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Monday, September 21, 2009

उसरी


उसरी ,
रसोई से बर्तनों की पटकने की आवाजें तेज हो गई थीं और निमिषा बिना इन
आवाजों पर ध्यान दिए अपनी सिलाई मशीन पर लगी हुई थीं पड़ोस की शीला की
शादी थी उसकी सारी साडी की फाल और चोली सिलने का काम निमिषा को मिला था
,मशीन चलाते चलाते प्यास का एहसास हुआ गला कुछ सूखा सा लग रहा था ,निगाह
उठा कर देखा तो घडी में बारह बजने को थे ,
बच्चों थी स्कूल से आने का समय हो चला था, पानी पीने को रसोई में फ्रीज
खोला तो लगा पीठ पर दो निगाहें चुभती हुई सी महसूस हुई पलट कर देखा
जेठानी का ध्यान रोटी बनाने पर कम उसपर ज्यादा था , वो फिर उनकी परवाह
किये बिना वापस मशीन पर आ गई, मशीन थे पहिये थे  साथ उसका मन भी घूमने लगा
इक्कीस  साल पहले ....................................
ढोल ताशों थी बीच जब वो दुल्हन बन कर आई थी आज भी एक एक पल उसके सामने
फिल्म की रील की तरह घूम जाता है चारो  तरफ मचता शोर ,रिश्तेदारों का जमघट
हर कोई नई दुल्हन की अगवानी करने को बेताब ..."अरे नहीं बहुरिया को पहले
मंदिर ले गए या नहीं", नन्नू की अम्मा रोली टिके की थाली तो ला ", अनाज
का कलश देहरी पर रख ,
सारी रस्मे वो मशीन की तरह निभाती चली गई,कम से कम बीस लोगों के तो पैर
छुए होंगे और ढेरों आशीष पाए,
उसको मुहदिखाई से पहले थोडी देर आराम करने के लिए कमरे में बिठा
दिया,घूघट की ओट से उसने अपनी ससुराल देखने की कोशिश की , पीले रंग से
नया पुता हुआ कमरा पूरे कमरे में लगे आदमकद शीशे, सामने  दीवार पर राधा
कृष्ण की जुगल तस्वीर कुल मिला कर कमरे को बहुत सुन्दर बना रही थी , कोने
में सिंगार की मेज रखी थी जिसपर नए फैशन का  सिंगार का सारा सामान रखा
था,
निमिषा को तो ये सब सपने जैसा लग रहा था, चार बहिन दो भाइयों का बड़ा
परिवार,निमिषा के पिता सरकारी नौकरी में थे अगर बहुत वैभव नहीं था तो
खाने पीने की कोई कमी भी नहीं थी ,
सभी बच्चों की पढाई पर पूरा ध्यान दिया था , निमिषा शुरू से पढाई में
ज्यादा अच्छी नहीं थी पर घर के काम काज में उसकी सुघड़ता देखते बनती थी ,
चाहें खाना बनाना हो ,सिलाई कढाई हो या बचे हुए सामान से कुछ बनाना उसके
शौक को देखते हुए उसकी उसे हर गर्मी की छुटियों में हॉबी क्लास भेज देती
थी, पांच भाई बहिन में तीसरा नंबर था निमिषा का, उसके हाँथ ने स्वाद की
वजह से सारे उसे अन्नपूर्णा कहते थे,
उसके इसी हुनर की वजह से मांग कर रिश्ता हुआ था,
निमिषा की जेठानी उसकी दीदी की चचेरी ननद थी जो उसके बनाये हुए मटर पनीर
,और रसगुल्लों के स्वाद में उलझ कर रह गई थी और जाते ही अपने लाडले देवर
नितिन के लिए सरकारी बाबू की बिटिया का हाँथ मांग लिया
अँधा क्या चाहें दो आँखे घर बैठे जब इतने अच्छे परिवार का रिश्ता आया तो
मन करने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता उँचा कुल , पढ़ा लिखा लड़का , खाता 
पीता परिवार बिना चप्पल घिसे बिटिया बिदा करने का सौभाग्य मिल रहा था,
पिता की ख़ुशी का ठिकाना न था तो माँ  मंदिर में दिया जलाने और इकीस रूपये
का प्रसाद चढाने  दौड़ पड़ी ,लड़के वालों की कोई मांग नहीं थी पर मिश्रा जी
ने अपने सामर्थ्य के अनुसार बिटिया को दे दिवा कर विदा किया,
आजसे निमिशा की नयी ज़िन्दगी शुरू हो रही थी नया घर नए लोग कुछ डर और कुछ
शर्म से गठरी बनी कमरे में बैठी थी , सारी रात शादी की रस्मों में बैठे
बैठे कमर अकड़ गई थी , जरा सा लेटने को मिल जाता तो आराम मिल जाता, पर हर
आहट पर चौंक कर निगाह दरवाजे पर पहुँच जाती ....


