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Wednesday, May 13, 2015

फिर आसमा से टूटकर बरसा नशा

बेतरतीब मैं (१३ मई २०१५ )

फिर आसमा से टूटकर बरसा नशा
फिर हमपर मयकशी का इलज़ाम लगा 

बारिशें किसी भी मौसम में आपको डिस्ट्रैक्ट कर सकती हैं ,कुछ जादू सा चलता है और आप मज़बूर हो जाते हो। 

कागज़ की नाव चलाने वाली बारिशें , किसी  नज़र की छुअन से सिहर जाने वाली बारिशें,किसी के जल्दी घर  वापसी की दुआ मनाने वाली बारिशें
और भी कई मूड में बरस रही है ये बारिशें 

आफिस के कांच के भीतर से बाहर सब धुंधला दिख रहा है अच्छा है ना.बाहर सड़क है ,ट्रैफिक है भीड़ है ,ये तो मेरी बारिशों का हिस्सा नहीं हो सकते 
मेरी बारिशों में पहाड़ है उन पर झुके बादल है , मेरे हाँथ में छतरी के वाबजूद भीगती मैं 
पहाड़  ना सही समंदर का किनारा ही हो जहां खारी लहरों के साथ मीठी बूँदें मुझे भिगो दे ,खैर आंसू भी तो खारे ही होंगे 

मेरी मोहब्बत की कहानियों में बारिशें नहीं हैं बल्कि बारिश ही मेरी मोहब्बत है। 

कई गहरी नीली शामें जब आसमान स्लेटी बादलों से खेल रहा था ,हवा में सीली सी गंध हाँथ में एक कप कॉफ़ी लिए आसमान को निहारते हुए मैंने गुडगाँव में चेरापूँजी को जिया है,

 कल्पनाओ के पंख पर सवार मुक्त हो लेती हूँ मैं.
 भर जाती हूँ भीतर तक तो खुलकर रो लेती हूँ मैं 

Thursday, December 5, 2013

बहुत काम है मुझको



बहुत काम है मुझको
लाल सूरज उगाना है
नया सा राग गाना है  
सितारे बाँध रख छोड़े
ओस बिंदु उठाना है
संवरने की कहाँ फुर्सत
अभी दिन भी सजाना है
जुगनू को सुलाना है
कलियों को जगाना है
भोर से रूठ छिप बैठी
उसे अब खींच लाना है
तुम्हारे जागने से पहले
दुनिया को सजाना है

Friday, September 13, 2013

राम ढूंढना रावण में

बैलट बुलेट की छावन में
मेला लगेगा गांवन में
राह हमारी जो पाहुन भूले
नित पधारेंगे आँगन में
भोपू जोर जोर  बजेंगे
हांथी के दूजे दांत दिखेंगे
बरसाती मेढक निकलेंगे
बिन बारिश इस सावन में
भोरे भोरे आन घुसेंगे
देहरी देहरी नाक घिसेंगे
मिश्री वाले बोल बोलकर
आन गिरेंगे पाँवन में
नोट उड़ेंगे वोट बिकेंगे
जात पात पर खूब बकेंगे
नहीं जो संभले डूब गिरेंगे
कागज़ की इन नावन में  
खूब परखना जांच के रखना
सुनना सबकी मनकी करना
बड़ा कठिन है काज भैया
राम ढूंढना रावण में

Tuesday, May 21, 2013

बवाल है बवाल है !

