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Thursday, December 13, 2012

पिया बिदेस


ओ री सखी
सूनी बहियाँ
सीली अंखिया
बहकी बतिया
बिरहन रतियाँ

ओ री सखी
पिया बिदेस
जोगन भेस
रूखे केश
जीवन क्लेश
भेज संदेस

ओ री सखी
पूस मास
भूली हास
धूमिल आस
भारी सांस
अधूरी प्यास



19 comments:

  1. वाह , विरह रस तो शब्द शब्द छलक रहा है , पढ़ के आनंद आया . अत्यंत सुन्दर .

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  2. अरे.......ये सत्यानास कहाँ से आ गया....
    अधूरी प्यास कर दो यार....श्रृंगार की कविता हास्य रस की होने से बच जायेगी :-)

    अनु

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  3. सुन्दर भाव पूर्ण अभिव्यक्ति

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  4. प्रेम और विरह को आत्मसात करती रचना ...
    भावपूर्ण रचना ...

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  5. विरह को अभिव्यक्त करती सुन्दर रचना...

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  6. वाह ... क्‍या बात है
    बहुत ही अच्‍छा लिखा है

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  7. विरह रस में डूबी एक बेहतरीन कविता :))
    my first short story:-  बेतुकी खुशियाँ

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  8. करूँ प्रतीक्षा, आँखें प्यासी

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  9. शृंगार रस की कविता हास्य रस की होने से बच गयी :) विरह का सुंदर वर्णन ।

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  10. sakhi...bochhoh ki vedna ko sundarta se ukera hai aapne :)

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  11. दो पोस्ट बैक टू बैक पढ़ी, एक में हंसाया एक में रुलाया !!!! :( :(

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  12. पर ज्यादा सेंटी होने की ज़रूरत नहीं, जब रात गहरी हो जाये , तो मोर्निंग होने ही वाली है :) :)

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  13. दर्द बखूबी उकेरा है ...
    शुभकामनायें ॥

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  14. इस कविता में एक मिठास, एक अपना और हलके से दर्द का अहसास है।

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