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Tuesday, November 27, 2012

मेरे शहर में



मेरे शहर में
शाम नहीं होती
देखा नहीं किसी नें
ढलते सूरज को
हाँ, वालपेपर पर
कई बार देखा है ,
ऑफिस से  निकलते है
बंधुआ मजदूर
अँधेरे में मुह छिपाए
कंधे झुकाए रोबोट 
नशे में डुबो देते है
पूरा दिन और तनाव
पर शाम को तो
उन्होंने भी नहीं देखा
आसमान के रंग
को लेकर अक्सर
बहस छिड़ती है
छ बाय छ के
पिंजरे से कभी
आकाश दिखा नहीं
जो घोसलों को
लौटते है बिना पिए
उनके चूजे भी
सीमेंट में पलते है
सीमेंट में बढ़ते है
शाम को वो भी जानते नहीं
कुछ बूढ़े बाते करते है
गोधूलि बेला की
पर ऐसा कुछ
मेरे शहर में नहीं होता 
दिन और रात के सिवा
कुछ नहीं देखा
मेरे शहर में
किसी ने भी
शाम को नहीं देखा

20 comments:

  1. उम्‍दा अभिव्‍यक्‍ित

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  2. bahut din ho gaye, mujhe bhi shaam dekhe.. pichhlee baar apne gaaon ke pokhar ke uss paar dekha tha.. dubte suraj ko:)

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  3. सही कह रही हो आप, एक अरसा हो गया शाम देखे !!!

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  4. बढ़िया चित्रण किया है आपने आज के परिदृश्य का ।

    आपकी इस उत्कृष्ट पोस्ट की चर्चा बुधवार (28-11-12) के चर्चा मंच पर भी है | जरूर पधारें |
    सूचनार्थ |

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  5. वाह......
    बहुत बढ़िया...बड़ी गहराई से लिखा है सोनल...
    अनु

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  6. शाम तो मेरे शहर में भी आती है.पर वो शाम सी नहीं रात सी होती है .(यहाँ आजकल 3:30 pm पर ही अँधेरा हो जाता है na :P)

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  7. ये आज का सबसे बडा सच है …………सटीक अभिव्यक्ति

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  8. "सीमेंट ही सीमेंट" जिसकी परत ने अनुभूतियों पर ऐसा लेप चढ़ा दिया है जो प्रकृति की ओर निहारने ही नहीं देता - प्रशंसनीय प्रस्तुति

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  9. रात है कि शाम को आने ही नहीं देती है, दिन को ही निगल जाती है।

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  10. प्रभावशाली प्रस्तुती....

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  11. sacha aisa to har roz hota h aur strange ye h ki aisa kabhi socha nahi.. sahiii

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  12. सोनल जी बेहद प्रभावशाली रचना है
    अरुन शर्मा
    www.arunsblog.in

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  13. दिल को छू गयी आपकी रचना...
    ~सादर!!!

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  14. बहुत बढ़िया सोनल जी... आज शहरों की यही दशा है ... बहुत ही वास्तविक चित्रण किया है आपने ..
    साभार

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  15. मेरे शहर में
    किसी ने भी
    शाम को नहीं देखा
    वाह ...बहुत ही बढिया लिखा है आपने

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  16. सच्च कहा जी। एकदम्म सच्च।

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  17. प्रिय ब्लॉगर मित्र,

    हमें आपको यह बताते हुए प्रसन्नता हो रही है साथ ही संकोच भी – विशेषकर उन ब्लॉगर्स को यह बताने में जिनके ब्लॉग इतने उच्च स्तर के हैं कि उन्हें किसी भी सूची में सम्मिलित करने से उस सूची का सम्मान बढ़ता है न कि उस ब्लॉग का – कि ITB की सर्वश्रेष्ठ हिन्दी ब्लॉगों की डाइरैक्टरी अब प्रकाशित हो चुकी है और आपका ब्लॉग उसमें सम्मिलित है।

    शुभकामनाओं सहित,
    ITB टीम

    पुनश्च:

    1. हम कुछेक लोकप्रिय ब्लॉग्स को डाइरैक्टरी में शामिल नहीं कर पाए क्योंकि उनके कंटैंट तथा/या डिज़ाइन फूहड़ / निम्न-स्तरीय / खिजाने वाले हैं। दो-एक ब्लॉगर्स ने अपने एक ब्लॉग की सामग्री दूसरे ब्लॉग्स में डुप्लिकेट करने में डिज़ाइन की ऐसी तैसी कर रखी है। कुछ ब्लॉगर्स अपने मुँह मिया मिट्ठू बनते रहते हैं, लेकिन इस संकलन में हमने उनके ब्लॉग्स ले रखे हैं बशर्ते उनमें स्तरीय कंटैंट हो। डाइरैक्टरी में शामिल किए / नहीं किए गए ब्लॉग्स के बारे में आपके विचारों का इंतज़ार रहेगा।

    2. ITB के लोग ब्लॉग्स पर बहुत कम कमेंट कर पाते हैं और कमेंट तभी करते हैं जब विषय-वस्तु के प्रसंग में कुछ कहना होता है। यह कमेंट हमने यहाँ इसलिए किया क्योंकि हमें आपका ईमेल ब्लॉग में नहीं मिला।

    [यह भी हो सकता है कि हम ठीक से ईमेल ढूंढ नहीं पाए।] बिना प्रसंग के इस कमेंट के लिए क्षमा कीजिएगा।

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  18. आजकी भागमभाग जिंदगी का सच लिख दिया आपने ... असल चित्रण महानगरीय जीवन का ...

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  19. शाम का यह रंग पहली बार किसी कवि ने देखा, सचमुच कितने दिनों से मैंने भी शाम का रंग नहीं देखा, लड़कियों को घरों के आगे रंगोली बनाते हुए नहीं देखा, बच्चों को गलियों में क्रिकेट खेलते नहीं देखा। बहुत अच्छी कविता

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