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Wednesday, February 20, 2013

ऑलमोस्ट अ डेट (बरसती फरवरी )


गुडगाँव के एक पाश सी सड़क से मेट्रो से दिल्ली के एक ठिकाने तक, कैफ़े कॉफ़ी डे पर मुंह बिचकाकर "शादी वाली कॉफ़ी " पा जाने तक,एक चमक एक उतावलापन  था, सब बटोर लेने की ख्वाहिश उस रोज़ जब मुझसे ज्यादा आसमान बरसा था पर भीगे तुम ही थे दोनों हालात में,

और मैंने पाया था सबसे ख़ास एहसास ...तुम्हारे साथ होने का, तुम्हारे वक़्त में से एक कतरन काट कर अपने पास छिपा लेने का ,इससे पहले तुम फिर इस घडी के गुलाम हो जाओ और तनहा छोड़ दो मुझे ,मैंने अपने हिस्से के तुमको अपने पास सहेजना चाहती थी .

मेरी आँखे जो देख रही थी उस पर दिमाग यकीन नहीं कर पा रहा था एक पूरा दिन पूरी शाम तुम मेरे साथ थे ... अरसा हो गया था इतना समय एक साथ रहे ,मैंने हिचकिचाते हुए कहा " दिल्ली हाट चलें ?"
"बारिश में दिल्ली हाट ,भीग जाओगी " तुमने हैरानी से कहा
"इतनी भी कहाँ है , फिर छतरी तो है " मैंने हिम्मत की
पता नहीं क्यों तुमने मना नहीं किया ,और अच्छा किया बरसों बाद हमने बरसों पहले का समय जी लिया ,बे-फिक्र कोई टारगेट नहीं कोई डेड लाइन नहीं बस हम दोनों, पहले जहां मेरी बातें नहीं ख़त्म होती थी आज मैं खामोश थी समझ नहीं पा रही थी क्या कहूं ...पर कहना बहुत कुछ था इससे पहले कोई मुझे इस सच्चे सपने से जगाकर कहे "उठो बेल्ट कसो और कोल्हू में जुत जाओ ".

अपनी पसंद का खाना हमेशा कई यादों को जगा देता है , महाराष्ट्र पवेलियन में बैठे हम दो बहुराष्ट्रीय कंपनी के ज़िम्मेदार कर्मचारी , बड़ा पाव , उसल पाव, अंडा पाव और पाव भाजी पर बात कर रहे थे , पेट भरने का कितना आसान और सस्ता इंतज़ाम हर चीज़ के साथ पाव , करोड़ों के बजट बनाने वाले तुम जब दुकानदार से साबूदाना वडा  समझ रहे थे तो सच कहूं बेहद मासूम लग रहे थे .

मेरा बस चलता तुम्हारी उस उत्सुकता को कहीं सात तहों में छिपा लेती और जब तुम बोर्ड रूम ,बहीखाता और बलेंस शीट में परेशान होते तो तुमको चुपके से मुट्ठीभर वो मासूमियत सौंप देती, 18-18 घंटों तक चलने वाले ऑफिस 24 घंटे बीप देने वाले ब्लैक-बेरी  मुझे उस सजा से लगते जो शायद किसी जन्म के पाप का फल है, हर वक़्त एक जासूस की तरह निगाह रखे ,
तुम से कई बार कह कर देखा पर तुम्हारा जवाब भी जायज़ है "दुनिया सिर्फ तितली ,फूलों और जुगनुओं के नाम नहीं है, उन्हें देखने के लिए पेट भरा होना चाहिए और इतने बड़े और महंगे शहर में पाँव टिके होने ज़रूरी है

सच्ची बात पर मैं और क्या कहूं , हम बंजारे ही तो है बस एक शहर से दुसरे शहर एक गाँव से दुसरे गाँव , हमारा कोई आँगन नहीं कोई नीम नहीं कोई पड़ोस नहीं ,हर बार हमारे जीवन की तख्ती काली स्याही से पोत कर तैयार कर दी जाती फिर से वही अ से ज्ञ तक, इस उठापटक को ....

मेट्रो स्टेशन से उतारते हुए मैं तुम्हे उस शहर के बारे में वो छोटी छोटी बातें समझा रही थी जो मैंने कितनी अकेली शामों में खुद महसूस की है और याद रखी है तुम्हे बताने के लिए , "ये लड़की रोज़ शाम यहीं किसी का इंतज़ार करती है ", " पता है सारे   हाई फाई इस ठेले पर खड़े कचोरी में एक्स्ट्रा चटनी डलवाते है ", और तुम मेरी बातों पर उस शाम ऐसे जता रहे थे जैसे मैं कितनी महतवपूर्ण बात कर रही हूँ .

कुछ दिन पहले मैं शायद इस रिश्ते पर आंसू बहा रही थी आज मेरी आँखों में ख़ुशी के आंसू थे,
प्यार में कभी कभी आंसू ज़रूरी होते है जो रिश्तों पर पड़ने वाली धुल को धोकर साफ़ कर देते हैं , फिर तो मेरे दिल की ख़ुशी का साथ आसमान ने भी दिया वो भी जी भर कर बरसा , कड़कती बिजलियों ने इतने घने अँधेरे में भी रौशनी की किरण दिखा ही दी

Friday, February 15, 2013

"बहाने बसंत के" (अंतिम भाग)





बावरे बसंत के खुमार से पार पाना इतना सहज कहाँ है, आसमानी पेंचों के साथ छतों पर लड़ने वाले पेंचों का ज़िक्र ना हो तो बात अधूरी सी रहती है, मोहल्ले में जुड़ने वाले दिल के रिश्ते अधिकतर एक तरफ़ा होते ,  छोटे शहर के पारखी सयाने हवा में मानो प्यार की महक कुछ पकने से पहले सूंघ लेते, चाहतो का इज़हार अक्सर नहीं होता ..एक दुसरे को दूर से ताककर  या सडक के किनारे खड़े होकर अपने वहां होने का एहसास दिलाना था , जानते थे खुलकर सामने आने में ..घर में "पादुका पूजन " ( चप्पलों से पिटाई ) के संयोग ज्यादा बनते ...

ऐसे डरे सहमे मौहोल में बसंत का इंतज़ार जायज था, महबूब के घर के पास वाली छतों पर बसंत पर चढ़ने के रास्ते तलाशे जाते नयी दोस्तियाँ होती ... कुछ मिन्नतें मनाई जाती ..घर वालों को समझाना होता आखिर एक पूरा दिन दीदार का कोई कैसे छोड़ दे ...कितनी खामोश मोहब्बते एक दीदार और मुस्कान के टॉनिक के साथ उस दिन तक चल जाती जिस दिन डोली उठती।

खुलकर सामने आने से बंदिशों और रुसवाई का दौर शुरू होने का डर, सुबह से गुलज़ार छतें  वसंतोत्सव के मद में झूमने लगती, दोपहर में  सुस्ताती और शाम आते आते एक बार  मेले की सी रौनक छा जाती , पीली साड़ियों में सजी कुलवधुएं ,पीला दुपट्टा लहराती नवयौवनाएं , और पीले टॉप या स्वेटर से काम चलाते हम जैसे कुछ अल्हड, एक दुसरे से हाल चाल पूछते , उत्साह बढाते, लड़के जहां छतों पर चढ़े रहते , हम लडकिया टोलियों में एक से दूसरी छतों पर डोलते, गप्पों बातों का अंतहीन सिलसिला, मीठी मीठी चुहलबाजियां, इनके बीच कच्ची शायरी में रंगी कोई पतंग छत पर आ जाए तो पूछो मत .

ठाकुर जी के भोग के लिए ख़ास मीठे चावल बनते जिनकी खुशबू और स्वाद आज भी सारे स्वाद तंतु जाग्रत कर देता है,दादी बसंत पर गंगा स्नान की महिमा हर साल बताती पर जानती थी इस दिन छत छोड़कर कोई कहीं नहीं जाने वाला, शुभ दिन होने के चलते सबसे ज्यादा शादियों के मुहूर्त इसी दिन निकलते ,शहर की शादियाँ तो फिर भी ठीक थी बाहर की शादियों में जाने के लिए तलवारें खिंच जाती "अरे उनको बसंत पर ही शादी रखनी थी क्या ".

