मैं क्या सोचती हूँ ..दुनिया को कैसे देखती हूँ ..जब कुछ दिल को खुश करता है या ठेस पहुंचाता है बस लिख डालती हूँ ..मेरा ब्लॉग मेरी डायरी है ..जहाँ मैं अपने दिल की बात खुलकर रख पाती हूँ
Saturday, January 30, 2010
आज यूँही
यार आज यूँही कुछ लिखने का मन कर रहा है ,बिना किसी विचार के बस मन में उठे भावों को शब्दों का चोला पहनाकर देखते है क्या रूप लेता है , कहते हैं मन की उड़ान हवा से भी तेज होती है तो आज कहाँ ले जा रहा है मेरा मन........आज मूड बहुत अच्छा है कुछ असर ठण्ड के कम होने का है और कुछ बसंत ऋतू का है.
आँखों में सपने चमकने लगे है और होठों पर अनायास ही मुस्कराहट खेल जाती है क्यों ना हो हवा हे कुछ बौराई सी है और मेरा मन इस हवा के साथ उड़ा जा रहा है, क्या आप को भी कभी बंधन मुक्त होने का एहसास हुआ है ...हुआ होगा अगर कभी किसी बंधन में पड़े होंगे ..फिर वही पागलपन
"कभी मन चाहे बाँध लूं अपने को हज़ार बंधन में ,और करूँ महसूस उनको अपने हर स्पंदन में "
चलिए बस ब्लॉग से गुज़रते हुए यूँही कुछ लिख दिया , बसंत के मद ने आप पर भी कुछ असर किया होगा ....
मैं तो ये पूरे जोश से मना रही हूँ
Wednesday, January 27, 2010
गर
गर ज़िन्दगी इतनी आसान होती
तो हर लैब पर खिची मुस्कान होती
गर होता आसान सपने सजाना
न पड़ता फिर पलकों पे आँसूं उठाना
जीना है फिर भी जिए जा रहे हैं
अपने दर्दों को सीने में पाले हुए है
शायद कभी रौशनी हो मयस्सर
सुना है अंधेरों के बाद ही उजाले हुए हैं
तो हर लैब पर खिची मुस्कान होती
गर होता आसान सपने सजाना
न पड़ता फिर पलकों पे आँसूं उठाना
जीना है फिर भी जिए जा रहे हैं
अपने दर्दों को सीने में पाले हुए है
शायद कभी रौशनी हो मयस्सर
सुना है अंधेरों के बाद ही उजाले हुए हैं
Tuesday, January 19, 2010
मितिया
"अब के सावन में झुलनी गड़ा दे पिया
जिया हरसाई दे पिया ना "
मितिया कमर हिला हिला कर नाच रही थी , पंद्रह साल की उम्र में झुलनी और पिया का मतलब थोड़ा थोड़ा समझने लगी थी, अपनी राधा मौसी को देख देख कर बंजारों के सारे हुनर सीख रही थी, देखने में भले ही हूर की परी ना हो पर, चेचरे पर कैशोर्य का लावण्या अपना रंग बिखेरने लगा था, मौसी की सीख मानकर छोटी सी मितिया जिसे मौसी मीतु बुलाती थी अपने को सबसे बचाकर चलती थी , गली देने को जबान और हाँथ में छुरी ऐसी कुशलता से चलती थी के सुनने वाले अपने कानो पर हाँथ रख लेते और देखने वाले दांतों टेल ऊँगली दबा लेते.
डेरे पर साथ में रहने वाले मर्दों की नज़र मितिया पर पड़ने लगी थी और मौसी को अपनी इस दौलत का पूरा एहसास था यही थी उनके बुढापे का सहारा सो सबसे बचाकर रखती थी,पर उनके समाज का खुलापन बहुत लम्बे समय तक मौसी को मितिया को बंधन में रखने से रोक ना सका, मितिया और रंगजी चोरी चोरी एक दुसरे को देखने लगे थे, अजीब सा सम्मोहन लगता था रंगजी को मितिया के नाच में ,जब वो घुँघरू बंधती तो अनोखा समा छा जाता, ऐसा कोई राहगीर नहीं होता जो उसे नज़रंदाज़ कर निकल जाए ढोल बजाता रंग जी भी कहाँ उस पर से अपनी निगाह हटा पाता था, हज़ारों मर्दों की निगाह मितिया पर होती पर मितिया रंगजी के निगाह की गर्मी से मानो पिघल सी जाती और और उस के नाच का बहाव और तेज़ हो जाता,
मौसी इस खेल से अनजान नहीं थी उन्होंने मितिया को हर तरह से समझाने की कोशिश की, पर इस उम्र का बहाव किसी भी बाँध से नहीं रुकता, मन और तन दोनों बावले हो उठते फिर कोई सीमा कहाँ, अल्हड उम्र पिया का साथ , भविष्य के सपने, आसमान भी उड़ने को छोटा लगने लगा.
घंटो चिलम फूकते और दोनों सपने बुनते ,मितिया अपनी इस ज़िन्दगी से छुटकारा चाहती थी ,रंगजी जो था उससे संतुष्ट था अपने डेरे वालों की तरह उसे शराब की भी लत नहीं थी सो सारी कमाई अपनी थी..कभी कभी मितिया की आँखों चमक रंगजी के दिल में दर बैठा देती वो कहता "मितु युझे आखिर करना क्या है ".
मितिया मुस्कुरा कर उसके कंधे पर सर रख देती.
एक दिन मितिया का नाच ख़त्म हुआ रंगजी सामान समेट रहा था अचानक सामने गाडी से उतर कर एक साब उतर कर आया, "बहुत अच्छा इटेम पेश किया तुम लोगों ने , आकर मुझसे मेरे होटल में मिलो "
मितिया और रंग जी की आँखे विस्मय से से फैल गई जब साब ने ५०० का पत्ता बक्शीश के रूप में उनके हाथ में रख दिया, दोनों समझ नहीं पा रहे थे, डेरे पर बड़े लोगों से सलाह ली तो कुछ ने डराया "अरे इ बाबू लोगो को भरोसा नहीं है ", तो कुछ ने मौक़ा न गवाने की सलाह दी , डेरे पर सबसे समझदार समझे जाने वाले नंदू को बुलाया गया ,नंदू बड़े बड़े शहरों में घूम चुका था थोड़ी अंग्रेजी भी बोल लेता था...तो फिर तै किया गया नंदू जाएगा मितिया और रंगजी के साथ.
होटल में पहुँच कर तीनों की मानों पलकों ने झपकना छोड़ दिया, महल जैसा , सूत बूट में घुमते साब लोग और परियों जैसी मेंम -साब , मस्त-मलंग सी मितिया को अपने कपड़ों के गंदे होने का एहसास होने लगा और अपने आप में सिमटने लगी,
"इसी होटल का नाम बताया था ना ,तुम लोग गलती तो नहीं कर रहे " नंदू असमंजस में था.
"अरे तुम लोग बाहर क्यों खड़े हो अन्दर आओ " गाडी वाला साब सामने खड़ा मुस्कुर्रा रहा था उस पल के बाद मानो रंग जी और मितिया जैसे मशीनों की तरह चलते गए, सब कुछ सपनो की तरह होता गया, अब उनको सड़कों पर धुल नहीं फाकनी थी, हर शाम होटल में अपना कार्यक्रम देना था .....अब सरस्वती पर लक्ष्मी मेहरबान हो रही थी, डेरे के और लोगों को भी काम मिल गया.
