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Thursday, August 31, 2017

इन आँखों में बारिश कौन भरता है ..






बेतरतीब मैं  
(३१.८.१७ )

`
कुछ पंक्तियाँ उधार है मौसम की मुझपर ,  इस बरस पहले तो बरखा बरसी नहीं ,अब बरसी है तो  बरस रही ,शायद ये पहली बारिशों का मौसम है ,जब मैंने भीगने की इच्छा नहीं की ,पिछली शाम गाडी तक जाना असंभव सा था , बादल झूमकर नहीं टूटकर बरस रहे थे, मैं हैरान सी गाडी तक जाने का उपाय सोच रही थी ,
भीतर किसी ने बोला ,क्या हुआ पगली , बारिशों से घबराने वाली ये लड़की कौन है , आसमान में घटा देखकर दीवानी होने वाली बावरी कहाँ चली गई ,बारिशों पर कम से कम १०० कविताएं लिखने वाली ,इस लड़की ने इस बरस दो पंक्तियाँ भी नहीं लिखी ,आखिर हुआ क्या है ?

सच आखिर हुआ क्या है , कितनी तेज दौड़ रही हूँ कि एक लम्हा ठहर कर बारिशों को निहारने की भी फुर्सत नहीं है.

एक माँ बनने के बाद का ठहराव है क्या , जो बोलता है अगर बीमार हो गई तो बच्ची को कौन संभालेगा , उफ़ ऐसा भी क्या , 

अब शायद एक दिन थोड़ा ठहरना है ,तनहा रहना है ,अपने साथ समय बिताना है , भीतर दबी नन्ही लड़की को वापस लाना है ,ताकि बारिश ,रोमांस और रोमांच भीतर बचे रहे
 
कुछ पुरानी पंक्तियाँ खुद को याद दिलाने के लिए , बारिशें ईंधन है तुम्हारे लिए लड़की , ऑक्सीजन है तुम्हारे फेफड़ों के लिए ,उम्र के किसी भी मोड़ या पड़ाव पर ,बारिशों से पुनर्जीवित  हो उठना 


बारिशों में अक्सर उबासियाँ आती है 
चादर लपेटकर सोने का जी करता है 
समन्दर-भाप से बनते बादल सुना है 
इन आँखों में बारिश कौन भरता है ....

#हिंदीब्लॉगिंग 

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Tuesday, July 4, 2017

प्रेम करती हूँ तुमसे

 
यमुना  किनारे उस रात
मेरे हाँथ की लकीरों में 
एक स्वप्न दबाया था ना  
उस क्षण की मधुस्मृतियाँ 
तन को गुदगुदाती है 
उस मनभावन रुत में 
धडकनों का मृदंग

बज उठता  है 
मयूर पंख फैलाए

नृत्य करता है 
सलोना मेघ तकता है

यह मोहक  उत्सव 
इस स्वप्न के 

आवेश में डूबकर 
आँखे मुखर हो उठती हैं  
अधखुले मादक अधरों से 
मौन  प्रीत बरसती है 
जहां गूँज उठता है 

बस उसी पल 
प्रेम करती हूँ तुमसे 

...बस तुमसे 

#हिंदी_ब्लॉगिंग 

Saturday, July 1, 2017

बेटी बचाओ




स्वतंत्र अणु  
मुक्त जग में  
रहा  विचरता 
नभ से थल तक 
अपरिमित शक्ति
 भरी थी 
ओज भरा था 
अंत:स्थल तक 
नियत समय में 
स्रष्टि ने फिर 
उसके जीवन को 
अर्थ दिया 
मानव रचना हेतु उसको 
भावी माँ का 
गर्भ दिया 
उत्साहित था 
पा शरीर को 
देखूंगा अब
 दुनिया सारी 
था प्रतीक्षारत व्याकुल 
कब गूंजूंगा 
बन किलकारी 
अनायास जो 
हुआ आक्रमण 
कुछ भी ना
 समझ पाया 
बदला रक्त 
औ मांस पिंड में 
कैसी ये 
स्रष्टि की माया 
प्रश्नों का बोझ
 था मन में 
पुन: देह से 
अणु हुआ 
मादा होने के कारण वह 
नवजीवन ना 
देख सका

