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Wednesday, May 13, 2015

फिर आसमा से टूटकर बरसा नशा

बेतरतीब मैं (१३ मई २०१५ )

फिर आसमा से टूटकर बरसा नशा
फिर हमपर मयकशी का इलज़ाम लगा 

बारिशें किसी भी मौसम में आपको डिस्ट्रैक्ट कर सकती हैं ,कुछ जादू सा चलता है और आप मज़बूर हो जाते हो। 

कागज़ की नाव चलाने वाली बारिशें , किसी  नज़र की छुअन से सिहर जाने वाली बारिशें,किसी के जल्दी घर  वापसी की दुआ मनाने वाली बारिशें
और भी कई मूड में बरस रही है ये बारिशें 

आफिस के कांच के भीतर से बाहर सब धुंधला दिख रहा है अच्छा है ना.बाहर सड़क है ,ट्रैफिक है भीड़ है ,ये तो मेरी बारिशों का हिस्सा नहीं हो सकते 
मेरी बारिशों में पहाड़ है उन पर झुके बादल है , मेरे हाँथ में छतरी के वाबजूद भीगती मैं 
पहाड़  ना सही समंदर का किनारा ही हो जहां खारी लहरों के साथ मीठी बूँदें मुझे भिगो दे ,खैर आंसू भी तो खारे ही होंगे 

मेरी मोहब्बत की कहानियों में बारिशें नहीं हैं बल्कि बारिश ही मेरी मोहब्बत है। 

कई गहरी नीली शामें जब आसमान स्लेटी बादलों से खेल रहा था ,हवा में सीली सी गंध हाँथ में एक कप कॉफ़ी लिए आसमान को निहारते हुए मैंने गुडगाँव में चेरापूँजी को जिया है,

 कल्पनाओ के पंख पर सवार मुक्त हो लेती हूँ मैं.
 भर जाती हूँ भीतर तक तो खुलकर रो लेती हूँ मैं 

Thursday, December 5, 2013

बहुत काम है मुझको



बहुत काम है मुझको
लाल सूरज उगाना है
नया सा राग गाना है  
सितारे बाँध रख छोड़े
ओस बिंदु उठाना है
संवरने की कहाँ फुर्सत
अभी दिन भी सजाना है
जुगनू को सुलाना है
कलियों को जगाना है
भोर से रूठ छिप बैठी
उसे अब खींच लाना है
तुम्हारे जागने से पहले
दुनिया को सजाना है

Monday, September 2, 2013

मंज़र तेरी कब्र पर


दो दिन जुटेंगे मज़ार पर
तेरे चाहने वाले
दिन चार चक्कर लगायेंगे
दुआ मांगने वाले
सूखे फूल और सूखे अश्क
फकत बाकी रहेंगे
कुछ कबूतर के सुफेद जोड़े
तेरे साथी रहेंगे
होकर पत्थरो की कैद में
तू आज़ाद रहेगा
मंज़र यही तेरी कब्र पर
तेरे बाद रहेगा
जीतेजी जो एक दिल भी
रोशन किया तूने
वो नूर इस जहाँ में
तेरे बाद रहेगा

Tuesday, May 21, 2013

बवाल है बवाल है !

बवाल है बवाल है
बड़ा अजब हाल है
लापता से तंत्र में
ये कौम बेहाल है

पटरी से उतर गई
मालामाल कर गई
मामा की रेल है 
भांजा निहाल है

राष्ट्र के गले पड़े
राष्ट्रीय दामाद है
मौन है सारे देवता 
खुजली है खाज है 


नेता भी भीतर है
अभिनेता भी जेल में
भारतीय कारागार अब
राष्ट्रीय ससुराल है

बैट बॉल छोड़कर
गड्डियों का खेल है
खेल खिलाडियों का
अब ठिकाना जेल है

सबके बंद कान है
जनता हैरान है
समझ लो भैया ये
भारत निर्माण है

Monday, April 1, 2013

अगली बहार तक ...

बड़ी बड़ी इमारतों से गुज़रते हुए ...गमलों में मुहं उठाये नन्हे पौधे अक्सर रास्ता रोक लेते है ..मनो कह रहे हो पनपने के लिए पूरी ज़मीन नहीं थोड़ी मिटटी की दरकार है ...हां अगर और बढ़ना  है तो अपनी ज़मीन खुद  पानी होगी ....
 
हाइवे पर तेज रफ़्तार गाडी दौडाते हुए ....डिवाइडर पर डटे गुलाबी फूलों से लदे मंझोले कद के शूरवीर जो गर्म काले धुंए के थपेड़े खाकर भी लहलहाते हुए से लगते है,हर लम्हा बिना रुके रात दिन अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ते हुए,अपने इस युद्ध के बीच एक नज़र मुझपर भी डालते है   "हमसे भी कमज़ोर हो क्या ".. ....
 
पार्किंग के कोने में .... सबकी नज़र बचाकर कोई ऊपर आ रहा है पहले बाहें निकली है हरी नर्म मुलायम ..जैसे बच्चे बिना नाम ,मज़हब के पैदा होते है वैसे ही वो दो पत्तियां भी अनचीन्ही है ..
 
