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Wednesday, November 20, 2013

बावरी मैं (बीस नवम्बर )



बावरी मैं (बीस नवम्बर )
(बावरों का कोई ठिकाना नहीं,अपने रिस्क पर पढ़े )

जानेमन सुनो
गए तो हो हज़ार मील दूर पर जाने नहीं दिया मैंने तुम्हारे साथ तुमको, करवट की सलवट अभी भी वही है बचाकर रखूंगी अपनी बेचैन सलवट के साथ, ताकि तुम आओ तो मिलान कर सकूं, यूँ तो तुम्हारा बंजारापन जाहिर था मुझपर पर तुम्हारा तो तन बंजारा है ,और मैं मन से बंजारन कही यूँ  ना हो के तुम लौटो तो मैंने बसेरा बदल लिया हो ... अरे नाराज़ काहे होते हो ज़रा सुनो तो रूठने मनाने के लिए यहाँ आना पडेगा तुमको मेरे पास, मैंने मोबाइल बंद कर दिया है ,इन्टरनेट भी इस्तेमाल नहीं कर रही इंतज़ार कर रही हूँ , एक चिट्ठी का ज़रा कलम तो उठाओ , एक पोस्ट कार्ड ही डाल दो के मैं पढ़ सकूं मजमून और छू सकूं तुम्हारी खुशबू ,चेहरा तो आँखों के सामने है ही.
बदलता मौसम बिलकुल तुम जैसा हो चला है हरजाई कहीं का ... जब चादर लपेटूं तो पसीने में भीग जाती हूँ और ना लपेटूं तो तन अपना नहीं रहता ज्वर सा लगता है , जिस दिन मौसम का मिजाज समझ लूंगी उस दिन तुम्हे भी समझ पाऊं , कई बार लगता है हम यहाँ क्यों जन्मे ... जहां सब बदल जाता है , किसी ऐसे देस में होते के जहां सारा साल एक सा मौसम रहता और तुम भी एक से ... पर मेरे मन का मौसम तो बदलता रहता है ...
अब जल्दी आओ
तुम्हारी बावरी

Tuesday, October 29, 2013

बेतरतीब मैं (उन्तीस अक्टूबर )



अनावृत रहना कुछ का फैशन कुछ की मजबूरी और कुछ का व्यवसाय ... जिन कपड़ो को मौसम का सामना करने के लिए रचा गया था आज वो शालीनता ,मर्यादा ,धर्म ,रिवाज़ और अनुशासन ..ना जाने किन किन रूपों बाँट दिए गए है, कपडे सिर्फ कपडे नहीं रह गए है
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आप आओ फिर तय कर लेंगे एक माल के सभ्य रेस्टरूम में फोन पर हो रही बातचीत का एक टुकडा निगाह बात करने वाली पर उठा देता है, हम त्यौहार पर बाज़ार आये है वो खुद बाज़ार है . आँख के कोने में एक नमी का टुकड़ा मुझे तुमसे नफरत नहीं करने दे रहा, सिर्फ किस्मत की बात है , तुम्हारी जगह शायद मैं भी हो सकती थी
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उँगलियों में उंगलियाँ फसाए हाँथ की गर्माहट महसूस करते वो दोनों, एक ही लैपटॉप पर फेसबुक पर कुछ देखते और खिलखिलाते,तस्वीरे अपलोड करते, हाँ हम प्यार में हैं का एलान करते, फेसबुक से वेडिंग अल्बम में कन्वेर्ट हो जाना, आजकल रुसवाई भी एलान के साथ आती है
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हाँथ फैलाते हुए मेट्रो की सीढियों पर रोजाना,रेड लाइट पर चेहरे पर चढ़ाई हुई पीड़ा लपेटे या मंदिर की सीढियों पर कटोरे खनखनाते, सब एक जमात है. नकलीपन ने असली जरूरतमंद के बीच का अंतर ख़त्म कर देता है और हम पत्थर हो जाते है और इंतज़ार करते है लाल बत्ती के हरी होने का ताकि हमारे भीतर का इंसान भी भाग सके .और सुकून की सांस ले सके
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दिवाली पर ढेर पटाखों में चिंगारी लगाते तय नहीं कर पाती ..मैं उनका घर रोशन कर रही हूँ जो इन्हें बनाते है या उनके घरों में मायूसी भर रही हूँ जो उन्हें चला नहीं सकते इस बीच के फासले को पाटने की शुरुवात करूँ ?

