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Wednesday, December 26, 2012

भुला दिया !



कुछ दिन होते है खुराफातों के जब कोई बेचैनी आपको भीतर तक उकसा जाती है उठो और कुछ कर जाओ कुछ तो करो ..सक्रियता वाले रसायन शरीर और मन दोनों को झंझोड़ देते है ... माँ वाले समय में होती तो शायद किसी कोरे कपडे पर फूल चिड़िया रंगीन धागों से उकेर देती ...और दीदी जैसी तो किसी सूती कपडे पर धागों से नन्हे नन्हे मोती बाँध कर लाल हरे रंग में डुबो देती ..पर मैं तो अजीब हूँ कुछ अपूर्ण सी ,सुघड़ता के नामपर कुछ नहीं ...फिर क्या करूँ एक बार सिलाई करने बैठी तो अपनी फ्रॉक को समीज के साथ सिल डाला ....आर्ट के नामपर आम से ज्यादा कुछ नहीं बना पाती . फिर कुछ पर चढ़ा ये फितूर .. सोचते सोचते मोबाइल उठा लिया ..आज किसी ऐसे से बात करूंगी जिससे बरसों से बात नहीं की है हां ये अच्छा रहेगा कुछ अनजाना सा ..मोबाइल को लेकर घर के सामने पार्क में चली आई ,एक के बाद एक सारे नंबर आँखों के सामने से गुजरने लगे साथ ही उनसे जुड़े चेहरे भी कभी मुस्कुराती तो कभी उदासी ..किसी के नाम पर होंठ वक्र हो उठे।
अचानक एक अनजाना सा नाम लिस्ट में उभर आया "मिति" , दिमाग के सारे दरवाजे खटखटा  डाले  कोई पहचान की खिड़की खुले पर चाह कर याद नहीं आया, पीछे आठ सालों से यही नंबर है मेरा पर मेरी स्मृतियों में दूर-दूर तक कोई मिति नहीं है, क्या करूँ ? कॉल करती हूँ, देखती हूँ कौन है ?

गीत गूंजा "मुस्काने झूठी है " करीना के गहरे लाल रंग से पुते होंठ आँखों के सामने आ गए पर मिति का कोई सूत्र नहीं पकड़ पा रही थी, अचानक एक मीठी सी आवाज़ गूंजी "हेल्लो स्नेहा ,आज याद आई तुम्हे मुझे कॉल करने की ". इतने अपनेपन से किया गया सवाल मुझे ज़मीन पर पटक गया सोचा था हेल्लो के बाद पूछ लूंगी आपका नंबर मेरे मोबाइल पर है क्या हम कभी मिले है ?

संवाद की डोर उसने पकड़ ली थी ,एक के बाद एक सवाल पूछ रही थी मेरे बारे में काम के बारे में मेरे परिवार के बारे में , और मैं अपने दिमाग पर हथोड़े मारकर उसे जगाने की कोशिश कर रही थी काश किसी बात से कोई सूत्र मिल जाए और मैं इस बवंडर से आज़ाद हो जाऊं, किसी को एक आत्मीयता भरी बातचीत के बीच में टोकना और परिचय मांगना कितना कठिन काम है ये मुझे आज पता चला ... कही बिना रहस्य का  उठाये फोन रख दिया तो और आफत,बैठे बैठे ये आफत मैंने खुद मोल ली थी .मैंने संभाल संभाल कर सवाल करने शुरू किये शायद किसी जवाब से कोई रास्ता मिले और मैं इस शर्मिंदगी से बच जाऊं. पर नहीं सारे उपाय फेल हारकर मैंने उससे कह दिया "प्लीज़ बुरा मत मानना , मैं तुम्हे बिलकुल पहचान नहीं पा रही हूँ आज मोबाइल में नंबर देखा तो कॉल कर लिया हम कब मिले थे "

दूसरी तरफ एक पल को सन्नाटा पसर गया मेरी धड़कन अब मेरी कांपती पर वार कर रही थी.
अचानक वो बोली "तुम्हे सच में याद नहीं है हम कब मिले थे ?"
"नहीं " मैंने सकपकाते हुए कहा।

"जानने के लिए मुझसे मिलना पड़ेगा तुम्हारी यही सजा है मैं कल तुम्हारा इंतज़ार 12 बजे मेगा मॉल में करूंगी,वैसे भी तुम्हारी थैंक्सगिविंग की छुट्टियाँ है "उसने तसल्ली से कहा।
कल यानी 24 घंटे बाप रे मैं तो जासूसी नावेल भी पीछे से पढ़ती हूँ यहाँ इतना लंबा इंतज़ार ..आज की रात कैसे कटेगी। उसने फोन कट कर दिया मेरे पास इंतज़ार के अलावा कोई चारा नहीं था। .......क्रमश:

Tuesday, December 18, 2012

बस देह भर


पुनरावृति
हताशा की
एक मौन
अपने होने पर
एक पीड़ा
नारी होने की
वही अंतहीन
अरण्य रुदन
बस देह भर
ये अस्तित्व
छिद्रान्वेषण
पुन: पुन:
चरित्र हनन
या वस्त्र विमर्श
मैं बस विवश
बस विवश ...

