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Tuesday, July 4, 2017

प्रेम करती हूँ तुमसे

 
यमुना  किनारे उस रात
मेरे हाँथ की लकीरों में 
एक स्वप्न दबाया था ना  
उस क्षण की मधुस्मृतियाँ 
तन को गुदगुदाती है 
उस मनभावन रुत में 
धडकनों का मृदंग

बज उठता  है 
मयूर पंख फैलाए

नृत्य करता है 
सलोना मेघ तकता है

यह मोहक  उत्सव 
इस स्वप्न के 

आवेश में डूबकर 
आँखे मुखर हो उठती हैं  
अधखुले मादक अधरों से 
मौन  प्रीत बरसती है 
जहां गूँज उठता है 

बस उसी पल 
प्रेम करती हूँ तुमसे 

...बस तुमसे 

#हिंदी_ब्लॉगिंग 

Wednesday, November 30, 2016

जो भी है खूबसूरत है

जो भी है खूबसूरत है

पीली पत्तियों ने हरी कोंपलों को स्थान दिया है ,इस तरह पुराने पड़े पेड़ नए लग रहे हैं ,सांस ले रहे है ,हवा कुछ और ठंडी हो चली है पर अभी मफलर बाँधने  नहीं हुई है ,तुम्हारा हाँथ थामने में अब मेरी हथेलियां पसीजती नहीं , याद है ना पहली बार जब तुमने हाँथ थामा था ,इक सनसनाहट सी पूरे शरीर में दौड़ गई थी ,गाल दहक उठे थे , आरक्त ये शब्द कितने उपन्यासों में पढ़ा था ,पर अर्थ उस पल समझ में आया था। 

तुम मेरा पहला प्यार नहीं थे, पर तुमसे मिलने के बाद ये जाना प्यार बस प्यार होता है ,पहला प्यार कच्चे आम सा पर दुबारा होने वाला प्यार मादक ,बेहद मादक ,पूर्वाग्रहों से परे ,बंधनो से भरा हुआ नहीं। 

तुमसे जब मिली तो मैं मुक्त नहीं थी , सही गलत ,भला बुरा , पाप पुण्य अपने भीतर कई पाले खींच रखे थे, जिनकी लक्ष्मण रेखा को पार करना मेरे बस का नहीं था ,हर वक़्त मैं एक कटघरे में खड़ी अपने से सवाल करती खुद को दोषी ठहराती और सज़ा देती 

मेरा चेहरा ,मेरी आँखों के नीचे पड़े गहरे गड्ढे ,पीलापन कुल मिलाकर किसी सज़ायाफ्ता की तस्वीर बना रहे थे. क्यों उन गठरियों को ढो रही थी ,शायद परवरिश ,समाज और उसके मापदंड ,जो एक मध्यमवर्गीय इंसान को साहसी नहीं होने देता, मैं कायर बन रही थी, अपने आप से भागती हुई 

उम्र के एक दौर में दौड़ते भागते किसी माइलस्टोन पर थम कर सोचने लगी ,मैं कौन हूँ ,मैं क्या कर रही हूँ और एक वर्जित सवाल मन में बिजली की तरह कौंध गया , "आखिर मुझे चाहिए क्या ". 

बस इसी समय तुम आये होठों पर हलकी सी मुस्कान लिए ,बड़ी से बड़ी समस्या को मुस्कुरा कर हल करने का ज़ज़्बा लिए ,सब वही था तुमने मेरा नजरिया बदला , और वो बदलते ही मैं बदल गई एक एक करके बंधन ढीले पड़ने लगे ,गठरिया हलकी होने लगी , झुकी कमर कुछ सीधी हुई। 

अभी मैं नहीं जानती मैं तुमसे आकर्षित हूँ या दोस्ती में हूँ या प्यार में पर जो भी है खूबसूरत है 


Wednesday, August 5, 2015

भय



भय का किल्ला फूटा  
मन के सहमें कोनें में 
कांटे क्यों  उग आये है 
रेशम जड़े  बिछोने में    
क्या मेरा है जो लूटेगा 
छोड़ दिया सो छूटेगा  
आँखों में सपने डूब गए 
हर दिन के रोने धोने में 
भारी साँसे भारी जीवन 
पीड़ा स्वप्न सजोने में  
कांटे क्यों  उग आये है 
रेशम जड़े  बिछोने में