ज़मीन पर बिखरे पीले निराश पत्ते ..जानते थे मौसम के साथ उनका भी यही हश्र होना है पेड़ों ने भी उनकी विदाई का शोक मनाया कुछ दिन पर ज़िन्दगी रुकी नहीं ..फूट  पड़ी मोटे डंठलों में ,कठोरता को भेद कर मखमल से चमकीले पत्ते ...
 
पीपल सुलग रहा है ....खिड़की के ठीक सामने पीपल के जुड़वां पेड़ अचानक अपना रूप बदल के अचंभित कर रहे है ...वे हरे ...भूरे ना वे सुनहले हो उठे है अनूठे सच में बेहद अनूठे, सुबह उनको निहारना क्योंकि गर्म सुबहों में वे काई के रंग को लपेट लेंगे और ये स्वर्णिम आभा लुप्त हो जायेगी ...

फूल और प्रेम .... फूल और प्रेम कब एक दुसरे का पर्याय हुए ये तो नहीं जानती पर ये जानती हूँ कुछ तो कोमल सा प्रस्फुटित हो उठता है इन रंगबिरंगे दूतों को देखकर,पिछली रातों में जब हवा बादलों से बिगड़ रही थी ...बादल के दिल से आंसू नहीं पत्थर बरस रहे थे ,मेरे आँगन के उदार पेड़ ने ...एक पीली चादर बिछा दी इंतज़ार की

और मैं ... इतनी जीवंत चीज़ों में मैं भला निर्जीव कैसे रहूँ ...लड़ते ,जूझते अपनी ज़मीन तलाशते ,अपने रास्ते बनाते सोने सी चमकते ,जी ही लूंगी अगली बहार तक ...


Thursday, March 28, 2013

बेवजह

जिरह-ए-जुल्फ में उलझा हुआ हूँ
बेवजह शानो पर बिखरा हुआ हूँ
पास होकर भी दूरियां मीलों की
हूँ अश्क़, आँख से फिसला हुआ हूँ

अधूरी ग़ज़ल का मिसरा हुआ हूँ
कहीं ख़याल में अटका हुआ हूँ
किस लम्हा मुकम्मल हो जाऊं
हूँ ग़ज़ल, बहर से भटका हुआ हूँ

यूँ अपने आप से बिगड़ा हुआ हूँ
छोड़ दुनिया आज तनहा खड़ा हूँ
सामने आँखों के अँधियारा घना है  
हूँ सितारा,राह से भटका हुआ हूँ

कल तुझमें डूबकर तुझसा हुआ हूँ
सांस की उस छुअन से तप रहा हूँ
मुझको रोक ले ख़ाक होने से पहले
हूँ शरारा, ईमान से बुझता हुआ हूँ

Tuesday, March 26, 2013

होली है


काका बौराते फिरे
काले करके बाल
कोई नवयौवना
रंग दे अबके साल

बत्तीसी सेट किये
काकी रही मुसकाय
फागुन सजी फुहार
देवर नाही आय

ससुराल साली बसे
वे जीजा मालामाल
पास पडोसी ताक रहे
दिल में बड़ा मलाल

फ़गुआये भये  बावरे 
खूब चढ़ाई भांग 
चुनर ओढ़ बाबा रचे 
नार नवल का स्वांग 

जो रोये सो रो रहे 
जो गाये सो गाये 
नौटंकी घर घर सजी 
कौन किसे समझाए 

कोई छेड़े राग भैरवी 
कोई छेड़े राग मल्हार 
होली है में डूब गया 
सारा सुर संसार 


Wednesday, March 20, 2013

तू,तेरा अक्स


शोर था साँसों का
दिल में सन्नाटा
तेरे जाने के बाद
तू उग रही है यहाँ
जम रही है काई सी
आईने पे लगी बिंदी में
टेबल पर चूड़ियों में
पड़े सूखे गजरे में

छोड़ गई हो जानकर
चादर के आगोश में
बालों के नर्म  गुच्छे
कुछ टूटे लाल नाखून 
दुपट्टे से बिछड़े मोती
पायल से खफा घुँघरू
कप पर गुलाबी निशान
कमरे में इत्र -ए -ख़स

जागा हूँ उस दिन से
पलक भी झपकी नहीं
के तुम लौट ना जाओ
खडका कर कुण्डी कहीं
आहट सुनना चाहता हूँ
तुम्हे छूना चाहता हूँ
कहते है राख से भी
जन्म जाते है लोग
गर पुकारो दिल से




Tuesday, March 12, 2013

होरी नाही खेलूंगी


होरी नाही खेलूंगी
श्याम सांवरे सांवरिया
बिगत बरस फागुन में
 तैने कारो रंग लगायो
चन्द्रबदन ते श्यामा कीन्ही
तोरे मन को भायो 
अलकन में उलझायो तैने
पलकन में अट्कायो 
बारह मास मैं रही बावरी
दूजो फागुन आयो
तोरी सूरत नाही देखूंगी
श्याम सांवरे सांवरिया