तभी दरवाजे से जिठानी सीमा मुस्कुराती हुई आई साफ़ गेंहुआ रंग ,भरा हुआ शरीर काजल लगी बड़ी बड़ी आँखें सलीके से किया हुआ सिंगार ,सुर्ख लाल रंग की बनारसी साडी के साथ बड़ी सी बिंदी लगाए बिलकुल ठकुरानी सी लग रही थी , उनके वयक्तिव से रईसी की ठसक जाहिर हो रही थी, आखिर थी भी तो कानपूर के मशहूर वकील इश्वर्सरन की एकलौती बेटी.
निमिषा को अपने साथ लेकर बाकी की रस्में निपटाने के लिए मुहँदिखाई शुरू हुई निमिषा का घूंघट उठाया गया , यूँ तो निमिषा देखने में सुन्दर थी आमकी फंकों की तरह कटीली आँखें, नुकीली नाक जिसके नीचे पतले पतले गुलाबी होंठ, कमर तक झूलती नागिन जैसी चोटी...बस रंग थोडा गहरा सा था पर चेहरे का भोलापन देखने वालों की निगाह को एक बार रोक ही लेता सारी रस्मे पूरी होते होते ग्यारह बज गए नींद के मारे बुरा हाल हो गया, पता नहीं कब बैठे बैठे निमिषा की आँख लग गई वो तो सोती ही रह जाती अगर जिठानी का बेटा उसको आकर जगाता नहीं , तीन साल का छोटा सा प्यारा सा पिंटू रबड़ के गुड्डे जैसा ,निमिषा का मन किया उसे गोद में ले ले तभी सब उसे कमरे में ले गए.
शादी की शुरुवात का एक महीना तो जैसे सपने की तरह गुजर गया नितिन के साथ कुल्लू -मनाली की वादियों में घुमते एक दुसरे के साथ को, स्पर्श को महसूस करते हुए , लगा बस अब ज़िन्दगी ऐसी ही रहे कुछ ना बदले पर ऐसा होता ही कहाँ है. हनीमून से वापस आने पर सब बदल चुका था, सारे रिश्तेदार जा चुके थें, नितिन भी ऑफिस जाने लगा, पिंटू स्कूल घर में अब बस निमिषा और उसकी जेठानी,
निमिषा तो शुरू से ही घर के कामों में होशियार थी सो घर क रूटीन को समझने में ज्यादा समय नहीं लगा,किसको खाने में क्या पसंद है मिर्च मसाले कैसे पड़ते है बहुत जल्दी सीख गई , उसके हाँथ का खाना सबकी जबान पर चढ़ गया सब तारीफ़ कर कर के खाते थे , जिठानी ने बाहर का काम संभाल लिया और रसोई क ज़िम्मेदारी निमिषा पर आ गई, घर पर लक्ष्मी जी की कृपा थी ही, सबको सबके मन का खिला कर निमिषा का मन खुश हो जाता, और नितिन जब तारीफ़ की नज़रों से देखता तो वो उसे लगता की दुनिया की सारी खुशियाँ मिल गई, तीन साल में दो प्यारे- प्यारे बच्चों की माँ बन गई, सब बढिया चल रहा था
पर समय बदलते देर नहीं लगती , कुछ महीनों से जेठ जी रात को देर से आने लगे थे उनको ताश खेलने की आदत लग गई थी ...शुरुवात मजे के लिए हुई तो लत में बदल गई ,नितिन ने बहुत कोशिश की पर हारा हुआ जुआरी अपनी हर रात की हार को सुबह जीत में बदलना चाहता है ,
वो लक्ष्मी जो घर में धन धान्य बरसा रही थी आज ताश के पत्तों के साथ घर से बाहर जाने लगी ,