साल बीते बसंत में कुछ नयी बातें जुडी "सरस्वती पूजा " , हमारे इंग्लिश के अध्यापक हर साल सरस्वती पूजा मनाते और माँ शारदा की नई मूर्ति स्थापित करते ,पुरानी प्रतिमा किसी छात्र को इस शर्त पर दी जाती वो पूरे साल मन लगाकर पढ़ाई करेगा, वही सच्ची सरस्वती पूजा होगी, एक साल माँ शारदा मेरे घर भी आई आज तक उनका आशीर्वाद फल रहा है . आजकल दीवाली से ज्यादा आतिशबाजी बसंत की रात हो होती है , टाट  में आग लगाकर मशालें जलाई जाती है , तीन दिन का त्यौहार आज एक दिन में सिमट गया है ....

ये दस्तावेज है ताकि सनद रहे के एक दिन आकाश ,छतों ,डोर और पतंगों के नाम था .....
आज घर से दूर, छत से दूर कीबोर्ड खटखटाते हुए, बसंत की स्वर्णिम आभा जी रही हूँ ... आप सभी को बसंत की शुभकामनाये ..

Tuesday, February 12, 2013

"बहाने बसंत के" (2)


"बहाने बसंत के"(1)
बसंत की सुबह अक्सर पापा के फरमान से होती ...बिना नहाय कोई छत पर नहीं चढ़ेगा ..जानते थे एक बार जो चढ़ गया वो किसी हालत में नीचे नहीं उतरेगा,वो बालपन का जोश वो उत्साह , बीच-बीच में दादी फ़्लैश बेक में चली जाती "घर में इन बच्चों के कुर्ते पीले रंग में रंग देते थे क्या मजाल कोई बच्चा बिना नहाय छत पर चढ़ जाए ... "
अपनी अलमारियों में पीले कपड़ों की ढूंढ शुरू हो जाती आखिर ऋतुराज का स्वागत उनके मन-भावन रंग में ही तो करना चाहिए,बचपन से कैशोर्य के बीच छतों पर बहार का त्यौहार लगने लगा था हर छत आबाद ,आँखे आकाश की ओर,

 फुर्सत भरा फिर भी बेहद व्यस्त दिन ,थकाने वाला पर फुर्तीला दिन जो चेहरे साल भर नहीं दीखते थे वो भी उस दिन नज़र आ जाते , कदम बरबस छत की और चल पड़ते कुछ ख़ास कम्पटीशन होते , सबसे पहली पतंग किसने उड़ाई , सबसे बड़ी पतंग , सबसे ज्यादा पतंगे किसने काटी ,किसके म्यूजिक सिस्टम पर सबसे नए गाने बजे, किसकी उंगलियाँ सबसे ज्यादा ज़ख़्मी हुई    .

 आखिर बसंत के बाद मोहल्ले के मोड़ों पर डिस्कस करने का मसाला भी तो चाहिए .

खैर ,वैसे तो सार साल पतंगे आसमान के पहलु में गोते खाती पर तीन दिन इस  त्यौहार को ख़ास बना देते पहला छोटा बसंत ,बसंत और बूढा बसंत

कितने तरह की पतंगे सजी धजी , नई पतंगों पर जब कन्ने बांधे जाते और नजाकत से उनके मुढ्हे मोड़े जाते ताकि हवा का सामना करने को तैयार हो जाए .

बसंत की सुबह की सबसे बड़ी चिंता हवा का रुख होती आखिर सही हवा के बिना पूरे दिन पतंग कैसे उड़ाई जायेगी ,कहीं तूफानी हवा चल गई तो त्यौहार का सत्यानाश।  मिन्नतो का दौर चल पड़ता.
बच्चे अल सुबह से छत पर होते बड़े 10-11 बजे तक औरते सारा काम निपटा कर दोपहर में नाश्ता ,फल ,भुने आलू ,मूंगफली ,तहरी (पुलाव) से लेकर चाय के कई दौर सब छत पर,

हसी ठहाके तो गूंजते पर, कई समझौते भी पडोसी छतों से किये जाते ...मसलन "तुम मेरी पतंग नहीं काटोगे , लंगर नहीं डालोगे , पंतग कट गई तो डोर नहीं लूटोगे , ये बात अलग है दिन ढलते ढलते सारे समझोते टूट जाते , आखिर आकाश युद्ध में ऐसे समझोते कहाँ चलते है। बड़े बुजुर्गों का छतों पर रहना सुरक्षा और सद्भाव बनाय रखता , थोड़ी तू-तू मैं - मैं  से मामला सुलझ जाता ... सारी रंजिशें पतंगों के साथ कट जाती (हर बार ऐसा नहीं होता एक जनाब हमारी छत पर कट्टा (देसी तमंचा ) लेकर चढ़ आये थे :-) )

सारा दिन तेज़ गीतों के ..कटी  पतंगों  के नाम रहता शाम को आकाश भर आतिशबाजी,एक दुसरे की छत पर जाना लजीज नाश्तों की प्लेटों की अदला बदली , और कुछ रंगारंग कार्यक्रम और बसंत बीत जाता, बड़ी पतंगे वापस अपने चौकोर बक्सों में आराम करती ,चरखी सारे दिन  चक्कर खाने के बाद सुस्ताती, छत अगली सुबह के सन्नाटे को सोच उदास हो जाती, थके हारे नौनिहाल नींद में वो- काटा चिल्लाते या अपनी पतंग काटने के दुःख में नींद में सुबकते हुए भी पाए जाते , पैरों का दर्द रात को महसूस होता ,तेज मांझे से कटी उंगलिया टीस मारती पर बसंत से मोहब्बत वैसी ही रहती 

(किस्सा लंबा होता जा रहा है मेरी बसंत के लिए दीवानगी ही ऐसी है अगर आप सब सुनना चाहेंगे तो बयान करेंगे छज्जे -छज्जे का प्यार वरना इतना ही काफी है )

Monday, February 11, 2013

बहाने बसंत के



अक्सर सोचती हूँ के बसंत मुझे बावरा क्यों करता है ,गीतों कविताओ और प्रेम से पहले भी बसंत मन लुभाता था ...पतंगों से घिरा आकाश, तीन दिन पहले से पतंगों में हिस्सेदारी छोटी छोटी चरखियां , नशे में झूमती इस छत से उस छत गिरती कागज़ की परियां और उनको पाने को लालायित चेहरे ,  और जिस हाँथ में वो परी उतरी उसके चेहरे का विजयी भाव देखने लायक ...

बसंत की तैयारी बसंत से एक रात पहले हिस्सा लगता, चोकोर बक्से निकले जाते जो खास तौर पर पतंग रखने के लिए दादाजी और उनके पूर्वजों ने बनवाये थे उसमें विशालकाय " अद्धा ,पौना " पतंगे सारे साल सुकून से सोती उन बड़ी पतंगों को हम हैरत से ताका करते यही हाल चर्खियों के बड़े भाई चरखों को देखकर होता , शीशम और संगमरमर के काम की नक्काशी वाली खूबसूरत ख़ास चरखियां जिन्हें हाँथ में थामने की हमारी ललक ,ललक ही रह जाती , हम हांथों में रंगबिरंगी छोटी छोटी चरखियां थामकर उल्लास में डूब जाते .... फिर आता सबसे कठिन समय जब पतंग-सद्दी -रील का बंटवारा होता,ये सार हिसाब किताब मेरे बड़े ताउजी के हांथों में था, और उनके फैसले पर कोई ऊँगली उठा ही नहीं सकता था। सबकी धड़कने तेज ,बिना किसी भेदभाव के सारे छोटे बच्चे बराबर पतंगे पाते बड़ों का कोटा ज्यादा था , हमारे भाई बिगड़ जाते ..

"ये उडाती तो है नहीं फिर इसको इत्ती सारी पतंगे क्यों ?"
उन्हें ताउजी  आँख के इशारे से कंट्रोल कर देते ,आखिर उनकी लाडली भतीजियों से कोई कुछ कैसे कह सकता है , पतंगों के बटवारे के बाद हत्थे पर चरखी रखकर तागा चढाने का काम शुरू होता, और भाई की कोशिश शुरू हो जाती , "अरे अपनी गिट्टी मुझे अपनी चरखी में चढ़वाने दे ,मैं तुझे पतंग ऊँची करके दे दूंगा ", और हम बहल भी जाते . रात को ही फटी-टूटी पतंगों के इलाज का भी इंतज़ाम कर दिया जाता उबले आलू ,चावल , लेइ .