इस सब में मितिया को लगने लगा रंग जी कुछ बदल सा गया है , अब वो उससे थोड़ा दूर रहने लगा है , उसके कंधे पर सर रखे भी तो महीनो हो गए , जब टूरिस्ट लोग मितिया की तस्वीरे लेते और उसकी तारीफ़ करते तो रंग जी ने कदम और पीछे खीच लेता और कही भीड़ में गुम हो जाता.
एक दिन इटेम के बाद मितिया रंगजी को ढूँढने निकली तो देखा एक अंग्रेजन रंगजी के कंधे पर हाँथ रखे खड़ी है, और लिपट लिपट पर तस्वीरे खिचवा रही है, मितिया को मनो साप सूंघ गया, मितिया को मर्दों की कमी नहीं थी पर रंगजी जैसा उसके डेरे में कोई नहीं था , बांका जवान,कोई बुरी आदत नहीं .
उसके आँखों में आंसू की लकीर तैर गई , गुस्से से चेहरा गर्म हो गया, दिल की जलन चेहरे से साफ़ झलक रही थी और शायद जबान से भी निकल आती की रंगजी की निगाह अकेली खड़ी मितिया पर पड़ गई....एक पल में उसे सब समझ में आ गया तीन साल से साथ था मितिया के ..लपक कर उसने मितिया का हाँथ पकड़ लिया ..
मेमसाब दोनों को साथ देखकर एक दम बोली "ऐसे ही खड़े रहो बहुत अछे लग रहे हो दोनों साथ "
एक तरफ टूरिस्ट दोनों की तस्वीरे खीच रहे थे , पर दोनों एक दुसरे का हाँथ धीरे से दबाते हुए अपने मन की बात आँखों ही आँखों में बोल रहे थे ....
अकेले में मितिया धीरे से बोली " लगन करेगा मुझसे ....अब मुझसे अकेले नहीं रहा जाता "
रंग जी ने हस कर कहा "तो फिर तुझे झुलनी (नथ) गडाने के लिए सावन का इंतज़ार नहीं करना पडेगा ...
और मितिया और रंग जी एक दुसरे की बाहों में खो गए
जिया हरसाई दे पिया ना "
मितिया कमर हिला हिला कर नाच रही थी , पंद्रह साल की उम्र में झुलनी और पिया का मतलब थोड़ा थोड़ा समझने लगी थी, अपनी राधा मौसी को देख देख कर बंजारों के सारे हुनर सीख रही थी, देखने में भले ही हूर की परी ना हो पर, चेचरे पर कैशोर्य का लावण्या अपना रंग बिखेरने लगा था, मौसी की सीख मानकर छोटी सी मितिया जिसे मौसी मीतु बुलाती थी अपने को सबसे बचाकर चलती थी , गली देने को जबान और हाँथ में छुरी ऐसी कुशलता से चलती थी के सुनने वाले अपने कानो पर हाँथ रख लेते और देखने वाले दांतों टेल ऊँगली दबा लेते.
डेरे पर साथ में रहने वाले मर्दों की नज़र मितिया पर पड़ने लगी थी और मौसी को अपनी इस दौलत का पूरा एहसास था यही थी उनके बुढापे का सहारा सो सबसे बचाकर रखती थी,पर उनके समाज का खुलापन बहुत लम्बे समय तक मौसी को मितिया को बंधन में रखने से रोक ना सका, मितिया और रंगजी चोरी चोरी एक दुसरे को देखने लगे थे, अजीब सा सम्मोहन लगता था रंगजी को मितिया के नाच में ,जब वो घुँघरू बंधती तो अनोखा समा छा जाता, ऐसा कोई राहगीर नहीं होता जो उसे नज़रंदाज़ कर निकल जाए ढोल बजाता रंग जी भी कहाँ उस पर से अपनी निगाह हटा पाता था, हज़ारों मर्दों की निगाह मितिया पर होती पर मितिया रंगजी के निगाह की गर्मी से मानो पिघल सी जाती और और उस के नाच का बहाव और तेज़ हो जाता,
मौसी इस खेल से अनजान नहीं थी उन्होंने मितिया को हर तरह से समझाने की कोशिश की, पर इस उम्र का बहाव किसी भी बाँध से नहीं रुकता, मन और तन दोनों बावले हो उठते फिर कोई सीमा कहाँ, अल्हड उम्र पिया का साथ , भविष्य के सपने, आसमान भी उड़ने को छोटा लगने लगा.
घंटो चिलम फूकते और दोनों सपने बुनते ,मितिया अपनी इस ज़िन्दगी से छुटकारा चाहती थी ,रंगजी जो था उससे संतुष्ट था अपने डेरे वालों की तरह उसे शराब की भी लत नहीं थी सो सारी कमाई अपनी थी..कभी कभी मितिया की आँखों चमक रंगजी के दिल में दर बैठा देती वो कहता "मितु युझे आखिर करना क्या है ".
मितिया मुस्कुरा कर उसके कंधे पर सर रख देती.
एक दिन मितिया का नाच ख़त्म हुआ रंगजी सामान समेट रहा था अचानक सामने गाडी से उतर कर एक साब उतर कर आया, "बहुत अच्छा इटेम पेश किया तुम लोगों ने , आकर मुझसे मेरे होटल में मिलो "
मितिया और रंग जी की आँखे विस्मय से से फैल गई जब साब ने ५०० का पत्ता बक्शीश के रूप में उनके हाथ में रख दिया, दोनों समझ नहीं पा रहे थे, डेरे पर बड़े लोगों से सलाह ली तो कुछ ने डराया "अरे इ बाबू लोगो को भरोसा नहीं है ", तो कुछ ने मौक़ा न गवाने की सलाह दी , डेरे पर सबसे समझदार समझे जाने वाले नंदू को बुलाया गया ,नंदू बड़े बड़े शहरों में घूम चुका था थोड़ी अंग्रेजी भी बोल लेता था...तो फिर तै किया गया नंदू जाएगा मितिया और रंगजी के साथ.
होटल में पहुँच कर तीनों की मानों पलकों ने झपकना छोड़ दिया, महल जैसा , सूत बूट में घुमते साब लोग और परियों जैसी मेंम -साब , मस्त-मलंग सी मितिया को अपने कपड़ों के गंदे होने का एहसास होने लगा और अपने आप में सिमटने लगी,
"इसी होटल का नाम बताया था ना ,तुम लोग गलती तो नहीं कर रहे " नंदू असमंजस में था.
"अरे तुम लोग बाहर क्यों खड़े हो अन्दर आओ " गाडी वाला साब सामने खड़ा मुस्कुर्रा रहा था उस पल के बाद मानो रंग जी और मितिया जैसे मशीनों की तरह चलते गए, सब कुछ सपनो की तरह होता गया, अब उनको सड़कों पर धुल नहीं फाकनी थी, हर शाम होटल में अपना कार्यक्रम देना था .....अब सरस्वती पर लक्ष्मी मेहरबान हो रही थी, डेरे के और लोगों को भी काम मिल गया.