Thursday, June 18, 2015

बेतरतीब मैं 18-जून २०१५


बेतरतीब मैं 18-जून २०१५ 
(१)

मेरे पिता जूतियां बनाते हैं मैं छोटे से बैकग्राउंड से आता हूँ ,पढ़ाई १२वीं के बाद छोड़नी पड़ी ,वो एक के बाद एक अपनी मज़बूरियां गिना रहा था ,मेज के इस पार मैनेजर की कुर्सी पर बैठी छोटे से शहर वाली लड़की के दिल में करुणा का सैलाब उठा जिसे एक चमकीले ऑफिस में बैठने वाली लड़की ने कुचल दिया , ऑफिस में दिल नहीं दिमाग चलता है। 

(२)

वक़्त बदलते देर नहीं लगती वैसे ही इंसान को बदलते ,कठिन समय में सामने वाले का व्यवहार भी कठिन हो जाता है ,जैसे -जैसे आप अपने बल पर  परेशानियों से पार पाकर ऊपर उठते हो ,वही चेहरे जो एक समय मुहं छिपाते थे ,मुस्कुराते हुए नज़र आते हैं, एक बन्दर की तकलीफ पर पूरा झुण्ड एक साथ आ सकता है पर इंसान ने अपने पूर्वज से ये नहीं सीखा  

(३)

सफल वर्तमान के साथ अतीत की गलियों में लौट -लौटकर जाना एक नशा सा होता है , कितनी बार सोचो नहीं जाना उतनी बार सम्मोहित से लौट लौट कर जाते हैं,उन पलों को जब आप गिरे थे,अपमानित हुए थे, आंसू पिए थे ,सब जश्न में थे और आप अकेले , आज आप जश्न में हैं तो किसी को अकेले में मत रहने देना 

(४)

हाँथ में महंगा फोन ,कंधे पर महंगा पर्स आँखों पर चश्मा ,उसने वो सब बटोर लिया था जो उसको रईस और खुश दिखा सकते थे,आँखों में काजल की लकीरे गहरी करते हुए अपनी उदासी को काला करना चाहती थी काश काजल  आँखों के भीतर भी लगा सकते। 

Friday, June 5, 2015

ये मैं तो नहीं हूँ


१। 
सामने से आती एक शक्ल बेहद पहचानी सी लगी ,वही है क्या ? अरे हाँ वही तो है 
आठ  साल पहले सादा से प्रिंटेड सूट में देखा चेहरा आज किसी महंगे ब्रांड के वन पीस ड्रेस में कुछ अज़नबी सा लगा ,आँखों में पहचान का भाव उभरा और पानी के बुलबुले सा फुट गया और रह गया नीरव स्थिर अज़नबीपन। 
या तो उसने पहचाना नहीं या … जाने दो 
वो पहचाना अज़नबी साया पास से गुज़र चुका था अपने साथ खुशबू की लकीर छोड़ते हुए, इसको परफ्यूम की जरूरत कब से पड़ने लगी, छत की मुंडेर पर चाहे अनचाहे करीब आते हुए कितनी बार एक मादक सुगंध को जिया था कुछ रजनीगंधा जैसी शायद।
उसके हाँथ आज भी थामने पर पसीजते होंगे क्या सोचते ही होंठों पर मुस्कान  तैर गई 
पिछले आठ सालों में ज़िन्दगी की दौड़ दौड़ते हुए कभी एहसास ही नहीं हुआ जिनके साथ जीने मरने की कसमें खाई  थी आज उनका ख्याल भी नहीं आता 

२। 
होटल के कमरें में सिगरेट फूंकते हुए निगाह दरवाजे की तरफ  लगी है ,भागती  ज़िन्दगी में जब कुछ जरूरते जागती हैं तो खाने से बिस्तर तक होम डिलीवरी के ऑप्शन मिल जाते हैं ऐसी ही ऑप्शन पिछले कुछ सालों कमरे में आते जाते रहे है। 
अब एक ज़रुरत के लिए ज़िन्दगी भर के बंधन तो नहीं पाल सकता ना 
दरवाजा खुलते ही एक खुशबू का झोंका अपनी गर्माहट से भर देता है ,अचानक ये खुशबू खींचकर गली के मोड़ पर खड़ा कर देती है दिल की धड़कने तेज हो रही है , मेकअप की परतों में लिपटा अजनबी चेहरा अपना सा क्यों  लग रहा है ,
क्या ये वो है ,काश वो ना हो , उसको अपने साथ चाहा था एक ज़माने में पर 
आज इस कमरे में इस बिस्तर पर तो नहीं, उसके करीब आते ही एक ठंडी सांस राहत की भरता हूँ , वो नहीं है।  

