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Tuesday, July 9, 2013

देवभूमि का चीत्कार

बादलों की मंडी थी
पानियों का सौदा था
सैलाब के क़दमों ने
फिर ज़मीं को रौंदा था
हवा बहुत रूठी थी
डालियों से झगडा था
नदियों के धारों को
किनारों ने पकड़ा था
सब्र उसका छूटा जो
बिफर के निकल गई
उफनती नदी उस पल
किनारों पर चढ़ गई
चीखती लहरों में
आंसू थे पहाड़ों के
जंगल की कब्र थी
अवशेष देवदारों के
विनाश हमने रचा
उसका प्रतिकार था
लाखो आघातों पर
देवभूमि का चीत्कार था

24 comments:

  1. वाह बहुत सुंदर, बिलकुल सार्थक कहा है, बहुत बधाई यहाँ भी पधारे
    रिश्तों का खोखलापन
    http://shoryamalik.blogspot.in/2013/07/blog-post_8.html

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  2. वाह सोनल जी आपने तो खूबसूरत शब्दों के भाव से वर्तमान स्थिति का आईना दिखा दिया बहुत खूब...

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  3. बेहतरीन ....
    मार्मिक ....

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  4. कुदरत का कहर सबने देखा इस बार

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  5. बेहद सुन्दर प्रस्तुतीकरण ....!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा कल बुधवार (10-07-2013) के .. !! निकलना होगा विजेता बनकर ......रिश्तो के मकडजाल से ....!१३०२ ,बुधवारीय चर्चा मंच अंक-१३०२ पर भी होगी!
    सादर...!
    शशि पुरवार

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  6. ह्रदय विदारक-
    सटीक प्रस्तुति-
    आभार आदरेया-

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  7. आपकी रचना कल बुधवार [10-07-2013] को
    ब्लॉग प्रसारण पर
    कृपया पधार कर अनुग्रहित करें |
    सादर
    सरिता भाटिया

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  8. कुदरत का कहर नहीं बल्कि देवभूमि का चीत्कार था .... बहुत सार्थक रचना

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  9. बहुत ही सुन्दर और मार्मिक रचना ।

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  10. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन फिर भी दिल है हिंदुस्तानी - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  11. सचमुच, बड़ा दुखद चीत्कार था!

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  12. सच कहा आपने..
    हम मानव को प्रकृति अपने हिसाब से हमारे किये-धरे के लिए दण्डित करना बखूबी जानती है ..

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  13. सुंदर प्रस्तुति...
    मुझे आप को सुचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टी का लिंक 12-07-2013 यानी आने वाले शुकरवार की नई पुरानी हलचल पर भी है...
    आप भी इस हलचल में शामिल होकर इस की शोभा बढ़ाएं तथा इसमें शामिल पोस्ट पर नजर डालें और नयी पुरानी हलचल को समृद्ध बनाएं.... आपकी एक टिप्पणी हलचल में शामिल पोस्ट्स को आकर्षण प्रदान और रचनाकारोम का मनोबल बढ़ाएगी...
    मिलते हैं फिर शुकरवार को आप की इस रचना के साथ।



    जय हिंद जय भारत...


    मन का मंथन... मेरे विचारों कादर्पण...

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  14. देव भूमि का चीत्कार तो लंबे समय से था .. अपर हमने अब सुना जब नगाड़े बजे ...
    इन्सान सुनता कहां है आज ...
    सार्थक रचना ...

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  15. वाह . बहुत उम्दा,सुन्दर व् सार्थक प्रस्तुति
    कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |

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  16. Ufff....Aap ab bhi utne hi khoobsurat ho!!

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  17. बहुत उम्दा भावपूर्ण प्रस्तुति...बहुत बहुत बधाई...

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  18. बहुत सामयिक और मार्मिक प्रस्तुति

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  19. Beautiful poem filled with a deep sadness.
    Check my poem on the same @ The youth's write by Rishi Jain.

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