#हिंदी_ब्लॉगिंग 

Wednesday, November 30, 2016

जो भी है खूबसूरत है

जो भी है खूबसूरत है

पीली पत्तियों ने हरी कोंपलों को स्थान दिया है ,इस तरह पुराने पड़े पेड़ नए लग रहे हैं ,सांस ले रहे है ,हवा कुछ और ठंडी हो चली है पर अभी मफलर बाँधने  नहीं हुई है ,तुम्हारा हाँथ थामने में अब मेरी हथेलियां पसीजती नहीं , याद है ना पहली बार जब तुमने हाँथ थामा था ,इक सनसनाहट सी पूरे शरीर में दौड़ गई थी ,गाल दहक उठे थे , आरक्त ये शब्द कितने उपन्यासों में पढ़ा था ,पर अर्थ उस पल समझ में आया था। 

तुम मेरा पहला प्यार नहीं थे, पर तुमसे मिलने के बाद ये जाना प्यार बस प्यार होता है ,पहला प्यार कच्चे आम सा पर दुबारा होने वाला प्यार मादक ,बेहद मादक ,पूर्वाग्रहों से परे ,बंधनो से भरा हुआ नहीं। 

तुमसे जब मिली तो मैं मुक्त नहीं थी , सही गलत ,भला बुरा , पाप पुण्य अपने भीतर कई पाले खींच रखे थे, जिनकी लक्ष्मण रेखा को पार करना मेरे बस का नहीं था ,हर वक़्त मैं एक कटघरे में खड़ी अपने से सवाल करती खुद को दोषी ठहराती और सज़ा देती 

मेरा चेहरा ,मेरी आँखों के नीचे पड़े गहरे गड्ढे ,पीलापन कुल मिलाकर किसी सज़ायाफ्ता की तस्वीर बना रहे थे. क्यों उन गठरियों को ढो रही थी ,शायद परवरिश ,समाज और उसके मापदंड ,जो एक मध्यमवर्गीय इंसान को साहसी नहीं होने देता, मैं कायर बन रही थी, अपने आप से भागती हुई 

उम्र के एक दौर में दौड़ते भागते किसी माइलस्टोन पर थम कर सोचने लगी ,मैं कौन हूँ ,मैं क्या कर रही हूँ और एक वर्जित सवाल मन में बिजली की तरह कौंध गया , "आखिर मुझे चाहिए क्या ". 

बस इसी समय तुम आये होठों पर हलकी सी मुस्कान लिए ,बड़ी से बड़ी समस्या को मुस्कुरा कर हल करने का ज़ज़्बा लिए ,सब वही था तुमने मेरा नजरिया बदला , और वो बदलते ही मैं बदल गई एक एक करके बंधन ढीले पड़ने लगे ,गठरिया हलकी होने लगी , झुकी कमर कुछ सीधी हुई। 

अभी मैं नहीं जानती मैं तुमसे आकर्षित हूँ या दोस्ती में हूँ या प्यार में पर जो भी है खूबसूरत है 


Thursday, October 20, 2016

कहानियों की तलाश



यूँही एक लिंक से दुसरे लिंक घूमते हुए कुछ पुरानी कहानियों में पहुँच गई , शिवानी मेरे बचपन की प्रिय लेखिका, एक ही कहानी उम्र के अलग अलग दौर में अलग अलग असर पैदा करती है, शायद बड़े होते होते हमारी मानसिक परिपक्वता भी अलग हो जाती है। 
 एक नशा सा था शिवानी को पढ़ने में बेहद सहज ,सपनो सा प्रेम पर उन सबमें गड़ा हुआ दुःख या कष्ट का एक ऐसा दंश जो या तो आँखों की कोर भिगो दे या बहुत देर तक सहज ना होने दे। 

शिवानी की नायिकाएं शिवानी के आँगन से उत्तराँचल से निकली ,परियों सी सुन्दर ,भोलेपन से भरी पर उनकी सुंदरता के साथ शापित भाग्य ,दुखांत ,लाइलाज बीमारी ,धोखा तेजी से बदलते घटनाक्रम जो आपके भीतर सिहरन भर दे , मुंह से निकल जाए "भगवान्  दुश्मन को भी ये ना दिखाए "

