख्श दो

वो थक गया है

कभी दोस्त कभी डाकिया

कभी हमराज़ बनाते है

उसकी कभी सुनते नहीं

बस अपनी ही सुनाते है

इस एकतरफा रिश्ते से

दम उसका घुट गया है

चाँद को बख्श दो ..........

Monday, May 3, 2010

हर रंग में छांट लूं ...

चलो एहसासों को

दुपट्टे में बाँध लूं

तुम्हारी छुअन को

किनारी सा टांक लूं



लिपटे जो मुझसे

तो तुम नज़र आओ

काँधे से फिसलो तो

बाँहों में उतर जाओ



दांतों तले दबा लूं

तो हया से लगो

ऐसे बनो मेरा हिस्सा

कभी न जुदा से लगो



इतने रंग भर दो

के अम्बर को बाँट दूं

दुपट्टे की तरह तुमको

हर रंग में छांट लूं

Saturday, May 1, 2010

गालियाँ सीखूं क्या ?

http://bharhaas.blogspot.com/2010/04/blog-post_9062.html

आज अनायास ही एक ब्लॉग पर पुन: जाना हुआ इसी ब्लॉग पर सानिया -शोइब प्रकरण पर एक लेख पर एक छोटी सी टिपण्णी डाली थी,जिसमें मैंने गालियों  के प्रयोग को गलत माना था जिसके प्रतिउत्तर में एक पूरी की पूरी पोस्ट पढने को मिली ...


मुझे लगता है गाली देकर बात करने में आप अपना आक्रोश चाहें जसे भी निकाले पर वास्तव में आप अपमानित अपने आप को ही कर रहे होते है क्योंकि ये गालियाँ  आपकी जननी ,बहिन ,पत्नी ,पुत्री समस्त नारी जाति से जुडी होती है, यदि किसी पुरुष ने कुछ गलत किया है तो आप गाली उसकी माँ को देते है,भारत में गालियों को सुभाषित की तरह बोला और दोहराया जाता है ..जुबान पर ऐसे चढ़ा लेते है मनो वाक्य में गाली नहीं शामिल करेंगे तो कुछ व्याकरण सम्बन्धी त्रुटी हो जायेगी

मुझे मेरी माँ ने सिखाया था "अच्छा पढ़ोगी ,तो अच्छा सोचोगी, अच्छा बोलोगी और अच्छा लिखोगी "


शायद ना मैं गालियाँ सुन पाती हूँ और ना ब्लॉग पर पढ़ पाती हूँ.

Friday, April 30, 2010

वो सहता गया....


दर्द उसको भी होता था

खून उसका भी रिसता  था
तुम जख्म देते गए
वो सहता गया

तुम दोस्ती के नाम पर
मांगते रहे कुर्बानियाँ
वो तुम्हारे भरोसे पर
हर लम्हा साथ देता गया


तुमने मिटा दिया
उसने आह भी ना निकाली
ये दोस्ती का है इम्तिहान
हँस के वो कहता गया..

Tuesday, April 27, 2010

डर लगता है

मुझे खुश होने से डर लगता है,

जो न पाया उसे खोने से डर लगता है

मेरे अश्क बनके तेज़ाब न जला दे मुझको

इसलिए रोने से डर लगता है



महफ़िल में भी सन्नाटा सुनती हूँ

मुझे तनहा होने से डर लगता है

ख्वाब टूटकर चुभेंगे ज़िन्दगी भर

मुझको सोने से डर लगता है



तुम्हारी याद काफी है मेरे लिए

तुम्हारे साथ होने से डर लगता है

पता नहीं किस बात पे शर्मिन्दा हूँ

मुझे अपने ज़िंदा होने से डर लगता है

Sunday, April 25, 2010

कायर(कहानी)

एक


आज समाजशास्त्र की किताब पढ़ते हुए ,मेरा शारीर तो वही रह गया और मन पंख लगा कर उड़ गया, जरुरी पंक्तिया रेकंकित करते हुए न जाने कब किताब के आखिरी पन्ने पर तुम्हे उकेरने लगा,मुझे हमेशा ऐसा लगता है, तुम्हे मेरे से अच्छा कोई भी तस्वीर में नहीं उतार सकता,

शुरुवात तुम्हारी आँखों से की कितनी गहरी ,रेखाए तो खींच दी पर उनकी शरारत और भोलापन...चलो वो मेरी नज़र में है वैसे भी तस्वीर अपने लिए बना रहा हूँ .