                        
बसंत पंचमी के दिन सुबह कुछ ज्यादा जल्दी हो जाती आस-पास के घरो में बजने वाला तेज संगीत और वो-काटा का उदघोष ,आप चाहकर भी नहीं सो सकते ....
(अगले भाग में ... पीले कपडे ,पीले चावल और छज्जे-छज्जे का प्यार :-) )

Thursday, January 24, 2013

क्या रखा ?

यूँही खुद को मैंने सदा तनहा रखा
खुशियों से महरूम औ रुसवा रखा
महफिलों से कतरा कर गुज़रे हम
दर्द से दिल इस कदर बोझिल रखा
सो ना जाए किसी शब् सुकून से
पलक में एक अश्क उलझा रखा
रौशनी ना मांगने लगे आँगन मेरा
चराग भी रखा तो बुझता रखा
ना कोई हमसफर हो जाए मेरा
अपनी हस्ती को मैंने मुर्दा रखा
जुर्म क्या था तेरा ये बता "सोनल "

सांस लेना इस कदर मुश्किल रखा 
कैसे मिलेगा बहीखाता  ज़िन्दगी का
पास बस दिल का एक टुकड़ा रखा 

Friday, December 28, 2012

तुझे कैसे भूल गई !


 भुला दिया !
रात भर करवटें बदलने का फैसला  मैंने खुद किया था, तो किसी का क्या कुसूर :-(  गूगल में मिति का नाम ढूँढा ... फेसबुक पर खोज की यहाँ तक  ऑरकुट जिसे शायद पिछले चार सालों में मुड कर भी नहीं देखा था उसे भी एक्टिवेट कर डाला, दिमागी कीड़ा जाग चुका था और मेरा दिमाग खा रहा था,पर कमाल है जो पहचान का एक सिरा भी पकड़ में आ जाए ... तो मैं यादों की पतंग खींच लूं, जब आधी रात सोच दिमाग से उबालकर बाहर आने लगी तो हार कर  चादर में मुह घुसा कर सो गए ...एक हारे हुए खिलाडी की तरह ..ये  ऐसा था जैसे आपको किसी गाने की धुन याद आये और बोल नहीं ...या किसी फिल्म के गीत के साथ पूरी  फिल्म याद आयें और फिल्म का नाम याद आने का नाम ना ले ।

सुबह थोड़ी देर से हुई चूँकि छुट्टियाँ थी तो साँसे और घडी दोनों सुस्त रफ़्तार पकडें थी। रहस्य खुलने में ज्यादा वक़्त नहीं था तो दिमाग का कीड़ा भी सुस्त पड़ गया था। इससे ज्यादा मेहनत उसके बस की नहीं थी, तय समय से कुछ पहले मेगा माल के गेट पर खड़ी थी, मिति कौन थी इससे ज्यादा उत्सुकता इस बात की थी कोई ऐसा जो मुझे इतने अच्छे  से जानता है मैं उसे भूल गई .

बेचैनी से चारो ओर  निगाहें घुमा दी फिर एक मुस्कान खेल गई ..नाम तो याद नहीं शक्ल भी पता नहीं याद है भी  या नहीं। हर आती जाती लड़की के चेहरे पर आँखे गडा देती इसी उम्मीद में शायद वो मुझे पहचान ले। एक दो ने तो मुस्कान भी दे दी पता नहीं तरस खा रहे होंगे मुझ पर ...एक  लड़की हर किसी को अजीब तरीके से घूर रही है .

अचानक मेरे कंधे को किसी ने प्यार से थपथपाया, पलटी तो भूरी आँखों वाली एक भोली सी लड़की मुस्कुरा रही है, चुस्त जीन्स और गुलाबी टॉप, कुछ हल्का सा मेकप कानो तक छोटे -2 पर करीने से कटे बाल । मैं  मानो एक भंवर में उतर गई आँखे छोटी करके पहचानने की कोशिश में ना जाने कितनी  तसवीरें आँखों के आगे से गुज़र गई, मैं इसी हालत में कुछ देर और रहती अगर उसका ठहाका मुझे होश में नहीं लाता, एक पहाड़ी झरने सा खिलखिलाता . ये हंसी मेरे साथ रही है मैं पहचानती हूँ इस हंसी को पर ये इस चेहरे से कुछ मेल नहीं खा रही

"रहने दे स्नेहा तेरे बस की नहीं " उसकी  मुस्कान कुछ और खिल गई
अचानक सारे सूत्र  में आने लगे उलझन सुलझ सी गई ...और मैं उसके गले लग गई ..अरे मिति मैं तुझे कैसे भूल गई .......क्रमश:

(इस दुसरे क्रमश: के लिए मुझे पता है ढेरो ताने  मिलेंगे पर ये कहानी मुझसे मेरे सब्र का इम्तेहान ले रही है ... स्नेहा और मिति के साथ बने रहिये :-) )

Wednesday, December 26, 2012

भुला दिया !



कुछ दिन होते है खुराफातों के जब कोई बेचैनी आपको भीतर तक उकसा जाती है उठो और कुछ कर जाओ कुछ तो करो ..सक्रियता वाले रसायन शरीर और मन दोनों को झंझोड़ देते है ... माँ वाले समय में होती तो शायद किसी कोरे कपडे पर फूल चिड़िया रंगीन धागों से उकेर देती ...और दीदी जैसी तो किसी सूती कपडे पर धागों से नन्हे नन्हे मोती बाँध कर लाल हरे रंग में डुबो देती ..पर मैं तो अजीब हूँ कुछ अपूर्ण सी ,सुघड़ता के नामपर कुछ नहीं ...फिर क्या करूँ एक बार सिलाई करने बैठी तो अपनी फ्रॉक को समीज के साथ सिल डाला ....आर्ट के नामपर आम से ज्यादा कुछ नहीं बना पाती . फिर कुछ पर चढ़ा ये फितूर .. सोचते सोचते मोबाइल उठा लिया ..आज किसी ऐसे से बात करूंगी जिससे बरसों से बात नहीं की है हां ये अच्छा रहेगा कुछ अनजाना सा ..मोबाइल को लेकर घर के सामने पार्क में चली आई ,एक के बाद एक सारे नंबर आँखों के सामने से गुजरने लगे साथ ही उनसे जुड़े चेहरे भी कभी मुस्कुराती तो कभी उदासी ..किसी के नाम पर होंठ वक्र हो उठे।
अचानक एक अनजाना सा नाम लिस्ट में उभर आया "मिति" , दिमाग के सारे दरवाजे खटखटा  डाले  कोई पहचान की खिड़की खुले पर चाह कर याद नहीं आया, पीछे आठ सालों से यही नंबर है मेरा पर मेरी स्मृतियों में दूर-दूर तक कोई मिति नहीं है, क्या करूँ ? कॉल करती हूँ, देखती हूँ कौन है ?

गीत गूंजा "मुस्काने झूठी है " करीना के गहरे लाल रंग से पुते होंठ आँखों के सामने आ गए पर मिति का कोई सूत्र नहीं पकड़ पा रही थी, अचानक एक मीठी सी आवाज़ गूंजी "हेल्लो स्नेहा ,आज याद आई तुम्हे मुझे कॉल करने की ". इतने अपनेपन से किया गया सवाल मुझे ज़मीन पर पटक गया सोचा था हेल्लो के बाद पूछ लूंगी आपका नंबर मेरे मोबाइल पर है क्या हम कभी मिले है ?