कविताओ के समुद्र में अच्छी कहानियों के प्यासे हम , बस तरस के रह जाते हैं , आपके पास कुछ अच्छी कहानियों के लिंक हो तो शेयर करें 

Wednesday, August 31, 2016

छुटकी रानी





छुटकी रानी मस्त कलंदर 
बिल्ली रखती पेट के अंदर 
गटगट पीती ठंडा पानी  
दूध देख ले उठे बवंडर 
एकबार जो गई पार्क में 
आती ना है घर के अंदर 
बच्चों से तो लडे लड़ाई 
साथी उसके डॉगी बन्दर

बात बात पे गाल फुलाये 
ज्यों दो लड़डू हो अंदर 
जो रूठूँ तो गले लगाए 
मेरी मम्मा कित्ती सुन्दर 

Monday, August 1, 2016

बेतरतीब मैं (०१. ०८. १६ )


(१)

अगस्त का महीना आ गया जब आसमान में बादल दिल में उमंग और बाज़ार सेल सेल चिल्ला रहा होगा ,
बस आज आई है कल ना रहेगी ५०% से ७०% तक लूट लो ,रस्ते का माल सस्ते में ,कहाँ चल दिए बाबू ,ये गुडगाँव है ,मरा हांथी भी सवा लाख का होता है, आप जो उल्लास भरे चमचमाते मॉल के भीतर चल दिए है वहां सब ९९ का फेर है ९९९ से लेकर ९९९९ तक या उससे भी ऊपर , २ के साथ ३ फ्री ,१ खरीदों ३०% ३ खरीदों ५०% , सारा हिसाब किताब यहीं फेल।

(२)

अगस्त के मायने कितने बदल गए कभी अगस्त याद करके "भारत छोडो आंदोलन " और स्वतंत्रता दिवस याद आता था आज कैलेंडर में महज छुट्टी का दिन बन गया है आस पास शनिवार या इतवार मिल जाए तो एक लॉन्ग वीकेंड ,फिर बाज़ार हावी ,हॉलिडे पैकेज खरीद लो २००० हज़ार का कमरा १०००० में , ट्रेन के टिकेट नदारद ,हवाई टिकेट सातवें आसमान पर ,

(३)

"जो शहीद हुए हैं उनकी ज़रा याद करो कुर्बानी "
साल दर साल पंद्रह अगस्त पर ख़ुशी ख़ुशी स्कूल  जाना ,तिरंगे को लहराते हुए देखना ,शहीदों के बारे में जानना ,लोकप्रिय शहीदों के साथ उन गुमनाम शहीदों की बातें जिनका नाम आज कोई लेता भी नहीं ,वो तो कह गए
"शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले वतन पर मारने वालों का यही आखिरी निशा होगा "

(४)

अगस्त शहीदों के नाम होना चाहिए ,आज़ादी का जश्न मानाने के लिए , क़ुरबानी याद करने के लिए ,पर सिर्फ गाल पर तिरंगा पेंट करवाकर या माल में घूमकर ये जश्न नहीं मनता ना

लहू दिया माँ रहे सुहागन
साँसे वारी महके आँगन
पर निर्लज्ज हम वंशज तेरे
फंसे है किस व्यापार में
अपना उत्सव भूल भुलाकर
खोये हैं बाज़ार  में

Friday, July 29, 2016

बेतरतीब मैं (२९. ०७. १६ )




(१ )
प्यासे शहर ने बारिश की दुआ मांगी और इस बार आसमान का दिल पिघला नहीं बल्कि फट पड़ा, झूले पड़ी आम की डालें टूट गई, बूंदों में भीगने वाले नन्हे नन्हे कोंपल हवा और पानी के थपेड़े झेल झेल के बेहोश हो गए
इस सावन ने ज़मीन को तृप्त नहीं किया बस रौंद  दिया

(२)
जब चली ठंडी हवा  जब उठी काली घटा मुझको ए  जाने वफ़ा तुम याद आये .......