तुम कैमरे से शर्माती क्यों हो सोचती हो तुम्हारी रुसवाई ना हो जाए पर तुम मेरे लिए बस एक युवा देह नहीं हो तुम्हारे लिए मेरा आकर्षण हमारे शरीरों के पुष्पित होने से पहले का है ,मैं समझाता हूँ तो तुम झिड़क कर कहती हो "सारे लड़के एक से ही होते है ", मुझे देखो महसूस करो मैं सब जैसा नहीं हूँ ....

प्रेमी नहीं अब मैं तुम्हारा उपासक बन गया हूँ,तुम्हारी एक मुस्कराहट से उम्र काट सकता हूँ .



दो

तुम सिसक रही हो ,मैं तुम्हारे आंसूं भी नहीं पोछ पा रहा हूँ ,कितने सवाल तुम्हारी आँखों में है ,सदमें में आ गया था जब तुमने कहा था एक नया रिश्ता तुम्हारे अन्दर सांस लेने लगा है,तुमने कितने विश्वास से कहा था मुझसे चलो ज़िन्दगी शुरू करेंगे और मैं आसमान से ज़मीन पर एक पल में आ गया था ,मेरी दोनों बहने अभी कुँवारी है ...रिश्ते कैसे होंगे ,जॉब भी नहीं है ...पढ़ाई का एक साल भी बाकी है अभी कैसे ...

तुम होठ वक्र करके कहती हो "कैसे " ये तुमने उस समय क्यों नहीं सोचा जब ..अपने वासना रहित प्रेम का विश्वास दिला कर मुझसे समर्पण माँगा था और कहा था "मैं सब जैसा नहीं हूँ " कायर

तीन

बाइस साल बीत गए .. तुम आज सामने खड़ी हो एक स्वनाम धन्य लेखिका ,समाज सेविका के रूप में जिसका जीवन वृत अपने आप में उदाहरण बन गया,अपनी संतान को बहुरास्ट्रीय कंपनी के उच्च पद पर बैठा कर स्वयं ज़मीन से जुड़ गई,हिंदी दिवस पर तुम्हारे सम्मान में ये आयोजन है ,मुझे स्वागत भाषण देना है , मेरे हाँथ काँप रहे है अतीत तेजी से आँखों के सामने घूम रहा है. तुम गुलदस्ता स्वीकार करती हो ..तम्हारे होंठो पर वह वक्र मुस्कराहट दौड़ जाती है .

मैं बौना होता जा रहा हूँ ..तुम्हारा कद आसमान छू रहा है ...मैं विचार शून्य हो गया हूँ ,तुम्हारे सामने खड़ा नहीं हो पा रहा .....मैं धीमे क़दमों से निकल जाता हूँ .... एक कायर की तरह

Thursday, April 22, 2010

तुमको याद ना हो

बहुत मुमकिन है

तुमको याद ना हो

तुम्हारी डायरी के

इक्किस्वे पन्ने पर

एक सूखा गुडहल

जो तुमने अपने हांथो से लगाया था

मेरे जूडे में

फिर मान के निशानी

दबा दिया डायरी में

उसकी साँसे

कल तक बाकि थी

आज ही दम तोडा है

अपने रिश्ते के साथ

अब शायद मुझको भी

दफ़न कर दोगे

मानकर निशानी

और भुला दोगे

जान कर याद पुरानी

Wednesday, April 14, 2010

कुछ लम्हे

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हाँथ रख कर मांथे पर


ताप क्यों देखते हो


मेरी आँखों में देखो


भाप की बूंदे उभर आई है


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अपनी किस्मत आजमा सकती


नई नज़्म गुनगुना सकती


एक पल को ही सही


शायद मैं मुस्कुरा सकती


.....................................


आशाओं और उम्मीदों से


ज़िंदा हूँ मैं


वो समझते है


साँसों का चलना ज़िन्दगी है


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Thursday, April 8, 2010

आशा बाकी है लाडली

(यह कविता श्रेष्ठ सृजन प्रतियोगिता अंक- 7 में चयनित हुई तो सोचा आप सब के साथ बाँट लूं )


