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Thursday, March 11, 2010

इतना सा फलसफा.................

इतना सा फलसफा है इतनी सी ज़िन्दगी है'



,करना है काम बहुत पर वक़्त कि कमी है ,


हमने बहुत सोचा क्या क्या न कर गए हम ,


अपनी तरक्की के खातिर हद से गुज़र गए हम


,उचाईयों पर जाकर पीछे जो हमने देखा ,


रह गए थे तनहा परछाई भी नहीं थी ......


एक वो भी दौर था जब भीड़ से घिरे थे,


न जाने कितने लम्हे बाहों में आ गिरे थे,


हमको कहाँ थी फुर्सत उनको गले लगाते


आज सूनी हैं बाहें और आँख में नमी है


इतना सा फलसफा है .......................

Wednesday, March 10, 2010

ज़िन्दगी रुकी क्यों है !

कल खुदा से मेरी मुलाक़ात हुई

पता नहीं उसकी सूरत मेरे सनम सी क्यों थी
चेहरा तो रोशन चिराग सा था
आँखों के कोनों में नमी सी क्यों थी

वो करता रहा मुझसे बात
और मेरे दर्द भी बांटता रहा
जो भी कहा सुना उसने गौर से
मेरे दिल में भी झाकता रहा

गर उससे  नहीं है कोई भी रिश्ता
ज़िन्दगी उस लम्हात पर रुकी क्यों है ......

Monday, March 8, 2010

पहचानो मुझे ....


मैं देवी नहीं हूँ मैं माँ हूँ तुम्हारी


मैं बेटी हूँ,पत्नी और हूँ सखी भी

हँसती हूँ जब मुस्कुराते हो तुम

तुम्हारी एक शिकन से होती हूँ दुखी भी



जब थी परीक्षा तो जागी थी मैं भी

दही चीनी लेकर पीछे भागी थी मैं ही

जब चमका तेरे भाग्य का सितारा

मुट्ठी भर मिर्चें नज़र भी उतारी



सप्तपदी के वचन को निभाया हमेशा

हर रिश्ते को तेरी नज़र से ही देखा

तेरी सांस से जोड़ ली अपनी साँसे

अग्निपरीक्षा देने को वेदी चढ़ी मैं



तेरी गोद में नन्ही कली सी महकी

मुझे पा के तेरी बगिया थी महकी

तुम्हारी मर्यादा को कन्धों पे ढोया

हुई विदा पर ये रिश्ता न खोया



कई रूप मेरे सभी तो निभाये

संस्कार,शील, मर्यादा सभी सर झुकाए

करती गई जो जब भी था चाहा

तेरे साथ से कभी ज्यादा ना माँगा



तो फिर आज क्यों भृकुटी तनी है तुम्हारी

पहचानो मुझे संग खड़ी हूँ तुम्हारे .......


Saturday, March 6, 2010

बहुत दिन हुए.......

बहुत दिन हुए.......

कच्ची अमियों की फांकों पे बुरके नमक

पतंग को हवा में उडाये हुए

झूले पे पींगे बढाए हुए

हाँ बहुत दिन हुए ठहाका लगाये हुए



आखिरी बार कब .....

लिखा था ख़त

निहारा था चाँद को

तनहा बैठे थे छत पर

हाँ बहुत दिन हुए ग़ज़ल गुनगुनाये हुए



पता नहीं क्यों ......

बेर उतने मीठे नहीं

कनेर भी दीखते नहीं

गलिया सूनी सी रहती है

हाँ बहुत दिन हुए मोहल्ले में मजमा जमाये हुए

Thursday, February 25, 2010

आज यूँही (होली)

लो मैं फिर आ गई फिर युही लिखने के लिए ,पिछली बार बसंत था तो इस बार फागुन, मुझे लगता है बचपन से हिंदी महीनों क नाम क साथ उनकी विशेषताएं मुझे जो बताई गई वो ही मेरे इस यूँही का कारण है वरना जनवरी फरवरी जानने वालो को कभी ऐसे बौराते देखा है,

