स्वतंत्र अणु
मुक्त जग में
रहा विचरता
नभ से थल तक
अपरिमित शक्ति
भरी थी
ओज भरा था
अंत:स्थल तक
नियत समय में
स्रष्टि ने फिर
उसके जीवन को
अर्थ दिया
मानव रचना हेतु उसको
भावी माँ का
गर्भ दिया
उत्साहित था
पा शरीर को
देखूंगा अब
दुनिया सारी
था प्रतीक्षारत व्याकुल
कब गूंजूंगा
बन किलकारी
अनायास जो
हुआ आक्रमण
समझ पाया
बदला रक्त
औ मांस पिंड में
कैसी ये
स्रष्टि की माया
प्रश्नों का बोझ
था मन में
पुन: देह से
अणु हुआ
मादा होने के कारण वह
नवजीवन ना
देख सका
#हिंदी_ब्लॉगिंग
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