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Wednesday, October 19, 2011

देह से इतर

ना तुम देह से परे
कभी सोच पाए ना सोच पाओगे
पलटवार करोगे
जो खुद को कमतर पाओगे
ना दोगे स्थान बराबरी का
स्वयं अर्जित किया
तो खीजोगे तिलमिलाओगे
तुम्हारे जन्म से
तुम्हारी वासनाओ तक
तुम्हारे पेट से लेकर
तृप्त अतृप्त इच्छाओं तक
निचोड़ोगे दबाओगे
पर देह से इतर जो मन है
उसे क्या जान पाओगे

37 comments:

  1. जानना चाहता ही कौन है...
    कम पंक्तियों में काफी कुछ कहा तुमने.

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  2. मन तक पहुँचने के लिए मन होना चाहिए ... अच्छी प्रस्तुति

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  3. "पर देह से इतर जो मन है
    उसे क्या जान पाओगे"

    गहराई तक कौन पहुँच पाता है? इच्छाओं की तृप्ति ही मात्र धेय रह गया है । मन की थाह लेने की, उस आत्मिक तत्व को मह्सूस करने की फ़ुर्सत कहाँ रह गई है ?

    बहुत सुंदर! बधाई

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  4. मन तक पहुँचने पर मन की बात होती है
    क्षुधा मन की हो जाए तो बाकी सब भी मन .... कोई प्रश्न ही नहीं , कोई चाह ही नहीं , बस सबकुछ एकाकार

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  5. और आगे तक पहुँचना होता है प्रेम में।

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  6. बहुत सुन्दर रचना ,बधाई.

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  7. कल 21/10/2011 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  8. waha bahut khub........naari man ki pidha....sundar shabdo se abhivyakti....

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  9. मन को मन ही पढ पायेगा

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  10. bahut sari baate kaha dali is chhoti si kavita me....bahut badhiya

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  11. कितनी सशक्त/सार्थक रचना....
    सादर बधाई....

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  12. स्त्री पर स्तरीय कविताएं, कम ही मिलती हैं। जो उस तक पहुंचने का राह बताती हुई हो। स्त्री देह भर है तो उसके लिए हर तरफ़ जगह है, लेकिन यदि प्रेम है तो कहीं नहीं। विडम्बना यह है कि प्रेम करना उसका स्त्रीत्व है और प्रेम में रीतते जाना इस पुरुषसत्तात्मक समाज में उसकी नियति।

    स्त्री की मौन जद्दोजहद को आपने परिचित बिंबों से उतारा है।

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  13. वाह ...बहुत ही अच्‍छी रचना ।

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  14. देह से इतर जो मन है.. सुन्दर, सार्थक और विचारों को झकझोरती रचना.

    दीवाली की शुभकामनायें!!
    थोड़ा समय मेरे ब्लॉग के लिए निकालें.
    www.belovedlife-santosh.blogspot.com

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  15. समय- समय पर मिले आपके स्नेह, शुभकामनाओं तथा समर्थन का आभारी हूँ.

    प्रकाश पर्व( दीपावली ) की आप तथा आप के परिजनों को मंगल कामनाएं.

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  16. गहरी संवेदनशील बात ... अस्सन नहीं होता देह से आगे मन को तलाशना ...

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  17. क्या बात है. मन कहीं इससे परे है.
    दीपोत्सव की शुभकामनायें.

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  18. मन न मिलें तो तन की प्यास खोखली, पर मन मिले और तन न मिले, तो भी तो अधूरापन होगा?

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  19. कविता मुझे पसंद आई......... आपको दीपावली की बहुत बहुत शुभकामनायें....

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  20. बहुत ही सुंदर कविता । मन को आंदोलित कर गयी । मेरे पोस्ट पर आपका स्वागत है ।. दीपावली की शुभकामनाएं । धन्यवाद .

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  21. बहुत बढ़िया लिखा है आपने! लाजवाब प्रस्तुती!
    आपको एवं आपके परिवार के सभी सदस्य को दिवाली की हार्दिक बधाइयाँ और शुभकामनायें !
    मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-
    http://seawave-babli.blogspot.com/
    http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/

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  22. आपको गोवर्धन व अन्नकूट पर्व की हार्दिक मंगल कामनाएं,

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  23. बहुत गंभीर कविता...

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  24. बहुत अच्छे से आपने पुरुषप्रधान समाज पर व्यंग्य किया है सरल शब्दों में गूढ़ रचना
    दीपावली व नववर्ष की आपको सपरिवार हार्दिक शुभकामनाएं !

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  25. पूर्णता "सत्यम शिवम् सुन्दरम" से आती हैं...किसी एक के अभाव में बात अधूरी हैं.

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  26. sonal ji बहुत ही बोल्ड और बेहतरीन कविता

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  27. सही कहा और बेहद खूबसूरती से अंत किया अपनी कविता का...

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