शोर था साँसों का
दिल में सन्नाटा
तेरे जाने के बाद
तू उग रही है यहाँ
जम रही है काई सी
आईने पे लगी बिंदी में
टेबल पर चूड़ियों में
पड़े सूखे गजरे में
छोड़ गई हो जानकर
चादर के आगोश में
बालों के नर्म गुच्छे
कुछ टूटे लाल नाखून
दुपट्टे से बिछड़े मोती
पायल से खफा घुँघरू
कप पर गुलाबी निशान
कमरे में इत्र -ए -ख़स
जागा हूँ उस दिन से
पलक भी झपकी नहीं
के तुम लौट ना जाओ
खडका कर कुण्डी कहीं
आहट सुनना चाहता हूँ
तुम्हे छूना चाहता हूँ
कहते है राख से भी
जन्म जाते है लोग
गर पुकारो दिल से