आज आसमान जब बादलों की सियाही लपेट कर काला हुआ तो दिल तेरा साथ पाने को मचल उठा हमारी ज़िन्दगी से शाम वैसे ही लापता है तो भरी दोपहर हुई शाम को बस जी लेने का जी हो उठा, उस ज़माने में तो सात समंदर पार कर दो प्रेमी मिल लेते थे आज इन शीशे की इमारतों को पार करना दुश्वार है

(३ )
सुनो ! बारिश तुम्हें क्या याद दिलाती हैं

मुझे हरियाली ,गर्म भुट्टे ,चाय और मस्ती तुम्हे?
मुझे जलभराव ,गड्ढे जाम ,गन्दगी और मक्खियां
उसके बाद एक अपनी बारिश की रूमानियत में गम हो गया
और दूसरा शाम को घर समय से पहुँचने की फ़िक्र में

(४)

जा बरसो मेह खेतों में
जहाँ बीज का निखरे रूप
जा बरसों मेह उन गाँवों में
जहाँ सूखे पड़े ताल कूप
जा बरसो मेह मरुथल में
जहाँ धरा तपाती नित धूप
आ बरसों मेह मेरे आँगन    
सजा लूँ में अपना रूप


#हिंदीब्लॉगिंग



Thursday, July 28, 2016

लाडली १  (२८.०७। १६ )

हम किस हालात में लिखते है ? जब हम रीते होते है या जब भावनाएं छलक उठती है अपने बारे में सोचूं तो अज़ीब लगेगा बरसो से लिखने के बाद भी आज भी अनजान हूँ कब  कैसे लिख पाती हूँ किसी साल १०० से ऊपर ब्लॉग पोस्ट तो कोई साल पूरी तरह सूना।
सृजन तो चल रहा है साथ में क्षरण भी चल रहा है पर ब्लॉग पर पोस्ट के रूप में दर्ज नहीं हो पा रहा, आखिर एक शाम बारिश में रचना फूट पड़ी आसमान से बरसता रस मेरे भीतर के कवि  को सींच गया  अब जो शुरू हुआ है वो रुकने नहीं देना है ,






अपनी लाडली के नाम

तुमको बारिशें सौंप रही हूँ
भीगने से घबराना मत
छतरी के पीछे शरमाकर
खुदको कभी छुपाना मत
जो मन भाये बादल गढना
जीवन में सकुचाना मत
तुमको जीवन सौंप रही हूँ
जीने से घबराना मत

Wednesday, August 5, 2015

भय



भय का किल्ला फूटा  
मन के सहमें कोनें में 
कांटे क्यों  उग आये है 
रेशम जड़े  बिछोने में    
क्या मेरा है जो लूटेगा 
छोड़ दिया सो छूटेगा  
आँखों में सपने डूब गए 
हर दिन के रोने धोने में 
भारी साँसे भारी जीवन 
पीड़ा स्वप्न सजोने में  
कांटे क्यों  उग आये है 
रेशम जड़े  बिछोने में

Thursday, June 18, 2015

बेतरतीब मैं 18-जून २०१५


बेतरतीब मैं 18-जून २०१५ 
(१)

मेरे पिता जूतियां बनाते हैं मैं छोटे से बैकग्राउंड से आता हूँ ,पढ़ाई १२वीं के बाद छोड़नी पड़ी ,वो एक के बाद एक अपनी मज़बूरियां गिना रहा था ,मेज के इस पार मैनेजर की कुर्सी पर बैठी छोटे से शहर वाली लड़की के दिल में करुणा का सैलाब उठा जिसे एक चमकीले ऑफिस में बैठने वाली लड़की ने कुचल दिया , ऑफिस में दिल नहीं दिमाग चलता है। 

(२)

वक़्त बदलते देर नहीं लगती वैसे ही इंसान को बदलते ,कठिन समय में सामने वाले का व्यवहार भी कठिन हो जाता है ,जैसे -जैसे आप अपने बल पर  परेशानियों से पार पाकर ऊपर उठते हो ,वही चेहरे जो एक समय मुहं छिपाते थे ,मुस्कुराते हुए नज़र आते हैं, एक बन्दर की तकलीफ पर पूरा झुण्ड एक साथ आ सकता है पर इंसान ने अपने पूर्वज से ये नहीं सीखा  

(३)

