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Friday, February 15, 2013

"बहाने बसंत के" (अंतिम भाग)





बावरे बसंत के खुमार से पार पाना इतना सहज कहाँ है, आसमानी पेंचों के साथ छतों पर लड़ने वाले पेंचों का ज़िक्र ना हो तो बात अधूरी सी रहती है, मोहल्ले में जुड़ने वाले दिल के रिश्ते अधिकतर एक तरफ़ा होते ,  छोटे शहर के पारखी सयाने हवा में मानो प्यार की महक कुछ पकने से पहले सूंघ लेते, चाहतो का इज़हार अक्सर नहीं होता ..एक दुसरे को दूर से ताककर  या सडक के किनारे खड़े होकर अपने वहां होने का एहसास दिलाना था , जानते थे खुलकर सामने आने में ..घर में "पादुका पूजन " ( चप्पलों से पिटाई ) के संयोग ज्यादा बनते ...

ऐसे डरे सहमे मौहोल में बसंत का इंतज़ार जायज था, महबूब के घर के पास वाली छतों पर बसंत पर चढ़ने के रास्ते तलाशे जाते नयी दोस्तियाँ होती ... कुछ मिन्नतें मनाई जाती ..घर वालों को समझाना होता आखिर एक पूरा दिन दीदार का कोई कैसे छोड़ दे ...कितनी खामोश मोहब्बते एक दीदार और मुस्कान के टॉनिक के साथ उस दिन तक चल जाती जिस दिन डोली उठती।

खुलकर सामने आने से बंदिशों और रुसवाई का दौर शुरू होने का डर, सुबह से गुलज़ार छतें  वसंतोत्सव के मद में झूमने लगती, दोपहर में  सुस्ताती और शाम आते आते एक बार  मेले की सी रौनक छा जाती , पीली साड़ियों में सजी कुलवधुएं ,पीला दुपट्टा लहराती नवयौवनाएं , और पीले टॉप या स्वेटर से काम चलाते हम जैसे कुछ अल्हड, एक दुसरे से हाल चाल पूछते , उत्साह बढाते, लड़के जहां छतों पर चढ़े रहते , हम लडकिया टोलियों में एक से दूसरी छतों पर डोलते, गप्पों बातों का अंतहीन सिलसिला, मीठी मीठी चुहलबाजियां, इनके बीच कच्ची शायरी में रंगी कोई पतंग छत पर आ जाए तो पूछो मत .

ठाकुर जी के भोग के लिए ख़ास मीठे चावल बनते जिनकी खुशबू और स्वाद आज भी सारे स्वाद तंतु जाग्रत कर देता है,दादी बसंत पर गंगा स्नान की महिमा हर साल बताती पर जानती थी इस दिन छत छोड़कर कोई कहीं नहीं जाने वाला, शुभ दिन होने के चलते सबसे ज्यादा शादियों के मुहूर्त इसी दिन निकलते ,शहर की शादियाँ तो फिर भी ठीक थी बाहर की शादियों में जाने के लिए तलवारें खिंच जाती "अरे उनको बसंत पर ही शादी रखनी थी क्या ".

साल बीते बसंत में कुछ नयी बातें जुडी "सरस्वती पूजा " , हमारे इंग्लिश के अध्यापक हर साल सरस्वती पूजा मनाते और माँ शारदा की नई मूर्ति स्थापित करते ,पुरानी प्रतिमा किसी छात्र को इस शर्त पर दी जाती वो पूरे साल मन लगाकर पढ़ाई करेगा, वही सच्ची सरस्वती पूजा होगी, एक साल माँ शारदा मेरे घर भी आई आज तक उनका आशीर्वाद फल रहा है . आजकल दीवाली से ज्यादा आतिशबाजी बसंत की रात हो होती है , टाट  में आग लगाकर मशालें जलाई जाती है , तीन दिन का त्यौहार आज एक दिन में सिमट गया है ....

ये दस्तावेज है ताकि सनद रहे के एक दिन आकाश ,छतों ,डोर और पतंगों के नाम था .....
आज घर से दूर, छत से दूर कीबोर्ड खटखटाते हुए, बसंत की स्वर्णिम आभा जी रही हूँ ... आप सभी को बसंत की शुभकामनाये ..

10 comments:

  1. मधुर स्मृतियाँ सँजो ली हैं .... पंचमी की शुभकामनायें

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  2. सादर नमन ।।
    बढ़िया है -
    शुभकामनायें- ||

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  3. बहुत बढ़िया ...
    वसंत पंचमी की शुभकामनायें

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  4. बहुत बहुत अच्छा सीरिज रहा ये!!

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  5. बसन्त पंचमी की हार्दिक शुभ कामनाएँ!बेहतरीन अभिव्यक्ति.

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  6. मेरे नानाजी सरस्वती माँ के उपासक थे, वे सबसे ज्यादा जोश से बसंत पंचमी का पर्व मनाते, इसकी महत्ता मुझे उन्हीं से पता चली। अच्छी सीरिज के लिए धन्यवाद

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  7. अरे अभी कैसे खतम किया भाई! छज्जे वाली बात पूरी लिखी नहीं! :)

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  8. बहुत खूब ... आपने यादों के कई पन्नों को सामने ला खड़ा किया है ...
    मज़ा आ गया ...

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  9. वसंत का आगमन मन बौराना... पीले सरसों, पीली पतंग, पीली धूप पीला गुला, पीली साड़ी... और फिर पीला गुलाल... अहा... बहुत मनभावन, वसंत ऋतु की शुभकामनाएँ.

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