Thursday, December 13, 2012

पिया बिदेस


ओ री सखी
सूनी बहियाँ
सीली अंखिया
बहकी बतिया
बिरहन रतियाँ

ओ री सखी
पिया बिदेस
जोगन भेस
रूखे केश
जीवन क्लेश
भेज संदेस

ओ री सखी
पूस मास
भूली हास
धूमिल आस
भारी सांस
अधूरी प्यास



Tuesday, December 4, 2012

हरि अनंत हरी कथा अनंता !!!


जीवन का आरम्भ क्या है पर जीवन का अंत क्या है ..आप कहेंगे वो भी पता है ,और मैं कहूँगी जो आप सोच रहे है वो सरासर गलत है अच्छा इस सवाल को ऐसे पूछती हूँ एक नारी के जीवन का अंत क्या है उद्देश्य क्या है ... कृपया आपके मन में उठ रही भाषण की स्क्रिप्ट अपने पास फोल्ड कर के रख लीजिये ...बघारने के लिए हमारे पास भी बहुत बड़ा ज्ञान का पिटारा है :-) और वो ही बघारने जा रहे है .

कल टी वी देखते हुए हमें जीवन के परम सत्य की प्राप्ति हुई वो तो पतिदेव आ गए वरना मोक्ष भी मिल गया होता ...

हर नारी के जीवन का अंतत: उद्देश्य ससुराल में हो रहे षड़यंत्र झेलना,छुपकर सुनना और फाइनली खुद षड़यंत्र रचना ही है यकीन नहीं आता तो गौर फरमाइए, हम जानते है आप सब भी जितनी बुराई कर ले पर दिमाग उन सजी धजी बहुओं में लगा रहता है, अरे मुझपर आँखे मत तरेरिये अगर मैंने भी नहीं देखा होता तो ये पोस्ट नहीं चेप रही होती :-)

 ये दुनिया दो तरह के लोगों से बनी है जो पहले जो सास-बहु ,बहन-बेटी सिरिअल पसंद करते है और दुसरे जो नापसंद करते है पर दोनों ही प्रेम और घृणा से ही सही पर देखते ज़रूर है।
अब मेरे जैसा दूसरी कैटेगरी वाला प्राणी इस विषय पर दूसरी पोस्ट लिख रहा है तो मतलब यही है ना देखते तो है ना :-)

पहली पोस्ट  टीवी मेरी तौबा.

अब बहनों ,बहुओं और उनके रिश्तेदारों हांथो में अक्षत लो और कुछ देवियों के बलिदान की कहानी संक्षेप में सुनो .( नायिकाओ/सीरियल के नाम नहीं दे रही हूँ आप सब समझदार हो , अभी जेल जाने का मूड नहीं है )

(1)
पहले -  एक खूंखार डाकू आँखों में गहरे काजल के साथ बदले की आग ,होंठों पर लिप्ग्लास के साथ गलियाँ ,जीवन का मकसद बदला- बदला -बदला !
बाद में -शादी ,आँखों में आंसू ,करवाचौथ का व्रत ,भारी साड़ियाँ जेवर ,षड़यंत्र झेलना,छुपकर सुनना और फाइनली खुद षड़यंत्र रचना।

(2)
पहले- एक आर्थिक रूप से कमजोर परिवार की बेटी ,जीवन का मकसद प्रशासनिक सेवा में जाना ,देश के लिए कुछ करना।
बाद में -शादी ,आँखों में आंसू ,करवाचौथ का व्रत ,भारी साड़ियाँ जेवर ,षड़यंत्र झेलना,छुपकर सुनना और फाइनली खुद षड़यंत्र रचना।

(3)
पहले- एक दबे कुचले तबके से ,मकसद अपने परिवार को हर संकट से उबारना।
बाद में -शादी ,आँखों में आंसू ,करवाचौथ का व्रत ,भारी साड़ियाँ जेवर ,षड़यंत्र झेलना,छुपकर सुनना और फाइनली खुद षड़यंत्र रचना।

भैया हरि  अनंत हरी कथा अनंता .... तो आप कुछ भी कर लो कोई भी मकसद तय कर लो फाइनली जीवन का उद्देश्य करवाचौथ का व्रत रखना और सजधज के रहना ही है
(ये सुविचार-कुविचार सब मेरे अपने ही है और इनका रोज़ रोज़ टीवी पर चलने वाली कहानियो से पूरा सम्बन्ध है )