संवाद की डोर उसने पकड़ ली थी ,एक के बाद एक सवाल पूछ रही थी मेरे बारे में काम के बारे में मेरे परिवार के बारे में , और मैं अपने दिमाग पर हथोड़े मारकर उसे जगाने की कोशिश कर रही थी काश किसी बात से कोई सूत्र मिल जाए और मैं इस बवंडर से आज़ाद हो जाऊं, किसी को एक आत्मीयता भरी बातचीत के बीच में टोकना और परिचय मांगना कितना कठिन काम है ये मुझे आज पता चला ... कही बिना रहस्य का  उठाये फोन रख दिया तो और आफत,बैठे बैठे ये आफत मैंने खुद मोल ली थी .मैंने संभाल संभाल कर सवाल करने शुरू किये शायद किसी जवाब से कोई रास्ता मिले और मैं इस शर्मिंदगी से बच जाऊं. पर नहीं सारे उपाय फेल हारकर मैंने उससे कह दिया "प्लीज़ बुरा मत मानना , मैं तुम्हे बिलकुल पहचान नहीं पा रही हूँ आज मोबाइल में नंबर देखा तो कॉल कर लिया हम कब मिले थे "

दूसरी तरफ एक पल को सन्नाटा पसर गया मेरी धड़कन अब मेरी कांपती पर वार कर रही थी.
अचानक वो बोली "तुम्हे सच में याद नहीं है हम कब मिले थे ?"
"नहीं " मैंने सकपकाते हुए कहा।

"जानने के लिए मुझसे मिलना पड़ेगा तुम्हारी यही सजा है मैं कल तुम्हारा इंतज़ार 12 बजे मेगा मॉल में करूंगी,वैसे भी तुम्हारी थैंक्सगिविंग की छुट्टियाँ है "उसने तसल्ली से कहा।
कल यानी 24 घंटे बाप रे मैं तो जासूसी नावेल भी पीछे से पढ़ती हूँ यहाँ इतना लंबा इंतज़ार ..आज की रात कैसे कटेगी। उसने फोन कट कर दिया मेरे पास इंतज़ार के अलावा कोई चारा नहीं था। .......क्रमश:

Thursday, November 22, 2012

घुंघराली जलेबियाँ





ये मौसम का ही कसूर है और उस पर हमारी भुक्खड़ तबियत ..ज़रा मौसम बढ़िया हुआ तो मुह में पानी आते देर नहीं लगती ...इसे ही नीयत और लार गिरती है गरम जलेबी पर ..बचपन से आज तक लाल लाल रस में डूबी ..प्यार से अपने पास बुलाती है जितना सुकून गर्म जलेबी को खाने में मिलता है उतना किसी मिठाई को नहीं।। सुबह का नाश्ता गर्म जलेबी के बिना पूरा ही नहीं होता कटोरी भर दही और प्लेट भर जलेबी और क्या चाहिए ...अमृत ..परमानन्द . .... जब नन्हे मुन्ने थे लहंगा पहन कर कन्या भोज के लिए तैयार हो जाते थे ...दही जलेबी की कन्या जो खाने को मिलती थी , घर में मेहमान आये तो जलेबी का नाश्ता, ननिहाल (इलाहबाद ) में बिलकुल अलग पैकिंग में जलेबी देख कर दिल बाग़ बाग़ हो जाता था चोकोर डिब्बा कुछ पत्तलों से बना ..अभी भी वो कहीं भूले भटके दिख जाए तो अपने राम को जलेबी ही याद आती है
सब मिलता है गुडगाँव में पर जलेबी में वो बात नहीं ..केसर का स्वाद अपने ठेठ देहाती स्वाद से मैच नहीं करता ऐसा लगता है ..अलता महावर से सजी गाँव की गोरी को स्कर्ट पहना दिया हो बेमेल और बे- ढब (किसी केसर प्रेमी की भावनाए आहत हो तो प्लीज पुलिस में ना जाए ). देसी जलेबी के नाम पर पुराने शहर में एक ही ठिकाना है जहां लाइन लगाकर जलेबी खरीदनी पड़ती है ..पर  जुबान से मजबूर इंसान करे भी तो क्या उससे ही काम चला लेते है , कई अलग अलग शहरों में जलेबी की फॅमिली से मिलना हुआ है ... पनीर की जलेबी ,गुड़ की जलेबी ,विशाल जलेबा ...
अरे आप लोग सोचने लग गए कितनी केलोरी होती है ,चीनी और घी के अलावा कुछ नहीं होता ,बहुत नुक्सान करती है तो भाई जलेबी की खिलाफत सुनने वाले कान हम बक्से में बंद रखते है ... और हाँ ..जो सबसे ज्यादा समझा रहे है इस सीजन शादियों में जलेबी के स्टाल पर ही पाए जायेंगे ... जलेबी प्रेमियों के बीच हुई बहस में अक्सर जलेबी के बेस्ट पार्टनर पर अंतहीन बहस छिड़ते देखा है ...दूध के साथ ,रबड़ी  के साथ या दही के साथ या यूँही ... अभी तक तो सर्वसम्मति हुई नहीं
जबान अपनी अपनी ..स्वाद अपना अपना
कुछ आपको पता हो तो हमारा भी जलेबी ज्ञानं बढाइये ...प्यार से खाइए ...मिठास बढाइये
 चाशनी से तरबतर
घुंघराली जलेबियाँ
उकसाती है अक्सर
तोड़ दो सारी कसमें
और थाम लो हमें
मेनका -उर्वशी सी
घुंघराली जलेबियाँ
बनती है सुबह -सुबह
तोड़ने को सारे प्रण
बस आज और, बस
कल से मत देखना
उलझी लिपटी सी
घुंघराली जलेबियाँ
कहती है चख लो
गुनाहों  के ढेर से
मीठा टुकड़ा गुनाह का 


Wednesday, April 20, 2011

मैं शर्मिन्दा ना होती इंसान होने पर ...

कभी कभी आँखे ऐसे दौर से गुज़रती है जब उनमें पानी की कमी नहीं रहती ..दिल का भारीपन जुबां को खुलने नहीं देता ..आखिर भारी दिल ..छलकने को तैयार आँखे और सुस्त जुबान कभी एक सुर में नहीं रह सकते ...कोई ना कोई धोखा दे ही जाएगा ..और हम शर्मिन्दा हो जायेंगे अपने इंसान होने पर ...
..रोबोट सी ज़िन्दगी जीते हुए बरस बीत गए ..थोडा थोडा करके साल डर साल अपने अन्दर की इंसानियत काट कर समय के साथ बहती चली गई ..पर कुछ हिस्से नहीं काट पाई जो मेरे दिल और आँहो से जुड़े थे ..आज भी वही बचे हुए हिस्से दिल में तीस पैदा करते है और आँखों में reaction सा हो जाता है और फिर मैं शर्मिन्दा हो जाती हूँ अपने इंसान होने पर ...
कुछ समय पहले इंसान से जानवर बनने का चलन था मैंने भी कोशश की ..शायद जानवर बनकर राहत पा जाऊं ..दिन बीते साल बीते पर ना पूरी इंसान रह पाई ना जानवर ...जब भी जानवर बनने की कोशिश की ...पता नहीं कहाँ से एक लकीर इंसानियत की चेहरे पर उभर आई और दिल ने बगावत कर दी ...काश कभी तो ये दिल दिमाग की सुन लेता ..और मैं शर्मिन्दा ना होती इंसान होने पर ...
इसी दौरान रोबोट का दौर आया हर चीज़ में छोटी सी मशीन ज़िन्दगी कितनी आसान सी लगने लगी भावनाओं वाले प्रोग्राम की फाइल hidden कर दी और सुकूं की ज़िन्दगी चलने लगी ...जब मशीन बनने लगे तो एहसास हुआ आस पास इंसान है ही नहीं सिर्फ मशीने ही मशीने है ...गलती तो मेरी ही थी ना कहाँ मशीनों में इंसान ढूंढ रही थी .... बड़े गर्व के साथ मशीनों में शामिल हो गई ...चोट देने लगी चोट खाने लगी दर्द अब कहीं नहीं था ये मेरी सोच थी ....