इस सब में मितिया को लगने लगा रंग जी कुछ बदल सा गया है , अब वो उससे थोड़ा दूर रहने लगा है , उसके कंधे पर सर रखे भी तो महीनो हो गए , जब टूरिस्ट लोग मितिया की तस्वीरे लेते और उसकी तारीफ़ करते तो रंग जी ने कदम और पीछे खीच लेता और कही भीड़ में गुम हो जाता.
एक दिन इटेम के बाद मितिया रंगजी को ढूँढने निकली तो देखा एक अंग्रेजन रंगजी के कंधे पर हाँथ रखे खड़ी है, और लिपट लिपट पर तस्वीरे खिचवा रही है, मितिया को मनो साप सूंघ गया, मितिया को मर्दों की कमी नहीं थी पर रंगजी जैसा उसके डेरे में कोई नहीं था , बांका जवान,कोई बुरी आदत नहीं .
उसके आँखों में आंसू की लकीर तैर गई , गुस्से से चेहरा गर्म हो गया, दिल की जलन चेहरे से साफ़ झलक रही थी और शायद जबान से भी निकल आती की रंगजी की निगाह अकेली खड़ी मितिया पर पड़ गई....एक पल में उसे सब समझ में आ गया तीन साल से साथ था मितिया के ..लपक कर उसने मितिया का हाँथ पकड़ लिया ..
मेमसाब दोनों को साथ देखकर एक दम बोली "ऐसे ही खड़े रहो बहुत अछे लग रहे हो दोनों साथ "
एक तरफ टूरिस्ट दोनों की तस्वीरे खीच रहे थे , पर दोनों एक दुसरे का हाँथ धीरे से दबाते हुए अपने मन की बात आँखों ही आँखों में बोल रहे थे ....
अकेले में मितिया धीरे से बोली " लगन करेगा मुझसे ....अब मुझसे अकेले नहीं रहा जाता "
रंग जी ने हस कर कहा "तो फिर तुझे झुलनी (नथ) गडाने के लिए सावन का इंतज़ार नहीं करना पडेगा ...
और मितिया और रंग जी एक दुसरे की बाहों में खो गए
Tuesday, January 12, 2010
Wednesday, January 6, 2010
डर
अचानक मेरी आँख खुलती है,मैं अपने आप को एक अंधरे कमरे में पाती हूँ जहाँ मुझे कुछ भी नहीं सूझ रहा,दिल का बोझ दिमाग पर हावी होने लगा है, दिमाग में सारे समय घडी की सुइयों की तरह कुछ कुछ चलता रहता है ,और इसी सोच में कभी कभी मन की बातें अपने आप जुबां से निकलने लगती है, जो सामने वाले को बडबडाने जैसा लगता है, मुझे इस घुटन से बाहर निकालो प्लीज़........................... मैं अचानक चीख पड़ती हूँ ,
"का भवा गुडिया कौन्हों बुरा सपना देखिन का " निर्मला काकी ने मेरे माथे पर हाँथ फेरते हुए कहा, काकी के झुरियों भरे हाँथ का स्पर्श मुझे दो पल तो सुकून देता है पर , वो हाँथ हटतेही मैं फिर उसी अँधेरे कुएं में डूबता सा महसूस करती हूँ, कई बार अपने भयानक सपनों में मैं मैंने निर्मला काकी को पुकारने की कोशिश भी की पर गले से आवाज़ ही नहीं निकली,
"का भवा लल्ली ", काकी ने लगभग मुझे झिझोड़ते हुए कहा . "अरी सूरज देबता सर अपर आई गए है ,दिन चढ़े सोती ही रहियो का , स्कूल नहीं जाने है का ",कहते हुए उन्होंने खिडकियों के परदे हटा दिए .....मेरे कालेज का आखिरी साल था पर काकी के लिए मैं अभी भी स्कूल में ही थी.
खिडकियों के पार सूर्यदेव अपनी आभा बिखेर रहे थे, बहुत ही सुहानी सुबह थी ,शायद ये सुबह की ताज़ा किरने और हवा का असर था ,जो मेरे डरावने सपने की स्मृति एक दम से लुप्त हो गई.
बस से कालेज का सफ़र एक घंटे का है मैं अपनी सीट पर बैठ कर वापस अपने ख्यालों में खो गई, रात होते ही मैं एकदम अकेली क्यों हो जाती हूँ मुझे डरावने सपने क्यों घेर लेते है,हे ईश्वर रात आया ही ना करे..........
बचपन से ही अपने आसपास हमेशा काकी को ही पाया मम्मी, पापा अपनी जॉब में बिजी रहे वो कोशिश करके भी मेरे लिए समय नहीं निकाल नहीं पाते,रात को उनकी नींद में व्यवधान ना हो इसलिए मुझे शुरू से अकेले सोने की आदत डाल दी, अपनी गुडिया को पकड़ कर मैं सोने लगी.
मेरी बालपन की बेसुध नींद शायद उस दिन से ही मुझसे दूर हो गई जबसे मैंने अपने कमरे में आधी रात को किसी अजनबी को महसूस किया,अपने कंधे पर किसी के हाँथ का स्पर्श पाकर मैंने आँखे खोली और पहचानना चाहा,पर अँधेरे को चीरता वो साया कही लुप्त हो गया,उसके बाद कई रातों तक मैं सो नहीं पाई,माँ से कहना चाहा पर उन्हें ये मेरा भ्रम लगा ..उनके पास मेरे लिए समय के अलावा सब कुछ था , अपने कैशोर्य में मैं ..किसी करीबी सहेली ,बड़ी बहन की कमी से गुज़र रही थी जिससे मैं बात कर सकू. मेरे माँ के पास सोने के अनुरोध को मेरा बचपना समझ कर टाल दिया गया...
फिर एक रात वो हुआ जिसने शायद मेरा आत्मविश्वास हमेशा के लिए जगा दिया रात के अँधेरे में मैंने फिर उसी साए को अपने कमरे में महसूस किया,मैं दम साधे लेती रही मैं अपने डर का चेहरा देखना चाहती थी,उसके हाँथ मेरे कंधे पर थे और वो मेरे चेहरे की तरफ घूर रहा था,शायद यह निश्चिन्त कर रहा था मैं सो चुकी हूँ,मेरे हाँथ धीरे धीरे टोर्च की तरफ बढ़ रहे थे हो मैंने छुपा कर रखी थी, मैंने टोर्च जला कर अचानक उसके चेहरे पर मारी, और चीखने लगी,मैंने उसका शर्ट पकड़ लिया कुछ ही पलों में माँ और पापा कमरे में आ गए , कमरे की लाइट जल चुकी थी , मेरा डर कोई भ्रम नहीं था, हमारा ड्राईवर कमरे में सर झुकाए खडा था, और उससे ज्यादा झुका हुआ हुआ सर था मेरे माँ और पापा का..............मेरे चेहरे पर गुस्से,डर और अपमान के भाव एक साथ थे रुंधे गले से मैं कुछ बोलना चाहती थी पर माँ ने मुझे गले से लगा लिया और मैं रो पड़ी..शायद अब शब्दों की जरूरत नहीं रह गई थी.
कहा अनकहा सबकी समझ में आ चुका था........माँ और पापा अब मुझे अपने साथ होने का विश्वास दिला रहे है है .