Tuesday, November 27, 2012

मेरे शहर में



मेरे शहर में
शाम नहीं होती
देखा नहीं किसी नें
ढलते सूरज को
हाँ, वालपेपर पर
कई बार देखा है ,
ऑफिस से  निकलते है
बंधुआ मजदूर
अँधेरे में मुह छिपाए
कंधे झुकाए रोबोट 
नशे में डुबो देते है
पूरा दिन और तनाव
पर शाम को तो
उन्होंने भी नहीं देखा
आसमान के रंग
को लेकर अक्सर
बहस छिड़ती है
छ बाय छ के
पिंजरे से कभी
आकाश दिखा नहीं
जो घोसलों को
लौटते है बिना पिए
उनके चूजे भी
सीमेंट में पलते है
सीमेंट में बढ़ते है
शाम को वो भी जानते नहीं
कुछ बूढ़े बाते करते है
गोधूलि बेला की
पर ऐसा कुछ
मेरे शहर में नहीं होता 
दिन और रात के सिवा
कुछ नहीं देखा
मेरे शहर में
किसी ने भी
शाम को नहीं देखा

Thursday, November 22, 2012

घुंघराली जलेबियाँ





ये मौसम का ही कसूर है और उस पर हमारी भुक्खड़ तबियत ..ज़रा मौसम बढ़िया हुआ तो मुह में पानी आते देर नहीं लगती ...इसे ही नीयत और लार गिरती है गरम जलेबी पर ..बचपन से आज तक लाल लाल रस में डूबी ..प्यार से अपने पास बुलाती है जितना सुकून गर्म जलेबी को खाने में मिलता है उतना किसी मिठाई को नहीं।। सुबह का नाश्ता गर्म जलेबी के बिना पूरा ही नहीं होता कटोरी भर दही और प्लेट भर जलेबी और क्या चाहिए ...अमृत ..परमानन्द . .... जब नन्हे मुन्ने थे लहंगा पहन कर कन्या भोज के लिए तैयार हो जाते थे ...दही जलेबी की कन्या जो खाने को मिलती थी , घर में मेहमान आये तो जलेबी का नाश्ता, ननिहाल (इलाहबाद ) में बिलकुल अलग पैकिंग में जलेबी देख कर दिल बाग़ बाग़ हो जाता था चोकोर डिब्बा कुछ पत्तलों से बना ..अभी भी वो कहीं भूले भटके दिख जाए तो अपने राम को जलेबी ही याद आती है
सब मिलता है गुडगाँव में पर जलेबी में वो बात नहीं ..केसर का स्वाद अपने ठेठ देहाती स्वाद से मैच नहीं करता ऐसा लगता है ..अलता महावर से सजी गाँव की गोरी को स्कर्ट पहना दिया हो बेमेल और बे- ढब (किसी केसर प्रेमी की भावनाए आहत हो तो प्लीज पुलिस में ना जाए ). देसी जलेबी के नाम पर पुराने शहर में एक ही ठिकाना है जहां लाइन लगाकर जलेबी खरीदनी पड़ती है ..पर  जुबान से मजबूर इंसान करे भी तो क्या उससे ही काम चला लेते है , कई अलग अलग शहरों में जलेबी की फॅमिली से मिलना हुआ है ... पनीर की जलेबी ,गुड़ की जलेबी ,विशाल जलेबा ...
अरे आप लोग सोचने लग गए कितनी केलोरी होती है ,चीनी और घी के अलावा कुछ नहीं होता ,बहुत नुक्सान करती है तो भाई जलेबी की खिलाफत सुनने वाले कान हम बक्से में बंद रखते है ... और हाँ ..जो सबसे ज्यादा समझा रहे है इस सीजन शादियों में जलेबी के स्टाल पर ही पाए जायेंगे ... जलेबी प्रेमियों के बीच हुई बहस में अक्सर जलेबी के बेस्ट पार्टनर पर अंतहीन बहस छिड़ते देखा है ...दूध के साथ ,रबड़ी  के साथ या दही के साथ या यूँही ... अभी तक तो सर्वसम्मति हुई नहीं
जबान अपनी अपनी ..स्वाद अपना अपना
कुछ आपको पता हो तो हमारा भी जलेबी ज्ञानं बढाइये ...प्यार से खाइए ...मिठास बढाइये
 चाशनी से तरबतर
घुंघराली जलेबियाँ
उकसाती है अक्सर
तोड़ दो सारी कसमें
और थाम लो हमें
मेनका -उर्वशी सी
घुंघराली जलेबियाँ
बनती है सुबह -सुबह
तोड़ने को सारे प्रण
बस आज और, बस
कल से मत देखना
उलझी लिपटी सी
घुंघराली जलेबियाँ
कहती है चख लो
गुनाहों  के ढेर से
मीठा टुकड़ा गुनाह का 


Tuesday, November 20, 2012

मौन


सूरज भी मुश्किलों
 से उगा आज सुबह 
चिड़िया नहीं निकली
अपने  घोसलों से
बच्चे म्यूट मोड में
लगातार बिलखे
गाय दूध देने से
कर रही थी इनकार
तीन दिनों से
 ठहर -ठहर कर
वो भर रही थी सांस
इस घबराहट में
क्या पता खुदा
आक्सीजन की भी
सप्लाई रोक दे ...