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Saturday, February 20, 2010

इंतज़ार फागुन का

 पेड़ों पर लद गया भार फागुन का



गलियों में छा गया खुमार फागुन का


जब मन बहका सा हो और गालों पर दहके टेसू


समझलो ख़त्म हुआ इंतज़ार फागुन का






२.जब मन बहके और तन लहके


बिन बात कहीं मैं मुस्काऊं


नयन लगें हो राहों पर


सुलझी लट फिर से सुलझाऊं


कैसे हुई मैं बावरी


इसका मुझको ध्यान नहीं


जो फागुन में तुम आन मिलो प्रिय


मैं बासंती हो जाऊं



Tuesday, February 16, 2010

हर हर गंगे ! बम बम भोले


हमेशा अख़बारों में टीवी पर कुंभ से जुडी खबरें देखती थी, तो मन में विचार आता था कैसा लगता होगा ? बहुत भीड़ होती होगी ,गन्दगी, अव्यवस्था होगी, और चैनल बदलते ही कुंभ भी मन से निकल जाता.

शायद मेरा सोचना कुंभ के बारे में ऐसा हे रहता पर बम भोले की कृपा से शिवरात्रि पर हरिद्वार जाने का अचानक मौक़ा मिला , हमने इसे इश्वर की इक्छा माना रात १२ बजे कार्यक्रम बना और सुबह ५.३० पर निकल पड़े

११ फरवरी २०१०

सुबह सुबह कुछ अलसाए कुछ उत्साहित हम निकल पड़े भोले की नगरी की ओर बीच में आँख लग गई जब आँख खुली तो अपनी बाई ओर गंगा नहर को बहते पाया, इतना सुन्दर द्रश्य आँखें हट ही नहीं रही थी कभी सोचा ही नहीं था की सुबह इतनी सुहानी भी हो सकती है मेरा कवि मन गंगा की लहरों के साथ हिलोरे लेने लगा, अभी रास्ता लंबा था तो शिवानी जी की "शमशान चम्पा " को सखी बना लिया.

हरिद्वार हे प्रभु , कितना जीवंत ये कुंभ का प्रभाव था या मन की आस्था की लग रहा था की बस यही तो आना था मुझे, होटल से विश्वकर्मा घाट १०० मीटर की दूरी पर था जितना चाहो डुबकी लगाओ या किनारे बैठ कर भागीरथी की लहरों को निहारो, फ्रेश होकर कंधे पर कैमरा टांगा और अकेले निकल पड़ी, जब निकल रही थी तो सोचा नहीं था ये अनुबव जीवन पर्यंत याद रहेगा.

महाशिवरात्रि से एक दिन पहले मनो सारे रास्ते हर की पौड़ी की तरफ जा रहे थे हर प्रान्त ,हर वय के लोग आस्था की गंगा में डुबकी लगाने जा रहे थे,सबके चेहरे अजनबी थे पर सब एक ही डोर से बंधे लग रहे थे, मैं हमेशा भीड़ से घबराती थी पर ये समूह कुछ अलग था, श्रधा आस्था प्रेम धर्म सब एक ही जगह, अभेद सुरक्षा व्यवस्था की वजह से ३ किलोमीटर पैदल चलना पड़ा पर जैसे ही हर की पौड़ी के दर्शन हुए तो लगा मेहनत सफल हो गई.

सच में जीवनदायनी है गंगा, गंगाजल स्पर्श करते ही आँखे छलक पड़ी मन स्वतः ही अपने बिछड़े परिजनों को याद कने लगा और उनकी मुक्ति की कामना भी सच में अभूतपूर्व है गंगा और अद्भुत है कुंभ.