Wednesday, October 16, 2013

बेतरतीब मैं (सोलह अक्टूबर)



बेतरतीब मैं (सोलह अक्टूबर)

बीते दशहरे रावण जला ,जिनको जलना था वो इस बार भी बच गए अंतत: सिद्ध हुआ सतयुग में की गई एक गलती आपको जन्म-जन्मान्तर तक अपराधी घोषित करवा सकती है , कलयुग में अपराध को अपराध और अपराधी को अपराधी सिद्ध करना आम मनुष्य के बस की बात नहीं .
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कन्या पूजन हुआ, सुबह से बेटियाँ ढूंढी गई ,जिनके जन्मने पर पड़ोस की भाभी दिलासे देने और चाची ऊपर वाले की मर्ज़ी का ज्ञान बाटने आई थी, आज उनकी पूछ सबसे ज्यादा थी, धन्यवाद देवी माँ अपनी पूजा के नौ दिनों में से एक दिन अपनी बेटियों को देने के लिए
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मेले में घूमते हुए  बचपन अचानक हाँथ थामकर साथ चलने लगा, उसकी ढेरो जिद रेत नमक में भुने पोपकोर्न, बांस से बना सांप , पलके खोलने मूंदने वाली गुडिया आज सब मेरे साथ घर चलने को तैयार , पर इस घर में जब मैं बचपन को नहीं ले जा सकती तो बचपन के साथी कैसे जायेंगे .
फिर मिलना ऐसे ही किसी मेले में .
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ज़िन्दगी महंगी है और उससे भी महंगे जीने के सवाल
कमाल है हमें वो सब चाहिए जो हमारे हाँथ की पहुँच से दूर है एडी उचकाकर भी जो ना छू पाए, हम लालसा करते है निराशा की, हमें मायूसी भाती है जानते हुए के सितारे आस्मां में है और दिए हाँथ की पहुँच में , हम दिए नहीं सितारों की चाह करते है ,और आँखों में दो बूँद मायूसी डालकर सो जाते है

Wednesday, October 9, 2013

बेतरतीब मैं ( नौ अक्टूबर )

बेतरतीब मैं ( नौ अक्टूबर )
ऊपर वाला हमेशा एक के बाद नई कसौटी कर कस रहा है, एक दम खरा सोना बनाकर मानेगा जितनी चोट पड़ेगी उतना खूबसूरत आभूषण बनकर निकलूंगी, हर दर्द के साथ बेहद लचीली बन रही हूँ ,बहुत पहले सुनी कहानी याद आ गई
सोने ने लोहे से पूछा तुम एक चोट में टूट जाते हो और मैं हज़ार वार भी झेल जाता हूँ , लोहा हस कर बोला बाहर वालो के वार झेलना कठिन है पर मुझपर वार करने वाले मेरे अपने होते है अपनों का दगा मुझे तोड़ देता है 
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बंद अँधेरे कमरे में आधी रात अगर आँख खुले तो आँखे रौशनी की किरण ढूंढती है ,बदहवासी में आँखे कमरे के हर कोने में रौशनी की उम्मीद में दौड़ जाती है, दिल को यकीन दिलाती है कोशिश करो कहीं ना कहीं रौशनी होगीही, आखिरी उम्मीद सुबह सूरज के निकलने की होती है ,
मेरे कमरे में अभी सूरज की किरण पहुंची नहीं है
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नीला आसमान और भूरी ज़मीन इसके बीच हवा और मैं ,मेरे भीतर उमड़ते ढेर तूफ़ान आँखों को मूँदकर होंठों को कसके भींचकर ,भीतर ही भीतर भिड जाती हूँ कौन जीता इसका फैसला अभी बाकी है
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पुराने से नए की तरफ का सफ़र है ज़िन्दगी ,पुराने घर से नया घर ,पुराने रिश्तों से नए रिश्ते ,पुरानी पड़ती देह से नयी देह की ओर, फिर दुःख क्यों ,शायद ये मोह है जो आखिरी रेशे तक बांधता है ...

Monday, September 23, 2013

बेतरतीब मैं (तेईस सितम्बर )



बेतरतीब मैं (तेईस सितम्बर )

तुम सोचते हो ज़हर मुझे मार देगा  गलत हो मैं ज़हर गले से उतरने नहीं देती मैंने मासूम दिल को बचा रखा है, नीलकंठ हूँ ,मेरा पीला पड़ता चेहरा पतझड़ की आमद का अंदेसा देता है फ़िक्र मत करो मैं अगली बहार के लिए तैयार हूँ

