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Tuesday, December 21, 2010

सर्द मौसम

चटक चांदनी
फीकी सुबहें
मौसम का
अंदाज़ है
सुबह हवा ने
...बतलाया था
सूरज कुछ
नाराज़ है
धुंध लपेटे
चुप पड़ा है
बड़ा बिगड़ा
नवाब है
 

Tuesday, December 7, 2010

ये जो मेरा चेहरा है


(१)
ये जो मेरा चेहरा है
खुशियों से जड़ा  है
हर वक़्त खिलखिलाहट
जैसे झुण्ड चहका है
आँखों में सितारों सी
चमक सदा है
इतनी लम्बी मुस्कराहट
हर लम्हा फ़िदा है
सदा दमकते है
मोती जिनके बीच
उसने कभी लबों को
सीप सा भी कहा है
मुस्कान के साथ पड़ते
गालों में गढढे
आँखों के करीब
दो पर्बत से उठते
 मेरे चेहरे का वजूद
सबसे अलहदा है
(२)
ये जो मेरा चेहरा है
दर्द का फलसफा है
हर वक़्त सिसकियों की
गूँज से भरा है
आँखों से रिसती
सीलन इस दिल की
हर लम्हा यहाँ
सावन सा ही रहा है
आँखों के पास पड़े
स्याही के घेरे
देखे न जैसे
उजले सवेरे
मायूसी मेरे
वजूद का हिस्सा है

Monday, December 6, 2010

टीवी मेरी तौबा

आज बहुत फुर्सत में थे तो सोचा कुछ समय का खून किया जाए ,आखिर कितना भी सदुपयोग करे एक दिन तो टाइम पूरा होना ही है ..तो बस अपने हांथो में रिमोट थमा और शुरू हो गए ..बाप रे भावनाओं का सैलाब उमड़ पड़ा, सारी दुनिया उलट पुलट हो गई ..और हमको अपने आप पर इतनी शर्म आई की क्या कहे ..हमको तो पता ही नहीं क्या क्या हो रहा है हमारे देश में बाल विवाह ,सतीप्रथा,अग्नि परीक्षा ,गंगा की धीज... इसमें से कुछ तो हमने सुना था इतिहास में दर्ज है पर भला हो टीवी का जो हम आज जान पाए पर डर भी लगा कही मेरी सासू मां गर यही देखती हुई और कहा "ज़रा अंगारों पर चल कर या नदी में डूब कर पवित्रता साबित कर फिर "


घबरा कर चैनल बदल दिया सारा मौसम गुलाबी हो गया खूबसूरत सी नायिका अकडू सा हीरो एक दुसरे को प्यार से देखते हुए ..गुदगुदी तो हमारे भी दिल में हुई ..पर ये गुदगुदी धीरे धीरे खीज में बदलने लगी क्या करते ...पूरा ३ मिनट २२ सेकेण्ड एक दुसरे को घूरते रहे और ठंडी आहें भरते रहे ..हमको विशवास हो गया पेमेंट ना मिलने से dialog लेखक बीच में भाग गया है ...

फिर थोड़ी -थोड़ी देर में हर तरफ वही नज़ारा भारी साड़िया,कुंदन के जेवर दिल फुंक कर रह गया जहाँ हम सारा दिन ऑफिस से घर की चक्की में पिसे रहते है वहीँ ये महँ देवियाँ आराम से घर में नौकरों को किसी न किसी त्यौहार की तैयारी के लिए बनने वाली मिठाई की लिस्ट समझा रही होती है ...

बहुत सुन रहे थे की आजकल रेअल्टी शोज़ में सच्चाई दिखाते है तो बस इसी उम्मीद में एक चर्चित कार्यक्रम देखने बैठ गए ..शुक्र है अकेले थे अगर परिवार साथ में होता तो शायद तुरंत चैनल बदलते और कहीं छोटे बच्चे होते तो वो हर बीप पर मतलब पूछ कर बैठना मुहाल कर देते.. हमारे बचपन में ११ बजे के बाद दूरदर्शन पर आने वाली फिल्मे भी इनके प्राइम टाइम status को छू नहीं सकती ...

न्यूज चैनल लगाने की हिम्मत की तो कहीं "मुन्नी के बदनाम होने की चर्चा " ,तो कहीं "शीला की जवानी पर गोष्ठी" देख हमको अपने तुच्छ होने का एहसास हुआ और हम अपना सा मुह लेकर वापस लैपटॉप पर आ गए,और फैसला किया जब तक हम इतनी समझ नहीं पैदा कर ले, रिमोट हाँथ में नहीं लेंगे और अगर लेंगे भी तो बस dusting के लिए ...

Tuesday, November 30, 2010

तेरी बाते जामुन जामुन

कुछ तुम  पागल 
कुछ मैं पागल 
 साथ बटोरें
चल  कुछ बादल
कभी तुम अंधड़
कभी मैं बिजली
कहीं तुम गरजे
कहीं मैं तड़की
जब तुम रूठे
कुछ तुम बरसे
जब मैं बिगड़ी  
कुछ  मैं पिघली
तेरी बाते
जामुन जामुन 
मेरी बाते
इमली इमली
दिन बीता
तुझे मनाते
रूठी रूठी
रात भी छिटकी
आओ अब तो 
साथ निभाओ
कहती है
पाँव की चुटकी

Thursday, November 25, 2010

मुझसे भी तो बाटों चाँद

पतला पतला काटों चाँद
मुझसे भी तो बाटों चाँद
ओस बन टपके आंसूं
ऐसे तो ना डाटों चाँद

सिन्दूरी सुबह कजरारी रात
अपना रंग भी छाटों चाँद

करवा चौथ पे तू भी देखे
इस धरती पर कितने चाँद

बरसे जो सिक्को की माफिक
बारातों में लूटो चाँद
लटके लटके थके नहीं तुम
कभी तो नभ से टूटो चाँद


Friday, November 19, 2010

मैं काजल हो जाती हूँ

 
मुझे जलना भा रहा है
मैं तो यूँही जल जाती हूँ 
तुम शमा बनोगे बोलो ना
मैं परवाना हो  जाती हूँ
तेरी खुशबू मन को भाये
मुझे मस्त करो और बहकाए
तुम कली बनो और इठलाओ
मैं भंवरा बन मंडराती हूँ
इतनी दीवानी चाहत में
मुझको मेरा होश नहीं
तुम मुक्त पवन के झोके से
और मैं आँचल हो  जाती हूँ
तुम हो प्यासे मैं रस से भरी
फिर रहे अधूरे अधूरे क्यों
तुम फैला दो अपनी बाहें
और मैं बादल हो जाती हूँ
तुम कितने भोले भाले से
जी भर देखूं तो नज़र लगे
मुझको भर लो तुम आँखों  में
और मैं काजल हो जाती हूँ
 
 
 
 

Wednesday, November 10, 2010

मैं आ रही हूँ

Jaisalmer

कुछ लम्हे चुराकर
रेत में दबाने जा रही हूँ
रेत में डूबकर
ज़िन्दगी पाने जा रही हूँ
बवंडर यादों का
समंदर वादों का
सुनहरी शाम को
गुनगुनाने जा रही हूँ
हवा ने बुलाया है
नया रुख दिखाया है
सीमेंट में घुट ना जाए
सपनो को धुप
दिखाने जा रही हूँ
सुना है तन्हाई भी
गीत गाती है वहां
समय की घडी
रुक जाती है वहां
दफ़न होकर भी
मुक्त नहीं होते
उन सायों में
समाने जा रही हूँ
 

मैं आ रही हूँ