एक दिन फिर ..वो सामने आ गया ..इंसान कही का ...अभी भी दिल ,सितारे ,रेशम फूलों की बातें करता है ....बेवक़ूफ़ मेरे रेशमी दुपट्टे को हाँथ में लेकर कहता था "कितने निर्दोष कीड़ो की जान गई है इस दुपट्टे को बनाने में "
दर्द और उसका एहसास सब ज़िंदा रखा है उसने ...बहुत कोशिश की मैं उससे दूर रहूँ जिससे इंसान होने की बीमारी ना लगे बड़ी मुश्किल से खुद को मशीन बनाया है ... पर
नहीं रोक पाई ना ...आज शर्मिन्दा हूँ इंसान होने पर ..
(इस पोस्ट में जो कुछ लिखा है उसके लिए पूरी तरह डा. अनुराग आर्य जी का facebook status ज़िम्मेदार है )

Friday, November 19, 2010

मैं काजल हो जाती हूँ

 
मुझे जलना भा रहा है
मैं तो यूँही जल जाती हूँ 
तुम शमा बनोगे बोलो ना
मैं परवाना हो  जाती हूँ
तेरी खुशबू मन को भाये
मुझे मस्त करो और बहकाए
तुम कली बनो और इठलाओ
मैं भंवरा बन मंडराती हूँ
इतनी दीवानी चाहत में
मुझको मेरा होश नहीं
तुम मुक्त पवन के झोके से
और मैं आँचल हो  जाती हूँ
तुम हो प्यासे मैं रस से भरी
फिर रहे अधूरे अधूरे क्यों
तुम फैला दो अपनी बाहें
और मैं बादल हो जाती हूँ
तुम कितने भोले भाले से
जी भर देखूं तो नज़र लगे
मुझको भर लो तुम आँखों  में
और मैं काजल हो जाती हूँ
 
 
 
 

Wednesday, October 6, 2010

रहस्यमयी

"लिखना जरूरी है क्या उसने सिगरेट के धुएं  से छल्ला बनाते हुए कहा"


"तुम्हारे लिए जैसे सांस लेना ज़रूरी है वैसे ही मेरे लिए लिखना"
"कैसा महसूस करते हो कोई रचना जब स्वरुप लेती है" ,अब वो एक पत्रकार की तरह बात कर रही थी
बहुत उलझा हुआ,करेक्टरहै ये प्रिया भी ,आज तक समझ नहीं पाया ,अगर उसके पंख होते तो शायद अब तक आसमान में होती एक आज़ाद परिंदे में और उसमें बस पंखो का ही अंतर था, एक डाल से दूसरी बिना किसी क्षोभ के गिल्ट के ,

"जीवन नदी की तरह है इसपर जितने पुल और बाँध बनोगे इसकी गति उतनी मंथर होगी और एक दिन जीवन समाप्त "
बाप रे लेखक तो मैं नाम का हूँ अगर वो अपने ख़याल लिखने लगे तो रातो-रात स्टार बन जाए .................
रात से याद आया उसको रात बहुत पसंद है, अँधेरी सूनसान, कहती है अपने को जानने का सही मौक़ा मिलता है रात को ...नीरव, इन्ही नीरवता भरी रातों में जब हम दोनों एकाकार होते है तब मुझे उसके मन में पसरा सन्नाटा और करीब से दिखता है हाँ मैं देख सकता हूँ ,सब साफ़ साफ़

वो ऐसी क्यों है हमेशा पुछा पर नहीं जान पाया ...हस देती "तुम मेरा वर्तमान हो ना तो अतीत के पीछे क्यों पड़ते हो,कब्र खोदकर सड़ी बदबूदार लाश बाहर मत निकालो वर्तमान भी मुश्किल हो जाएगा."

पर मैं इस चंचल नदी का स्त्रोत जानना चाहता था,ऐसी मुझे कभी कोई नहीं मिली ,इतनी निर्लिप्त की उसके इस निर्लिप्त स्वरुप से निकलने का मन ही ना करे ..गज़ब का आकर्षण, हफ़्तों बिता दिये उसके साथ सोते जागते पर मोह बढता गया ,और साथ में जिज्ञासा भी.

उसने कुछ शर्ते रखी थी साथ आने से पहले , कभी अतीत पर कोई सवाल नहीं करना ,रिश्ते में बाँधने की कोई कोशिश मत करना....
मुझे अक्सर वो शिवानी की नायिका सी लगती ..खूबसूरत,स्वतंत्र, रहस्यमयी
कई बार मैंने उसे कहा चल मैं तेरी कहानी लिखता हूँ ,उसका जवाब हमेशा एक था जिस दिन मेरी कहानी लिखो हमारे रिश्ते पर समाप्त लिख देना.
अब मेरी जिज्ञासा इस हद तक बढ़ गई थी की मैं उसकी सभी वर्जनाओं को भी पार करना चाहता था आखिर ऐसा क्या है उसके अतीत में ????

उस रहस्यमयी के कमरें में इतिफाक से कहूं या जानकर...कलम ढूंढते हुए कुछ तसवीरें कुछ पन्ने हाँथ लग गए,और सच अनावृत हो गया..मैंने सच में एक कब्र खोद दी थी जिसमें से इतनी सड़ांध उठ रही थी की सांस घुटने लगी ...और वो तो इस सड़ांध के साथ जी रही थी ...

"कम उम्र में व्याह दी गई थी,दो गर्भपात, मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना. जीवन साथी बेहद शक्की,घर से बाहर जाता तो ताला लगाकर,मायके मित्रों से सारे सम्बन्ध ख़त्म करवा दिए..... ये नरक चलता रहता एक दिन एक्सिडेंट के बाद बिल्लाख बिलख कर रोई ,दुनिया उसके आंसू दुःख के समझ रही थी ,उसको विशवास नहीं हो रहा था की अब वो आज़ाद थी..."

तभी वो अब किसी बंधन में पढ़ना नहीं चाहती ..एक दम दिल में आया उसको गले से लगाकर कहूं मैं हूँ ना,मैं तुम्हारे जीवन में खुशियाँ लाउंगा,जो चाहो जैसा चाहो,मैं साथी बनूँगा ....

"नहीं माने ना तुम " वो सामने खड़ी थी ,मुस्कुराते हुए ..मैंने सोचा उसको गुस्सा होना चाहिए था पर वो तो हस रही थी ...
"तुमने आखिर समाप्त लिख ही दिया ना " उसने कुछ तल्ख़ स्वर में कहा और तेज़ क़दमों से निकल गई ....

उस रहस्यमयी को रोकने के लिए मैंने हाँथ तो उठाया पर रोक नहीं पाया ...

Wednesday, July 21, 2010

लिखो ना ..

लिखो ना ..


पहली मुलाकात

हलकी हरारत

तेज़ धड़कन

आँखों में शरारत

लिखो ना ...

पहली छुअन

हलकी सरसराहट

तेज़ साँसे

बेहद घबराहट

लिखो ना ....

छोटी शामें

लम्बी रातें

बेबाक बे-तकल्लुफ

मीठी बातें

लिखो ना ...

सात फेरे

साथ मेरे

गूंजी शहनाई

नम बिदाई

लिखो ना ...

नया आँगन

सिमटी दुल्हन

कोरे रिश्ते

जुड़ते दिलसे

(जारी .... अभी बहुत लिखना है )

Saturday, July 3, 2010

पहली बारिश और हम तुम....

सिमटे सिमटे


सीले सीले

आधे सूखे

आधे गीले

पहली  बारिश

और हम तुम

सुलगे सुलगे

दहके दहके

थोड़े संभले

थोड़े बहके

पहली  बारिश

और हम तुम

चाय की प्याली

गर्म पकोड़े

मुंह  में भरते

सी सी करते

पहली बारिश

और हम तुम

सावन आये

सावन जाए

जिया करेंगे

संग रहेंगे

पहली  बारिश

और हम तुम

Monday, May 31, 2010

बंद लिफाफे में गुलाब आता है

आज भी ....


ख़त लिखते है तो जवाब आता है

बंद लिफाफे में गुलाब आता है

देख कर उनको भारी हो जाती है पलकें

रुखसार पर रंग लाल छाता है

अब भी.....

खस गर्मियों में लगा कर निकलते है

सुबह- शाम दोनों वक़्त संवरते है

कलफ लगी सूती चुन्नी की ओट से

मूंगे से सुर्ख लब दमकते हैं

पर....

वो ना आया जिससे वादा था

यकीन जिसपर खुदा से ज्यादा था

आज ज़माने भर की मजबूरियां जताता है

कल जो चाँद लाने पर आमादा था

Sunday, April 25, 2010

कायर(कहानी)

एक


आज समाजशास्त्र की किताब पढ़ते हुए ,मेरा शारीर तो वही रह गया और मन पंख लगा कर उड़ गया, जरुरी पंक्तिया रेकंकित करते हुए न जाने कब किताब के आखिरी पन्ने पर तुम्हे उकेरने लगा,मुझे हमेशा ऐसा लगता है, तुम्हे मेरे से अच्छा कोई भी तस्वीर में नहीं उतार सकता,

शुरुवात तुम्हारी आँखों से की कितनी गहरी ,रेखाए तो खींच दी पर उनकी शरारत और भोलापन...चलो वो मेरी नज़र में है वैसे भी तस्वीर अपने लिए बना रहा हूँ .