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छिछिली नीयत वाले और ओछी सोच वाले ज्यादा है उनके चेहरे एक ख़ास तरह की मुस्कान से ढके है , ज्यादा मिठास से उनके वजूद में उभर आया लिजलिजापन,छिप नही पाता,वो शुभचिंतक ,सह्रदयता , निछ्चलता के मुखौटे लिए हमारे आस पास अपने आप को बेच रहे है, मेरे गले पर जमा ज़हर अपनी तेज़ी से मेरी आँखों को साफ़ रखता है और उनके मुखौटे पिघला देता है
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एक देह के भीतर कितने महायुद्ध जारी है , मारने वाले हम, मरने वाले हम,
किसी पल कोई हिस्सा देह की सीमा तोड़कर आज़ाद हो जाएगा तो क्या ये युद्ध का अंत होगा,शायद नहीं भीतर विजयी होने वाला, बाकि देह आत्माओ से भिड जाएगा ,युद्ध कभी समाप्त नहीं होते ....अनवरत चलते है
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मैंने तुमसे आज सुबह सीखी है जिद और सर उठाकर रहना,आघातों का सामना करना ,तूफानों में खड़े रहना ,पददलित होने पर उठ खड़े होना अपनी मिट्टी पकड़ कर रहना
घास मेरी वर्तमान गुरु

Saturday, September 21, 2013

लव हेट रिलेशन विद गुडगाँव (१)


कितना बंजारा जीवन जीते है ,अलग परवरिश अलग बोली कई बार अलग देस ..हर बार अलग सांचे में उतरना होता है ..पर ये भी इतना सहज कहाँ है ..गंगा किनारे फर्रुखाबाद में पली बढ़ी दुनिया बड़ी आसान थी  पैदल पूरे कसबे का चक्कर लगा लेते ..हर दूसरी दूकान पर कोई ना कोई पहचान वाला होता जो गर्माहट भरी मुस्कान से स्वागत करता ..आधा मोहल्ला चाचा ,मामा बुआ जैसे संबोधन  वाले प्यारे चेहरों से भरा मिलता जलेबी से ज्वेलरी बिना पैसे खरीद कर घर ला सकते थे ..

बड़े शहर के नाम पर दो तीन बार दिल्ली देखा और कुछ साल लखनऊ में बिताये पर लगा ज़िन्दगी ऐसे ही गुज़र जायेगी ..आत्मविश्वास से भरे ,अपनी मेधा के प्रमाणपत्र हाँथ में लिए जब गुडगाँव  में कदम रखा ..तो एक बार होश ही उड़ गए सब कुछ चमकीला लगा  वो शहर जो दिन और रात दोनों में भव्य लगता है ...रौनक ही रौनक . बड़े बड़े माल भीड़ से भरे , बड़ी बड़ी बातें और बड़ी बड़ी सैलरी आँखे विस्मय और अविश्वास से चौड़ी हो जाती ...छोटे से घर वो भी करोड़ों के


चमकीले चेहरे ,सब सजा संवरा, दुनिया की हर कम्पनी यहाँ जिनके नाम पता थे और जिनके नाम आज भी पता नहीं है ,आश्चर्य ये होता कैसे लोग होंगे जो इन शीशा जड़ी इमारतों में काम करते होंगे, इन माल में खरीदारी करते होंगे

अपने पास झोला भर डिगरिया थी पर दिन-ब-दिन आत्मविश्वास कम हो रहा था , कैसे शामिल होऊं मैं इस दुनिया में ,.कुछ बोलने से पहले सौ बार सोचना क्या पता कौन सा उच्चारण आपको देहाती का तमगा दिलवा दे ..पर सपने तो थे बोर्डरूम में बड़ी बड़ी मीटिंग्स का हिस्सा बनने  के , अपने घर की सबसे स्मार्ट लड़की आज  घबरा रही थी

एक दिन ऐसी ही चमचमाती शीशे जड़ी इमारत से इंटरव्यू का बुलावा आया हिम्मत बटोरी,शीशे के सामने खुद से सवाल जवाब किये,कई बार यकीन दिलाया ,हाँ मैं तैयार हूँ ,सवाल ही तो पूछेंगे मार तो नहीं डालेंगे ,ज्यादा से ज्यादा मना  कर देंगे , उन बड़ी इमारतों के भीतर कुछ आत्मीयता भरे चेहरे मिले, कुछ जवाब दिए कुछ नहीं दे पाई पर मैं भी उस इमारत का हिस्सा बन गई ...राहत की सांस ली पर ये राहत नहीं आफत की सांस ज्यादा थी। लोगों के साथ घुलना मिलना था काम जल्द से जल्द सीखना था

रोज़ नई  चुनौतियां एक महीने बाद काम मिला विदेशी पार्टनर  से बात करने का ..अभी तक हिन्दुस्तानियों की अंग्रेजी समझ में नहीं आ रही थी उस पर अंग्रेजों की अंग्रेजी हे ! भगवान् , फोन उठाया ,नंबर मिलाया , रिंग टोन के साथ धडकन तेज़ होने लगी ..दुआ तक मांग ली फोन ना उठे तो कह दूँगी , फोन नहीं उठ रहा ..पर फोन उठा सामने वाली कन्या ने इतने प्यार से जो कुछ भी पूछा ..वो मुझे अपनी धड़कन के शोर के सामने सुनाई नहीं दिया ना एक वाक्य बोल पाई ना समझ पाई ..हडबडाहट में फोन काट दिया ... बॉस को बोला लाइन में डिस्टर्बेंस है ..बाद में पता चला भारत से भारत में बात करना भले ही मुश्किल हो पर लन्दन की लाइन कभी खराब नहीं होती .शर्म आ रही थी,एक लड़ाई बिना लड़े हार जाने जैसा  पर दोबारा ऐसा ना हो इस लिए आँखे कान कुछ और खुले रखने शुरू किये ..जो असंभव लगता था आसान  होने लगा ..फोन पर काम के अलावा भी बातें करने लगी लगा जंग जीत ली ...पर पूरी तरह हिंदी माध्यम से पढ़ी इस छात्रा की एक लड़ाई और बाकी थी.