ललिता रंगी गुलाबी  तैने
रंगी विशाखा लाल
होरी बीते बरस बिताया
अब तक गाल गुलाल
मोसे तूने बैर निभाया
छोड़ अबीर गुलाल
श्यामल रंग लगाया मोहे
हाल किया बेहाल
गोवर्धन की सौं तू सुनले
घूंघट नाही खोलूंगी
श्याम सांवरे सांवरिया
होरी नाही खेलूंगी

Thursday, March 7, 2013

राधे सांवरी होय


(1)
श्याम सजे
ज्यो गोपिका
धरा अनूठा रूप
सांवल तन
घूँघर मुखपर
लीला रची अनूप

(2)
टेसू भिगोया
केसर भिगोई
और पिसाई भांग
मोरपंख धर
राधा सजी ज्यों
मोहन घनश्याम

(3)
नित्य नवल
रास रचाए
राधे तेरो श्याम
फाग चढ़े
बौरा गया
सबरा गोकुलधाम

(4)
श्याम छवि निरख
राधे सांवरी होय
सांवरे के  तन पे 
रंग चढ़े ना कोय

Monday, February 25, 2013

किसी ने कहा होगा


कोई तो गिला होगा किसी ने कहा होगा
मसला भरे बाज़ार ऐसे नहीं उछला होगा
लहू के ताज़ा निशां आँख के मुहाने पर 
दर्द कोई सरहद तोड़ कर निकला होगा 
दरख्त के मानिंद छाया दिया करता था 
खुन्नस में तुमने ही रास्ता बदला होगा 
सूखे मोम की लकीरें देहरी पर निढाल 
कल इंतज़ार तन्हा  यहाँ पिघला होगा 
दिखाकर चमकीले सितारे बुझाए चराग 
तेरा मसीहा  भी नीयत से उथला होगा

Wednesday, February 20, 2013

ऑलमोस्ट अ डेट (बरसती फरवरी )


गुडगाँव के एक पाश सी सड़क से मेट्रो से दिल्ली के एक ठिकाने तक, कैफ़े कॉफ़ी डे पर मुंह बिचकाकर "शादी वाली कॉफ़ी " पा जाने तक,एक चमक एक उतावलापन  था, सब बटोर लेने की ख्वाहिश उस रोज़ जब मुझसे ज्यादा आसमान बरसा था पर भीगे तुम ही थे दोनों हालात में,

और मैंने पाया था सबसे ख़ास एहसास ...तुम्हारे साथ होने का, तुम्हारे वक़्त में से एक कतरन काट कर अपने पास छिपा लेने का ,इससे पहले तुम फिर इस घडी के गुलाम हो जाओ और तनहा छोड़ दो मुझे ,मैंने अपने हिस्से के तुमको अपने पास सहेजना चाहती थी .

मेरी आँखे जो देख रही थी उस पर दिमाग यकीन नहीं कर पा रहा था एक पूरा दिन पूरी शाम तुम मेरे साथ थे ... अरसा हो गया था इतना समय एक साथ रहे ,मैंने हिचकिचाते हुए कहा " दिल्ली हाट चलें ?"
"बारिश में दिल्ली हाट ,भीग जाओगी " तुमने हैरानी से कहा
"इतनी भी कहाँ है , फिर छतरी तो है " मैंने हिम्मत की
पता नहीं क्यों तुमने मना नहीं किया ,और अच्छा किया बरसों बाद हमने बरसों पहले का समय जी लिया ,बे-फिक्र कोई टारगेट नहीं कोई डेड लाइन नहीं बस हम दोनों, पहले जहां मेरी बातें नहीं ख़त्म होती थी आज मैं खामोश थी समझ नहीं पा रही थी क्या कहूं ...पर कहना बहुत कुछ था इससे पहले कोई मुझे इस सच्चे सपने से जगाकर कहे "उठो बेल्ट कसो और कोल्हू में जुत जाओ ".

अपनी पसंद का खाना हमेशा कई यादों को जगा देता है , महाराष्ट्र पवेलियन में बैठे हम दो बहुराष्ट्रीय कंपनी के ज़िम्मेदार कर्मचारी , बड़ा पाव , उसल पाव, अंडा पाव और पाव भाजी पर बात कर रहे थे , पेट भरने का कितना आसान और सस्ता इंतज़ाम हर चीज़ के साथ पाव , करोड़ों के बजट बनाने वाले तुम जब दुकानदार से साबूदाना वडा  समझ रहे थे तो सच कहूं बेहद मासूम लग रहे थे .

मेरा बस चलता तुम्हारी उस उत्सुकता को कहीं सात तहों में छिपा लेती और जब तुम बोर्ड रूम ,बहीखाता और बलेंस शीट में परेशान होते तो तुमको चुपके से मुट्ठीभर वो मासूमियत सौंप देती, 18-18 घंटों तक चलने वाले ऑफिस 24 घंटे बीप देने वाले ब्लैक-बेरी  मुझे उस सजा से लगते जो शायद किसी जन्म के पाप का फल है, हर वक़्त एक जासूस की तरह निगाह रखे ,
तुम से कई बार कह कर देखा पर तुम्हारा जवाब भी जायज़ है "दुनिया सिर्फ तितली ,फूलों और जुगनुओं के नाम नहीं है, उन्हें देखने के लिए पेट भरा होना चाहिए और इतने बड़े और महंगे शहर में पाँव टिके होने ज़रूरी है

सच्ची बात पर मैं और क्या कहूं , हम बंजारे ही तो है बस एक शहर से दुसरे शहर एक गाँव से दुसरे गाँव , हमारा कोई आँगन नहीं कोई नीम नहीं कोई पड़ोस नहीं ,हर बार हमारे जीवन की तख्ती काली स्याही से पोत कर तैयार कर दी जाती फिर से वही अ से ज्ञ तक, इस उठापटक को ....

