किस्सों में ज़िक्र उसका भी होगा
बिछाए कांटे जिसने मेरी राहों में
वो ना होता तो ये सफर न होता
झूमते रहते बहारों की पनाहों में
दर्द लहू उसका भी शामिल था
एक आह थी मेरी हज़ार आहों में
ना जाने बना कैसे हमसफ़र वो
कोई नेकी थी ढेरभर गुनाहों में
बिछाए कांटे जिसने मेरी राहों में
वो ना होता तो ये सफर न होता
झूमते रहते बहारों की पनाहों में
दर्द लहू उसका भी शामिल था
एक आह थी मेरी हज़ार आहों में
ना जाने बना कैसे हमसफ़र वो
कोई नेकी थी ढेरभर गुनाहों में