वो रात जा चुकी है उसके बाद कितनी रातें गुजर चुकी है पर मेरे मन के कोने में कहीं एक डर अपना निशाँ छोड़ गया है,जो आज भी मेरे व्यक्तित्व को झिंझोड़ जाता है ......
"का भवा गुडिया कौन्हों बुरा सपना देखिन का " निर्मला काकी ने मेरे माथे पर हाँथ फेरते हुए कहा, काकी के झुरियों भरे हाँथ का स्पर्श मुझे दो पल तो सुकून देता है पर , वो हाँथ हटतेही मैं फिर उसी अँधेरे कुएं में डूबता सा महसूस करती हूँ, कई बार अपने भयानक सपनों में मैं मैंने निर्मला काकी को पुकारने की कोशिश भी की पर गले से आवाज़ ही नहीं निकली,
"का भवा लल्ली ", काकी ने लगभग मुझे झिझोड़ते हुए कहा . "अरी सूरज देबता सर अपर आई गए है ,दिन चढ़े सोती ही रहियो का , स्कूल नहीं जाने है का ",कहते हुए उन्होंने खिडकियों के परदे हटा दिए .....मेरे कालेज का आखिरी साल था पर काकी के लिए मैं अभी भी स्कूल में ही थी.
खिडकियों के पार सूर्यदेव अपनी आभा बिखेर रहे थे, बहुत ही सुहानी सुबह थी ,शायद ये सुबह की ताज़ा किरने और हवा का असर था ,जो मेरे डरावने सपने की स्मृति एक दम से लुप्त हो गई.
बस से कालेज का सफ़र एक घंटे का है मैं अपनी सीट पर बैठ कर वापस अपने ख्यालों में खो गई, रात होते ही मैं एकदम अकेली क्यों हो जाती हूँ मुझे डरावने सपने क्यों घेर लेते है,हे ईश्वर रात आया ही ना करे..........
बचपन से ही अपने आसपास हमेशा काकी को ही पाया मम्मी, पापा अपनी जॉब में बिजी रहे वो कोशिश करके भी मेरे लिए समय नहीं निकाल नहीं पाते,रात को उनकी नींद में व्यवधान ना हो इसलिए मुझे शुरू से अकेले सोने की आदत डाल दी, अपनी गुडिया को पकड़ कर मैं सोने लगी.
मेरी बालपन की बेसुध नींद शायद उस दिन से ही मुझसे दूर हो गई जबसे मैंने अपने कमरे में आधी रात को किसी अजनबी को महसूस किया,अपने कंधे पर किसी के हाँथ का स्पर्श पाकर मैंने आँखे खोली और पहचानना चाहा,पर अँधेरे को चीरता वो साया कही लुप्त हो गया,उसके बाद कई रातों तक मैं सो नहीं पाई,माँ से कहना चाहा पर उन्हें ये मेरा भ्रम लगा ..उनके पास मेरे लिए समय के अलावा सब कुछ था , अपने कैशोर्य में मैं ..किसी करीबी सहेली ,बड़ी बहन की कमी से गुज़र रही थी जिससे मैं बात कर सकू. मेरे माँ के पास सोने के अनुरोध को मेरा बचपना समझ कर टाल दिया गया...
फिर एक रात वो हुआ जिसने शायद मेरा आत्मविश्वास हमेशा के लिए जगा दिया रात के अँधेरे में मैंने फिर उसी साए को अपने कमरे में महसूस किया,मैं दम साधे लेती रही मैं अपने डर का चेहरा देखना चाहती थी,उसके हाँथ मेरे कंधे पर थे और वो मेरे चेहरे की तरफ घूर रहा था,शायद यह निश्चिन्त कर रहा था मैं सो चुकी हूँ,मेरे हाँथ धीरे धीरे टोर्च की तरफ बढ़ रहे थे हो मैंने छुपा कर रखी थी, मैंने टोर्च जला कर अचानक उसके चेहरे पर मारी, और चीखने लगी,मैंने उसका शर्ट पकड़ लिया कुछ ही पलों में माँ और पापा कमरे में आ गए , कमरे की लाइट जल चुकी थी , मेरा डर कोई भ्रम नहीं था, हमारा ड्राईवर कमरे में सर झुकाए खडा था, और उससे ज्यादा झुका हुआ हुआ सर था मेरे माँ और पापा का..............मेरे चेहरे पर गुस्से,डर और अपमान के भाव एक साथ थे रुंधे गले से मैं कुछ बोलना चाहती थी पर माँ ने मुझे गले से लगा लिया और मैं रो पड़ी..शायद अब शब्दों की जरूरत नहीं रह गई थी.
कहा अनकहा सबकी समझ में आ चुका था........माँ और पापा अब मुझे अपने साथ होने का विश्वास दिला रहे है है .
वो रात जा चुकी है उसके बाद कितनी रातें गुजर चुकी है पर मेरे मन के कोने में कहीं एक डर अपना निशाँ छोड़ गया है,जो आज भी मेरे व्यक्तित्व को झिंझोड़ जाता है ......
Thursday, December 17, 2009
वापसी (भाग-१ )
कहते है जब ज़िन्दगी बोझिल सी लगने लगे तो थोडी देर ठहर कर फिर आगे बढ़ना चाहिए, आज मैं भी थोडी देर के लिए रुक गई हूँ ऐसा नहीं है की मेरी ज़िन्दगी बोझ बन गई है पर क़दमों में थोडा भारीपन सा महसोस हो रहा है, आज ऑफिस से लौट कर थकावट महसूस कर रही हूँ ,दोनों बच्चे अभी कोचिंग से लौटे नहीं है आठ बजे तक आयेंगे ,अभी काफी समय है मेरे पास आराम करने के लिए, कपडे बदल कर फ्रेश हो कर आई तो सामने किरण चाय का प्याला लिए मेरा इंतज़ार कर रही थी , किरण मेरी कामवाली की बेटी बचपन से मेरे घर में रही अब ओ परिवार का एक हिस्सा सी बन गई है,उसके ग्यारहवी की परीक्षा अभी ख़त्म हुई है ,सो अपनी माँ की मदद करने आ गई ,
चाय पी कर आँख बंद कर के लेट गई ....तो अचानक अपनी माँ का चेहरा आँखों के सामने आ गया आज ना जाने माँ की बहुत याद आ रही है ,मन करता है उड़ कर पहुँच जाऊं .बॉम्बे से कानपुर इतना आसान नहीं तो मुश्किल भी नहीं,
आज रात को अजय से बात करती हूँ ,घर से ऑफिस, ऑफिस से घर सुबह छह बजे से रात बारह बजे तक का समय मशीन की तरह लगे लगे कहाँ बीत जाता है पता नहीं चलता...सोचते सोचते कब आँख लग गई पता ही नहीं चला ......अचानक कानों में आवाज़ आई ,इस समय लेटी हो तबियत तो ठीक है ,उनींदी आँखों से देखा तो अजय खड़े थे ....एक दम से उठ कर बैठ गई घडी साढ़े आठ बजा रही थी "अरे बहुत समय हो गया ,बच्चे आ गए क्या ,किसी ने उठाया क्यों नहीं "
अजय मुस्कुरा कर बोले कोई बात नहीं कभी कभी आराम कर लेना चाहिए ,तभी बच्चों की आवाज़ आई "मॉम डैड डिनर सर्व हो गया है जल्दी आइये "
डिनर टेबल मेरे घर में एक ऐसी जगह है जहा सारा परिवार बैठ कर पूरे दिन का हाल चाल सुनाता है ,दीक्षा अपने फ्रेंड्स की बातें बता रही थी बीच बीच में अर्नव उसको छेड़ रहा था,अजय उस नोक झोक का मजा ले रहे थे .अचानक दीक्षा बोली "मॉम आप यहाँ होकर भी यहाँ नहीं हो क्या बात है "
मैं खुद भी बात करने वाली सो धीमी सी आवाज़ में बोली "सोच रही हूँ कुछ दिन माँ के पास रहूँ ,कभी साल हो गए उनसे मिले हुए बहुत मन कर रहा है ". अर्नव मुस्कुरा कर बोला "तो ये बात है मैं अभी रिज़र्वेशन करवा देता हूँ यहाँ से देहली की फ्लाईएट ले वहां से ट्रेन " आपको जब तक मन करे रहना फिर मैं और दीक्षा भी आ जायेंगे आपको लेने हमें भी काफी समय हो गया है नानी से मिले हुए ".