अभी आशा बाकी है लाडली


कुहासा छटेगा धूप निकलेगी

बाहें फैला कर भर लेना तुम

सारी सीलन उड़ जायेगी



अभी कंधो में दम है

तेरे चलने तक उठा सकती हूँ

घबराना नहीं मेरी गुडिया

अँधेरे को मिटा सकती हूँ



तेरी छुअन के सहारे

मैं इतनी देर जी सकी हूँ

तेरी मुस्कान के दम से

सारे विष पी सकी हूँ

Wednesday, April 7, 2010

संवेदनाये मर चुकी है

संवेदनाये  मर चुकी है


लाशें जवानो पड़ी है

फुर्सत कहाँ हमको

सान्या- शोइब से आगे सोचे

भावनाए बिक चुकी है



जो बुद्धू बक्सा दिखाए

उसे सच मानते है

हैदराबाद के दंगे का कारण

कितने जानते है

सोच कुंद हो चुकी है



जब तक हमारे मुह पर

चांटा नहीं पड़ेगा

दर्द नहीं महसूस करेंगे

"ओह बुरा हुआ "कहकर

हाँथ झाड लेंगे



इंसानियत मिट चुकी है

Tuesday, April 6, 2010

अजीब लड़की (अंतिम किस्त )

आज ही परीक्षा ख़त्म हुई थी ,कालेज से आकर सीधे बिस्तर पर पड़ गई आखिर पिछले १५ दिनों की नींद जो पूरी करनी थी, उफ़ कैसे विचित्र सपने देख रही थी मैं सूनसान सड़क पर जा रही हूँ अचानक एक अजगर दिखाई देता है उसकी शक्ल किसी से मिल रही है...अरे ये तो मधु जैसा है घबराकर मेरी नींद खुली तो देखा नौ बज रहे है ....

"कोई बुरा सपना देखा क्या?" निधि ने मेरे माथे पर हाँथ रखते हुए पूछा , शायद थकान का असर होगा मैंने मुह धोते हुए सोचा ......कहाँ है मधु ..ये लड़की भी अजीब है मन मेरे पेपर चल रहे है पर एक बार मिल तो जाती देखती हूँ ......मधु के कमरे पर बड़ा सा ताला लटक रहा था, कहाँ गई होगी मैंने उसकी रूममेट लता से पूछा ..

कहीं बाहर गई होगी उसकने मुस्कुराते हुए जवाब दिया ....

अरे होस्टल का गेट तो बंद हो जाएगा १० मिनट में उसके पास तो मोबाइल भी नहीं है कैसे आएगी अन्दर ,

"आप क्यों खून सुखा रही हो ..मज़े करो आज पेपर ख़त्म हुए हैं ." लता बोली

...मैं डिनर के लिए चली गई .रात के ११ बजे उस लड़की का कोई पता नहीं ,सारी लडकिया मूवी देखने के लिए टी वी रूम में थी ....मेरी रूचि टी वी में समाचार से ज्यादा कभी नहीं रही ,मैंने शिवानी की कृष्णकली उठाई और बालकोनी में बैठकर पढने लगी ...इतनी रोचक किताब होने पर भी मन कही ना कही मधु में अटका था पता नहीं कहाँ होगी, कुछ परेशानी में तो नहीं फस गई , हे इश्वर किसी को कोई फिक्र नहीं है , क्रश्न्काली के लास्य में मैं ऐसी बंध गई की समय का पता नहीं चला, अचानक किसी ने मेरे कंधे पर हाँथ रखा ..मैंने सकपका कर देखा तो निधि थी .."यहाँ क्या कर रही हो "
""मधु नहीं आई अभी तक, पता नहीं कहाँ रह गई कोई contact करने का ज़रिया भी नहीं है ,मुझे फिकर हो रही है " मैंने बेचैन स्वर में निधि से कहा .
"आप मेरे साथ चलो " निधि ने द्रढ़ता से मेरा हाँथ  पकड़ लिया ..मैंने बहुत पूछा निधि बोली बस चुपचाप चलो

निधि मुझे होस्टल के गाते के पास बने चौकीदार के कमरे के पास ले गई ,मैंने कुछ बोलना चाहा तो निधि ने होंठ पर ऊँगली रख कर चुप रहने का इशारा किया,हलके  हाँथ से उसने अधखुली खिड़की हो थोड़ा और खोल दिया ...अब स्तब्ध होने की मेरी बारी थी ...मधु कुर्सी पर आराम से बैठी थी सामने चौकीदार मोहन बैठा था ...दोनों ठहाके लगा रहे थे ...बात तो समझ में नहीं आ रही थी पर ये साफ़ दिख रहा था दोनों आपस में बहुत घुले मिले है ....

मैं अपने आप को मूर्ख सा महसूस कर रही थी पिछले २ घंटे से मैं जिसकी सलामती के लिए हलकान हुई जा रही थी वो भली चंगी सामने बैठी थी ...

