संवेदनाये मर चुकी है
लाशें जवानो पड़ी है
फुर्सत कहाँ हमको
सान्या- शोइब से आगे सोचे
भावनाए बिक चुकी है
जो बुद्धू बक्सा दिखाए
उसे सच मानते है
हैदराबाद के दंगे का कारण
कितने जानते है
सोच कुंद हो चुकी है
जब तक हमारे मुह पर
चांटा नहीं पड़ेगा
दर्द नहीं महसूस करेंगे
"ओह बुरा हुआ "कहकर
हाँथ झाड लेंगे
इंसानियत मिट चुकी है