शिवरात्रि से जो फागुन की उमंग चद्ती है वो होली पर बम भोले का प्रसाद(ठंडाई ) पाए बिना उतरता ही नहीं,जब फर्रुखाबाद में थी तब हर गली हर मोड़ पर होली की उमंग खींच लेती थी,ठेलों पर गुलाल के रंग आँखों को ठंडक देते तो हलवाई की दूकान पर रस की गुझिया जीभ के सारे स्वाद तंतु जगा देती,मंदिरों में रोली क साथ गुलाल का टिका लगने लगता तो रंगभरी एकादशी तक चलता..होली पूजन को गोबर की गुलेरियाँ कहीं पथ रही होती तो ,कांजी के लिए बड़े उतरने को कही कडाही चढ़ी होती तरह तरह क पकवान, पर क्या मजाल होली से पहले कुछ चखने को भी मिल जाए.



आज वो होली नहीं है जिसमें "रंग भंग और तरंग " का संगम होता था, आज थोड़ी अभिजात्य प्रकार की होली मनाती हूँ, जब सुखा गुलाल हाँथ में लेकर मिलने वालों को "हैप्पी होली" बोलती हूँ, तो कहीं छोटी सी सोनल हाँथ में गीला रंग लिए सहेलियों के साथ गलियों में होली है  भाई होली है के नारे लगा कर दौड़ जाती है .

"आप सभी को होली की शुभकामनाएं "

Saturday, February 20, 2010

इंतज़ार फागुन का

 पेड़ों पर लद गया भार फागुन का



गलियों में छा गया खुमार फागुन का


जब मन बहका सा हो और गालों पर दहके टेसू


समझलो ख़त्म हुआ इंतज़ार फागुन का






२.जब मन बहके और तन लहके


बिन बात कहीं मैं मुस्काऊं


नयन लगें हो राहों पर


सुलझी लट फिर से सुलझाऊं


कैसे हुई मैं बावरी


इसका मुझको ध्यान नहीं


जो फागुन में तुम आन मिलो प्रिय


मैं बासंती हो जाऊं



Tuesday, February 16, 2010

हर हर गंगे ! बम बम भोले


हमेशा अख़बारों में टीवी पर कुंभ से जुडी खबरें देखती थी, तो मन में विचार आता था कैसा लगता होगा ? बहुत भीड़ होती होगी ,गन्दगी, अव्यवस्था होगी, और चैनल बदलते ही कुंभ भी मन से निकल जाता.

शायद मेरा सोचना कुंभ के बारे में ऐसा हे रहता पर बम भोले की कृपा से शिवरात्रि पर हरिद्वार जाने का अचानक मौक़ा मिला , हमने इसे इश्वर की इक्छा माना रात १२ बजे कार्यक्रम बना और सुबह ५.३० पर निकल पड़े

११ फरवरी २०१०

सुबह सुबह कुछ अलसाए कुछ उत्साहित हम निकल पड़े भोले की नगरी की ओर बीच में आँख लग गई जब आँख खुली तो अपनी बाई ओर गंगा नहर को बहते पाया, इतना सुन्दर द्रश्य आँखें हट ही नहीं रही थी कभी सोचा ही नहीं था की सुबह इतनी सुहानी भी हो सकती है मेरा कवि मन गंगा की लहरों के साथ हिलोरे लेने लगा, अभी रास्ता लंबा था तो शिवानी जी की "शमशान चम्पा " को सखी बना लिया.

हरिद्वार हे प्रभु , कितना जीवंत ये कुंभ का प्रभाव था या मन की आस्था की लग रहा था की बस यही तो आना था मुझे, होटल से विश्वकर्मा घाट १०० मीटर की दूरी पर था जितना चाहो डुबकी लगाओ या किनारे बैठ कर भागीरथी की लहरों को निहारो, फ्रेश होकर कंधे पर कैमरा टांगा और अकेले निकल पड़ी, जब निकल रही थी तो सोचा नहीं था ये अनुबव जीवन पर्यंत याद रहेगा.