निधि ने धीरे से मेरा कंधा दबाया और ऊपर चलने का इशारा किया ..सारे सवाल मेरे चहरे पर छपे हुए थे .....

"ये सब क्या है , तुम लोग सब जानती थी तो मुझे क्यों नहीं बताया " मैंने निधि और मधु की रूम मेट लता से पूछा

"आपकी परीक्षाओं की वजह से आपको नहीं बताया " निधि ने बात शुरू करते हुए कहा ...... और आगे का रहस्योद्घाटन तो मेरे लिए किसी रोमांचक उपन्यास से कम नहीं था .....

मधु अपने आप में पूरा झूठ का पुलिंदा थी , उसके पिता जीवित थे , जो उसके बैंक अकाउंट में पैसे जमा करवाते थे ....उसको कोई हार्ट की बिमारी नहीं थी और उस रात उसने जो नाटक किया वो मेरी संवेदना जीतने के लिए किया, उससे मेरी बेरुखी बर्दाश्त नहीं हो रही थी ,बाद में अपनी विजयगाथा उसने डिनर पर बड़ी निर्लज्जता से सबको बताई थी ..और दवा मैंने उसे दी depression की थी जो कोई भी मेडिकल स्टोर से ला सकता है ..उस दिन डॉक्टर ने भी उससे हार्ट की रिपोर्ट्स मांगी जो आजतक उसने नहीं दिखाई.......

"और वो मोहन के पास क्या कर रही है " ये रहस्य मुझे मार रहा था .

"अरे वो उसको पटा कर रखती है " लता बोली , देर रात दोस्तों के साथ घूमकर आती है तो मोहन बिना वार्डन को बताये गेट खोल देता है ..उसका छोटा मोटा काम भी कर देता है .

"हम तो आप को आज भी ना बताते पर आपका मधु प्रेम कुछ ज्यादा बढ़ गया था ..हमने आपको कई बार इशारे भी दिए पर आप तो सुनने को तैयार नहीं " निधि हँसते हुए बोली

मेरी आँखों के सामने निधि की वो मुस्कान आई जो मैं इग्नोर नहीं कर पाई थी ........

हम लेखको के साथ के बड़ी समस्या है हम "क्या है" से तृप्त नहीं होते हमको "क्यों " का जवाब भी चाहिए ..सारी रात करवटों में बीती कितनी भावनाए कितने समीकरण ..क्या पता वो मानसिक रूप से बीमार हो , किसी कुंठा के चलते वो ऐसा व्यवहार कर रही हो , शायद अपने परिवार से प्यार ना मिला हो ................ मैं शायद उसकी मदद कर पाऊं, भावनाओं का तूफ़ान सारी रात चलता रहा बीच बीच में ...कुछ गर्म बूंदे आँखों की कोरों से टपक भी गई

सुबह तक दिल दिमाग की लड़ाई में दिमाग हावी हो गया . मैं किसी अनजान लड़की के लिए इस सीमा तक जा सकती हूँ ...ये तो वो झूठ है जो लोगों को पता है अभी ना जाने उसके अस्तित्व और चरित्र की कितनी परते और खुले .... और ना जाने किस  किस तरीके से मेरी भावनाओं का फायदा उठाये

मैं उस अजीब लड़की को वही छोड़ कर आगे बढ़ गई ....किसी मोड़ पर वो मुझे फिर मिली तो जरूर बताउंगी

Sunday, April 4, 2010

अजीब लड़की (२)



मेरे कमरे में उसकी उपस्थिति मानो किसी कुर्सी मेज की तरह थी मैं उसे पूरी तरह उपेक्षा दे रही थी ..मैं अपनी पढ़ाई में कोई भी व्यवधान नहीं चाहती थी,हालाँकि खाने के समय वो चुप्पी तोड़ने की बहुत कोशिश करती, ऐसा नहीं था मैं उससे जानबूझ कर रुखाई से पेश आ रही थी...पर मैं सहज नहीं थी ..



