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Tuesday, July 4, 2017

प्रेम करती हूँ तुमसे

 
यमुना  किनारे उस रात
मेरे हाँथ की लकीरों में 
एक स्वप्न दबाया था ना  
उस क्षण की मधुस्मृतियाँ 
तन को गुदगुदाती है 
उस मनभावन रुत में 
धडकनों का मृदंग

बज उठता  है 
मयूर पंख फैलाए

नृत्य करता है 
सलोना मेघ तकता है

यह मोहक  उत्सव 
इस स्वप्न के 

आवेश में डूबकर 
आँखे मुखर हो उठती हैं  
अधखुले मादक अधरों से 
मौन  प्रीत बरसती है 
जहां गूँज उठता है 

बस उसी पल 
प्रेम करती हूँ तुमसे 

...बस तुमसे 

#हिंदी_ब्लॉगिंग 

Wednesday, March 20, 2013

तू,तेरा अक्स


शोर था साँसों का
दिल में सन्नाटा
तेरे जाने के बाद
तू उग रही है यहाँ
जम रही है काई सी
आईने पे लगी बिंदी में
टेबल पर चूड़ियों में
पड़े सूखे गजरे में

छोड़ गई हो जानकर
चादर के आगोश में
बालों के नर्म  गुच्छे
कुछ टूटे लाल नाखून 
दुपट्टे से बिछड़े मोती
पायल से खफा घुँघरू
कप पर गुलाबी निशान
कमरे में इत्र -ए -ख़स

जागा हूँ उस दिन से
पलक भी झपकी नहीं
के तुम लौट ना जाओ
खडका कर कुण्डी कहीं
आहट सुनना चाहता हूँ
तुम्हे छूना चाहता हूँ
कहते है राख से भी
जन्म जाते है लोग
गर पुकारो दिल से




Thursday, March 7, 2013

राधे सांवरी होय


(1)
श्याम सजे
ज्यो गोपिका
धरा अनूठा रूप
सांवल तन
घूँघर मुखपर
लीला रची अनूप

(2)
टेसू भिगोया
केसर भिगोई
और पिसाई भांग
मोरपंख धर
राधा सजी ज्यों
मोहन घनश्याम

(3)
नित्य नवल
रास रचाए
राधे तेरो श्याम
फाग चढ़े
बौरा गया
सबरा गोकुलधाम

(4)
श्याम छवि निरख
राधे सांवरी होय
सांवरे के  तन पे 
रंग चढ़े ना कोय

Monday, February 25, 2013

किसी ने कहा होगा


कोई तो गिला होगा किसी ने कहा होगा
मसला भरे बाज़ार ऐसे नहीं उछला होगा
लहू के ताज़ा निशां आँख के मुहाने पर 
दर्द कोई सरहद तोड़ कर निकला होगा 
दरख्त के मानिंद छाया दिया करता था 
खुन्नस में तुमने ही रास्ता बदला होगा 
सूखे मोम की लकीरें देहरी पर निढाल 
कल इंतज़ार तन्हा  यहाँ पिघला होगा 
दिखाकर चमकीले सितारे बुझाए चराग 
तेरा मसीहा  भी नीयत से उथला होगा

Thursday, February 7, 2013

सारा टाइम काँय-काँय



फलाना बैंड नहीं चलेगा
ढिमाकी फिल्म नहीं चलेगी
कला प्रदर्शनी नहीं चलेगी
ये लेखक नहीं चलेगा
वो निर्देशक नहीं चलेगा
तू बोला तो क्यों बोला
मुंह खोला तो क्यों खोला
ऐसे कपडे नहीं चलेंगे
पुतले पुतली रोज जलेंगे
ख़बरों के छोटे टुकड़े कर
ब्रेकिंग न्यूज़ में रोज़ तलेंगे 
इसके विचार  हाय हाय
उसका घर बार हाय हाय
फुर्सत कितनी इनको देखो
सारा टाइम काँय-काँय-काँय-काँय

Thursday, January 24, 2013

क्या रखा ?

यूँही खुद को मैंने सदा तनहा रखा
खुशियों से महरूम औ रुसवा रखा
महफिलों से कतरा कर गुज़रे हम
दर्द से दिल इस कदर बोझिल रखा
सो ना जाए किसी शब् सुकून से
पलक में एक अश्क उलझा रखा
रौशनी ना मांगने लगे आँगन मेरा
चराग भी रखा तो बुझता रखा
ना कोई हमसफर हो जाए मेरा
अपनी हस्ती को मैंने मुर्दा रखा
जुर्म क्या था तेरा ये बता "सोनल "

सांस लेना इस कदर मुश्किल रखा 
कैसे मिलेगा बहीखाता  ज़िन्दगी का
पास बस दिल का एक टुकड़ा रखा 

Thursday, March 29, 2012

चलो कुछ भूल जाएँ ......