तुम कैमरे से शर्माती क्यों हो सोचती हो तुम्हारी रुसवाई ना हो जाए पर तुम मेरे लिए बस एक युवा देह नहीं हो तुम्हारे लिए मेरा आकर्षण हमारे शरीरों के पुष्पित होने से पहले का है ,मैं समझाता हूँ तो तुम झिड़क कर कहती हो "सारे लड़के एक से ही होते है ", मुझे देखो महसूस करो मैं सब जैसा नहीं हूँ ....

प्रेमी नहीं अब मैं तुम्हारा उपासक बन गया हूँ,तुम्हारी एक मुस्कराहट से उम्र काट सकता हूँ .



दो

तुम सिसक रही हो ,मैं तुम्हारे आंसूं भी नहीं पोछ पा रहा हूँ ,कितने सवाल तुम्हारी आँखों में है ,सदमें में आ गया था जब तुमने कहा था एक नया रिश्ता तुम्हारे अन्दर सांस लेने लगा है,तुमने कितने विश्वास से कहा था मुझसे चलो ज़िन्दगी शुरू करेंगे और मैं आसमान से ज़मीन पर एक पल में आ गया था ,मेरी दोनों बहने अभी कुँवारी है ...रिश्ते कैसे होंगे ,जॉब भी नहीं है ...पढ़ाई का एक साल भी बाकी है अभी कैसे ...

तुम होठ वक्र करके कहती हो "कैसे " ये तुमने उस समय क्यों नहीं सोचा जब ..अपने वासना रहित प्रेम का विश्वास दिला कर मुझसे समर्पण माँगा था और कहा था "मैं सब जैसा नहीं हूँ " कायर

तीन

बाइस साल बीत गए .. तुम आज सामने खड़ी हो एक स्वनाम धन्य लेखिका ,समाज सेविका के रूप में जिसका जीवन वृत अपने आप में उदाहरण बन गया,अपनी संतान को बहुरास्ट्रीय कंपनी के उच्च पद पर बैठा कर स्वयं ज़मीन से जुड़ गई,हिंदी दिवस पर तुम्हारे सम्मान में ये आयोजन है ,मुझे स्वागत भाषण देना है , मेरे हाँथ काँप रहे है अतीत तेजी से आँखों के सामने घूम रहा है. तुम गुलदस्ता स्वीकार करती हो ..तम्हारे होंठो पर वह वक्र मुस्कराहट दौड़ जाती है .

मैं बौना होता जा रहा हूँ ..तुम्हारा कद आसमान छू रहा है ...मैं विचार शून्य हो गया हूँ ,तुम्हारे सामने खड़ा नहीं हो पा रहा .....मैं धीमे क़दमों से निकल जाता हूँ .... एक कायर की तरह

Tuesday, April 6, 2010

अजीब लड़की (अंतिम किस्त )

आज ही परीक्षा ख़त्म हुई थी ,कालेज से आकर सीधे बिस्तर पर पड़ गई आखिर पिछले १५ दिनों की नींद जो पूरी करनी थी, उफ़ कैसे विचित्र सपने देख रही थी मैं सूनसान सड़क पर जा रही हूँ अचानक एक अजगर दिखाई देता है उसकी शक्ल किसी से मिल रही है...अरे ये तो मधु जैसा है घबराकर मेरी नींद खुली तो देखा नौ बज रहे है ....

"कोई बुरा सपना देखा क्या?" निधि ने मेरे माथे पर हाँथ रखते हुए पूछा , शायद थकान का असर होगा मैंने मुह धोते हुए सोचा ......कहाँ है मधु ..ये लड़की भी अजीब है मन मेरे पेपर चल रहे है पर एक बार मिल तो जाती देखती हूँ ......मधु के कमरे पर बड़ा सा ताला लटक रहा था, कहाँ गई होगी मैंने उसकी रूममेट लता से पूछा ..

कहीं बाहर गई होगी उसकने मुस्कुराते हुए जवाब दिया ....

अरे होस्टल का गेट तो बंद हो जाएगा १० मिनट में उसके पास तो मोबाइल भी नहीं है कैसे आएगी अन्दर ,

"आप क्यों खून सुखा रही हो ..मज़े करो आज पेपर ख़त्म हुए हैं ." लता बोली

...मैं डिनर के लिए चली गई .रात के ११ बजे उस लड़की का कोई पता नहीं ,सारी लडकिया मूवी देखने के लिए टी वी रूम में थी ....मेरी रूचि टी वी में समाचार से ज्यादा कभी नहीं रही ,मैंने शिवानी की कृष्णकली उठाई और बालकोनी में बैठकर पढने लगी ...इतनी रोचक किताब होने पर भी मन कही ना कही मधु में अटका था पता नहीं कहाँ होगी, कुछ परेशानी में तो नहीं फस गई , हे इश्वर किसी को कोई फिक्र नहीं है , क्रश्न्काली के लास्य में मैं ऐसी बंध गई की समय का पता नहीं चला, अचानक किसी ने मेरे कंधे पर हाँथ रखा ..मैंने सकपका कर देखा तो निधि थी .."यहाँ क्या कर रही हो "
""मधु नहीं आई अभी तक, पता नहीं कहाँ रह गई कोई contact करने का ज़रिया भी नहीं है ,मुझे फिकर हो रही है " मैंने बेचैन स्वर में निधि से कहा .
"आप मेरे साथ चलो " निधि ने द्रढ़ता से मेरा हाँथ  पकड़ लिया ..मैंने बहुत पूछा निधि बोली बस चुपचाप चलो

निधि मुझे होस्टल के गाते के पास बने चौकीदार के कमरे के पास ले गई ,मैंने कुछ बोलना चाहा तो निधि ने होंठ पर ऊँगली रख कर चुप रहने का इशारा किया,हलके  हाँथ से उसने अधखुली खिड़की हो थोड़ा और खोल दिया ...अब स्तब्ध होने की मेरी बारी थी ...मधु कुर्सी पर आराम से बैठी थी सामने चौकीदार मोहन बैठा था ...दोनों ठहाके लगा रहे थे ...बात तो समझ में नहीं आ रही थी पर ये साफ़ दिख रहा था दोनों आपस में बहुत घुले मिले है ....

मैं अपने आप को मूर्ख सा महसूस कर रही थी पिछले २ घंटे से मैं जिसकी सलामती के लिए हलकान हुई जा रही थी वो भली चंगी सामने बैठी थी ...

निधि ने धीरे से मेरा कंधा दबाया और ऊपर चलने का इशारा किया ..सारे सवाल मेरे चहरे पर छपे हुए थे .....

"ये सब क्या है , तुम लोग सब जानती थी तो मुझे क्यों नहीं बताया " मैंने निधि और मधु की रूम मेट लता से पूछा

"आपकी परीक्षाओं की वजह से आपको नहीं बताया " निधि ने बात शुरू करते हुए कहा ...... और आगे का रहस्योद्घाटन तो मेरे लिए किसी रोमांचक उपन्यास से कम नहीं था .....

मधु अपने आप में पूरा झूठ का पुलिंदा थी , उसके पिता जीवित थे , जो उसके बैंक अकाउंट में पैसे जमा करवाते थे ....उसको कोई हार्ट की बिमारी नहीं थी और उस रात उसने जो नाटक किया वो मेरी संवेदना जीतने के लिए किया, उससे मेरी बेरुखी बर्दाश्त नहीं हो रही थी ,बाद में अपनी विजयगाथा उसने डिनर पर बड़ी निर्लज्जता से सबको बताई थी ..और दवा मैंने उसे दी depression की थी जो कोई भी मेडिकल स्टोर से ला सकता है ..उस दिन डॉक्टर ने भी उससे हार्ट की रिपोर्ट्स मांगी जो आजतक उसने नहीं दिखाई.......

"और वो मोहन के पास क्या कर रही है " ये रहस्य मुझे मार रहा था .

"अरे वो उसको पटा कर रखती है " लता बोली , देर रात दोस्तों के साथ घूमकर आती है तो मोहन बिना वार्डन को बताये गेट खोल देता है ..उसका छोटा मोटा काम भी कर देता है .