एक दिन आधी रात किसी की सिसकियों ने मुझे जगा दिया,लगा हॉस्टल में सुनाई जाने वाली कहानी की नायिका जिसने पता नहीं कितने साल पहले आत्महत्या कर ली थी
कही सूनसान होस्टल में वापस तो नहीं आ गई ,मैं हनुमान चालीसा शुरू करती उससे पहले साथ वाले पलंग पर कुछ हलचल महसूस की ..हाँ वो मधु ही थी,असमंजस में पड़ गई क्या करू दम साधे पड़ी रहूँ या पूछूं १० मिनट बाद दिल दिमाग पर हावी हुआ, हिम्मत कर के लाइट जलाई...मधु ने एक दवा की शीशी की ओर इशारा किया वो तकलीफ में थी अगले दो घंटे तक मेरे होश फाख्ता रहे उसने बताया उसे हार्ट की तकलीफ है उसके सुकून के सोने के बाद ही मैं सो पाई .

अपने में गहरा अपराधबोध महसूस किया,किसी को जाने बिना किसी के बारे में राय क्यों बना ली..उस रात के बाद मैं उसके साथ सहज हो गई मेरे खाली समय में वो अपने किस्से सुनाती मैं भी मुस्कुरा कर हामी भरती.

१ हफ्ते के लिए घर जाना था पड़ोस के रूम की नेहा को मधु को सौंप कर मैं चली गई ..घर पहुँच कहाँ कुछ याद रहता है बस माँ के हाँथ का खाना और आराम जब होस्टल लौटी तो पूरी रौनक वापस थी,सारी लडकिया आ चुकी थी और होस्टल गुलज़ार था,निधि दौड़ कर गले मिली और उससे ज्यादा प्यार से मधु ..निधि के चेहरे पर अजीब सी आश्चर्य मिश्रित मुस्कान फ़ैल गई जिसे मैं इग्नोर नहीं कर पाई, खाना खाने के बाद मैं निधि से गप्पे लगा ही रही थी हॉस्टल में शोर फ़ैल गया मधु की तबियत फिर खराब हो गई थी ,डॉक्टर को बुलाया गया था उस अजीब लड़की के परिवार के किसी सदस्य का नंबर नहीं था रिकॉर्ड में जो नंबर था वो गलत था,वो रोये जा रही थी डॉक्टर इंजेक्शन लगाकर चला गया ,मेरा मन करुना से भर गया इश्वर क्यों करता है किसी के साथ ऐसा, मैंने अपने मन की बात और लड़कियों से बांटने की कोशिश की तो सबने मुझे इन सब मामलों ना पड़कर अपनी पढ़ाई पर ध्यान देने को कहा ,कितनी स्वार्थी है दुनिया ........

ये घटनाएं मुझे उसके और करीब ले आई,मैं उसका ख़ास ख्याल रखने लगी शायद सब ऐसा ही चलता रहता पर उस दिन की घटना ने मुझे और मेरे विश्वास को हिला कर रख दिया ................................................................


क्रमश:

Saturday, April 3, 2010

अजीब लड़की (भाग १)

वो मुझे हमेशा बहुत अजीब सी लगती..पता नहीं क्यों कुछ मरदाना सा चेहरा लंबा कद चौड़े कंधे , नारीसुलभ कोमलता का पूरी तरह अभाव ,बोली अभी अजीब सी मानो आवाज़ को खींच रही हो, होस्टल में सबके साथ घुलती मिलती पर मुझे वो अपनापन सहज नहीं लगता, यहाँ तक उसका छूना मुझे किसी पुरुष के स्पर्श की याद दिलाता और मैं और विचलित हो उठती .

मैं अपनी पढ़ाई में व्यस्त रहती, वो होस्टल की लड़कियों को अपनी कहानी सुनाती ..उसकी कहानी किसी फिल्म की कहानी की तरह लगती बचपन में पिता गुज़र गए माँ ने दूसरी शादी की नये पिता ने प्यार नहीं दिया, अब इस हॉस्टल में उसके कुछ अपने से लगने वाले लोग मिले है,
कालेज बंद होने पर २ माह के लिए होस्टल लगभग खाली हो गया..
एक हफ्ता घर पर बिताने के बाद जब मैं होस्टल वापस आई तो मेरे साइड वाले पलंग पर मधु को पाया , मधु अजीब लड़की का नाम मधु था, मेरी रूममेट निधि अपना बिस्तर उसको सौंप गई थी ,

अकेले सुनसान होस्टल में रहने की हिम्मत ना तो उसमे थी और ना मुझमें ..तो मजबूरी में मुस्कुरा कर समझोता कर लिया..वैसे भी सारा दिन प्रतियोगिताओं की तैयारी में बीतना था ..अपने आप को मन ही मन तैयार कर लिया उसके साथ रहने के लिए ....