मेट्रो स्टेशन से उतारते हुए मैं तुम्हे उस शहर के बारे में वो छोटी छोटी बातें समझा रही थी जो मैंने कितनी अकेली शामों में खुद महसूस की है और याद रखी है तुम्हे बताने के लिए , "ये लड़की रोज़ शाम यहीं किसी का इंतज़ार करती है ", " पता है सारे   हाई फाई इस ठेले पर खड़े कचोरी में एक्स्ट्रा चटनी डलवाते है ", और तुम मेरी बातों पर उस शाम ऐसे जता रहे थे जैसे मैं कितनी महतवपूर्ण बात कर रही हूँ .

कुछ दिन पहले मैं शायद इस रिश्ते पर आंसू बहा रही थी आज मेरी आँखों में ख़ुशी के आंसू थे,
प्यार में कभी कभी आंसू ज़रूरी होते है जो रिश्तों पर पड़ने वाली धुल को धोकर साफ़ कर देते हैं , फिर तो मेरे दिल की ख़ुशी का साथ आसमान ने भी दिया वो भी जी भर कर बरसा , कड़कती बिजलियों ने इतने घने अँधेरे में भी रौशनी की किरण दिखा ही दी

Friday, February 15, 2013

"बहाने बसंत के" (अंतिम भाग)





बावरे बसंत के खुमार से पार पाना इतना सहज कहाँ है, आसमानी पेंचों के साथ छतों पर लड़ने वाले पेंचों का ज़िक्र ना हो तो बात अधूरी सी रहती है, मोहल्ले में जुड़ने वाले दिल के रिश्ते अधिकतर एक तरफ़ा होते ,  छोटे शहर के पारखी सयाने हवा में मानो प्यार की महक कुछ पकने से पहले सूंघ लेते, चाहतो का इज़हार अक्सर नहीं होता ..एक दुसरे को दूर से ताककर  या सडक के किनारे खड़े होकर अपने वहां होने का एहसास दिलाना था , जानते थे खुलकर सामने आने में ..घर में "पादुका पूजन " ( चप्पलों से पिटाई ) के संयोग ज्यादा बनते ...

ऐसे डरे सहमे मौहोल में बसंत का इंतज़ार जायज था, महबूब के घर के पास वाली छतों पर बसंत पर चढ़ने के रास्ते तलाशे जाते नयी दोस्तियाँ होती ... कुछ मिन्नतें मनाई जाती ..घर वालों को समझाना होता आखिर एक पूरा दिन दीदार का कोई कैसे छोड़ दे ...कितनी खामोश मोहब्बते एक दीदार और मुस्कान के टॉनिक के साथ उस दिन तक चल जाती जिस दिन डोली उठती।

खुलकर सामने आने से बंदिशों और रुसवाई का दौर शुरू होने का डर, सुबह से गुलज़ार छतें  वसंतोत्सव के मद में झूमने लगती, दोपहर में  सुस्ताती और शाम आते आते एक बार  मेले की सी रौनक छा जाती , पीली साड़ियों में सजी कुलवधुएं ,पीला दुपट्टा लहराती नवयौवनाएं , और पीले टॉप या स्वेटर से काम चलाते हम जैसे कुछ अल्हड, एक दुसरे से हाल चाल पूछते , उत्साह बढाते, लड़के जहां छतों पर चढ़े रहते , हम लडकिया टोलियों में एक से दूसरी छतों पर डोलते, गप्पों बातों का अंतहीन सिलसिला, मीठी मीठी चुहलबाजियां, इनके बीच कच्ची शायरी में रंगी कोई पतंग छत पर आ जाए तो पूछो मत .

ठाकुर जी के भोग के लिए ख़ास मीठे चावल बनते जिनकी खुशबू और स्वाद आज भी सारे स्वाद तंतु जाग्रत कर देता है,दादी बसंत पर गंगा स्नान की महिमा हर साल बताती पर जानती थी इस दिन छत छोड़कर कोई कहीं नहीं जाने वाला, शुभ दिन होने के चलते सबसे ज्यादा शादियों के मुहूर्त इसी दिन निकलते ,शहर की शादियाँ तो फिर भी ठीक थी बाहर की शादियों में जाने के लिए तलवारें खिंच जाती "अरे उनको बसंत पर ही शादी रखनी थी क्या ".