कानपुर जाने का सोच कर मन फ्रेश हो गया अगले ही दिन ऑफिस में छुटियों की अर्जी दे दी जो मंज़ूर भी हो गई, मन फिर से अल्हड सा हो गया ,माँ और भाभी को फ़ोन से आने का बताया तो दोनों बहुत खुश हुई वैसे भी मेरी भाभी ,भाभी कम सहेली ज्यादा है आज भी घंटों फ़ोन पर बतियाते है ....जाने से पहले सारे काम निपटा लिए पैकिंग सबके लिए शौपिंग और भी बहुत कुछ .
जाने की ख़ुशी में समय के मानों पंख लग गए और मैं अपने कानपुर स्टेशन पर खड़ी थी, आँखें बेसब्री से अपने परिचित चेहरे ढूंढ रही थी ,तभी कंधे पर किसी का हाँथ महसूस हुआ पलती तो बड़े भैया खड़े मुस्कुरा रहे थे, गले लगा कर बोले "कैसी है बिट्टो ",
बिट्टो मेरा प्यार का नाम, सुधा मैडम सुनते सुनते मैं मैडम ही बन गई थी ,और चंचल सी बिट्टो ना जाने कहाँ खो गई थी, भैया के गले लगी तो आँखों के कोरों पर नन्हे नन्हे दो मोती झलक आये ,
भैया सर पर चपत लगा कर बोले " दो बच्चों की माँ बन गई इतनी बड़ी कंपनी में अफसर, पर रही तो झल्ली की झल्ली ,रो क्यों रही है ". मैंने मुस्कुराते हुए जवाब दिया "कुछ भी बन जाऊं भैया पर आपके लिए तो आपकी बिट्टो ही रहूंगी ".
सारे रास्ते कितने सारे सवाल थे मन में सबके लिए पूछूंगी नीता ताई कैसी है , उनकी बहु को कुछ हुआ , राधा मौसी के बच्चे भी तो अब शादी लायक हो गए होंगे , बगल वाले शर्मा अंकल की तबियत कैसी है, अपनी ज़मीन पर पैर रखते ही जैसे सारे भूले बिसरे नाम और रिश्ते वापस याद आ गए,
जहाँ बॉम्बे में ट्रैफिक को लेकर परेशान रहती हूँ ,वही कानपुर की सड़कों पर लगा रिक्शा,साईकिल ,हाँथगाड़ी का जाम भी अपना सा लग रहा है,बिलकुल सुकून ना ऑफिस जाने की जल्दी ना कोई टेंशन. गली में घुसते हुए ताज़ी उतरती कचोरी और जलेबी की खुशबू नें याद दिलाया की भूख लग रही है ,भैया हँस कर बोले तुझे घर छोड़ कर तेरे लिए ताजा नाश्ता ले आऊंगा , आज भी भैया मेरा चेहरा बढ़ लेते है, आखिर उनकी इकलौती लाडली बहन जो थी जिसे भैया कभी बहुत दूर नहीं जाने देना चाहते थे बंगलोर का रिश्ता उन्होंने इसीलिए मना किया था, पर उनको क्या पता था जिस बहन को वो लखनऊ ब्याह रहे है वो बॉम्बे जा कर रहेगी...शरू में हर राखी दूज पर दिल भारी हो जाता ना भैया की उदासी कम होती ना उनकी बिट्टो के आंसू रुकते,
पर समय बहुत बलवान होता है धीरे धीरे मैं अपने घर और ऑफिस में व्यस्त होती गई, पर फोन से बराबर बात होती रही, अपने घर की गली में मुड़ते ही मानों बचपन वापस लौट कर आ गया मैं गर्दन घुमा कर देख ही रही थी की घर के सामने गजानन चाचा के घर पर ताला लटकते देख कर परेशान हो गई , वो घर ऐसा था जिसके दरवाजे हमेशा सभी के लिए खुले रहते थे.... क्रमश:
चाय पी कर आँख बंद कर के लेट गई ....तो अचानक अपनी माँ का चेहरा आँखों के सामने आ गया आज ना जाने माँ की बहुत याद आ रही है ,मन करता है उड़ कर पहुँच जाऊं .बॉम्बे से कानपुर इतना आसान नहीं तो मुश्किल भी नहीं,
आज रात को अजय से बात करती हूँ ,घर से ऑफिस, ऑफिस से घर सुबह छह बजे से रात बारह बजे तक का समय मशीन की तरह लगे लगे कहाँ बीत जाता है पता नहीं चलता...सोचते सोचते कब आँख लग गई पता ही नहीं चला ......अचानक कानों में आवाज़ आई ,इस समय लेटी हो तबियत तो ठीक है ,उनींदी आँखों से देखा तो अजय खड़े थे ....एक दम से उठ कर बैठ गई घडी साढ़े आठ बजा रही थी "अरे बहुत समय हो गया ,बच्चे आ गए क्या ,किसी ने उठाया क्यों नहीं "
अजय मुस्कुरा कर बोले कोई बात नहीं कभी कभी आराम कर लेना चाहिए ,तभी बच्चों की आवाज़ आई "मॉम डैड डिनर सर्व हो गया है जल्दी आइये "
डिनर टेबल मेरे घर में एक ऐसी जगह है जहा सारा परिवार बैठ कर पूरे दिन का हाल चाल सुनाता है ,दीक्षा अपने फ्रेंड्स की बातें बता रही थी बीच बीच में अर्नव उसको छेड़ रहा था,अजय उस नोक झोक का मजा ले रहे थे .अचानक दीक्षा बोली "मॉम आप यहाँ होकर भी यहाँ नहीं हो क्या बात है "
मैं खुद भी बात करने वाली सो धीमी सी आवाज़ में बोली "सोच रही हूँ कुछ दिन माँ के पास रहूँ ,कभी साल हो गए उनसे मिले हुए बहुत मन कर रहा है ". अर्नव मुस्कुरा कर बोला "तो ये बात है मैं अभी रिज़र्वेशन करवा देता हूँ यहाँ से देहली की फ्लाईएट ले वहां से ट्रेन " आपको जब तक मन करे रहना फिर मैं और दीक्षा भी आ जायेंगे आपको लेने हमें भी काफी समय हो गया है नानी से मिले हुए ".