सफल वर्तमान के साथ अतीत की गलियों में लौट -लौटकर जाना एक नशा सा होता है , कितनी बार सोचो नहीं जाना उतनी बार सम्मोहित से लौट लौट कर जाते हैं,उन पलों को जब आप गिरे थे,अपमानित हुए थे, आंसू पिए थे ,सब जश्न में थे और आप अकेले , आज आप जश्न में हैं तो किसी को अकेले में मत रहने देना 

(४)

हाँथ में महंगा फोन ,कंधे पर महंगा पर्स आँखों पर चश्मा ,उसने वो सब बटोर लिया था जो उसको रईस और खुश दिखा सकते थे,आँखों में काजल की लकीरे गहरी करते हुए अपनी उदासी को काला करना चाहती थी काश काजल  आँखों के भीतर भी लगा सकते। 

Friday, June 5, 2015

ये मैं तो नहीं हूँ


१। 
सामने से आती एक शक्ल बेहद पहचानी सी लगी ,वही है क्या ? अरे हाँ वही तो है 
आठ  साल पहले सादा से प्रिंटेड सूट में देखा चेहरा आज किसी महंगे ब्रांड के वन पीस ड्रेस में कुछ अज़नबी सा लगा ,आँखों में पहचान का भाव उभरा और पानी के बुलबुले सा फुट गया और रह गया नीरव स्थिर अज़नबीपन। 
या तो उसने पहचाना नहीं या … जाने दो 
वो पहचाना अज़नबी साया पास से गुज़र चुका था अपने साथ खुशबू की लकीर छोड़ते हुए, इसको परफ्यूम की जरूरत कब से पड़ने लगी, छत की मुंडेर पर चाहे अनचाहे करीब आते हुए कितनी बार एक मादक सुगंध को जिया था कुछ रजनीगंधा जैसी शायद।
उसके हाँथ आज भी थामने पर पसीजते होंगे क्या सोचते ही होंठों पर मुस्कान  तैर गई 
पिछले आठ सालों में ज़िन्दगी की दौड़ दौड़ते हुए कभी एहसास ही नहीं हुआ जिनके साथ जीने मरने की कसमें खाई  थी आज उनका ख्याल भी नहीं आता 

२। 
होटल के कमरें में सिगरेट फूंकते हुए निगाह दरवाजे की तरफ  लगी है ,भागती  ज़िन्दगी में जब कुछ जरूरते जागती हैं तो खाने से बिस्तर तक होम डिलीवरी के ऑप्शन मिल जाते हैं ऐसी ही ऑप्शन पिछले कुछ सालों कमरे में आते जाते रहे है। 
अब एक ज़रुरत के लिए ज़िन्दगी भर के बंधन तो नहीं पाल सकता ना 
दरवाजा खुलते ही एक खुशबू का झोंका अपनी गर्माहट से भर देता है ,अचानक ये खुशबू खींचकर गली के मोड़ पर खड़ा कर देती है दिल की धड़कने तेज हो रही है , मेकअप की परतों में लिपटा अजनबी चेहरा अपना सा क्यों  लग रहा है ,
क्या ये वो है ,काश वो ना हो , उसको अपने साथ चाहा था एक ज़माने में पर 
आज इस कमरे में इस बिस्तर पर तो नहीं, उसके करीब आते ही एक ठंडी सांस राहत की भरता हूँ , वो नहीं है।  

३। 

उस दिन के बाद होटल के कमरें में जा नहीं पाया हूँ ,एक डर  भीतर बैठ गया है , उस दिन अगर वो होती तो ,इस बार नहीं थी पर अगली बार हुई तब ,ऐसे कितने चेहरे कितने रिश्ते बनाता बिगाड़ता आया हूँ , कुछ तो बीता है भीतर ही भीतर जिसने आत्मा जैसा कुछ जगा दिया है। 
भला -बुरा ,पाप पुण्य कानो में बज रहे है.
हरिद्वार में गंगा किनारे बैठे हुए पानी के शोर में कुछ चीखे कुछ रुदन जैसे सुनाई दे रहे हैं , मेरा अहम उसकी मिन्नतें , मेरी लापरवाही उसकी हताशा ,या कितने मज़बूर मुस्कुराते चेहरे। 
पैर पानी में जाते ही दिमाग और दिल में द्वंद  शुरू हो जाता है , मैं आज जो हूँ ऐसा तो नहीं था ,कब मैं बदलता गया। 
बचपन की मासूमियत से कैशोर्य के अल्हडपन  से युवावस्था के जोश तक, तब तक तो सब ठीक था , सपने थे दिल था धड़कन थी दर्द भी था
दिलों का सौदागर कब बना ,पहली बार दिल और भरोसा तोड़ा तो बुरा लगा फिर कम बुरा लगा फिर बुरा लगना बंद हो गया 
ये आज अतीत का कौन सा दरवाजा खुल गया है जो दिल दिमाग को भारी किये जा रहा है 
घाट पर बैठे पण्डे से माथे पर चन्दन लगवाता हूँ शायद दिमाग को ठंडक मिले 
आइना देखता हूँ  पर ये मैं तो नहीं हूँ 