बवाल है बवाल है
बड़ा अजब हाल है
लापता से तंत्र में
ये कौम बेहाल है

पटरी से उतर गई
मालामाल कर गई
मामा की रेल है 
भांजा निहाल है

राष्ट्र के गले पड़े
राष्ट्रीय दामाद है
मौन है सारे देवता 
खुजली है खाज है 


नेता भी भीतर है
अभिनेता भी जेल में
भारतीय कारागार अब
राष्ट्रीय ससुराल है

बैट बॉल छोड़कर
गड्डियों का खेल है
खेल खिलाडियों का
अब ठिकाना जेल है

सबके बंद कान है
जनता हैरान है
समझ लो भैया ये
भारत निर्माण है

Thursday, March 28, 2013

बेवजह

जिरह-ए-जुल्फ में उलझा हुआ हूँ
बेवजह शानो पर बिखरा हुआ हूँ
पास होकर भी दूरियां मीलों की
हूँ अश्क़, आँख से फिसला हुआ हूँ

अधूरी ग़ज़ल का मिसरा हुआ हूँ
कहीं ख़याल में अटका हुआ हूँ
किस लम्हा मुकम्मल हो जाऊं
हूँ ग़ज़ल, बहर से भटका हुआ हूँ

यूँ अपने आप से बिगड़ा हुआ हूँ
छोड़ दुनिया आज तनहा खड़ा हूँ
सामने आँखों के अँधियारा घना है  
हूँ सितारा,राह से भटका हुआ हूँ

कल तुझमें डूबकर तुझसा हुआ हूँ
सांस की उस छुअन से तप रहा हूँ
मुझको रोक ले ख़ाक होने से पहले
हूँ शरारा, ईमान से बुझता हुआ हूँ

Wednesday, March 20, 2013

तू,तेरा अक्स


शोर था साँसों का
दिल में सन्नाटा
तेरे जाने के बाद
तू उग रही है यहाँ
जम रही है काई सी
आईने पे लगी बिंदी में
टेबल पर चूड़ियों में
पड़े सूखे गजरे में

छोड़ गई हो जानकर
चादर के आगोश में
बालों के नर्म  गुच्छे
कुछ टूटे लाल नाखून 
दुपट्टे से बिछड़े मोती
पायल से खफा घुँघरू
कप पर गुलाबी निशान
कमरे में इत्र -ए -ख़स

जागा हूँ उस दिन से
पलक भी झपकी नहीं
के तुम लौट ना जाओ
खडका कर कुण्डी कहीं
आहट सुनना चाहता हूँ
तुम्हे छूना चाहता हूँ
कहते है राख से भी
जन्म जाते है लोग
गर पुकारो दिल से




Thursday, March 14, 2013

सुनो ! भारत भाग्य विधाताओ


सुनो !
भारत भाग्य विधाताओ
शहीदों की चिताओं से
दूर रखना काले हाँथ
कलंकित करेंगे शहादत ,

तुम्हारे शरीर से उठती
सड़ांध दम घोट देगी
उनकी आत्माओ का
तुम तुष्टिकरण में रहो
देसी विदेसी आकाओं के

ना तुम्हारा आँगन रोया
ना सूनी हुई तुम्हारी देहरी
तुम बस गिनो गिन्नियां
बंद आँखों से लगातार
लथपथ चेहरे मत देखो

हम फिर सौंप देंगे
तुम्हारे हाँथ बागडोर
अपने भविष्य की
क्योंकि खो चुके है
अपनी आवाज़ शक्ति
और
स्व:

Tuesday, March 12, 2013

होरी नाही खेलूंगी


होरी नाही खेलूंगी
श्याम सांवरे सांवरिया
बिगत बरस फागुन में
 तैने कारो रंग लगायो
चन्द्रबदन ते श्यामा कीन्ही
तोरे मन को भायो 
अलकन में उलझायो तैने
पलकन में अट्कायो 
बारह मास मैं रही बावरी
दूजो फागुन आयो
तोरी सूरत नाही देखूंगी
श्याम सांवरे सांवरिया

ललिता रंगी गुलाबी  तैने
रंगी विशाखा लाल
होरी बीते बरस बिताया
अब तक गाल गुलाल
मोसे तूने बैर निभाया
छोड़ अबीर गुलाल
श्यामल रंग लगाया मोहे
हाल किया बेहाल
गोवर्धन की सौं तू सुनले
घूंघट नाही खोलूंगी
श्याम सांवरे सांवरिया
होरी नाही खेलूंगी

Thursday, January 24, 2013

क्या रखा ?