कानपुर जाने का सोच कर मन फ्रेश हो गया अगले ही दिन ऑफिस में छुटियों की अर्जी दे दी जो मंज़ूर भी हो गई, मन फिर से अल्हड सा हो गया ,माँ और भाभी को फ़ोन से आने का बताया तो दोनों बहुत खुश हुई वैसे भी मेरी भाभी ,भाभी कम सहेली ज्यादा है आज भी घंटों फ़ोन पर बतियाते है ....जाने से पहले सारे काम निपटा लिए पैकिंग सबके लिए शौपिंग और भी बहुत कुछ .
जाने की ख़ुशी में समय के मानों पंख लग गए और मैं अपने कानपुर स्टेशन पर खड़ी थी, आँखें बेसब्री से अपने परिचित चेहरे ढूंढ रही थी ,तभी कंधे पर किसी का हाँथ महसूस हुआ पलती तो बड़े भैया खड़े मुस्कुरा रहे थे, गले लगा कर बोले "कैसी है बिट्टो ",
बिट्टो मेरा प्यार का नाम, सुधा मैडम सुनते सुनते मैं मैडम ही बन गई थी ,और चंचल सी बिट्टो ना जाने कहाँ खो गई थी, भैया के गले लगी तो आँखों के कोरों पर नन्हे नन्हे दो मोती झलक आये ,
भैया सर पर चपत लगा कर बोले " दो बच्चों की माँ बन गई इतनी बड़ी कंपनी में अफसर, पर रही तो झल्ली की झल्ली ,रो क्यों रही है ". मैंने मुस्कुराते हुए जवाब दिया "कुछ भी बन जाऊं भैया पर आपके लिए तो आपकी बिट्टो ही रहूंगी ".
सारे रास्ते कितने सारे सवाल थे मन में सबके लिए पूछूंगी नीता ताई कैसी है , उनकी बहु को कुछ हुआ , राधा मौसी के बच्चे भी तो अब शादी लायक हो गए होंगे , बगल वाले शर्मा अंकल की तबियत कैसी है, अपनी ज़मीन पर पैर रखते ही जैसे सारे भूले बिसरे नाम और रिश्ते वापस याद आ गए,
जहाँ बॉम्बे में ट्रैफिक को लेकर परेशान रहती हूँ ,वही कानपुर की सड़कों पर लगा रिक्शा,साईकिल ,हाँथगाड़ी का जाम भी अपना सा लग रहा है,बिलकुल सुकून ना ऑफिस जाने की जल्दी ना कोई टेंशन. गली में घुसते हुए ताज़ी उतरती कचोरी और जलेबी की खुशबू नें याद दिलाया की भूख लग रही है ,भैया हँस कर बोले तुझे घर छोड़ कर तेरे लिए ताजा नाश्ता ले आऊंगा , आज भी भैया मेरा चेहरा बढ़ लेते है, आखिर उनकी इकलौती लाडली बहन जो थी जिसे भैया कभी बहुत दूर नहीं जाने देना चाहते थे बंगलोर का रिश्ता उन्होंने इसीलिए मना किया था, पर उनको क्या पता था जिस बहन को वो लखनऊ ब्याह रहे है वो बॉम्बे जा कर रहेगी...शरू में हर राखी दूज पर दिल भारी हो जाता ना भैया की उदासी कम होती ना उनकी बिट्टो के आंसू रुकते,
पर समय बहुत बलवान होता है धीरे धीरे मैं अपने घर और ऑफिस में व्यस्त होती गई, पर फोन से बराबर बात होती रही, अपने घर की गली में मुड़ते ही मानों बचपन वापस लौट कर आ गया मैं गर्दन घुमा कर देख ही रही थी की घर के सामने गजानन चाचा के घर पर ताला लटकते देख कर परेशान हो गई , वो घर ऐसा था जिसके दरवाजे हमेशा सभी के लिए खुले रहते थे.... क्रमश:
Saturday, December 5, 2009
शक
नारी का तन उपजाऊ होता है तो मानव का मन , हंसी आ रही है ना, स्त्री शारीर में अगर बीज पड़े तो नै ज़िन्दगी जनम लेती है , अगर मानव मन में बीज पड़े तो शक का ऐसा पौधा जन्म लेता है जिसकी जडें पीपल से भी गहरी होती है ,काटते काटते हांथों में छाले पड़ जाते है ,आँखों में आसुओं का सैलाब उमड़ आता है जो उतरने का नाम नहीं लेता , पर वो जिद्दी जड़े थोड़े थोड़े समय बाद फिर हरी हो जाती है या अपनी चुभन से अपने होने का एहसास दिलाती हैं,
नीरजा की डायरी के पन्ने पलटते हुए अनुज की निगाह कुछ पंक्तियों पर अटक गई " आज देव का इंतज़ार बहुत लंबा हो गया है पता नहीं कहाँ रह गया ढेर साड़ी बातें बतानी है ,बहुत खुश होगा ना वो ", अचानक नीरजा ने अनुज से डायरी छीन ली "क्या करते हो तुम भी ना ,किसी से बिना पूछे उसकी वक्तिगत डायरी नहीं पढ़ा करते ",
"ओह तो अब मैं पराया हो गया और तुम किसी हो गई " अनुज ने तल्ख़ अंदाज़ में कहा, "और फिर इस डायरी में ऐसा क्या है जो तुम मुझसे छिपाना चाहती हो "
"अरे बाप रे तुम तो नाराज़ हो गए " नीरजा ने अनुज को छेड़ते हुए कहा .
"तुम्हारा और देव का रिश्ता कैसा था " अनुज ने सीधे अपने मन की बात नीरजा के सामने रख दी , नीरजा जानती थी अनुज कभी घुमा-फिरा कर बात नहीं करते पर जो बात उनके मन में धंस जाए उसको निकलना बहुत मुश्किल होता है.
"मैंने बताया था न मैं और देव पडोसी होने के साथ सहपाठी भी थे, बचपन से साथ पले बढे थे "
"तो वो देवदास था और तुम उसकी पारो " अनुज ने तिरछी निगाहों देखा और मुस्कुरा दिया, अनुज की मुस्कराहट में छिपे व्यंग को समझना नीरजा के लिए मुश्किल नहीं था.
"मैंने बता दिया ना मेरा और देव का सम्बन्ध दो अछे दोस्तों का था उससे अधिक कुछ भी नहीं "
"तो मैं कब कह रहा हूँ दोस्ती से ज्यादा था " अनुज ने तीर छोड़ने जारी रखा
"अब मैं तुम्हारी कल्पना के घोड़ों पर तो लगाम नहीं लगा सकती तो तुम स्वतंत्र हो अपने मन के घोड़े दौडाने के लिए ". नीरजा व्यर्थ के वाद विवाद में नहीं पढ़ना चाहती थी सो वो कह कर भूल गई .
दिन बीते पर अनुज के मन में पड़े शक के बीज में कोंपल फूटने लगी ,नीरजा के व्यवहार ,आचरण , सब में वो वह खाद ढूँढने लगा तो उसकी सोच को सही साबित कर दे.