१२ फरवरी २०१०

महाकुभ महाशिवरात्रि और शाही स्नान ......सुबह से ही मन उद्वेलित क्या करुँगी आज होटल वालों से पूछा उन्होंने अखाड़ों के दर्शन करने की सलाह दी, तो फिर निकल पड़ी मैं हर की पौड़ी की ओर, पर ये क्या सारे रास्ते बंद पुलिस से पूछा उन्होंने बोला शंकराचार्य चौक पर बैठ जाइए सारे अखाड़े वही से निकालेंगे, अजीव सा रोमांच महसूस हो रहा था हजारों की भीड़ एक साथ,सड़क के किनारे बैठी थी,

मेरी संत समाज में कभी भी बहुत अधिक आस्था नहीं रही शायद ये हमारी पीढ़ी का दुर्भाग्य है, हम भी उनके बारे में जानते ही नहीं,मेरे साथ में आगरा से से आये एक बुजुर्ग थे उन्होंने मुझे अखाड़ों ,नागा बाबा, और उनके दर्शन के साथ करने का माहत्म्य बताया, मुझे तो सारा माहौल ही चमत्कारिक सा लग रहा था,अचानक कहे से भजनों के आवाज आई तो देखा, कुछ विदेशी युवा ढोलक मंजीरे लेकर शिव महिमा का गुणगान कर रहे है, कुछ लज्जा सी लगी मुझे बहुत याद करने पर भी ॐ नमह शिवाय के अलावा कुछ नहीं याद आया ना कोई मंत्र ना कोई भजन........

दो घंटों की प्रतीक्षा के बाद मैं तो वहां से उठने का मन बनाने लगी थी पर आस पास से आवाज आ रही थी "इश्वर के दर्शन इतने सहज नहीं होते , अब चाहें शाम हो जाए जायेंगे तो दर्शन कर के ". मेरी आस्था जो कहीं गुडगाँव की भाग दौड़ में मंद हो गई थी, धार्मिक मौहोल में वापस फलीभूत होने लगी.....

अचानक कुछ हलचल हुई और फिर मैंने जो देखा वो वास्तव में अद्भुत था झुण्ड के झुण्ड साधू , नागा बाबा हथियारों के साथ , सोने के सिहासन पर आरूढ़ महामंडलेश्वर ,उनके साथ शाही ध्वज लिए देश विदेश से आये भक्त जन, सब कुछ स्वप्न की तरह ,कितना सम्मोहक हाँथ अपने आप श्रधा से जुड़ गए , मस्तक झुक गया,और मन इश्वर को धन्यवाद देने लगा.

अपने सौभाग्य पर यकीन नहीं आ रहा था, सारे विश्व से आये संतों के दर्शन एक साथ , नागा बाबा तो साक्षात शिव का रूप लग रहे थे.......

कुंभ वास्तव में एक दर्शनीय अवसर है और उसपर शाही स्नान के दर्शन हो जाए तो सोने पर सुहागा,इस अनुबव नें मेरे मन को जो शान्ति और अपनी भारतीय धर्म और संत समाज के प्रति सम्मान और गर्व की अनुभूति दी है वो सदा मेरी स्मृति में रहेगी.

(लिखना तो बहुत था गंगा स्नान के बारे में, विदेशी भक्तों ,अवधूत बाबा के बारे में पर फिर कभी )

Thursday, February 4, 2010

लोग सवाल पूछेंगे


हम इस डर से लोगों का हाल नहीं पूछते

लोग फिर हमसे सवाल पूछेंगे
हम तो पूछेंगे कैसा है तबियत पानी
वो हमारे जख्मों का हाल पूछेंगे

गर वो हाल पूछे तो कोई बुराई नहीं
पर वो जख्मों को नाखून से कुरेदते है
हम मरहम की उम्मीद रखते है
वो सवालों से कलेजा बींध देते है

इसी लिए ख़ामोशी की चादर ओढ़ ली हमने
बस मुस्कुरा कर सर झुकाते हैं
करीब जायेंगे तो वही हाल होगा
इसलिए हर रिश्ता दूर से निभाते हैं

Saturday, January 30, 2010

आज यूँही


यार आज यूँही कुछ लिखने का मन कर रहा है ,बिना किसी विचार के बस मन में उठे भावों को शब्दों का चोला पहनाकर देखते है क्या रूप लेता है , कहते हैं मन की उड़ान हवा से भी तेज होती है तो आज कहाँ ले जा रहा है मेरा मन........आज मूड बहुत अच्छा है कुछ असर ठण्ड के कम होने का है और कुछ बसंत ऋतू का है.