क्रमश:

Friday, April 2, 2010

अभी और जीना है

कुछ ख्वाब टूटे हुए

कुछ अपने छूटे हुए
टूटे को सहेजना है
छूटे को टेरना है


कुछ खुशबुए बिखरी हुई

कुछ लटें उलझी हुई
खुशबूं को समेटना है
लटों को सवारना है

कुछ जख्म रिसते हुए

कुछ अश्क छलके हुए
जख्मों को सीना है
अश्कों को पीना है


सब संवर जाएगा

मेरा रूप निखार जाएगा
साथ दे दो मेरा
मुझे अभी और जीना है

Thursday, April 1, 2010

ठहरी ज़िन्दगी

मेरे घर के आँगन में
धुप तिरछी पड़ती थी
ठीक नौ बजे नौबजिया
की कली खिलती थी

सुबह स्कूल जाने

की हडबडाहट में
गर्म दाल चावल से अक्सर
ऊँगली और जीभ जलती थी

निकलना देर से

और पहुँचने की जल्दी में
कच्ची पगडण्डी पे कितनी बार
गिरती संभालती थी

बरस बीत गए लेकिन

ज़िन्दगी आज भी
इमली के पेड़ तले
ठहरी मिलती है

Tuesday, March 30, 2010

हनुमान जयंती




हनुमान जी को अगर एक व्यक्तित्व के रूप में देखा जाए तो बहुत कुछ समझ में आता है ...अपरिमित शक्ति , साहस, बल धैर्य के साथ प्रेरणा पुंज, एक वानर जो अजर अमर है हज़ारों सालों के बाद भी उनके प्रति श्रधा वैसी ही है, सिक्स पैक एब्स बनाने वाला हो या अखाड़े का पहलवान ...सब को प्रेरणा देते है बजरंगबली...

रात के अँधेरे में अपने आप मुह से हनुमान चालीसा निकलने लगती है ,कितने गहरे तक हमारे मन में बसे हुए है पवनसुत की कोई भी भय हो उनका नाम लेते ही दूर हो जाएगा, एक इश्वर होने के बाद भी बहुत करीब लगते है.

जय हनुमान फिल्म के बाद तो छोटे छोटे बच्चों के लिए देसी सुपरमेन बन गए है . हनुमान जी आपसभी के शोक भय दूर करे

आप सभी को हनुमान जयंती की बधाई

Saturday, March 27, 2010

आप बताइए


अभी अभी पोस्ट डाल कर गए ही थे कुछ रोचक मिला सोचा आपको भी दिखा दूं ...मैं ज्यादा नहीं लिखूंगी पर आप बताइए ये चित्र देख कर सबसे पहले आपके मन में क्या आता है

दुआ दूं या बददुआ


आज तुम्हारी बेवफाई से वाकिफ हुए है




क्या समझोगे कितने दर्द से गुज़रे हैं



जब थे मेरे साथ और ख़याल था गैर का



ऐसे लम्हे भी ज़िन्दगी से गुज़रे हैं







तुम थे खामोश हम समझे खफा हो



गुमसुम थे तो समझे कुछ जुदा हो



कोशिश की खुशिया भर दूं दामन में



अनजान थे तुम किसी और के भी खुदा हो







दर्द इतना है की रो भी नहीं पा रहे है



होश गुम है न जाने कहाँ जा रहे है



तुम्हारे सिवा दुनिया भी नहीं देखी



इस भरी दुनिया में तनहा नज़र आ रहे है





दुआ दूं या बद्दुआ तुम ही बताओ

कोई हल हो तुम ही सुझाओं

निभाई है मुझसे बे-वफाई जिस वफ़ा से

तुम्हे ख़त्म कर दूँ या खुद को मिटाऊं

Friday, March 26, 2010

नैनो की आत्महत्या!


ये तो होना ही था भैया आखिर कब तक कोई कार अत्याचार सहन करे, बड़े लाड से लाये थे नैनो को तारीफ़ में भी पुल क्या पूरे पूरे flyover बना दिये..छोटी सी प्यारी सी सजी धजी नैनो लोगों की आँखों का सपना बन गई.. कार मेले में जब मुह दिखाई हुई तो भीड़ के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए ..

हर कोई यही गीत गा रहा था "मेरे सपनो की नैनो कब आएगी तू "...

इंतज़ार ख़त्म हुआ और किस्मत वालो को मौक़ा मिला अपने घर लाने का..अड़ोसी पडोसी अपनी लाखों की कार को छोड़ कर नैनो पर निगाह लगाने लगे ..करोड़पतिओं के लाडलों को भी नैनो ललचाने लगी...