एक सुबह कहा गया तुमको कल कुछ विदेशी मेहमानों के सामने हमारी सेवाओ को प्रेजेंट करना है और जो सवाल पूछे उनके जवाब देने है ..एक और महाभारत ..जैसे तैसे काम सीखा अब आमने -सामने बात करना ..और वो भी इतना महत्वपूर्ण ..बॉस को कहाँ वो बोले तुम कर लोगी सारे देवी देवता मान लिये .. 11,21,51 कितने के प्रसाद बोले याद नहीं ... पर शुरुवाती हडबडाहट के बाद पता नहीं कहाँ से आत्मविश्वास आ गया ..एक प्यारी सी (जिसे सब मोहिनी सी कहते है ) मुस्कान के साथ पूरा प्रेजेंटेशन कर गई

 ...आज 7 साल हो गए ..कोरिया ,जापान, यूनाइटेड किंगडम ,इंडोनेशिया ...ना जाने कितने देशो में बात करती हूँ ..लोगों से आमने सामने मिलती हूँ, बिना तैयारी के भी कई बार मीटिंग्स का हिस्सा बनी हूँ , पर वो पहली कॉल और पहला प्रेजेंटेशन मुझे ये आत्मविश्वास दे गया है नामुमकिन कुछ भी नहीं आपकी आँखे अगर सपने देखती है तो आपके ही भीतर वो जज्बा है जो उन्हें सच कर सकता है , शायद मेरी जड़ों ने मुझे इतनी मजबूती दी के मैं हर मुश्किल को पार कर गई.

(ये सीरिज़ लम्बी चलेगी आखिर रिश्ता भी तो लंबा है)


Friday, September 20, 2013

बेतरतीब मैं (बीस सितम्बर)



बेतरतीब मैं
२०.०९.२०१३

आज बरसों बाद हाँथ में कलम उठाई तो लगा लिखना फिर सीखना पडेगा लैपटॉप के कीबोर्ड पर टकटक चलने वाली उंगलिया ऐसे बिहेव कर रही थी जैसे कभी कलम थामी ना थी ,जिस राइटिंग पर नोटबुक पर सितारे जड़े होते थे आज वो बेहूदी और अजीब लग रही थी ,पहचान में नहीं आ रही थी 
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कितना तेज रफ़्तार हो गया है ना सब कुछ जितनी तेजी से विचार मन मेंआते है उससे दुगुनी तेजी से वो टाइप कर दिए और उससे भी तेजी से शेयर इस सारी प्रोसेस के बीच विचार मनन का समय कहाँ बचा,पछतावा कितनी बार उभरता है और फिर उतनी तेजी से धुंधला होकर गायब, ये मन भी आजकल पश्चाताप का बोझ ज्यादा देर अपने तक नहीं रखता 
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मुश्किलों का दौर चल रहा हो और कोई रास्ता ना दिखे ऐसे हालात शायद  जीवन का हिस्सा बन चुके है ज़िन्दगी सुकून में कम बीती तकलीफ में ज्यादा , ऊपर वाले को क्या कहूं प्यार और मार दोनों उसने जी भर दिए है जब प्यार पर नहीं रोका तो मार पर शिकायत कैसे कर सकते है 
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खालीपन उम्र के चौथेपन में जन्मने वाला ये एहसास अभी से अपनी आमद दर्ज करा रहा है दौड़ते भागते आत्मबल के घुटने दर्द कर रहे है रिटायर होने की इच्छा हो रही है ,पर रिटायर होकर क्या करेंगे कुछ ना करने के लिए ही तो रिटायर होना चाहते है ,निष्क्रियता और खालीपन का कोई रिश्ता नहीं ,उलझा से रहे है ये दो शब्द 
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एक डरावने सपने से सुबह हुई है उसका असर अभी तक तारी है ना सुकून की नींद आई ना ताजगी भरी सुबह कोई फूलों से कह दो हर रोज़ उनकी तारीफ़ में गीत नहीं गाये जा सकते वो सिर्फ मंदिर ही नहीं मज़ार और मैय्यत भी याद दिला सकते है