Wednesday, June 3, 2015

बेतरतीब मैं (३ जून )

बेतरतीब मैं (३ जून )
(१)
दुनिया कीचड है अपने आप को कमल मत समझो कीचड के दाग अगर दामन पर लगे तो खुद से घिन आते देर नहीं लगेगी।
आस पास सूअर घूमते  है जिन्हे उसी कीचड में लोटकर आनंद की प्राप्ति होती है आपको दिखाते है ये कीचड तब तक गंदा लग रहा है जब तक बाहर से इसको देख रहे हो एक बार भीतर तो  उतरो फिर दुर्गन्ध सुगंध में बदलेगी।
अभी तो ना जाने का ऑप्शन खुला है एक बार उतरे तो बाहर आने का कोई रास्ता नहीं  मिलेगा।
कुछ सुख ना मिलें तो बेहतर।


(२)
मोह है इस शहर से इस गली से ,गली के मोड़ पर पान के खोके से रास्ते में पड़ने वाले जामुन के पेड़ से ,साल भर मिलने वाली छाया से , कितनी बार कदम उठाये के वापस लौटा  जाए वहीँ ठिकाना बनाया जाए,  एक प्याज ,एक चुटकी नमक ,चार रोटी  और सत्तू दो वक़्त ये तो जुड़ ही जाएगा।
शायद सुकून की नींद भी मिल जाए जो एक मुट्ठी गोलियां गटककर भी नसीब नहीं होती है ,आसमान के तारे भी नहीं दीखते यहाँ से।
पर कोल्हू के बैल की यात्रा अनवरत होती है एक ही दिशा में उसके थकने तक ,उसके थमने तक


(३)

जब पास समय होता है तो हम व्यस्तता तलाशते है जब व्यस्त होते है तो समय की कमी का रोना रोते है , किसी दिन शायद समझ जाए हमें चाहिए क्या , क्या ये खोज ये मानसिक स्थिति सिर्फ मेरी है या इस यात्रा में मेरे साथ बहुत से साये है।


(४)
पीठ पर एक ज़ख्म उभर आया है , धूप  में जलता है ,ठंडी हवा में टीस मारता है कभी कभी इस तरह शांत हो जाता है मानो वो वहां है ही नहीं , कितने  आंसू  इस ज़ख्म के चलते जाया हुए है , नहीं याद कब मेरी पीठ पर सवार हुआ था रह रह कर अपने अस्तित्व को जताता रहता है।
बरहाल जब तक तुम थे ये नहीं था अब ये है और तुम लौटे नहीं_ 

Wednesday, May 20, 2015

दुश्मन मसीहा

किस्सों में ज़िक्र उसका भी होगा
बिछाए कांटे जिसने मेरी राहों में
वो ना होता तो ये सफर न होता
झूमते रहते बहारों की पनाहों में

दर्द लहू  उसका भी शामिल था
एक आह थी मेरी हज़ार आहों में
ना जाने बना कैसे हमसफ़र वो
कोई नेकी थी ढेरभर गुनाहों में


Wednesday, May 13, 2015

फिर आसमा से टूटकर बरसा नशा

बेतरतीब मैं (१३ मई २०१५ )

फिर आसमा से टूटकर बरसा नशा
फिर हमपर मयकशी का इलज़ाम लगा 

बारिशें किसी भी मौसम में आपको डिस्ट्रैक्ट कर सकती हैं ,कुछ जादू सा चलता है और आप मज़बूर हो जाते हो। 

