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Wednesday, January 12, 2011

क्षणिकाए

(१)
एक का दर्द
दूजे का तमाशा है
लोकतंत्र की
यही भाषा है
(२ )
एक हाँथ में छाले
दूजे में प्याले है
वाह ऊपर वाले
तेरे खेल निराले है
(३)
वोट लिया
फिर खून पिया
फिर बोटी नोची
फिर खाल खींची
कहीं देखी है
जनसत्ता ऐसी
(४)
बुजुर्ग घर में
औरत शहर में
बच्चे स्कूल में
सुरक्षित नहीं


26 comments:

  1. बेहतरीन कहा है आपने हर क्षणिका में लाजवाब ...।

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  2. बेहतरीन कटाक्ष करती हुई क्षणिकाये
    शुभकामनायें

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  3. एक का दर्द
    दूजे का तमाशा है
    लोकतंत्र की
    यही भाषा है

    बेहतरीन क्षणिकायें। देखन में छोटे लगें, घाव करें गम्भीर।

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  4. वाह! क्या बात है, बहुत सुन्दर!

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  5. एक का दर्द
    दूजे का तमाशा है
    लोकतंत्र की
    यही भाषा है
    क्या बात है ..एकदम सटीक क्षणिकाएं .गहरी बात.

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  6. एक हाँथ में छाले
    दूजे में प्याले है
    वाह ऊपर वाले
    तेरे खेल निराले है
    bahut khoob

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  7. एक एक क्षणिका लाजवाब... समसामयिक!!

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  8. आज के समाज की सही तस्वीर प्रस्तुत करती सटीक क्षणिकाएं

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  9. sab ki sab barabar chubhti hain, bohot khoob kaha...too good

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  10. कटाक्ष करती हुई क्षणिकाये...
    बहुत सुन्दर!

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  11. गजब है! गजबै है। तमाम सारी रचनायें पढ़ने को बची हैं आपकी। पढ़ते हैं। :)

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  12. एक का दर्द
    दूजे का तमाशा है
    लोकतंत्र की
    यही भाषा है

    हरेक क्षणिकायें सामजिक और राजनीतिक स्तिथि पर सटीक कटाक्ष..बहुत सुन्दर

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  13. गज़ब की क्षणिकाएँ
    बहुत सुन्दर

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  14. आज के समाज की सही तस्वीर प्रस्तुत करती सटीक क्षणिकाएं

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  15. आपको मकर संक्रांति के पर्व की ढेरों शुभकामनाएँ !"

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  16. सक्रांति ...लोहड़ी और पोंगल....हमारे प्यारे-प्यारे त्योंहारों की शुभकामनायें

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  17. वोट लिया
    फिर खून पिया
    फिर बोटी नोची
    फिर खाल खींची
    कहीं देखी है
    जनसत्ता ऐसी ....

    ..एकदम सटीक क्षणिकाएं ..

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  18. आज की परिस्थितियों पर तीखा व्यंग्य है इन क्षणिकाओं में ।
    प्रशंसनीय रचना।
    शुभकामनाएं।

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  19. This comment has been removed by the author.

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  20. सटीक व्यंग . एक दम सधे हुए तीर.बहुत अच्छा लिखा है आपने.आपकी कलम को सलाम

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  21. आपको बधाई
    धन्यवाद अनूप जी को
    बढ़िया क्षणिकाएँ पढ़वाईं।

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  22. हम और हमारे समाज को दर्पण दिखातीं बहुत सटीक और बेमिशाल क्षणिकाएं

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