इंसा पैदा हुए थे हम
हुए ना जाने कब विषधर
किसी अंधियारे कोने में
केंचुली छोड़ आयें
चलो कुछ भूल जाएँ  ...... 

उम्र बीती जिरह करते
जब भी उगला ज़हर उगला
किसी गुमनाम पीर पर
ज़हर का तोड़ पाए
चलो कुछ भूल जाएँ ..........
 
युग बदले ना तू बदला
रहा उथले का तू उथला
किसी गंगा में यूँ डूबें
के  मुक्ति पा ही जाए
चलो कुछ भूल  जाएँ............
 
बड़ी  रंजिश सहेजी हैं 
तुमने अपनी किताबों में
किसी पार्क की बेंच पर
इरादतन छोड़ आयें
चलो कुछ भूल जाएँ ....
 
मनभर  बोझ  लेकर
सफ़र कैसे करोगे तय
मंजिल पास में ही है
अंत आसाँ बनाये
चलो सब  भूल जाएँ ....

Thursday, March 15, 2012

एक नया वादा कर ले


अपनी तन्हाइयों का
मुझसे सौदा कर ले
आज दिल कहता है
एक  नया वादा कर ले
बहुत हुए रेशमी साए
जुल्फों के तेरे शानो पर
सपनीली  आँखों को चल
धूप में सूखा कर ले
वफ़ा मिली भी मुझे
और निभाई भी दिल से
क्यों ना किसी लम्हा
दिल से कोई धोखा कर ले 
महंगी है दुनिया बहुत
महंगे है जीने के सवाल
खुद इन ख्वाहिशो को
थोडा सा सस्ता कर ले
बलिस्त भर कम पड़ जाते है
मेरी पहुँच से तारे-आसमां 
ज़रा नीचे एड़ी के
एक टुकड़ा हौसला रख दे

Thursday, January 12, 2012

उदास है कोई

सुर्ख  मौसम में भी उदास है कोई
होश गुम है बदहवास है कोई
आसुओं  से जल गए रुखसार जिसके
अपने साए को भी  भी नागवार है कोई
आहटों को तौलता रहता है
सन्नाटे को तोड़ता रहता है
सडको पर दौड़ता रहता है
मानो गुनाहगार है कोई

Wednesday, October 19, 2011

देह से इतर

ना तुम देह से परे
कभी सोच पाए ना सोच पाओगे
पलटवार करोगे
जो खुद को कमतर पाओगे
ना दोगे स्थान बराबरी का
स्वयं अर्जित किया
तो खीजोगे तिलमिलाओगे
तुम्हारे जन्म से
तुम्हारी वासनाओ तक
तुम्हारे पेट से लेकर
तृप्त अतृप्त इच्छाओं तक
निचोड़ोगे दबाओगे
पर देह से इतर जो मन है
उसे क्या जान पाओगे

Tuesday, September 6, 2011

उत्सव मुझको प्रिय नहीं


उत्सव मुझको प्रिय नहीं
एकांत रुदन ही भाता है
भीगी आँखों से मेरा
अंतस धुल सा जाता है

भीड़  मुझे नरमुंड लगे
मित्र काग के झुण्ड लगे
परिचित चीलों गिद्धों  से
पहले कौन नोच खाता है

जितने आवरण मुख पर है
उतनी पीड़ा भीतर है
विद्रोह कष्ट  की ज्वाला से
मेरा स्व: जलता जाता है

उत्सव मुझको प्रिय नहीं

Tuesday, June 28, 2011

सलवटें चेहरे पर

सलवटें चेहरे पर
साफ़ नज़र आती है
करवट बदलकर
जब रात गुज़र जाती है
दिल को निचोड़ते है 
ख़ामोशी के  जोर से
आँखों की कोरों पर
बूँद छलक जाती है
सुलगती है सांसें
चारो पहर रात दिन
दर्द की स्याही चेहरे पर
यूँही तो नहीं उभर आती है
झटक कर दूर करते है
तेरा साया तेरी यादें
तस्वीर मेरी अक्सर
मुझपे ही बिफर जाती है 