महाशिवरात्रि से एक दिन पहले मनो सारे रास्ते हर की पौड़ी की तरफ जा रहे थे हर प्रान्त ,हर वय के लोग आस्था की गंगा में डुबकी लगाने जा रहे थे,सबके चेहरे अजनबी थे पर सब एक ही डोर से बंधे लग रहे थे, मैं हमेशा भीड़ से घबराती थी पर ये समूह कुछ अलग था, श्रधा आस्था प्रेम धर्म सब एक ही जगह, अभेद सुरक्षा व्यवस्था की वजह से ३ किलोमीटर पैदल चलना पड़ा पर जैसे ही हर की पौड़ी के दर्शन हुए तो लगा मेहनत सफल हो गई.

सच में जीवनदायनी है गंगा, गंगाजल स्पर्श करते ही आँखे छलक पड़ी मन स्वतः ही अपने बिछड़े परिजनों को याद कने लगा और उनकी मुक्ति की कामना भी सच में अभूतपूर्व है गंगा और अद्भुत है कुंभ.

१२ फरवरी २०१०

महाकुभ महाशिवरात्रि और शाही स्नान ......सुबह से ही मन उद्वेलित क्या करुँगी आज होटल वालों से पूछा उन्होंने अखाड़ों के दर्शन करने की सलाह दी, तो फिर निकल पड़ी मैं हर की पौड़ी की ओर, पर ये क्या सारे रास्ते बंद पुलिस से पूछा उन्होंने बोला शंकराचार्य चौक पर बैठ जाइए सारे अखाड़े वही से निकालेंगे, अजीव सा रोमांच महसूस हो रहा था हजारों की भीड़ एक साथ,सड़क के किनारे बैठी थी,

मेरी संत समाज में कभी भी बहुत अधिक आस्था नहीं रही शायद ये हमारी पीढ़ी का दुर्भाग्य है, हम भी उनके बारे में जानते ही नहीं,मेरे साथ में आगरा से से आये एक बुजुर्ग थे उन्होंने मुझे अखाड़ों ,नागा बाबा, और उनके दर्शन के साथ करने का माहत्म्य बताया, मुझे तो सारा माहौल ही चमत्कारिक सा लग रहा था,अचानक कहे से भजनों के आवाज आई तो देखा, कुछ विदेशी युवा ढोलक मंजीरे लेकर शिव महिमा का गुणगान कर रहे है, कुछ लज्जा सी लगी मुझे बहुत याद करने पर भी ॐ नमह शिवाय के अलावा कुछ नहीं याद आया ना कोई मंत्र ना कोई भजन........

दो घंटों की प्रतीक्षा के बाद मैं तो वहां से उठने का मन बनाने लगी थी पर आस पास से आवाज आ रही थी "इश्वर के दर्शन इतने सहज नहीं होते , अब चाहें शाम हो जाए जायेंगे तो दर्शन कर के ". मेरी आस्था जो कहीं गुडगाँव की भाग दौड़ में मंद हो गई थी, धार्मिक मौहोल में वापस फलीभूत होने लगी.....

अचानक कुछ हलचल हुई और फिर मैंने जो देखा वो वास्तव में अद्भुत था झुण्ड के झुण्ड साधू , नागा बाबा हथियारों के साथ , सोने के सिहासन पर आरूढ़ महामंडलेश्वर ,उनके साथ शाही ध्वज लिए देश विदेश से आये भक्त जन, सब कुछ स्वप्न की तरह ,कितना सम्मोहक हाँथ अपने आप श्रधा से जुड़ गए , मस्तक झुक गया,और मन इश्वर को धन्यवाद देने लगा.

अपने सौभाग्य पर यकीन नहीं आ रहा था, सारे विश्व से आये संतों के दर्शन एक साथ , नागा बाबा तो साक्षात शिव का रूप लग रहे थे.......

कुंभ वास्तव में एक दर्शनीय अवसर है और उसपर शाही स्नान के दर्शन हो जाए तो सोने पर सुहागा,इस अनुबव नें मेरे मन को जो शान्ति और अपनी भारतीय धर्म और संत समाज के प्रति सम्मान और गर्व की अनुभूति दी है वो सदा मेरी स्मृति में रहेगी.

(लिखना तो बहुत था गंगा स्नान के बारे में, विदेशी भक्तों ,अवधूत बाबा के बारे में पर फिर कभी )