साल बीते बसंत में कुछ नयी बातें जुडी "सरस्वती पूजा " , हमारे इंग्लिश के अध्यापक हर साल सरस्वती पूजा मनाते और माँ शारदा की नई मूर्ति स्थापित करते ,पुरानी प्रतिमा किसी छात्र को इस शर्त पर दी जाती वो पूरे साल मन लगाकर पढ़ाई करेगा, वही सच्ची सरस्वती पूजा होगी, एक साल माँ शारदा मेरे घर भी आई आज तक उनका आशीर्वाद फल रहा है . आजकल दीवाली से ज्यादा आतिशबाजी बसंत की रात हो होती है , टाट  में आग लगाकर मशालें जलाई जाती है , तीन दिन का त्यौहार आज एक दिन में सिमट गया है ....

ये दस्तावेज है ताकि सनद रहे के एक दिन आकाश ,छतों ,डोर और पतंगों के नाम था .....
आज घर से दूर, छत से दूर कीबोर्ड खटखटाते हुए, बसंत की स्वर्णिम आभा जी रही हूँ ... आप सभी को बसंत की शुभकामनाये ..

Tuesday, February 12, 2013

"बहाने बसंत के" (2)


"बहाने बसंत के"(1)
बसंत की सुबह अक्सर पापा के फरमान से होती ...बिना नहाय कोई छत पर नहीं चढ़ेगा ..जानते थे एक बार जो चढ़ गया वो किसी हालत में नीचे नहीं उतरेगा,वो बालपन का जोश वो उत्साह , बीच-बीच में दादी फ़्लैश बेक में चली जाती "घर में इन बच्चों के कुर्ते पीले रंग में रंग देते थे क्या मजाल कोई बच्चा बिना नहाय छत पर चढ़ जाए ... "
अपनी अलमारियों में पीले कपड़ों की ढूंढ शुरू हो जाती आखिर ऋतुराज का स्वागत उनके मन-भावन रंग में ही तो करना चाहिए,बचपन से कैशोर्य के बीच छतों पर बहार का त्यौहार लगने लगा था हर छत आबाद ,आँखे आकाश की ओर,

 फुर्सत भरा फिर भी बेहद व्यस्त दिन ,थकाने वाला पर फुर्तीला दिन जो चेहरे साल भर नहीं दीखते थे वो भी उस दिन नज़र आ जाते , कदम बरबस छत की और चल पड़ते कुछ ख़ास कम्पटीशन होते , सबसे पहली पतंग किसने उड़ाई , सबसे बड़ी पतंग , सबसे ज्यादा पतंगे किसने काटी ,किसके म्यूजिक सिस्टम पर सबसे नए गाने बजे, किसकी उंगलियाँ सबसे ज्यादा ज़ख़्मी हुई    .

 आखिर बसंत के बाद मोहल्ले के मोड़ों पर डिस्कस करने का मसाला भी तो चाहिए .

खैर ,वैसे तो सार साल पतंगे आसमान के पहलु में गोते खाती पर तीन दिन इस  त्यौहार को ख़ास बना देते पहला छोटा बसंत ,बसंत और बूढा बसंत

कितने तरह की पतंगे सजी धजी , नई पतंगों पर जब कन्ने बांधे जाते और नजाकत से उनके मुढ्हे मोड़े जाते ताकि हवा का सामना करने को तैयार हो जाए .

बसंत की सुबह की सबसे बड़ी चिंता हवा का रुख होती आखिर सही हवा के बिना पूरे दिन पतंग कैसे उड़ाई जायेगी ,कहीं तूफानी हवा चल गई तो त्यौहार का सत्यानाश।  मिन्नतो का दौर चल पड़ता.
बच्चे अल सुबह से छत पर होते बड़े 10-11 बजे तक औरते सारा काम निपटा कर दोपहर में नाश्ता ,फल ,भुने आलू ,मूंगफली ,तहरी (पुलाव) से लेकर चाय के कई दौर सब छत पर,

हसी ठहाके तो गूंजते पर, कई समझौते भी पडोसी छतों से किये जाते ...मसलन "तुम मेरी पतंग नहीं काटोगे , लंगर नहीं डालोगे , पंतग कट गई तो डोर नहीं लूटोगे , ये बात अलग है दिन ढलते ढलते सारे समझोते टूट जाते , आखिर आकाश युद्ध में ऐसे समझोते कहाँ चलते है। बड़े बुजुर्गों का छतों पर रहना सुरक्षा और सद्भाव बनाय रखता , थोड़ी तू-तू मैं - मैं  से मामला सुलझ जाता ... सारी रंजिशें पतंगों के साथ कट जाती (हर बार ऐसा नहीं होता एक जनाब हमारी छत पर कट्टा (देसी तमंचा ) लेकर चढ़ आये थे :-) )

सारा दिन तेज़ गीतों के ..कटी  पतंगों  के नाम रहता शाम को आकाश भर आतिशबाजी,एक दुसरे की छत पर जाना लजीज नाश्तों की प्लेटों की अदला बदली , और कुछ रंगारंग कार्यक्रम और बसंत बीत जाता, बड़ी पतंगे वापस अपने चौकोर बक्सों में आराम करती ,चरखी सारे दिन  चक्कर खाने के बाद सुस्ताती, छत अगली सुबह के सन्नाटे को सोच उदास हो जाती, थके हारे नौनिहाल नींद में वो- काटा चिल्लाते या अपनी पतंग काटने के दुःख में नींद में सुबकते हुए भी पाए जाते , पैरों का दर्द रात को महसूस होता ,तेज मांझे से कटी उंगलिया टीस मारती पर बसंत से मोहब्बत वैसी ही रहती 