घर के खर्चों के लिए भी हाँथ तंग होने लगा , दाल में घी कम हो गया ,दो की बजाय एक सब्जी और दही से काम चलाया जाने लगा ,
नौकर चाकर भी निकाल दिए गए जिन खर्चों का कभी हिसाब भी नहीं होता था अब एक -एक पैसे का खर्च भी फिजूल लगने लगा
निमिषा के जिम्मे घर के काम बढ़ने लगे रसोई ,बर्तन ,घर की सफाई ...साथ में बच्चों को पढाना, जिठानी बड़े घर की बेटी थी सो जरा सा काम करते ही उनके हाथ में दर्द होने लगता था, निमिषा ने जब धीरे से कुछ कहना चाहा तो जिठानी बीच आँगन में बिफर पड़ी , मेरे परिवार की दो रोटियाँ सेकनी तुमको भारी पड़ती है अपने परिवार का मैं खुद संभाल लूंगी... रुपयों की तंगी ने दिलों को भी तंग कर दिया था, कुछ ख़ास नहीं बदला अभी भी निमिषा सब संभाल रही थी, बस जेठानी अपना और अपने बच्चों का खाना लगा कर शाम छह बजे से ही कमरे में ले जाती,फ़िर बाहर  ना निकलती
जब निमिषा नितिन अपने परवार का खाना लगाती तो कभी सब्जी कम पड़ जाती तो कभी आलू की रसेदार सब्जी में आलू कम होते, जेठ रात को चाहें दो बजे आये उनका खाना लगाना निमिषा की ज़िम्मेदारी थी क्योंकि वो उसके हाँथ का खाना खाते थे...
बढती  ज़िम्मेदारी और अपने परिवार को समय ना दे पाने की कसक से निमिषा चिड़चिडी सी हो गई थी , नितिन भी बढ़ते खर्च और घटी आमदनी से परेशान रहने लगे थे.
निमिषा को कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था.
एक दिन उसकी सहेली ने बातों ही बातों में उससे अपनी नई साड़ी की फाल लगाने और चोली सिलने को कहा , दरजी ने समय पर देने से मन कर दिया ,समय ना होने पर भी अपनी सहेली कंचन को निमिषा मना नहीं कर पाई, रात को एक बजे तक बैठ कर उसका काम पूरा करके दिया,
अगली सुबह कंचन जब साड़ी लेने आई तो दंग रह गई "निमिषा तेरे हाँथ में तो जादू है कितनी अच्छी फिटिंग दी है, बहुत सफाई है तेरे हाँथ में" मन करते करते भी हाँथ में अस्सी रूपये रख गई बोली दरजी को भी तो देती ना और ये तो तेरी मेहनत के है,
कंचन ने उससे फ़ोन पर कहा मेरी किट्टी की सहेलियां भी तुमसे कपडे सिलवाना चाहती है ,निमिषा मन ही मन में खुश तो हुई पर बोली घर के कामों से समय ही नहीं मिलता,कैसे करुँगी ,कंचन बोली घर बैठे काम आ रहा है और तू मना कर रही है सोच कर जवाब दे कोई जल्दी नहीं है,
रात को नितिन से निमिषा ने सारी बात बताई, और अपनी परेशानी भी .....नितिन बोला घर में काम मिल रहा है इससे अच्छी तो कोई बात हो नहीं सकती अपनी पैसों की परेशानी भी कुछ कम हो जायेगी, चलों मैं सुबह बड़े भैया से बात करूँगा.