Thursday, June 16, 2011

मिथ्या देव

 
सहज है ना 
थूक देना किसी पर
आक्षेप लगाना
अकर्मण्य होने पर
कहना तू व्यर्थ है
जीवन बोझ है तेरा
क्षणभर में
धूसरित करना
किसी का अस्तित्व 
अपमानित करना
दिखाता है 
कुंठाओं का बोझ
ढो रहे है सब
आत्मग्लानि छुपा
पोषित कर अंतर्पशु को
करते है आदर्श जीवन
का दिखावा
श्रेष्ट सिद्ध कर स्वयं को
बन बैठते है
आज के देवता
मिथ्या देव

Thursday, June 3, 2010

बाद मुद्दत के पहलू में सनम आया है

हंसकर जबसे गले लगाया है

चाँद आँखों में उतर आया है
पड़े गालों में दो भंवर गहरे
डूबकर कौन उबर पाया है

कुछ हया अदा में शामिल है
और कुछ अदा से शर्माती भी है
झिड़क देती है शरारत से
कभी तेवर नए दिखाती भी है

उँगलियों से सुलझा देती है
कभी जुल्फों में मुझे उलझाया है
कोई बात नहीं बस ख़ामोशी रहे
बाद मुद्दत के पहलू में सनम आया है

Monday, May 31, 2010

बंद लिफाफे में गुलाब आता है

आज भी ....


ख़त लिखते है तो जवाब आता है

बंद लिफाफे में गुलाब आता है

देख कर उनको भारी हो जाती है पलकें

रुखसार पर रंग लाल छाता है

अब भी.....

खस गर्मियों में लगा कर निकलते है

सुबह- शाम दोनों वक़्त संवरते है

कलफ लगी सूती चुन्नी की ओट से

मूंगे से सुर्ख लब दमकते हैं

पर....

वो ना आया जिससे वादा था

यकीन जिसपर खुदा से ज्यादा था

आज ज़माने भर की मजबूरियां जताता है

कल जो चाँद लाने पर आमादा था

Thursday, May 6, 2010

चाँद को बख्श दो

सुन सुन के आशिकी के तराने


पक गया है

चाँद को बख्श दो

वो थक गया है

शक्ल जब अपने यार की

चाँद से मिलाते है

आसमान में चाँद मिया

देख देख झल्लाते है

अपनी सूरत पहचानने में

दम उनका चुक गया है

चाँद को बख्श दो

वो थक गया है

बे- बात की बात

सारी रात किया करते है

हाल-ए-दिल सुना कर

जबरदस्ती

चाँद का सुकून

पीया करते है

तन्हाई,बेवफाई ,आशनाई

के किस्सों से

उसका माथा दुःख गया है

चाँद को बख्श दो

वो थक गया है

कभी दोस्त कभी डाकिया

कभी हमराज़ बनाते है

उसकी कभी सुनते नहीं

बस अपनी ही सुनाते है

इस एकतरफा रिश्ते से

दम उसका घुट गया है

चाँद को बख्श दो ..........

Friday, April 2, 2010

अभी और जीना है

कुछ ख्वाब टूटे हुए

कुछ अपने छूटे हुए
टूटे को सहेजना है
छूटे को टेरना है


कुछ खुशबुए बिखरी हुई

कुछ लटें उलझी हुई
खुशबूं को समेटना है
लटों को सवारना है

कुछ जख्म रिसते हुए

कुछ अश्क छलके हुए
जख्मों को सीना है
अश्कों को पीना है


सब संवर जाएगा

मेरा रूप निखार जाएगा
साथ दे दो मेरा
मुझे अभी और जीना है

Monday, October 5, 2009

दोपहर

एक सुस्त दोपहर में लेते हुए जम्हाइयां

करते है कोशिश ढूढने को  अपनी परछाइयां 
मन वैसा रीता -रीता सा जैसी  सूनी है सड़के
झुलस न जाए तपिश से धुप में पड़े सपने
तेज धुप से चुन्ध्याती आँखें दुखने लगती है
जब नींद  आती है तो पलके झुकने लगती है
है कैसे लम्बे लम्बे दिन और कैसे जलते तपते दिन
कैसे बीते तन्हाई में बोलो साजन तेरे बिन
तुम बाँहों में जो ले लो तो थोडी सी ठंडक पड़ जाए
सो जाऊं मैं चैन से ये गर्म दोपहर कट जाए