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Thursday, December 5, 2013

बहुत काम है मुझको



बहुत काम है मुझको
लाल सूरज उगाना है
नया सा राग गाना है  
सितारे बाँध रख छोड़े
ओस बिंदु उठाना है
संवरने की कहाँ फुर्सत
अभी दिन भी सजाना है
जुगनू को सुलाना है
कलियों को जगाना है
भोर से रूठ छिप बैठी
उसे अब खींच लाना है
तुम्हारे जागने से पहले
दुनिया को सजाना है

Saturday, September 21, 2013

लव हेट रिलेशन विद गुडगाँव (१)


कितना बंजारा जीवन जीते है ,अलग परवरिश अलग बोली कई बार अलग देस ..हर बार अलग सांचे में उतरना होता है ..पर ये भी इतना सहज कहाँ है ..गंगा किनारे फर्रुखाबाद में पली बढ़ी दुनिया बड़ी आसान थी  पैदल पूरे कसबे का चक्कर लगा लेते ..हर दूसरी दूकान पर कोई ना कोई पहचान वाला होता जो गर्माहट भरी मुस्कान से स्वागत करता ..आधा मोहल्ला चाचा ,मामा बुआ जैसे संबोधन  वाले प्यारे चेहरों से भरा मिलता जलेबी से ज्वेलरी बिना पैसे खरीद कर घर ला सकते थे ..

बड़े शहर के नाम पर दो तीन बार दिल्ली देखा और कुछ साल लखनऊ में बिताये पर लगा ज़िन्दगी ऐसे ही गुज़र जायेगी ..आत्मविश्वास से भरे ,अपनी मेधा के प्रमाणपत्र हाँथ में लिए जब गुडगाँव  में कदम रखा ..तो एक बार होश ही उड़ गए सब कुछ चमकीला लगा  वो शहर जो दिन और रात दोनों में भव्य लगता है ...रौनक ही रौनक . बड़े बड़े माल भीड़ से भरे , बड़ी बड़ी बातें और बड़ी बड़ी सैलरी आँखे विस्मय और अविश्वास से चौड़ी हो जाती ...छोटे से घर वो भी करोड़ों के


चमकीले चेहरे ,सब सजा संवरा, दुनिया की हर कम्पनी यहाँ जिनके नाम पता थे और जिनके नाम आज भी पता नहीं है ,आश्चर्य ये होता कैसे लोग होंगे जो इन शीशा जड़ी इमारतों में काम करते होंगे, इन माल में खरीदारी करते होंगे

अपने पास झोला भर डिगरिया थी पर दिन-ब-दिन आत्मविश्वास कम हो रहा था , कैसे शामिल होऊं मैं इस दुनिया में ,.कुछ बोलने से पहले सौ बार सोचना क्या पता कौन सा उच्चारण आपको देहाती का तमगा दिलवा दे ..पर सपने तो थे बोर्डरूम में बड़ी बड़ी मीटिंग्स का हिस्सा बनने  के , अपने घर की सबसे स्मार्ट लड़की आज  घबरा रही थी

एक दिन ऐसी ही चमचमाती शीशे जड़ी इमारत से इंटरव्यू का बुलावा आया हिम्मत बटोरी,शीशे के सामने खुद से सवाल जवाब किये,कई बार यकीन दिलाया ,हाँ मैं तैयार हूँ ,सवाल ही तो पूछेंगे मार तो नहीं डालेंगे ,ज्यादा से ज्यादा मना  कर देंगे , उन बड़ी इमारतों के भीतर कुछ आत्मीयता भरे चेहरे मिले, कुछ जवाब दिए कुछ नहीं दे पाई पर मैं भी उस इमारत का हिस्सा बन गई ...राहत की सांस ली पर ये राहत नहीं आफत की सांस ज्यादा थी। लोगों के साथ घुलना मिलना था काम जल्द से जल्द सीखना था

रोज़ नई  चुनौतियां एक महीने बाद काम मिला विदेशी पार्टनर  से बात करने का ..अभी तक हिन्दुस्तानियों की अंग्रेजी समझ में नहीं आ रही थी उस पर अंग्रेजों की अंग्रेजी हे ! भगवान् , फोन उठाया ,नंबर मिलाया , रिंग टोन के साथ धडकन तेज़ होने लगी ..दुआ तक मांग ली फोन ना उठे तो कह दूँगी , फोन नहीं उठ रहा ..पर फोन उठा सामने वाली कन्या ने इतने प्यार से जो कुछ भी पूछा ..वो मुझे अपनी धड़कन के शोर के सामने सुनाई नहीं दिया ना एक वाक्य बोल पाई ना समझ पाई ..हडबडाहट में फोन काट दिया ... बॉस को बोला लाइन में डिस्टर्बेंस है ..बाद में पता चला भारत से भारत में बात करना भले ही मुश्किल हो पर लन्दन की लाइन कभी खराब नहीं होती .शर्म आ रही थी,एक लड़ाई बिना लड़े हार जाने जैसा  पर दोबारा ऐसा ना हो इस लिए आँखे कान कुछ और खुले रखने शुरू किये ..जो असंभव लगता था आसान  होने लगा ..फोन पर काम के अलावा भी बातें करने लगी लगा जंग जीत ली ...पर पूरी तरह हिंदी माध्यम से पढ़ी इस छात्रा की एक लड़ाई और बाकी थी.