"हम तो आप को आज भी ना बताते पर आपका मधु प्रेम कुछ ज्यादा बढ़ गया था ..हमने आपको कई बार इशारे भी दिए पर आप तो सुनने को तैयार नहीं " निधि हँसते हुए बोली

मेरी आँखों के सामने निधि की वो मुस्कान आई जो मैं इग्नोर नहीं कर पाई थी ........

हम लेखको के साथ के बड़ी समस्या है हम "क्या है" से तृप्त नहीं होते हमको "क्यों " का जवाब भी चाहिए ..सारी रात करवटों में बीती कितनी भावनाए कितने समीकरण ..क्या पता वो मानसिक रूप से बीमार हो , किसी कुंठा के चलते वो ऐसा व्यवहार कर रही हो , शायद अपने परिवार से प्यार ना मिला हो ................ मैं शायद उसकी मदद कर पाऊं, भावनाओं का तूफ़ान सारी रात चलता रहा बीच बीच में ...कुछ गर्म बूंदे आँखों की कोरों से टपक भी गई

सुबह तक दिल दिमाग की लड़ाई में दिमाग हावी हो गया . मैं किसी अनजान लड़की के लिए इस सीमा तक जा सकती हूँ ...ये तो वो झूठ है जो लोगों को पता है अभी ना जाने उसके अस्तित्व और चरित्र की कितनी परते और खुले .... और ना जाने किस  किस तरीके से मेरी भावनाओं का फायदा उठाये

मैं उस अजीब लड़की को वही छोड़ कर आगे बढ़ गई ....किसी मोड़ पर वो मुझे फिर मिली तो जरूर बताउंगी

Sunday, April 4, 2010

अजीब लड़की (२)



मेरे कमरे में उसकी उपस्थिति मानो किसी कुर्सी मेज की तरह थी मैं उसे पूरी तरह उपेक्षा दे रही थी ..मैं अपनी पढ़ाई में कोई भी व्यवधान नहीं चाहती थी,हालाँकि खाने के समय वो चुप्पी तोड़ने की बहुत कोशिश करती, ऐसा नहीं था मैं उससे जानबूझ कर रुखाई से पेश आ रही थी...पर मैं सहज नहीं थी ..



एक दिन आधी रात किसी की सिसकियों ने मुझे जगा दिया,लगा हॉस्टल में सुनाई जाने वाली कहानी की नायिका जिसने पता नहीं कितने साल पहले आत्महत्या कर ली थी
कही सूनसान होस्टल में वापस तो नहीं आ गई ,मैं हनुमान चालीसा शुरू करती उससे पहले साथ वाले पलंग पर कुछ हलचल महसूस की ..हाँ वो मधु ही थी,असमंजस में पड़ गई क्या करू दम साधे पड़ी रहूँ या पूछूं १० मिनट बाद दिल दिमाग पर हावी हुआ, हिम्मत कर के लाइट जलाई...मधु ने एक दवा की शीशी की ओर इशारा किया वो तकलीफ में थी अगले दो घंटे तक मेरे होश फाख्ता रहे उसने बताया उसे हार्ट की तकलीफ है उसके सुकून के सोने के बाद ही मैं सो पाई .

अपने में गहरा अपराधबोध महसूस किया,किसी को जाने बिना किसी के बारे में राय क्यों बना ली..उस रात के बाद मैं उसके साथ सहज हो गई मेरे खाली समय में वो अपने किस्से सुनाती मैं भी मुस्कुरा कर हामी भरती.

१ हफ्ते के लिए घर जाना था पड़ोस के रूम की नेहा को मधु को सौंप कर मैं चली गई ..घर पहुँच कहाँ कुछ याद रहता है बस माँ के हाँथ का खाना और आराम जब होस्टल लौटी तो पूरी रौनक वापस थी,सारी लडकिया आ चुकी थी और होस्टल गुलज़ार था,निधि दौड़ कर गले मिली और उससे ज्यादा प्यार से मधु ..निधि के चेहरे पर अजीब सी आश्चर्य मिश्रित मुस्कान फ़ैल गई जिसे मैं इग्नोर नहीं कर पाई, खाना खाने के बाद मैं निधि से गप्पे लगा ही रही थी हॉस्टल में शोर फ़ैल गया मधु की तबियत फिर खराब हो गई थी ,डॉक्टर को बुलाया गया था उस अजीब लड़की के परिवार के किसी सदस्य का नंबर नहीं था रिकॉर्ड में जो नंबर था वो गलत था,वो रोये जा रही थी डॉक्टर इंजेक्शन लगाकर चला गया ,मेरा मन करुना से भर गया इश्वर क्यों करता है किसी के साथ ऐसा, मैंने अपने मन की बात और लड़कियों से बांटने की कोशिश की तो सबने मुझे इन सब मामलों ना पड़कर अपनी पढ़ाई पर ध्यान देने को कहा ,कितनी स्वार्थी है दुनिया ........

ये घटनाएं मुझे उसके और करीब ले आई,मैं उसका ख़ास ख्याल रखने लगी शायद सब ऐसा ही चलता रहता पर उस दिन की घटना ने मुझे और मेरे विश्वास को हिला कर रख दिया ................................................................


क्रमश:

Thursday, April 1, 2010

ठहरी ज़िन्दगी

मेरे घर के आँगन में
धुप तिरछी पड़ती थी
ठीक नौ बजे नौबजिया
की कली खिलती थी

सुबह स्कूल जाने

की हडबडाहट में
गर्म दाल चावल से अक्सर
ऊँगली और जीभ जलती थी

निकलना देर से

और पहुँचने की जल्दी में
कच्ची पगडण्डी पे कितनी बार
गिरती संभालती थी

बरस बीत गए लेकिन

ज़िन्दगी आज भी
इमली के पेड़ तले
ठहरी मिलती है

Thursday, December 17, 2009

वापसी (भाग-१ )

कहते है जब ज़िन्दगी बोझिल सी लगने लगे तो थोडी देर ठहर कर फिर आगे बढ़ना चाहिए, आज मैं भी थोडी देर के लिए रुक गई हूँ ऐसा नहीं है की मेरी ज़िन्दगी बोझ बन गई है पर क़दमों में थोडा भारीपन सा महसोस हो रहा है, आज ऑफिस से लौट कर थकावट महसूस कर रही हूँ ,दोनों बच्चे अभी कोचिंग से लौटे नहीं है आठ बजे तक आयेंगे ,अभी काफी समय है मेरे पास आराम करने के लिए, कपडे बदल कर फ्रेश हो कर आई तो सामने किरण चाय का प्याला लिए मेरा इंतज़ार कर रही थी , किरण मेरी कामवाली की बेटी बचपन से मेरे घर में रही अब ओ परिवार का एक हिस्सा सी बन गई है,उसके ग्यारहवी की परीक्षा अभी ख़त्म हुई है ,सो अपनी माँ की मदद करने आ गई ,


चाय पी कर आँख बंद कर के लेट गई ....तो अचानक अपनी माँ का चेहरा आँखों के सामने आ गया आज ना जाने माँ की बहुत याद आ रही है ,मन करता है उड़ कर पहुँच जाऊं .बॉम्बे से कानपुर इतना आसान नहीं तो मुश्किल भी नहीं,

आज रात को अजय से बात करती हूँ ,घर से ऑफिस, ऑफिस से घर सुबह छह बजे से रात बारह बजे तक का समय मशीन की तरह लगे लगे कहाँ बीत जाता है पता नहीं चलता...सोचते सोचते कब आँख लग गई पता ही नहीं चला ......अचानक कानों में आवाज़ आई ,इस समय लेटी हो तबियत तो ठीक है ,उनींदी आँखों से देखा तो अजय खड़े थे ....एक दम से उठ कर बैठ गई घडी साढ़े आठ बजा रही थी "अरे बहुत समय हो गया ,बच्चे आ गए क्या ,किसी ने उठाया क्यों नहीं "

अजय मुस्कुरा कर बोले कोई बात नहीं कभी कभी आराम कर लेना चाहिए ,तभी बच्चों की आवाज़ आई "मॉम डैड डिनर सर्व हो गया है जल्दी आइये "

डिनर टेबल मेरे घर में एक ऐसी जगह है जहा सारा परिवार बैठ कर पूरे दिन का हाल चाल सुनाता है ,दीक्षा अपने फ्रेंड्स की बातें बता रही थी बीच बीच में अर्नव उसको छेड़ रहा था,अजय उस नोक झोक का मजा ले रहे थे .अचानक दीक्षा बोली "मॉम आप यहाँ होकर भी यहाँ नहीं हो क्या बात है "

मैं खुद भी बात करने वाली सो धीमी सी आवाज़ में बोली "सोच रही हूँ कुछ दिन माँ के पास रहूँ ,कभी साल हो गए उनसे मिले हुए बहुत मन कर रहा है ". अर्नव मुस्कुरा कर बोला "तो ये बात है मैं अभी रिज़र्वेशन करवा देता हूँ यहाँ से देहली की फ्लाईएट ले वहां से ट्रेन " आपको जब तक मन करे रहना फिर मैं और दीक्षा भी आ जायेंगे आपको लेने हमें भी काफी समय हो गया है नानी से मिले हुए ".

