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Tuesday, August 10, 2010

तू ही मुझे संवार दे

कुछ वियोगी मन हुआ
तन भी ना अब साथ दे
कोई ऐसा पल नहीं
जो मन को मेरे साध दे

साध मन की थी कभी
खुशिया सराहे फिर मुझे
बुझ गए आंसू में सब
दीप जितने थे जले

मुश्किल हूँ मैं
या वक़्त मुश्किल है मेरा
मिलता भी नहीं कभी
जब साथ मांगती हूँ तेरा

मैं इतनी बुरी ना थी
पर भली कब तक रहूँ
मन है पीड़ा से भरा
दर्द अब किससे कहूं

क्या कभी होगा प्रलय
टूट कर बह जाउंगी
मैं अपने जीवन का
अवशेष मात्र रह जाउंगी

नेह की बूंदे कभी कुछ

मुख पे मेरे डाल दे
बहुत बिखरी हूँ प्रिये
तू ही मुझे संवार दे

Saturday, August 7, 2010

ये सावन मन भाये ना ...

ये सावन


मन भाये ना

बदरा तुमको

लाये ना

दूर बिदेस में

बैठे तुम

सौतन कहीं

लुभाए ना

बाट निहारे

नैन दुखे

पीर हमारी

कौन सुने

काली आँखे

काली रात

उसपर उस

डायन की घात

मन तो

ऐसा ऐसा है

जाने

कैसा कैसा है

कोई टोना

डाल ना दे

तुमको मुझसे

टाल ना दे

जितनी डाह

है प्रेम में

उतना तो

अगन जलाये ना

Wednesday, August 4, 2010

अबकी बारिश में क्या क्या होगा

अबकी बारिश में क्या क्या होगा


हर कदम पर गड्ढा बना होगा

मौत को खुला आमंत्रण है

कदम कदम पे मेनहोल खुला होगा



घरो में नलों की टोटिया सूखी

सडको पे नदी- नालो का समां होगा

फ़रियाद करोगे भी तो किससे

प्रशासन तो सो रहा होगा



करनी पे शायद पछताए

भ्रष्ट नेता सुधर जाए

आज दिल्ली में खुला है पाताल का रास्ता

कल हर गली में खुला होगा

Monday, August 2, 2010

चेहरे पे चेहरा चढ़ाया है मैंने


हर सुबह आईने से


मुखातिब होता हूँ

किसी रोज़ तो

सही सूरत दिखलायेगा

चेहरे पे चेहरा

चढ़ाया है मैंने

एक रोज़ तो

ये उतर जाएगा

जो कहता है मुझसे

मैं सबसे भला हूँ

उसी का बुरा अक्सर

मैंने किया है

जो आया मरहम

की उम्मीद लेकर

बड़ा जख्म उसको

मैंने दिया है

हमेशा तो मेरी

ये फितरत नहीं थी

इस शहर ने शायद मुझे

कुछ और बना दिया है

Thursday, July 29, 2010

रात अधूरी ....

चिंदी चिंदी


टुकड़ा टुकड़ा

रात को जोड़ा

चाँद को पकड़ा

रूठा रूठा
हाथ  से छूटा

वो भूरा

बादल का टुकड़ा

कुछ बड़े

तारे चिपकाए

कुछ छोटे

यूँही छितराए

रात की रानी

मांग के लाये

काजल भरकर

नैन जलाये

लोरी गाकर

जग सुलाया

बनी प्रेयसी

तुझे बुलाया

अब काहे

मीलों की दूरी

आओ तुमबिन

रात अधूरी

Monday, July 26, 2010

एक डुबकी गंग धार में

एक डुबकी गंग धार में


कांवर के त्यौहार में

तन मन सब धुल जाए

हर हर गंगे हो जाए

सावन के उस मेले में

मन भर पाओ धेले में

सारा आँचल भर जाए

जय बम भोले हो जाए

दूध दही और शहद

धतूरा भांग और मृग-मद

बेलपत्रि सी चढ़ जाऊं

शायद मैं भी तर जाऊं

घर से इतनी दूरी है

ऐसी ही मजबूरी है

चुल्लू भर आचमन लिया

शायद मैं भी तर जाऊं

Saturday, July 24, 2010

लिखो ना.......(2)

लिखो ना.......


महका बेला

बिखरा काजल

हुई पिया की

बहका आँचल

लिखो ना ....

मधुमास में

मधुमय रातें

प्रेम पगी थी

मीठी बातें

लिखो ना.....

लड़ना चिढना

और रुलाना

देना ताने

फिर मनाना

लिखो ना .....

कितने पल

कितनी बातें

हमने बांटी

कितनी सौगातें

प्रेम तुम्हारा

साथ तुम्हारा

मुझपर ये

विश्वास तुम्हारा

एक सम्मोहन

एक आकर्षण

कर डाला

सबकुछ अर्पण

इतना प्यार

संवर गई मैं

लिखा ह्रदय पर

नाम तुम्हारा