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Tuesday, October 12, 2010

नवरात्र

नवरात्र !


(शीतला माता ,गुडगाँव )

देवी के दिन इन दिनों का अलग ही उत्साह रहता है एक नारी के जीवन में ,इतनी शक्ति महसूस होती है इनदिनों पूछो मत हर उम्र में अलग रंग लाता है ये त्यौहार ,साल में दो बार, बचपन में जहाँ हलवा पूरी,दही जलेबी,रंगीन चुनरी और चमचमाते और खनखनाते सिक्को का आकर्षण ,तरुणाई में नौ दिन के व्रत ,देवी उपासना और सुरगा सप्तशती का पाठ.

साल के बाकी दिनों से कितना विरोधाभास दीखता है समाज में इन दिनों ,जहाँ साल भर लड़कियों को हे द्रष्टि से देखा जाता है वहीँ इनदिनों ढूंढ मच जाती है कन्याओं के लिए ...वाह रे समाज ,जिनका पैर पूजन करते है उन्ही के घर में पैदा होने पर उदासी का माहौल बना लेते है ( सोच बदल रही है पर मंजिल अभी भी दूर है ).

इन दिनों माँ अपनी कृपा के सारे द्वार खोल देती है जितना मांगो उससे ज्यादा मिलता है , रोज़ की उठापठक बस हाँथ जोड़कर काम चला लेते है कम से कम नवरात्र के बहाने ही सही साल में दो बार,थोड़ा आध्यात्मिक हो जाते है तो मन को शान्ति मिल जाती है .

आप सभी को नवरात्र बहुत बहुत शुभ हो

18 comments:

  1. sonal..tumhe bhi shubhkanayen..!

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  2. सुंदर प्रस्तुति....

    नवरात्रि की आप को बहुत बहुत शुभकामनाएँ ।जय माता दी ।

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  3. aapko bhi bahut bahut shubhkamnayen!!

    Jai Ho Mangalmay HO

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  4. आध्यात्मिक होने के मौके तो बहुत आते हैं .... अपना समाज जो हर किसी को मौका देता है ... पर नवरात्रि की धूम अलग ही है .

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  5. नवरात्रि की शुभकामनाएं

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  6. sonal jee aap ko bhi navratree ki shubhkaamnayen . mata kripa banayen rakhen

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  7. आपको भी नवरात्रि की बहुत बहुत शुभकामनाएं..

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  8. मुझे ही पता है कितनी हिम्मत जुटा कर कह रहा हूँ.... पर शायद आप 'धार्मिक' को 'आध्यात्मिक' से कन्फ्यूज़ कर रही हैं!
    अग्रिम क्षमा याचना सहित,
    आशीष
    --
    प्रायश्चित

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  9. आपको बहुत बहुत शुभकामनायें।

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  10. बहुत शुभकामनायें आप सबको।

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  11. नवरात्री की शुभकामनाएँ.

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  12. नवरात्र बहुत बहुत शुभ हो

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  13. बचपन में जहाँ हलवा पूरी,दही जलेबी,रंगीन चुनरी और चमचमाते और खनखनाते सिक्को का आकर्षण ,तरुणाई में नौ दिन के व्रत ,देवी उपासना और सुरगा सप्तशती का पाठ.

    so tru...kitna maza aata tha na sikke, kai kai baar sikke ginte the ;)

    bohot bohot shubhkaamnaayein aapko aur sabhiko

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  14. लेखन के लिये “उम्र कैदी” की ओर से शुभकामनाएँ।

    जीवन तो इंसान ही नहीं, बल्कि सभी जीव जीते हैं, लेकिन इस समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, मनमानी और भेदभावपूर्ण व्यवस्था के चलते कुछ लोगों के लिये मानव जीवन ही अभिशाप बन जाता है। अपना घर जेल से भी बुरी जगह बन जाता है। जिसके चलते अनेक लोग मजबूर होकर अपराधी भी बन जाते है। मैंने ऐसे लोगों को अपराधी बनते देखा है। मैंने अपराधी नहीं बनने का मार्ग चुना। मेरा निर्णय कितना सही या गलत था, ये तो पाठकों को तय करना है, लेकिन जो कुछ मैं पिछले तीन दशक से आज तक झेलता रहा हूँ, सह रहा हूँ और सहते रहने को विवश हूँ। उसके लिए कौन जिम्मेदार है? यह आप अर्थात समाज को तय करना है!

    मैं यह जरूर जनता हूँ कि जब तक मुझ जैसे परिस्थितियों में फंसे समस्याग्रस्त लोगों को समाज के लोग अपने हाल पर छोडकर आगे बढते जायेंगे, समाज के हालात लगातार बिगडते ही जायेंगे। बल्कि हालात बिगडते जाने का यह भी एक बडा कारण है।

    भगवान ना करे, लेकिन कल को आप या आपका कोई भी इस प्रकार के षडयन्त्र का कभी भी शिकार हो सकता है!

    अत: यदि आपके पास केवल कुछ मिनट का समय हो तो कृपया मुझ "उम्र-कैदी" का निम्न ब्लॉग पढने का कष्ट करें हो सकता है कि आपके अनुभवों/विचारों से मुझे कोई दिशा मिल जाये या मेरा जीवन संघर्ष आपके या अन्य किसी के काम आ जाये! लेकिन मुझे दया या रहम या दिखावटी सहानुभूति की जरूरत नहीं है।

    थोड़े से ज्ञान के आधार पर, यह ब्लॉग मैं खुद लिख रहा हूँ, इसे और अच्छा बनाने के लिए तथा अधिकतम पाठकों तक पहुँचाने के लिए तकनीकी जानकारी प्रदान करने वालों का आभारी रहूँगा।

    http://umraquaidi.blogspot.com/

    उक्त ब्लॉग पर आपकी एक सार्थक व मार्गदर्शक टिप्पणी की उम्मीद के साथ-आपका शुभचिन्तक
    “उम्र कैदी”

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  15. हिन्दू धर्म का नारी के प्रति रवैया बड़ा ही खूबसूरत रहा है. एक तरफ उसे देवी बना दिया, तो दूसरी तरफ उसकी हालत पशुओं से बदतर कर दी. पर शायद ऐसी हालत अंतिम 500 सालों में हुई है. उसके पहले नारी का पुरुष के बराबर ही सम्मान था.

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