३। 

उस दिन के बाद होटल के कमरें में जा नहीं पाया हूँ ,एक डर  भीतर बैठ गया है , उस दिन अगर वो होती तो ,इस बार नहीं थी पर अगली बार हुई तब ,ऐसे कितने चेहरे कितने रिश्ते बनाता बिगाड़ता आया हूँ , कुछ तो बीता है भीतर ही भीतर जिसने आत्मा जैसा कुछ जगा दिया है। 
भला -बुरा ,पाप पुण्य कानो में बज रहे है.
हरिद्वार में गंगा किनारे बैठे हुए पानी के शोर में कुछ चीखे कुछ रुदन जैसे सुनाई दे रहे हैं , मेरा अहम उसकी मिन्नतें , मेरी लापरवाही उसकी हताशा ,या कितने मज़बूर मुस्कुराते चेहरे। 
पैर पानी में जाते ही दिमाग और दिल में द्वंद  शुरू हो जाता है , मैं आज जो हूँ ऐसा तो नहीं था ,कब मैं बदलता गया। 
बचपन की मासूमियत से कैशोर्य के अल्हडपन  से युवावस्था के जोश तक, तब तक तो सब ठीक था , सपने थे दिल था धड़कन थी दर्द भी था
दिलों का सौदागर कब बना ,पहली बार दिल और भरोसा तोड़ा तो बुरा लगा फिर कम बुरा लगा फिर बुरा लगना बंद हो गया 
ये आज अतीत का कौन सा दरवाजा खुल गया है जो दिल दिमाग को भारी किये जा रहा है 
घाट पर बैठे पण्डे से माथे पर चन्दन लगवाता हूँ शायद दिमाग को ठंडक मिले 
आइना देखता हूँ  पर ये मैं तो नहीं हूँ 

Wednesday, May 20, 2015

दुश्मन मसीहा

किस्सों में ज़िक्र उसका भी होगा
बिछाए कांटे जिसने मेरी राहों में
वो ना होता तो ये सफर न होता
झूमते रहते बहारों की पनाहों में

दर्द लहू  उसका भी शामिल था
एक आह थी मेरी हज़ार आहों में
ना जाने बना कैसे हमसफ़र वो
कोई नेकी थी ढेरभर गुनाहों में


Wednesday, May 13, 2015

फिर आसमा से टूटकर बरसा नशा

बेतरतीब मैं (१३ मई २०१५ )

फिर आसमा से टूटकर बरसा नशा
फिर हमपर मयकशी का इलज़ाम लगा 

बारिशें किसी भी मौसम में आपको डिस्ट्रैक्ट कर सकती हैं ,कुछ जादू सा चलता है और आप मज़बूर हो जाते हो। 

कागज़ की नाव चलाने वाली बारिशें , किसी  नज़र की छुअन से सिहर जाने वाली बारिशें,किसी के जल्दी घर  वापसी की दुआ मनाने वाली बारिशें
और भी कई मूड में बरस रही है ये बारिशें 

आफिस के कांच के भीतर से बाहर सब धुंधला दिख रहा है अच्छा है ना.बाहर सड़क है ,ट्रैफिक है भीड़ है ,ये तो मेरी बारिशों का हिस्सा नहीं हो सकते 
मेरी बारिशों में पहाड़ है उन पर झुके बादल है , मेरे हाँथ में छतरी के वाबजूद भीगती मैं 
पहाड़  ना सही समंदर का किनारा ही हो जहां खारी लहरों के साथ मीठी बूँदें मुझे भिगो दे ,खैर आंसू भी तो खारे ही होंगे 

मेरी मोहब्बत की कहानियों में बारिशें नहीं हैं बल्कि बारिश ही मेरी मोहब्बत है। 

कई गहरी नीली शामें जब आसमान स्लेटी बादलों से खेल रहा था ,हवा में सीली सी गंध हाँथ में एक कप कॉफ़ी लिए आसमान को निहारते हुए मैंने गुडगाँव में चेरापूँजी को जिया है,

 कल्पनाओ के पंख पर सवार मुक्त हो लेती हूँ मैं.
 भर जाती हूँ भीतर तक तो खुलकर रो लेती हूँ मैं