अपनी बने हुई कलोल कल्पना की दुनिया में धीरे धीरे अनुज क़ैद होने लगा, नीरजा अगर श्रृगार करती तो उसको लगता वो देव के लिए है ,अगर ओ किसी किताब को पढ़ते पढ़ते मुस्कुरा देती तो तो अनुज को नीरजा के देव के ख्यालों में खोये हुए होने का भ्रम घेर लेता, हालाँकि अभी तक अनुज ने देव को देखा नहीं था पर अपनी शक की दुनिया में वो उसको कई बार मूर्त रूप दे चूका था , कई बार उसका मन होता नीरजा से फिर कुछ पूछे , पर उस दिन के नीरजा के तेवर याद कर उसकी हिम्मत जवाब दे जाती आखिर पूछे भी तो क्या , डायरी की उस एक पंक्ति के अतिरिक्त और कुछ भी तो नहीं था,.
अगर नीरजा को उसके मन में छिपे चोर का पता चल गया तो शायद वो उसे छोड़ भी सकती है , उसके स्वाभिमानी व्यक्तित्व से भी वो भली प्रकार परिचित था. अपना बुना जाल अब उसका जीना मुश्किल कर रहा था.
"हाय जीजू , कैसे हो " नीरजा की छोटी बहिन नलिनी की आवाज़ से अनुज मनो वर्तमान में लौट आया
"बस मैडम आप आ गई है तो सब बढ़िया ही बढ़िया हो जाएगा " अनुज ने मुस्कुराते हुए कहा , नलिनी अपनी परीक्षा के सिलसिले में आई थी, १ हफ्ते की परीक्षा के बाद नीरजा ने बहिन को रोक लिया, नलिनी के जीवंत व्यक्तित्व से घर भर में मनो रौनक छ गई, नीरजा और अनुज में बीच जो सन्नाटा पसारने लगा था उसकी छाया और प्रभाव अब धूमिल होने लगे.
"अरे दीदी देव भैया को बेटा हुआ है , मम्मी बता रही थी मैंने नंबर ले लिया है चलो विश करते हैं " नलिनी ने मम्मी से बात करके फ़ोन रखते हुए कहा
देव का नाम सुनते ही अनुज ने बुरा सा मुह बनाया मनो पहले कौर में बाल आ गया हो, जीजा जी के चेहरे पर हुए इस भाव परिवर्तन को नलिनी ने महसूस किया, उसको कुछ समझ में नहीं आया.उसने अपनी यह सोच नीरजा के सामने रखी .
"दीदी कोई प्रॉब्लम है क्या, देव भैया का नाम सुनते ही जीजू के चहरे पर अजीब सा भाव आ गया था "
" ऐसी तो कोई बात नहीं है एक दिन हम लोगों में कुछ डिस्कसन हुआ था बस, तुझे भ्रम हुआ होगा " नलिनी की बात को टालते हुए नीरजा ने कहा , नलिनी उसके उत्तर से संतुष्ट हो कर सोने चली गई पर नीरजा स्वयं संतुष्ट नहीं हो पाई,अनुज के वयवहार में आये परिवर्तन को वो महसूस तो कर रही थी पर उसकी जड़ में देव होगा ये उसने सोचा नहीं था, उस दिन के बाद दोनों अपने कामों में व्यस्त हो गए थे नीरजा तो उस बात को भूल चुकी थी, उसे महसूस हो रहा था उस दिन के बाद अनुज सहज नहीं हो पा रहा था , या तो ऑफिस से आकर वो लैपटॉप खोल लेता या सो जाता उनके बीच बस मतलब भर की बात ही होती, नीरजा जिसको काम की अधिकता समझ रही थी वो कही कुछ और तो नहीं ...............
नलिनी को विदा कर नीरजा अनुज के पास आकर बैठ गई और उसके कंधे पर अपना सर रख दिया, "कितना सूना लग रहा है ना नलिनी के बिना , "हूँ " अनुज ने संछिप्त सा उत्तर दिया
"क्या हुआ थके से लग रहे हो ऑफिस में बहुत काम है क्या " नीरजा ने अनुज का हाँथ सहलाते हुए कहा
"ऐसा कुछ ख़ास नहीं है ,बस यूँ ही " अनुज बोला
"बहुत दिन हो गए चलो कहीं होकर आते है, मेरा भी अभी प्रोजेक्ट ख़त्म हुआ है , एक अच्छा सा ब्रेक लेते है " नीरजा ने अपनी बाहें अनुज के गले में डाल दी
अनुज ने नीरजा के तरफ देखा उसका चेहरा एक दम मासूम सा लगा , उसने उस चेहरे में कुछ ढूँढने की कोशिश की पर वहां तो बस उसे अपने लिए प्यार नज़र आ रहा था, नीरजा बोले जा रही थी और अनुज का मन एक अंतर्द्वंद में फँसा हुआ था, एक तरफ उसकी अपनी बने कल्पना थी दूसरी ररफ नीरजा जो बच्चो सी निश्छल , उसके चेहरे पर भाव तेजी से आ जा रहे थे, तभी उसके मन में एक प्रश्न कौंधा
"मैं आखिर शक कर क्यों रहा हूँ " कभी नीरजा के किसी भी बात से महसूस भी नहीं हुआ की वो मेरे अलावा किसी और को चाहतो भी है ,अब उसने अपनी सारी सोच को दिमाग की चलनी से छानना शुरू किया, शक के कीड़े अलग हो गए और रह गया उनका निर्मल रिश्ता.
पिछले दिनों किया गया अपना व्यवहार उसकी आँखों के सामने आने लगा , जितना बचपना उसने किया था , ये तो शुक्र है नीरजा को मेरे मन के पागलपन का एहसास नहीं है वरना तो मैं निगाह भी नहीं मिला पाता.
अचानक उसकी आँखों में नमी तैर गई , अपनी अपरिपक्वता के चलते वो अपनी नीरजा को खोने चला था ये सोचते ही उसका दिल घबरा उठा ,और उसने नीरजा को गले से लगा लिया.
बहुत दिनों बाद आज वो और नीरजा अकेले थे उन दोनों के बीच में कोई नहीं था ...देव भी नहीं
नीरजा की डायरी के पन्ने पलटते हुए अनुज की निगाह कुछ पंक्तियों पर अटक गई " आज देव का इंतज़ार बहुत लंबा हो गया है पता नहीं कहाँ रह गया ढेर साड़ी बातें बतानी है ,बहुत खुश होगा ना वो ", अचानक नीरजा ने अनुज से डायरी छीन ली "क्या करते हो तुम भी ना ,किसी से बिना पूछे उसकी वक्तिगत डायरी नहीं पढ़ा करते ",
"ओह तो अब मैं पराया हो गया और तुम किसी हो गई " अनुज ने तल्ख़ अंदाज़ में कहा, "और फिर इस डायरी में ऐसा क्या है जो तुम मुझसे छिपाना चाहती हो "
"अरे बाप रे तुम तो नाराज़ हो गए " नीरजा ने अनुज को छेड़ते हुए कहा .
"तुम्हारा और देव का रिश्ता कैसा था " अनुज ने सीधे अपने मन की बात नीरजा के सामने रख दी , नीरजा जानती थी अनुज कभी घुमा-फिरा कर बात नहीं करते पर जो बात उनके मन में धंस जाए उसको निकलना बहुत मुश्किल होता है.