असली मोड़ तो तब आया जब ये आम होकर भी ख़ास कार सडको पर उतरी बड़ी बड़ी गाड़ियों ने डराना शुरू किया...अल्टो से लेकर औडी सब हिराकत की नज़र से देखने लगी,किसी पार्किंग lot में तनहा खड़ी देसी नैनो का किसी कार ने भी स्वागत नहीं किया विदेसी कारों ने तो नज़र भी नहीं डाली और देसी तो वैसे ही कुढ़ी बैठी थी.

अकेलेपन,तानो से आहत आखिर नैनो ने खुद को समाप्त करने का निर्णय लिया..... और जल गई नैनो



दो मिनट का मौन तो बनता ही है

Thursday, March 25, 2010

सीटी बज गई

"अरे लल्ला कहे किताबन में मूढ़ घुसाए बैठा है तानी सिट्टी बजाये की परकत्तिस तो कर लेव"


अरे राम रे पूरे गाम का बवाल मचा, जवान और बुड्ढे सभी सिट्टी बजाये में लगे है , जब से पहिलवान जी कहिन है संसद में सिट्टी बजिहें तभी से सब होंठ गोल किये घूम रहे है, जो पाहिले से संसद में है और सिट्टी नहीं बजा पा रहे है वो अपने नौनिहालों के मूह से सिट्टी छीन कर भाग रहे है, ट्रेफिक वाले जवान,मैच रेफरी तो पहले ही खुश है हमको तो सिट्टी बजाना खूब आता है,

अखाड़ों में कसरत की बजाये सिट्टी बज रही है, ये नारी मुक्ति वाले बेचारे सोफ्ट नेताजी की बातों का गल अर्थ निकाल लिए है और हर चैनल पर ऐसी तैसी करने में लगे है किसी ने भावार्थ तो समझा ही नहीं, अब हम ठहरे नेताजी के पडोसी जिले के तो इत्ता तो फ़र्ज़ हमारा भी बनता है



अब तैतीस प्रतिशत आरक्षण के बाद... चारो ओर महिलाओं को देख कर मन में जलन की चिंगारी तो पैदा हुइहे ही , चिंगारी से आग ,आग से भाप ,और भैया बहिनों अब ये मन की भाप निकालिए कैसे "सिट्टी " से. और सब शांत ..आप लोग भी सिट्टी बजाइए और देखिये कैसे आपका गुस्सा शांत होता है



बेकार ही आप लोग राशन पानी लेकर चढ़ गए...

Wednesday, March 24, 2010

त्राहिमाम !!!!

त्राहिमाम !!!!


आजकल ब्लॉग जगत पर धर्म-चर्चा पर महासंग्राम मचा है ,लोग लैपटॉप मोबाइल लेकर जुट गए है ,ऐसी-तैसी करने में और करवाने में, अपन को तो ये एकदम हिट टोपिक लगता है बीड़ू, वो क्या कहते है हिंग लगे ना फिटकरी और रंग चोखा..गूगल उठाओ और ऐसी हज़ारों मेल में से कोई सी भी उठा लो जो विवादस्पद हो ...जो विवादों में आ गया उसके तो १०० दिन क्या सौ हफ्ते पूरे...

अगर देखा जाए तो अश्लील चर्चा के बाद लीगों धर्म और राजनीति की चर्चा में मज़ा आता है ... भैया ऊपर वाला तो आने से रहा इनकी कही बातों का खंडन और समर्थन करने तो ज़मीन वाले लगे है अपनी कहानिया गढ़ने में , समर्थन और विरोध का आन्दोलन चलाने में...

ज्ञान तो इतना बाँट रहे है मानो जगद्गुरु,पैगम्बर साहिब और सभी पूजनीय विद्वान् इनको व्यक्तिगत रूप से लिखवा कर गए है

मान गए

अच्छी कहानिया और चर्चा तो आजकल गायब है शुक्र है चिट्ठाचर्चा जैसे अच्छे ब्लॉग कुछ पढने के लिए दे देते है वरना तो बस वही.

कुछ अच्छे ब्लॉगरगण इन चक्करों में पड़ कर बढिया-बढिया लिखना भूल गए है वापस आजाओ..