बड़े भैया को भी अपनी गलती का एहसास होने लगा था घर की गिरती हालत ने उनकी आँखें खोल दी थी नितिन की मदद से वो अपनी जुए की लत से छुटकारा पाने की कोशिश कर रहे थे .बड़े भैया को भी इसमें कोई बुराई नहीं दिखाई दी घर के कामों के लिए भैया ने कहा तुम दोनों जेठानी देवरानी अपनी अपनी एक एक दिन की उसरी (ड्यूटी ) बाँध लो, घर में अलग से आमदनी आएगी तो अच्छा ही रहेगा, इस सारी बातचीत को जेठानी चुपचाप सुनती रही उनके चेहरे पर इतनी देर में कितने रंग आये और चले गए , बीस सालों में जिसको थोडा काम करने की आदत हो उसपर पूरे दिन का काम आजाये तो उसके पैरो के नीचे से जमीन निकल ही जाती है, उसने तर्क करने की बहुत कोशिश की " ऐसे काम थोडी चलता है , एक कपडा भी खराब हुआ तो नाम खराब हो जाएगा , कौन काम देगा , बाज़ार में क्या दर्जी मर गए है ,बड़े भैया अपनी अर्धांगनी की बेचैनी समझ गए और बोले मुझे जो फैसला करना था वो कर दिया, आज से बल्कि अभी से तुम दोनों हफ्ते के दिन बाँट लो .
निमिषा को तो जैसे मन मांगी मुराद मिल गई उसने कंचन को फ़ोन कर हामी भर दी , जेठानी ने बीस साल बाद रसोई में कदम रखा तो मसाले दालें ढूँढने में आधा घंटा लग गया , निमिषा के आने के बाद रसोई में जाने की जरूरत ही नहीं रही थी, जैसे तैसे खाना बनाया तो उसमे स्वाद नदारद ना नमक का अंदाज न हल्दी का... एक दो बार निमिषा का मन हुआ जा कर मदद करे पर बीस साल बाद मिली आज़ादी को वो खोना नहीं चाहती थी,
कंचन की मदद से निमिषा का काम चल निकला कपडे सिलवाने वालों की और सिलाई सिखने वालों की लाइन लग गई, काज बटन और बखिया का काम उसने पड़ोस की जरूरतमंद राधा को दे दिया,
बच्चों के साथ समय मिलने लगा घर में अतिरिक्त आमदनी भी आने लगी , नितिन भी खुश थे .
अब इतवार को वो बच्चों को घुमाने जाने लगी बस जो खुश नहीं थी वो थी उसकी जेठानी ........
आज एक साल पूरा हो गया निमिषा को काम करते हुए, अब जा कर ज़िन्दगी ढर्रे पर आई है, अब कोई भी सबको तो खुश नहीं रख सकता ये सोच कर निमिषा के होंठों पर मुस्कराहट फ़ैल गई और संतोष के भाव आ गए........
रसोई में बर्तन पटकने की आवाजें और तेज़ हो गई



सोनल रस्तोगी ०९-जून-२००९

4 comments:

  1. कहानी गठन के हिसाब से बहुत अच्छी बन पड़ी है, रवानगी भी है, और कहानी लिखिए और अपलोड कीजिये.

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  2. कहानी गठन के हिसाब से बहुत अच्छी बन पड़ी है,
    WELCOME
    SANJAY BHASKAR
    TATA INDICOM
    HARYANA

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  3. अच्छी कहानी थी ...जैसे वो एक सीरियल आता था न कहानी घर-घर की वैसी ही बढ़िया पारिवारिक कहानी...

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  4. सोनल कहानी पढनी शुरू की तो लगा था वही परंपरागत कहानी होगी..नई बहु के त्याग की या जेठानी के अत्याचार की.पर जो व्यावहारिक मोड तुमने कहानी को दिया है..अच्छा लगा.और खास कर अंत की पंक्तियाँ बेहद प्रेक्टिकल और सच्चाई के निकट हैं...
    ये तो रही कथ्य की बात..
    अब शिल्प- तो वो ऐसा है कि बस पढते जाओ पढते जाओ.

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