(किस्सा लंबा होता जा रहा है मेरी बसंत के लिए दीवानगी ही ऐसी है अगर आप सब सुनना चाहेंगे तो बयान करेंगे छज्जे -छज्जे का प्यार वरना इतना ही काफी है )

Monday, February 11, 2013

बहाने बसंत के



अक्सर सोचती हूँ के बसंत मुझे बावरा क्यों करता है ,गीतों कविताओ और प्रेम से पहले भी बसंत मन लुभाता था ...पतंगों से घिरा आकाश, तीन दिन पहले से पतंगों में हिस्सेदारी छोटी छोटी चरखियां , नशे में झूमती इस छत से उस छत गिरती कागज़ की परियां और उनको पाने को लालायित चेहरे ,  और जिस हाँथ में वो परी उतरी उसके चेहरे का विजयी भाव देखने लायक ...

बसंत की तैयारी बसंत से एक रात पहले हिस्सा लगता, चोकोर बक्से निकले जाते जो खास तौर पर पतंग रखने के लिए दादाजी और उनके पूर्वजों ने बनवाये थे उसमें विशालकाय " अद्धा ,पौना " पतंगे सारे साल सुकून से सोती उन बड़ी पतंगों को हम हैरत से ताका करते यही हाल चर्खियों के बड़े भाई चरखों को देखकर होता , शीशम और संगमरमर के काम की नक्काशी वाली खूबसूरत ख़ास चरखियां जिन्हें हाँथ में थामने की हमारी ललक ,ललक ही रह जाती , हम हांथों में रंगबिरंगी छोटी छोटी चरखियां थामकर उल्लास में डूब जाते .... फिर आता सबसे कठिन समय जब पतंग-सद्दी -रील का बंटवारा होता,ये सार हिसाब किताब मेरे बड़े ताउजी के हांथों में था, और उनके फैसले पर कोई ऊँगली उठा ही नहीं सकता था। सबकी धड़कने तेज ,बिना किसी भेदभाव के सारे छोटे बच्चे बराबर पतंगे पाते बड़ों का कोटा ज्यादा था , हमारे भाई बिगड़ जाते ..

"ये उडाती तो है नहीं फिर इसको इत्ती सारी पतंगे क्यों ?"
उन्हें ताउजी  आँख के इशारे से कंट्रोल कर देते ,आखिर उनकी लाडली भतीजियों से कोई कुछ कैसे कह सकता है , पतंगों के बटवारे के बाद हत्थे पर चरखी रखकर तागा चढाने का काम शुरू होता, और भाई की कोशिश शुरू हो जाती , "अरे अपनी गिट्टी मुझे अपनी चरखी में चढ़वाने दे ,मैं तुझे पतंग ऊँची करके दे दूंगा ", और हम बहल भी जाते . रात को ही फटी-टूटी पतंगों के इलाज का भी इंतज़ाम कर दिया जाता उबले आलू ,चावल , लेइ .

                        
बसंत पंचमी के दिन सुबह कुछ ज्यादा जल्दी हो जाती आस-पास के घरो में बजने वाला तेज संगीत और वो-काटा का उदघोष ,आप चाहकर भी नहीं सो सकते ....
(अगले भाग में ... पीले कपडे ,पीले चावल और छज्जे-छज्जे का प्यार :-) )

Thursday, January 24, 2013

क्या रखा ?

यूँही खुद को मैंने सदा तनहा रखा
खुशियों से महरूम औ रुसवा रखा
महफिलों से कतरा कर गुज़रे हम
दर्द से दिल इस कदर बोझिल रखा
सो ना जाए किसी शब् सुकून से
पलक में एक अश्क उलझा रखा
रौशनी ना मांगने लगे आँगन मेरा
चराग भी रखा तो बुझता रखा
ना कोई हमसफर हो जाए मेरा
अपनी हस्ती को मैंने मुर्दा रखा
जुर्म क्या था तेरा ये बता "सोनल "

सांस लेना इस कदर मुश्किल रखा 
कैसे मिलेगा बहीखाता  ज़िन्दगी का
पास बस दिल का एक टुकड़ा रखा 

Tuesday, January 22, 2013

पधार रहे है .........


खबरदार होशियार
सियारों के सरदार
ऐय्यारों के ऐय्यार
करने  बंटाधार
पधार रहे है .......
 

बहरूपिये हज़ार
रंगे  सियार
लूटने को बेकरार
फिर एक बार
पधार रहे है .......
 

छुपे हथियार
खूं के तलबगार
तमाशेबाज़ ज़ोरदार
वोट मांगने द्वार-द्वार
पधार रहे है .........

Tuesday, January 15, 2013

वो तनहा !