अब लगता है दिमाग का ज्वालामुखी फट ही जाएगा इससे पहले मेरे छोटे से दिमाग (मेरा मानना है की है ) की बरात निकल जाए या तो चिट्ठाजगत इन महानुभावों को अलग से पोर्टल दे दे या हमें अधिकार की ये सब हमको दिखे ही ना

"रंग स्याह हांथो में उठाये घूम रहे है

किसको कितना काला करे

इसकी लगी है होड़

जहाँ इनकी हद ख़त्म हो

कोई बताये मुझे

कितनी दूर है वो मोड़ "

Tuesday, March 23, 2010

माफ़ कर दे कृति

कृति अपने हाँथ गौर से देख रही थी आँखों से आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे ,कोई तो बता दे कौन सी है किस्मत की रेखा ...उसने तो नहीं खिची तो फिर काकी क्यों कोसती है उसको, कृति के माँ पिताजी एक दुर्घटना में नहीं रहे थे जब वो सिर्फ तीन साल की थी ,इश्वर का आशीर्वाद था या कोई अभिशाप इतनी भयानक दुर्घटना के बाद भी वह बच गई. उसके काका अपने साथ ले आये,शुरू में तो काकी का व्यवहार अच्छा था ममता भी मिली पर समय और काकी के परिवार के बढने के साथ काकी ममता बाटने में कृपण हो गई...


उसे किताबे समझ में कम आती थी आज परीक्षा का परिणाम आने के बाद घर में कोहराम मचा था , पांचवी कक्षा में फेल हुई थी, काकी की आवाज़ कानो में पिघले शीशे की तरह उतर रही थी " पता नहीं हाँथ में कौन सी रेखा लेकर जन्मी है ,सूरत शकल तो ऊपर वाला देता है इसके दिमाग में भी गोबर भरा है ,सब तो यही कहेंगे बिना माँ बाप की लड़की को ठीक से नहीं रखा ...साल की फीस गई ,कापी पेन्सिल का खर्चा अलग ...अगर पढ़ लिख जाती तो कही ब्याह कर छुटी पाए बेपढ़ी को कौन ब्याहेगा आज के ज़माने में "

काका कम बोलते थे पर उनकी आँखों में रोष साफ़ दिख रहा था..

कृति कोने में खड़ी अपने पैर के अंगूठे से ज़मीन पर पता नहीं कौन सी आड़ी तिरछी रेखाए खीच रही थी,कितना तो पढ़ा था पर लिख नहीं पाई परीक्षा में हाय भगवान् क्या करूँ .

शाम को दूध पीने के लिए काकी कृति को ढूँढने लगी याद आया लड़की ने तो स्कूल से आकर कुछ खाया भी नहीं है..आवाज़ लगे पर कृति का जवाब नहीं आया सारे कमरे देख डाले कृति कही नहीं थी

किसी अनिष्ट की आशंका से काकी का कलेजा मुह को आ गया" कुछ कर करा ना लिया हो ,मुझे भी इतना नहीं डांटना चाहिए था बच्चो के आत्महत्या के समाचार आँखों के आगे घूमने लगे, पढ़ाई में कमजोर है पर बेचारी गौ की तरह शांत है,बाकी सब तो जल्दी सीख लेती है,एक मैं भी कहाँ ध्यान देती हूँ उसकी पढ़ाई पे , एक tution लगा दूं तो सब ठीक हो जाए ...ढूंढते हुए ना जाने कितने देवी देवता मान डाले ...कृत को खोने के एहसास से काकी की ममता पर पड़ी धूल मानो हट गई तीन साल की मासूम कृति की छवि आँखों के आगे तैर गई, स्वर्गवासी जेठानी मनो पूछ रही हो मेरी छोटी बिटिया का ध्यान नहीं रख पाई...

सारा घर देख लिया था पर कही नहीं थी कृति अचानक ध्यान आया छत तो छुट गई...दौड़ते हाफ्ते दुमंजिल चढ़ गई..कोने में कृति ज़मीन पर पड़ी थी डरते हुए उसको गोद में उठाया,गलों पर आंसुओं की लकीरे सूख गई थी रोते रोते भूखी प्यासी सो गई थी ...

काकी ने ने गले से लगाया और आंसू फूट पड़े कृति ने आँखे खोली अपनी हथेली काकी की और बढ़ा दी पेन से गहरी लकीर खिची हुई थी कृति बोली उसके आँखों में अजीब सी चमक थी

"काकी मैंने किस्मत की रेखा बना ली है ठीक है ना अब मैं कभी फेल नहीं होउंगी "

काकी ने उसे जोर से गले लगाकर बोला "बेटा तू नहीं तेरी काकी फेल हुई है , माफ़ कर दे "