आँखों में सपने चमकने लगे है और होठों पर अनायास ही मुस्कराहट खेल जाती है क्यों ना हो हवा हे कुछ बौराई सी है और मेरा मन इस हवा के साथ उड़ा जा रहा है, क्या आप को भी कभी बंधन मुक्त होने का एहसास हुआ है ...हुआ होगा अगर कभी किसी बंधन में पड़े होंगे ..फिर वही पागलपन

"कभी मन चाहे बाँध लूं अपने को हज़ार बंधन में ,और करूँ महसूस उनको अपने हर स्पंदन में "

चलिए बस ब्लॉग से गुज़रते हुए यूँही कुछ लिख दिया , बसंत के मद ने आप पर भी कुछ असर किया होगा ....

मैं तो ये पूरे जोश से मना रही हूँ

Wednesday, January 27, 2010

गर

गर ज़िन्दगी इतनी आसान होती


तो हर लैब पर खिची मुस्कान होती

गर होता आसान सपने सजाना

न पड़ता फिर पलकों पे आँसूं उठाना



जीना है फिर भी जिए जा रहे हैं

अपने दर्दों को सीने में पाले हुए है

शायद कभी रौशनी हो मयस्सर

सुना है अंधेरों के बाद ही उजाले हुए हैं

Tuesday, January 19, 2010

मितिया


"अब के सावन में झुलनी गड़ा दे पिया


जिया हरसाई दे पिया ना "

मितिया कमर हिला हिला कर नाच रही थी , पंद्रह साल की उम्र में झुलनी और पिया का मतलब थोड़ा थोड़ा समझने लगी थी, अपनी राधा मौसी को देख देख कर बंजारों के सारे हुनर सीख रही थी, देखने में भले ही हूर की परी ना हो पर, चेचरे पर कैशोर्य का लावण्या अपना रंग बिखेरने लगा था, मौसी की सीख मानकर छोटी सी मितिया जिसे मौसी मीतु बुलाती थी अपने को सबसे बचाकर चलती थी , गली देने को जबान और हाँथ में छुरी ऐसी कुशलता से चलती थी के सुनने वाले अपने कानो पर हाँथ रख लेते और देखने वाले दांतों टेल ऊँगली दबा लेते.

डेरे पर साथ में रहने वाले मर्दों की नज़र मितिया पर पड़ने लगी थी और मौसी को अपनी इस दौलत का पूरा एहसास था यही थी उनके बुढापे का सहारा सो सबसे बचाकर रखती थी,पर उनके समाज का खुलापन बहुत लम्बे समय तक मौसी को मितिया को बंधन में रखने से रोक ना सका, मितिया और रंगजी चोरी चोरी एक दुसरे को देखने लगे थे, अजीब सा सम्मोहन लगता था रंगजी को मितिया के नाच में ,जब वो घुँघरू बंधती तो अनोखा समा छा जाता, ऐसा कोई राहगीर नहीं होता जो उसे नज़रंदाज़ कर निकल जाए ढोल बजाता रंग जी भी कहाँ उस पर से अपनी निगाह हटा पाता था, हज़ारों मर्दों की निगाह मितिया पर होती पर मितिया रंगजी के निगाह की गर्मी से मानो पिघल सी जाती और और उस के नाच का बहाव और तेज़ हो जाता,

मौसी इस खेल से अनजान नहीं थी उन्होंने मितिया को हर तरह से समझाने की कोशिश की, पर इस उम्र का बहाव किसी भी बाँध से नहीं रुकता, मन और तन दोनों बावले हो उठते फिर कोई सीमा कहाँ, अल्हड उम्र पिया का साथ , भविष्य के सपने, आसमान भी उड़ने को छोटा लगने लगा.

घंटो चिलम फूकते और दोनों सपने बुनते ,मितिया अपनी इस ज़िन्दगी से छुटकारा चाहती थी ,रंगजी जो था उससे संतुष्ट था अपने डेरे वालों की तरह उसे शराब की भी लत नहीं थी सो सारी कमाई अपनी थी..कभी कभी मितिया की आँखों चमक रंगजी के दिल में दर बैठा देती वो कहता "मितु युझे आखिर करना क्या है ".

मितिया मुस्कुरा कर उसके कंधे पर सर रख देती.