छोड़कर घर फुटपाथ पर वो पड़ा था
वक़्त ने कितना कड़ा चांटा जड़ा था
गाँव को लगता था साहब बन गया वो
आखिरी दम सांस में काँटा गड़ा था 
सपने तोड़े सबके और उम्मीदें जलाई
राख पर अपनी आज वो तनहा खड़ा था
की बगावत समझा खुद को सिकंदर
पेट का सच आज सपनो से बड़ा था
किस तरह कहता मुझे वापस बुला लो 
सारे घर से रात भर कितना लड़ा था

Thursday, January 10, 2013

ये गठरियाँ



बिस्तर से उठने का उसका मन नहीं था पर उसने अपने  आप को समेटा और उठ खड़ी हुई ...सिलवटें देखकर चेहरे पर मुस्कान दौड़ गई एक ब्लैक कॉफ़ी के लिए कदम रसोई की तरफ बढ़ गए ... पिछले तीन सालों से वो अपने मन की ज़िन्दगी जी रही थी जहां दिन उसकी मर्ज़ी के थे और रातें भी उसकी मर्ज़ी की ...उसकी मर्ज़ी ...
अपनी उम्र के लगभग 3 दशक उसने अपनी मर्ज़ी समझने में लगा दिए ... जो वो अपनी मर्ज़ी समझती थी वो वास्तव में उसकी नहीं दुनिया की मर्ज़ी थी और वो एक कठपुतली। अस्पताल में लोगों की ज़िन्दगी मौत का फैसला लेने वाली ...अपने फैसले लेने में इतनी दयनीय स्थिति में पहुँच जाती के उसको खुद यकीन नहीं आता के वो एक डॉक्टर है ...उसकी योग्यता एक तरफ और नारी होना दूसरी तरफ ...

कर्त्तव्य ,मर्यादा ,सही ,गलत ,विवेक ,संस्कार ,धर्म ,त्याग,शील  की गठरियाँ जो एक -एक करके उसको सौपी गई थी दादी -नानी ,मासी -चाची जैसे अपनों के द्वारा और आज वो धरोहर बोझ की तरह हो गई थी, जब वो अपने बारे में सोचना चाहती तो ये गठरियाँ  उस पर हमला कर देती और वो एक अपराध भाव से भर उठती ...ये ग्लानि  धीरे धीरे उसे निगल लेती और फिर वो इंसान से नारी में तब्दील हो जाती ...

पिता के जाने के बाद  घर की जिम्मेदारियों के बीच वो अपने को भुला चुकी थी ...समय बीत रहा था।कैलेण्डर में सालों के बदलने के साथ वो भी अपने में परिवर्तन महसूस कर रही थी। अच्छी नौकरी थी भाई बहन भी सेटल होने की राह पर थे ..पर अभी भी सब अधपका था ...शामें तो ठीक थी पर रातें उसे बेचैन कर देती ...ये बेचैनी उस नीली आँखों वाले डॉक्टर के अस्पताल में आने के बाद कुछ ज्यादा बढ़ गई थी ..उसकी आँखों में उतरता आकर्षण ..उसके दिल की धड़कने तेज कर देता। कोई इतना सहज और सरल कैसे हो सकता है ...बिना बनावट अपनी बात कह देता ...कई बार वो अपनी पसंद भी जाहिर कर चुका था , और वो भी तो उसे पसंद करने लगी थी .. उसका दिल किसी तरुनी की मानिंद धड़क उठता ...मचल जाता मुझे बस वही नीली आँखे चाहिए ..ओ मुझे प्यार और सम्मान से देखती है ...

उसी पल वो  गठरियाँ एक एक कर खुल कर पसर जाती ...उनके ढेर के बीच वो नीली आँखे ना जाने कहाँ खो जाती ....

घर पर बात करने का कोई मतलब नहीं था ...एक बार सोचा पर जानती थी ...भाई के भीतर का मर्द जाग उठेगा ... सब अचानक ज़िम्मेदार हो उठेंगे और अपनी ये गठरियाँ खोलकर उसकी गठरियों को और भारी कर देंगे ..के वो फिर उठ भी नहीं पाएगी,जहां अपने गोत्र में शादी करने पर जान का खतरा हो वहाँ किसी  की बात करना खुदको और उसको खतरे में डालने से ज्यादा कुछ नहीं था ....

