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Tuesday, December 18, 2012

बस देह भर


पुनरावृति
हताशा की
एक मौन
अपने होने पर
एक पीड़ा
नारी होने की
वही अंतहीन
अरण्य रुदन
बस देह भर
ये अस्तित्व
छिद्रान्वेषण
पुन: पुन:
चरित्र हनन
या वस्त्र विमर्श
मैं बस विवश
बस विवश ...

24 comments:

  1. बस विवश! बस विवश!

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  2. कितने विवश हैं हम...वितृष्णा होती है इस विवशता से ........अपने आपसे ........पूरी व्यवस्था से .............!!!!!!

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  3. जारी भाषण,चर्चा और शब्दों का समूह ...असल में पसरा वही मौन.:(:(

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  4. बस विवश .... आए दिन ये हादसे हो रहे हैं ...जब तक कठोर कानून नहीं बनेंगे और उनका पालन नहीं होगा तब तक शायद ऐसा ही होता रहेगा .... आरोपी छूट जाएंगे .... लड़कियां डर डर कर जीती रहेंगी ।

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  5. दुखद मार्मिक और कठोर वातावरण

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  6. कोमल भावो की
    बेहतरीन.....

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  7. उम्दा, बेहतरीन अभिव्यक्ति...बहुत बहुत बधाई...

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  8. बहुत कम शब्दों में सम्पूर्ण पीड़ा को अभिव्यक्त किया आपने ...साधुवाद

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  9. मैं बस विवश
    बस विवश ... बहुत अच्छे काव्य की ठेरों शुभकामनायें .

    गद्दार सारे मस्त है हम विवश हैं,
    हम कैद है अपने घर में
    मुजरिम घूम रहे है सरेआम शहर में.... चित्र भी सच्चाई बयाँ करता है। :(

    मेरी नई कविता आपके इंतज़ार में है: नम मौसम, भीगी जमीं ..

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  10. अपने इस दर्द के साथ यहाँ आकर उसे न्याय दिलाने मे सहायता कीजिये या कहिये हम खुद की सहायता करेंगे यदि ऐसा करेंगे इस लिंक पर जाकर

    इस अभियान मे शामिल होने के लिये सबको प्रेरित कीजिए
    http://www.change.org/petitions/union-home-ministry-delhi-government-set-up-fast-track-courts-to-hear-rape-gangrape-cases#

    कम से कम हम इतना तो कर ही सकते हैं

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  11. कैसी इकतरफ़ा विवशता है ये...... :((

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  12. बहुत खूब .... आप भी पधारो पता है http://pankajkrsah.blogspot.com

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  13. इस विवशता पर क्रोध आता है, आखिर सब कुछ एक पक्षीय क्यों? कठोर कदम ज़रूरी है.

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  14. मार्मिक...कोई शब्द नहीं.

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  15. जो दिल्ली में घटा उसे युं तो किन्हीं शब्दों में बयां कर पाना मुश्किल है पर आपकी कविता उस दर्द को बखूब दर्शाती है..सुंदर प्रस्तुति।
    मेरी नई पोस्ट पर स्वागत है।

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  16. हर बार लडाई जीरो से शुरू होती है , घूम फिर कर वही अंतहीन मौन !

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  17. This comment has been removed by the author.

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