कानपुर जाने का सोच कर मन फ्रेश हो गया अगले ही दिन ऑफिस में छुटियों की अर्जी दे दी जो मंज़ूर भी हो गई, मन फिर से अल्हड सा हो गया ,माँ और भाभी को फ़ोन से आने का बताया तो दोनों बहुत खुश हुई वैसे भी मेरी भाभी ,भाभी कम सहेली ज्यादा है आज भी घंटों फ़ोन पर बतियाते है ....जाने से पहले सारे काम निपटा लिए पैकिंग सबके लिए शौपिंग और भी बहुत कुछ .

जाने की ख़ुशी में समय के मानों पंख लग गए और मैं अपने कानपुर स्टेशन पर खड़ी थी, आँखें बेसब्री से अपने परिचित चेहरे ढूंढ रही थी ,तभी कंधे पर किसी का हाँथ महसूस हुआ पलती तो बड़े भैया खड़े मुस्कुरा रहे थे, गले लगा कर बोले "कैसी है बिट्टो ",

बिट्टो मेरा प्यार का नाम, सुधा मैडम सुनते सुनते मैं मैडम ही बन गई थी ,और चंचल सी बिट्टो ना जाने कहाँ खो गई थी, भैया के गले लगी तो आँखों के कोरों पर नन्हे नन्हे दो मोती झलक आये ,

भैया सर पर चपत लगा कर बोले " दो बच्चों की माँ बन गई इतनी बड़ी कंपनी में अफसर, पर रही तो झल्ली की झल्ली ,रो क्यों रही है ". मैंने मुस्कुराते हुए जवाब दिया "कुछ भी बन जाऊं भैया पर आपके लिए तो आपकी बिट्टो ही रहूंगी ".

सारे रास्ते कितने सारे सवाल थे मन में सबके लिए पूछूंगी नीता ताई कैसी है , उनकी बहु को कुछ हुआ , राधा मौसी के बच्चे भी तो अब शादी लायक हो गए होंगे , बगल वाले शर्मा अंकल की तबियत कैसी है, अपनी ज़मीन पर पैर रखते ही जैसे सारे भूले बिसरे नाम और रिश्ते वापस याद आ गए,

जहाँ बॉम्बे में ट्रैफिक को लेकर परेशान रहती हूँ ,वही कानपुर की सड़कों पर लगा रिक्शा,साईकिल ,हाँथगाड़ी का जाम भी अपना सा लग रहा है,बिलकुल सुकून ना ऑफिस जाने की जल्दी ना कोई टेंशन. गली में घुसते हुए ताज़ी उतरती कचोरी और जलेबी की खुशबू नें याद दिलाया की भूख लग रही है ,भैया हँस कर बोले तुझे घर छोड़ कर तेरे लिए ताजा नाश्ता ले आऊंगा , आज भी भैया मेरा चेहरा बढ़ लेते है, आखिर उनकी इकलौती लाडली बहन जो थी जिसे भैया कभी बहुत दूर नहीं जाने देना चाहते थे बंगलोर का रिश्ता उन्होंने इसीलिए मना किया था, पर उनको क्या पता था जिस बहन को वो लखनऊ ब्याह रहे है वो बॉम्बे जा कर रहेगी...शरू में हर राखी दूज पर दिल भारी हो जाता ना भैया की उदासी कम होती ना उनकी बिट्टो के आंसू रुकते,

पर समय बहुत बलवान होता है धीरे धीरे मैं अपने घर और ऑफिस में व्यस्त होती गई, पर फोन से बराबर बात होती रही, अपने घर की गली में मुड़ते ही मानों बचपन वापस लौट कर आ गया मैं गर्दन घुमा कर देख ही रही थी की घर के सामने गजानन चाचा के घर पर ताला लटकते देख कर परेशान हो गई , वो घर ऐसा था जिसके दरवाजे हमेशा सभी के लिए खुले रहते थे....    क्रमश:

Wednesday, October 21, 2009

स्मृतियाँ-हरसिंगार (1)

ऑफिस से निकलते ही दिमाग में घर के काम भर जाते है,दूध लेना है घी भी ख़त्म हो रहा है ,जाते ही वाशिंग मशीन लगनी है....ओफ़्फ़. ऑफिस में घुसने के बाद शायद हमारा दिमाग अपना रोल बदल लेता है उन आठ घंटों में घर की कोई बात जैसे याद नहीं आती जैसे किसी ने पौज़ बटन दबा दिया हो जो छः बजते वापस प्ले हो जाता है.....
अरे ये खुशबू कहाँ से आ रही है अचानक मेरी गर्दन घूम गई, बहुत जानी पहचानी सी जैसे मेरा हिस्सा रही हो अचानक निगाह पड़ी हरसिंगार के पेड़ पर जो कुछ कलियों और अधखिले फूलों से लदा हुआ था....मुझे लगा जैसे पेड़ मुझे देखकर मुस्कुरा रहा हो और पूछ रहा हो "बिटिया मुझे तो तुम भूल ही गई " मैंने कुछ ज़मीन पर पड़े फूल उठाये और घर आकर वापस बचपन में पहुँच गई ....

कम से कम बीस साल पहले अपनी खिड़की के सामने हरसिंगार को देखना हमेशा अच्छा लगता था ,गहरे रंग के कुछ मखमली और कुछ खुरदुरे से लगते पत्ते जो सारे साल शांत रहते पर क्वार का महीना आते ही बौरा जाते ....सफ़ेद फूल नारंगी डंडी और मीठी मीठी खुशबू दूर दूर तक फ़ैल जाती...
मुझे हमेशा हर्सिगार का पेड़ बहुत उदार लगता जिसमे रात को फूल खिलते और सुबह-सुबह उन्हें मोतियों की तरह बिखेर देते और अगर कोई डाल हिला दे तो बस ताजे ओस में भीगे फूल आसमान से बरस उठते जो हमको हिंदी फिल्मों के द्रश्य याद सिलाते जहाँ नायक नायिका पर फूलों की डाल से फूल बरसाता है ........
मेरी दादी हर मौसम में सवा लाख हर्सिगार के फूल अपने ठाकुर जी को चढाती...और हम बच्चों की सेना उनको फूल लाकर देती..रात को पेड़ के नीचे चादर बिछा देते और सुबह-सुबह वो चादर सैकडों फूलों से भरी होती मानो हरसिंगार नतमस्तक होकर खुद लड्डू गोपाल जी को अपने फूल अर्पित कर रहा हो.
दादी सौ सौ के ढेर बनाती और अपनी कॉपी में लिखती....सूखे हुए फूलों की डंडी चन्दन के साथ पीस देती तो चन्दन का रंग और चटख हो जाता....
सवा लाख पूरे होने के बाद जितने फूल होते वो हम बच्चों के खेल का हिस्सा बन जाते ..गुडिया की माला,अपने गजरे ,फूलों की रंगोली और न जाने क्या क्या...
सच है कुछ खुशबू ,रंग और द्रश्य हमारे अस्तित्व का हिस्सा बन जाते है
आज मैं अपने शहर से सैकडों किलोमीटर दूर हूँ,बचपन को गए भी अरसा हो गया पर जब भी हरसिंगार के पेड़ के सामने गुज़रती हूँ और फूलों को हाँथ में लेकर एक बार अपनी दादी को याद करती हूँ......
मैं नहीं भूली न दादी आपको और ना हरसिंगार को.....