एक दिन वही घटा जिसके घटने के  इंतज़ार में पिछले कुछ दिनों से थी  उन नीली आँखों ने जुबां खोल दी एक लाल गुलाब के साथ उस गुलाब की खुशबू से एक पल वो कस्तूरी हो उठी काश ... इस दुनिया में बस मैं वो और ये गुलाब रह जाये ..सब गायब हो जाए ..होंठो पे मुस्कान और आँखों में आंसू ... सामने एक मासूम चेहरा जो एक "हाँ" सुनने को बेचैन है
उसके लिए प्रेम दो दिलो दो इंसानों के बीच का रिश्ता था ...पर ये जानती थी उसके यहाँ प्रेम ही अपराध है, अपनी ज़िन्दगी का इतना बड़ा फैसला वो खुद नहीं ले सकती थी।। दिल हाँ कह रहा था पर गठरियो के बोझ तले वो हाँ किसी सिसकी सी दब गई ...
"मुझे थोडा समय दो " वो संयत होकर बोली
"यू कैन टेक योर टाइम स्वीटहार्ट " उसने उसे हौले से गले लगाकर कहा
वो पिघलते पिघलते बची ...
एक पल में सितार सी हो गई वो ...कुछ था दिल में जो बगावत कर रहा था खुद से अपने आप से ...आईने के सामने देर तक निहारती रही खुद को उसने मुझे पसंद किया क्योंकि मैं, मैं हूँ हर महीने घर पैसे लाने वाली मशीन नहीं, आज वो अपने आप को जानना चाहती थी ..मैं कौन हूँ क्या चाहती हूँ ...किसी ने कभी नहीं पूछा पर आज वो खुद से सवाल कर रही थी बंद कमरे में कई तूफ़ान उठे और बिखर गए ... एक एक कर कई गठरियो से सवाल उठे और उसने उनका सामना किया ...अभी तो ये सवाल खुद से पूछ रही थी ...पर जब ये सवाल उसके अपनों के मुह से बरसेंगे ..आंसू और गुस्से के साथ ...तब ...तब
"देखा जाएगा " उसने खुद को जवाब दिया ..
आज वो बागी हो उठी थी अपने लिए अपनी ख़ुशी के लिए ...जानती थी लोग स्वार्थी कहेंगे ...ताने देंगे, कोसेंगे कह देगी मुझे माफ़ करो छोड़ दो ...
क्रासिंग से दो गुलाब खरीदे .... एक ले जाकर अपनी टेबल पर लगाया ..एक पूरी हिम्मत के साथ उसे सौंप दिया
"यू डिड इट " वो शरारत से मुस्कुरा रहा था
फिर बातों के लम्बे सिलसिले में कितने कॉफ़ी के प्याले खाली हुए भरे ..याद नहीं ....आज वो बोल रहा था ... और ये मुग्ध सी उसका चेहरा देख रही थी ...
जिन लम्हों में वो खुद को अकेला पा रही थी ...उन पलों को भी वो समझ रहा था .. वो सिर्फ प्यार और साथ चाहता था ... और रिश्ता जब मैं चाहू ....पुरुष के दोस्ती भरे रूप से वो अनजान थी ...पिता ,भाई, रिश्तेदार सबको उसने कलफ लगी अकड़ के साथ ही देखा था ... वो माहोल ही एसा था वहां ....इस नीली आँखों वाले साथी का मिलना किसी शहजादे से मिलने से कम नहीं था ....
वो खुश थी ,जिन पलों में वो उसका हाँथ थामकर निश्चिन्त ही जाना चाहती ... अक्सर गठरिया जीवित हो उठती ... डराती चिल्लाती ...कभी सिनेमा हाल में ,कभी पिकनिक में ... वो एक एक कर उनको अपने से अलग कर रही थी ... रेत से फिसलते वक़्त के दरमियाँ वो कुछ चमकीले टुकड़े अपने लिए बचाना सीख रही थी
प्यार में होना आपके चेहरे को फेशियल सा असर देता है और शरीर को स्पा सा सुकून ...होंठो से बरबस निकल पड़ने वाले गीतों के मुखड़े और अंतरे चुगली कर देते है,
तो जीने दो ना उसे ....

एक रोज़  ... वो अपने शहजादे के साथ  घर से निकल आई, एक छोटे से आशियाने में जहां वो अपनी मर्ज़ी से रह सके ...जिम्मेदारियों के साथ खुद भी जी सके बिना डरे फैसले ले सके, उसके हाँथ और पैर काँपे नहीं ...उन गठरियों को देहरी के बाहर छोड़ दिया, आज वो भारी कदमो से नहीं बल्कि आत्मविश्वास से चल रही थी, दिनों के पंख लगे और रातें मादक हो उठी ... प्यार से सराबोर हो उठी ...प्यार पा रही थी और प्यार बाँट रही थी .... निखर रही थी ,
सपनीले दिनों में एक नन्ही किलकारी गूँज उठी उसकी फरिश्तों सी  मासूमियत ने पत्थर दिलो को भी मोम कर दिया ... टूटे रिश्ते जुड़ गए ... उसके साथ बुरा घटने का इंतज़ार करते करते कुछ सो कॉल्ड शुभचिंतक आशा खो बैठे ......

रात वो नीली आंखे कुछ कह रही थी ... उन्हें फ़रिश्ते का  साथ देने के लिए एक परी चाहिए थी ....
"हाँ वो परी ही होगी, आकाश दूँगी मैं उसे ... गठरियों की बजाय एक टोकरी सौपूंगी खुद चुनेगी " बुदबुदाकर कब एकाकार हो गई खुद ना जान पाई


Monday, December 31, 2012

रख जूती पर पाँव सखी !


लाठी कल बरसाई थी
इस बरस पड़ेंगे पाँव सखी
पीर ना मद्धम होने पाए
ताजे रखो घाव सखी
जूती सर पर पड़ी हमारी
रख जूती पर पाँव सखी
छीनेगे पतवार हमारी 
खुद खेवेंगे नाव सखी
पीड़ा हुई सब की सांझी
दिल्ली या उन्नाव सखी
मरी कोख में या बस पर
था वहशत का भाव सखी
ये गिरगिट बदलेंगे रंग
समझो सारे दांव सखी
छोड़े जिंदा फिर डस लेंगे
है बिच्छू सा स्वभाव सखी
बांटने वाले आज समझ ले
एक है सारा गाँव सखी