एक सुबह कहा गया तुमको कल कुछ विदेशी मेहमानों के सामने हमारी सेवाओ को प्रेजेंट करना है और जो सवाल पूछे उनके जवाब देने है ..एक और महाभारत ..जैसे तैसे काम सीखा अब आमने -सामने बात करना ..और वो भी इतना महत्वपूर्ण ..बॉस को कहाँ वो बोले तुम कर लोगी सारे देवी देवता मान लिये .. 11,21,51 कितने के प्रसाद बोले याद नहीं ... पर शुरुवाती हडबडाहट के बाद पता नहीं कहाँ से आत्मविश्वास आ गया ..एक प्यारी सी (जिसे सब मोहिनी सी कहते है ) मुस्कान के साथ पूरा प्रेजेंटेशन कर गई

 ...आज 7 साल हो गए ..कोरिया ,जापान, यूनाइटेड किंगडम ,इंडोनेशिया ...ना जाने कितने देशो में बात करती हूँ ..लोगों से आमने सामने मिलती हूँ, बिना तैयारी के भी कई बार मीटिंग्स का हिस्सा बनी हूँ , पर वो पहली कॉल और पहला प्रेजेंटेशन मुझे ये आत्मविश्वास दे गया है नामुमकिन कुछ भी नहीं आपकी आँखे अगर सपने देखती है तो आपके ही भीतर वो जज्बा है जो उन्हें सच कर सकता है , शायद मेरी जड़ों ने मुझे इतनी मजबूती दी के मैं हर मुश्किल को पार कर गई.

(ये सीरिज़ लम्बी चलेगी आखिर रिश्ता भी तो लंबा है)


Monday, September 2, 2013

मंज़र तेरी कब्र पर


दो दिन जुटेंगे मज़ार पर
तेरे चाहने वाले
दिन चार चक्कर लगायेंगे
दुआ मांगने वाले
सूखे फूल और सूखे अश्क
फकत बाकी रहेंगे
कुछ कबूतर के सुफेद जोड़े
तेरे साथी रहेंगे
होकर पत्थरो की कैद में
तू आज़ाद रहेगा
मंज़र यही तेरी कब्र पर
तेरे बाद रहेगा
जीतेजी जो एक दिल भी
रोशन किया तूने
वो नूर इस जहाँ में
तेरे बाद रहेगा

Tuesday, July 9, 2013

देवभूमि का चीत्कार

बादलों की मंडी थी
पानियों का सौदा था
सैलाब के क़दमों ने
फिर ज़मीं को रौंदा था
हवा बहुत रूठी थी
डालियों से झगडा था
नदियों के धारों को
किनारों ने पकड़ा था
सब्र उसका छूटा जो
बिफर के निकल गई
उफनती नदी उस पल
किनारों पर चढ़ गई
चीखती लहरों में
आंसू थे पहाड़ों के
जंगल की कब्र थी
अवशेष देवदारों के
विनाश हमने रचा
उसका प्रतिकार था
लाखो आघातों पर
देवभूमि का चीत्कार था

Friday, June 28, 2013

मुस्कुरा दो यार




इन आफतों को भुला दो यार
इस हालत में मुस्कुरा दो यार
दुनिया चाहती है मायूस देखना
तुम ज़रा खिलखिला दो यार
सर पर सवार है फतूर बनके
हिलाकर गर्दन गिरा दो यार
अकड़ है आसमान सी जिनकी
धूल  उनको चटा दो यार
कमज़ोर कहा करते है अक्सर
कुर्सियां उनकी हिला दो यार
निबट लेंगे जुल्म-ज़माने से
एक ज़रा हौसला बढ़ा लो यार

Tuesday, May 21, 2013

बवाल है बवाल है !

बवाल है बवाल है
बड़ा अजब हाल है
लापता से तंत्र में
ये कौम बेहाल है

पटरी से उतर गई
मालामाल कर गई
मामा की रेल है 
भांजा निहाल है

राष्ट्र के गले पड़े
राष्ट्रीय दामाद है
मौन है सारे देवता 
खुजली है खाज है 


नेता भी भीतर है
अभिनेता भी जेल में
भारतीय कारागार अब
राष्ट्रीय ससुराल है

बैट बॉल छोड़कर
गड्डियों का खेल है
खेल खिलाडियों का
अब ठिकाना जेल है

सबके बंद कान है
जनता हैरान है
समझ लो भैया ये
भारत निर्माण है

Monday, February 25, 2013

किसी ने कहा होगा


कोई तो गिला होगा किसी ने कहा होगा
मसला भरे बाज़ार ऐसे नहीं उछला होगा
लहू के ताज़ा निशां आँख के मुहाने पर 
दर्द कोई सरहद तोड़ कर निकला होगा 
दरख्त के मानिंद छाया दिया करता था 
खुन्नस में तुमने ही रास्ता बदला होगा 
सूखे मोम की लकीरें देहरी पर निढाल 
कल इंतज़ार तन्हा  यहाँ पिघला होगा 
दिखाकर चमकीले सितारे बुझाए चराग 
तेरा मसीहा  भी नीयत से उथला होगा