यूँही खुद को मैंने सदा तनहा रखा
खुशियों से महरूम औ रुसवा रखा
महफिलों से कतरा कर गुज़रे हम
दर्द से दिल इस कदर बोझिल रखा
सो ना जाए किसी शब् सुकून से
पलक में एक अश्क उलझा रखा
रौशनी ना मांगने लगे आँगन मेरा
चराग भी रखा तो बुझता रखा
ना कोई हमसफर हो जाए मेरा
अपनी हस्ती को मैंने मुर्दा रखा
जुर्म क्या था तेरा ये बता "सोनल "

सांस लेना इस कदर मुश्किल रखा 
कैसे मिलेगा बहीखाता  ज़िन्दगी का
पास बस दिल का एक टुकड़ा रखा 

Tuesday, January 15, 2013

वो तनहा !


छोड़कर घर फुटपाथ पर वो पड़ा था
वक़्त ने कितना कड़ा चांटा जड़ा था
गाँव को लगता था साहब बन गया वो
आखिरी दम सांस में काँटा गड़ा था 
सपने तोड़े सबके और उम्मीदें जलाई
राख पर अपनी आज वो तनहा खड़ा था
की बगावत समझा खुद को सिकंदर
पेट का सच आज सपनो से बड़ा था
किस तरह कहता मुझे वापस बुला लो 
सारे घर से रात भर कितना लड़ा था

Monday, December 31, 2012

रख जूती पर पाँव सखी !


लाठी कल बरसाई थी
इस बरस पड़ेंगे पाँव सखी
पीर ना मद्धम होने पाए
ताजे रखो घाव सखी
जूती सर पर पड़ी हमारी
रख जूती पर पाँव सखी
छीनेगे पतवार हमारी 
खुद खेवेंगे नाव सखी
पीड़ा हुई सब की सांझी
दिल्ली या उन्नाव सखी
मरी कोख में या बस पर
था वहशत का भाव सखी
ये गिरगिट बदलेंगे रंग
समझो सारे दांव सखी
छोड़े जिंदा फिर डस लेंगे
है बिच्छू सा स्वभाव सखी
बांटने वाले आज समझ ले
एक है सारा गाँव सखी








Tuesday, December 18, 2012

बस देह भर


पुनरावृति
हताशा की
एक मौन
अपने होने पर
एक पीड़ा
नारी होने की
वही अंतहीन
अरण्य रुदन
बस देह भर
ये अस्तित्व
छिद्रान्वेषण
पुन: पुन:
चरित्र हनन
या वस्त्र विमर्श
मैं बस विवश
बस विवश ...

Thursday, December 13, 2012

पिया बिदेस


ओ री सखी
सूनी बहियाँ
सीली अंखिया
बहकी बतिया
बिरहन रतियाँ

ओ री सखी
पिया बिदेस
जोगन भेस
रूखे केश
जीवन क्लेश
भेज संदेस

ओ री सखी
पूस मास
भूली हास
धूमिल आस
भारी सांस
अधूरी प्यास



Tuesday, November 27, 2012

मेरे शहर में



मेरे शहर में
शाम नहीं होती
देखा नहीं किसी नें
ढलते सूरज को
हाँ, वालपेपर पर
कई बार देखा है ,
ऑफिस से  निकलते है
बंधुआ मजदूर
अँधेरे में मुह छिपाए
कंधे झुकाए रोबोट 
नशे में डुबो देते है
पूरा दिन और तनाव
पर शाम को तो
उन्होंने भी नहीं देखा
आसमान के रंग
को लेकर अक्सर
बहस छिड़ती है
छ बाय छ के
पिंजरे से कभी
आकाश दिखा नहीं
जो घोसलों को
लौटते है बिना पिए
उनके चूजे भी
सीमेंट में पलते है
सीमेंट में बढ़ते है
शाम को वो भी जानते नहीं
कुछ बूढ़े बाते करते है
गोधूलि बेला की
पर ऐसा कुछ
मेरे शहर में नहीं होता 
दिन और रात के सिवा
कुछ नहीं देखा
मेरे शहर में
किसी ने भी
शाम को नहीं देखा