एक दिन मितिया का नाच ख़त्म हुआ रंगजी सामान समेट रहा था अचानक सामने गाडी से उतर कर एक साब उतर कर आया, "बहुत अच्छा इटेम पेश किया तुम लोगों ने , आकर मुझसे मेरे होटल में मिलो "

मितिया और रंग जी की आँखे विस्मय से से फैल गई जब साब ने ५०० का पत्ता बक्शीश के रूप में उनके हाथ में रख दिया, दोनों समझ नहीं पा रहे थे, डेरे पर बड़े लोगों से सलाह ली तो कुछ ने डराया "अरे इ बाबू लोगो को भरोसा नहीं है ", तो कुछ ने मौक़ा न गवाने की सलाह दी , डेरे पर सबसे समझदार समझे जाने वाले नंदू को बुलाया गया ,नंदू बड़े बड़े शहरों में घूम चुका था थोड़ी अंग्रेजी भी बोल लेता था...तो फिर तै किया गया नंदू जाएगा मितिया और रंगजी के साथ.

होटल में पहुँच कर तीनों की मानों पलकों ने झपकना छोड़ दिया, महल जैसा , सूत बूट में घुमते साब लोग और परियों जैसी मेंम -साब , मस्त-मलंग सी मितिया को अपने कपड़ों के गंदे होने का एहसास होने लगा और अपने आप में सिमटने लगी,

"इसी होटल का नाम बताया था ना ,तुम लोग गलती तो नहीं कर रहे " नंदू असमंजस में था.

"अरे तुम लोग बाहर क्यों खड़े हो अन्दर आओ " गाडी वाला साब सामने खड़ा मुस्कुर्रा रहा था उस पल के बाद मानो रंग जी और मितिया जैसे मशीनों की तरह चलते गए, सब कुछ सपनो की तरह होता गया, अब उनको सड़कों पर धुल नहीं फाकनी थी, हर शाम होटल में अपना कार्यक्रम देना था .....अब सरस्वती पर लक्ष्मी मेहरबान हो रही थी, डेरे के और लोगों को भी काम मिल गया.

इस सब में मितिया को लगने लगा रंग जी कुछ बदल सा गया है , अब वो उससे थोड़ा दूर रहने लगा है , उसके कंधे पर सर रखे भी तो महीनो हो गए , जब टूरिस्ट लोग मितिया की तस्वीरे लेते और उसकी तारीफ़ करते तो रंग जी ने कदम और पीछे खीच लेता और कही भीड़ में गुम हो जाता.

एक दिन इटेम के बाद मितिया रंगजी को ढूँढने निकली तो देखा एक अंग्रेजन रंगजी के कंधे पर हाँथ रखे खड़ी है, और लिपट लिपट पर तस्वीरे खिचवा रही है, मितिया को मनो साप सूंघ गया, मितिया को मर्दों की कमी नहीं थी पर रंगजी जैसा उसके डेरे में कोई नहीं था , बांका जवान,कोई बुरी आदत नहीं .

उसके आँखों में आंसू की लकीर तैर गई , गुस्से से चेहरा गर्म हो गया, दिल की जलन चेहरे से साफ़ झलक रही थी और शायद जबान से भी निकल आती की रंगजी की निगाह अकेली खड़ी मितिया पर पड़ गई....एक पल में उसे सब समझ में आ गया तीन साल से साथ था मितिया के ..लपक कर उसने मितिया का हाँथ पकड़ लिया ..

मेमसाब दोनों को साथ देखकर एक दम बोली "ऐसे ही खड़े रहो बहुत अछे लग रहे हो दोनों साथ "

एक तरफ टूरिस्ट दोनों की तस्वीरे खीच रहे थे , पर दोनों एक दुसरे का हाँथ धीरे से दबाते हुए अपने मन की बात आँखों ही आँखों में बोल रहे थे ....

अकेले में मितिया धीरे से बोली " लगन करेगा मुझसे ....अब मुझसे अकेले नहीं रहा जाता "

रंग जी ने हस कर कहा "तो फिर तुझे झुलनी (नथ) गडाने के लिए सावन का इंतज़ार नहीं करना पडेगा ...

और मितिया और रंग जी एक दुसरे की बाहों में खो गए