कागज़ की नाव चलाने वाली बारिशें , किसी  नज़र की छुअन से सिहर जाने वाली बारिशें,किसी के जल्दी घर  वापसी की दुआ मनाने वाली बारिशें
और भी कई मूड में बरस रही है ये बारिशें 

आफिस के कांच के भीतर से बाहर सब धुंधला दिख रहा है अच्छा है ना.बाहर सड़क है ,ट्रैफिक है भीड़ है ,ये तो मेरी बारिशों का हिस्सा नहीं हो सकते 
मेरी बारिशों में पहाड़ है उन पर झुके बादल है , मेरे हाँथ में छतरी के वाबजूद भीगती मैं 
पहाड़  ना सही समंदर का किनारा ही हो जहां खारी लहरों के साथ मीठी बूँदें मुझे भिगो दे ,खैर आंसू भी तो खारे ही होंगे 

मेरी मोहब्बत की कहानियों में बारिशें नहीं हैं बल्कि बारिश ही मेरी मोहब्बत है। 

कई गहरी नीली शामें जब आसमान स्लेटी बादलों से खेल रहा था ,हवा में सीली सी गंध हाँथ में एक कप कॉफ़ी लिए आसमान को निहारते हुए मैंने गुडगाँव में चेरापूँजी को जिया है,

 कल्पनाओ के पंख पर सवार मुक्त हो लेती हूँ मैं.
 भर जाती हूँ भीतर तक तो खुलकर रो लेती हूँ मैं 

Tuesday, May 12, 2015

गाँव सिसक रहे हैं

शहर सुलग रहे हैं
गाँव सिसक रहे हैं
सड़कों पे खून फैला
जंगल दहक रहे है

हर हाँथ लिए ख़ंजर
बदहवास फिर रहे है
वहशत हँस रही है
जो इंसान मर रहे हैं

किसके लिए जाने
महल ये सज रहे हैं
गली गली वीराना
शमशान खुल रहे है

ये कौन सा मौसम
आया है इस चमन में
पेड़ों पर फल नहीं हैं
इंसान लटक रहे है


Saturday, March 28, 2015

खोई लड़की






बालों में तितली सजाती लड़की
बादल से बिजली चुराती लड़की
गुलाबी अरमान तालों में रखती
खुद को दुनिया से छुपाती लड़की


सौ तालों में फड़फड़ाती लड़की
सच पर सबसे भिड़ जाती लड़की
जलाकर आई सारे नकाब परदे
हर जीत पर मुस्कुराती लड़की


चाँद पर कदम बढाती लड़की
दुनिया खूबसूरत बनाती लड़की
भर देती घर तेरा मोहब्बत से
तूने क्यों कोख में मिटा दी लड़की

Tuesday, December 17, 2013

मेरी चिट्ठियाँ




तुमको लिखी वो तुमने पढ़ी 

खयालो से कभी ना आगे बढ़ी 

अक्सर किताबों में दबकर रही 

मुझ जैसी तनहा मेरी चिट्ठियाँ ...

किसी पंक्ति पर खुलकर हंसी

किसी शब्द से झलकी बेबसी

खुलके ना कह पाई बात कभी

मर्यादा से बंधी मेरी चिट्ठियाँ ...

देने से पहले कई बार पढ़ी

हज़ार टुकडो में कई बार फटी

मैंने लिखी और मुझ तक रही

अंतर्मुखी सी मेरी चिट्ठियाँ ....

रात ख़्वाबों में उठकर चली

तकिये के नीचे दबकर रही

सोये रहे तुम पर जागी रही

करवटें बदलती मेरी चिट्ठियाँ ....




Thursday, December 5, 2013

बहुत काम है मुझको



बहुत काम है मुझको
लाल सूरज उगाना है
नया सा राग गाना है  
सितारे बाँध रख छोड़े
ओस बिंदु उठाना है
संवरने की कहाँ फुर्सत
अभी दिन भी सजाना है
जुगनू को सुलाना है
कलियों को जगाना है
भोर से रूठ छिप बैठी
उसे अब खींच लाना है
तुम्हारे जागने से पहले
दुनिया को सजाना है