Tuesday, November 20, 2012

मौन


सूरज भी मुश्किलों
 से उगा आज सुबह 
चिड़िया नहीं निकली
अपने  घोसलों से
बच्चे म्यूट मोड में
लगातार बिलखे
गाय दूध देने से
कर रही थी इनकार
तीन दिनों से
 ठहर -ठहर कर
वो भर रही थी सांस
इस घबराहट में
क्या पता खुदा
आक्सीजन की भी
सप्लाई रोक दे ...

Tuesday, November 6, 2012

आईने में अक्स




आईने में अक्स जिसका  है 
मुझसे  इसका एक रिश्ता है 
देखकर अक्सर मुस्कुराता है
किसकी सूरत से मिलता है ?

रोक देता है सरेराह मुझको 
आप बनता कभी बिगड़ता है 
सामने बैठो तो वादे हज़ार 
वरना  पहचान से मुकरता है .

मासूम ऐसा शक ना हो ज़रा 
सांस की आंच से पिघलता है 
संग फिरता है हमसाया होकर 
मुझे तो मुझ सा ही लगता है .

Tuesday, September 11, 2012

एक बात कहूं गर करो यकीं



(पुरानी डायरी के पन्नो से ......)
एक बात कहूं  गर करो यकीं
ऐसा पहले कुछ हुआ नहीं
जैसा पल पल अब होता है
जैसा हर पल अब होता है
मैं जगते जगते सोती हूँ
और सोते से जग जाती हूँ
रातों को  करवट लेती हूँ
ना जाने क्यों मुस्काती हूँ
अन्जानी सी सिरहन कोई
भीतर से अक्सर उठती है
जो कह देते हो बात कोई
क्यों मेरी आँखे झुकती हैं
जादू तो तुमने किया नहीं
ख़ामोशी मैं सुन लेती हूँ
गुमसुम सी  मैं हो जाती हूँ
लगता है कुछ पा जाती हूँ
खुद जाने क्यों खो जाती हूँ
पूछूं गर तो सच कहना
प्यार यही तो होता है :-)



--
Sonal Rastogi


Friday, August 31, 2012

नीला उजास




सत्य है  वह 
या  भ्रम था 
मयूर वर्णी 
उसका तन था 
वैजयंती में 
पिरो गया वह 
वंशीधुन में 
डुबो गया वह 
नयन भी 
मुंदने ना पाये 
अधर भी 
खुलने ना पाये 
मोह मंतर 
पढ़ गया वह 
नीला उजास
भर गया वह 
चाँद उजला 
अब नहीं है 
भोर भी अब 
सुरमई है 
अधखुली आँखे 
भ्रमित मन 
पौ फटी है 
या ढला दिन

Wednesday, August 22, 2012

बंजर दिन बंजर रात ...

बंजर दिन
बंजर रात
सूनी आँखे
सूनी बरसात
कोरे कागज़
कोरी किस्मत
मौन अधर
कैसे हो बात
शब्द अधूरे
सन्दर्भ अधूरे
छितरे रिश्ते
बिखरे ख्वाब
मौन घाव
मुखर वेदना
कठिन घडी
कैसे हो पार



Wednesday, August 1, 2012

सावन में नैहर की यादें



सावन में नैहर की यादें
पाँव में  जैसे पायल बांधे
झूले सखियाँ हंसी ठिठोली
मेहँदी राखी चन्दन रोली
देह धरी है पिया के घर में
मन मैके की देहरी फांदे
नभ से बरसे शोर मचाकर 
नयनन रोके ज़ोर लगाकर 
आंसू हुए खारे से सादे
घेवर फेनी खीर बताशे
तीज का मेला खेल तमाशे
पैरो में क्यों बेडी सी  बांधे 
सावन में नैहर की यादें