"मैंने बताया था न मैं और देव पडोसी होने के साथ सहपाठी भी थे, बचपन से साथ पले बढे थे "
"तो वो देवदास था और तुम उसकी पारो " अनुज ने तिरछी निगाहों देखा और मुस्कुरा दिया, अनुज की मुस्कराहट में छिपे व्यंग को समझना नीरजा के लिए मुश्किल नहीं था.
"मैंने बता दिया ना मेरा और देव का सम्बन्ध दो अछे दोस्तों का था उससे अधिक कुछ भी नहीं "
"तो मैं कब कह रहा हूँ दोस्ती से ज्यादा था " अनुज ने तीर छोड़ने जारी रखा
"अब मैं तुम्हारी कल्पना के घोड़ों पर तो लगाम नहीं लगा सकती तो तुम स्वतंत्र हो अपने मन के घोड़े दौडाने के लिए ". नीरजा व्यर्थ के वाद विवाद में नहीं पढ़ना चाहती थी सो वो कह कर भूल गई .
दिन बीते पर अनुज के मन में पड़े शक के बीज में कोंपल फूटने लगी ,नीरजा के व्यवहार ,आचरण , सब में वो वह खाद ढूँढने लगा तो उसकी सोच को सही साबित कर दे.
अपनी बने हुई कलोल कल्पना की दुनिया में धीरे धीरे अनुज क़ैद होने लगा, नीरजा अगर श्रृगार करती तो उसको लगता वो देव के लिए है ,अगर ओ किसी किताब को पढ़ते पढ़ते मुस्कुरा देती तो तो अनुज को नीरजा के देव के ख्यालों में खोये हुए होने का भ्रम घेर लेता, हालाँकि अभी तक अनुज ने देव को देखा नहीं था पर अपनी शक की दुनिया में वो उसको कई बार मूर्त रूप दे चूका था , कई बार उसका मन होता नीरजा से फिर कुछ पूछे , पर उस दिन के नीरजा के तेवर याद कर उसकी हिम्मत जवाब दे जाती आखिर पूछे भी तो क्या , डायरी की उस एक पंक्ति के अतिरिक्त और कुछ भी तो नहीं था,.
अगर नीरजा को उसके मन में छिपे चोर का पता चल गया तो शायद वो उसे छोड़ भी सकती है , उसके स्वाभिमानी व्यक्तित्व से भी वो भली प्रकार परिचित था. अपना बुना जाल अब उसका जीना मुश्किल कर रहा था.
"हाय जीजू , कैसे हो " नीरजा की छोटी बहिन नलिनी की आवाज़ से अनुज मनो वर्तमान में लौट आया
"बस मैडम आप आ गई है तो सब बढ़िया ही बढ़िया हो जाएगा " अनुज ने मुस्कुराते हुए कहा , नलिनी अपनी परीक्षा के सिलसिले में आई थी, १ हफ्ते की परीक्षा के बाद नीरजा ने बहिन को रोक लिया, नलिनी के जीवंत व्यक्तित्व से घर भर में मनो रौनक छ गई, नीरजा और अनुज में बीच जो सन्नाटा पसारने लगा था उसकी छाया और प्रभाव अब धूमिल होने लगे.
"अरे दीदी देव भैया को बेटा हुआ है , मम्मी बता रही थी मैंने नंबर ले लिया है चलो विश करते हैं " नलिनी ने मम्मी से बात करके फ़ोन रखते हुए कहा
देव का नाम सुनते ही अनुज ने बुरा सा मुह बनाया मनो पहले कौर में बाल आ गया हो, जीजा जी के चेहरे पर हुए इस भाव परिवर्तन को नलिनी ने महसूस किया, उसको कुछ समझ में नहीं आया.उसने अपनी यह सोच नीरजा के सामने रखी .
"दीदी कोई प्रॉब्लम है क्या, देव भैया का नाम सुनते ही जीजू के चहरे पर अजीब सा भाव आ गया था "
" ऐसी तो कोई बात नहीं है एक दिन हम लोगों में कुछ डिस्कसन हुआ था बस, तुझे भ्रम हुआ होगा " नलिनी की बात को टालते हुए नीरजा ने कहा , नलिनी उसके उत्तर से संतुष्ट हो कर सोने चली गई पर नीरजा स्वयं संतुष्ट नहीं हो पाई,अनुज के वयवहार में आये परिवर्तन को वो महसूस तो कर रही थी पर उसकी जड़ में देव होगा ये उसने सोचा नहीं था, उस दिन के बाद दोनों अपने कामों में व्यस्त हो गए थे नीरजा तो उस बात को भूल चुकी थी, उसे महसूस हो रहा था उस दिन के बाद अनुज सहज नहीं हो पा रहा था , या तो ऑफिस से आकर वो लैपटॉप खोल लेता या सो जाता उनके बीच बस मतलब भर की बात ही होती, नीरजा जिसको काम की अधिकता समझ रही थी वो कही कुछ और तो नहीं ...............
नलिनी को विदा कर नीरजा अनुज के पास आकर बैठ गई और उसके कंधे पर अपना सर रख दिया, "कितना सूना लग रहा है ना नलिनी के बिना , "हूँ " अनुज ने संछिप्त सा उत्तर दिया
"क्या हुआ थके से लग रहे हो ऑफिस में बहुत काम है क्या " नीरजा ने अनुज का हाँथ सहलाते हुए कहा
"ऐसा कुछ ख़ास नहीं है ,बस यूँ ही " अनुज बोला
"बहुत दिन हो गए चलो कहीं होकर आते है, मेरा भी अभी प्रोजेक्ट ख़त्म हुआ है , एक अच्छा सा ब्रेक लेते है " नीरजा ने अपनी बाहें अनुज के गले में डाल दी
अनुज ने नीरजा के तरफ देखा उसका चेहरा एक दम मासूम सा लगा , उसने उस चेहरे में कुछ ढूँढने की कोशिश की पर वहां तो बस उसे अपने लिए प्यार नज़र आ रहा था, नीरजा बोले जा रही थी और अनुज का मन एक अंतर्द्वंद में फँसा हुआ था, एक तरफ उसकी अपनी बने कल्पना थी दूसरी ररफ नीरजा जो बच्चो सी निश्छल , उसके चेहरे पर भाव तेजी से आ जा रहे थे, तभी उसके मन में एक प्रश्न कौंधा
"मैं आखिर शक कर क्यों रहा हूँ " कभी नीरजा के किसी भी बात से महसूस भी नहीं हुआ की वो मेरे अलावा किसी और को चाहतो भी है ,अब उसने अपनी सारी सोच को दिमाग की चलनी से छानना शुरू किया, शक के कीड़े अलग हो गए और रह गया उनका निर्मल रिश्ता.
पिछले दिनों किया गया अपना व्यवहार उसकी आँखों के सामने आने लगा , जितना बचपना उसने किया था , ये तो शुक्र है नीरजा को मेरे मन के पागलपन का एहसास नहीं है वरना तो मैं निगाह भी नहीं मिला पाता.
अचानक उसकी आँखों में नमी तैर गई , अपनी अपरिपक्वता के चलते वो अपनी नीरजा को खोने चला था ये सोचते ही उसका दिल घबरा उठा ,और उसने नीरजा को गले से लगा लिया.
बहुत दिनों बाद आज वो और नीरजा अकेले थे उन दोनों के बीच में कोई नहीं था ...देव भी नहीं
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