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Tuesday, August 10, 2010

तू ही मुझे संवार दे

कुछ वियोगी मन हुआ
तन भी ना अब साथ दे
कोई ऐसा पल नहीं
जो मन को मेरे साध दे

साध मन की थी कभी
खुशिया सराहे फिर मुझे
बुझ गए आंसू में सब
दीप जितने थे जले

मुश्किल हूँ मैं
या वक़्त मुश्किल है मेरा
मिलता भी नहीं कभी
जब साथ मांगती हूँ तेरा

मैं इतनी बुरी ना थी
पर भली कब तक रहूँ
मन है पीड़ा से भरा
दर्द अब किससे कहूं

क्या कभी होगा प्रलय
टूट कर बह जाउंगी
मैं अपने जीवन का
अवशेष मात्र रह जाउंगी

नेह की बूंदे कभी कुछ

मुख पे मेरे डाल दे
बहुत बिखरी हूँ प्रिये
तू ही मुझे संवार दे

26 comments:

  1. साथ के साथ साध का मिलान बढ़िया है.. ओवर ऑल फ्लो बढ़िया है

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  2. कुछ वियोगी मन हुआ
    तन भी ना अब साथ दे
    कोई ऐसा पल नहीं
    जो मन को मेरे साध दे
    ..................
    क्या कभी होगा प्रलय
    टूट कर बह जाउंगी
    मैं अपने जीवन का
    अवशेष मात्र रह जाउंगी
    ..................
    नेह की बूंदे कभी कुछ
    मुख पे मेरे डाल दे
    बहुत बिखरी हूँ प्रिये
    तू ही मुझे संवार दे
    ....ye ishq nahi aasaan..bas itna samjh lijiye...g8 job sonal..! :)

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  3. नेह की बूंदे कभी कुछ

    मुख पे मेरे डाल दे
    Bahut khubsurati se vyakt kiya hai.

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  4. सोनल जी, नमस्कार....

    हमेशा की तरह आपने पुनः गुनगुनाने लायक छंदात्मक कविता लिखी है....और मुझे दिल से छंद वाली कवितायेँ अच्छी लगती हैं....
    पर कविता का नीचे लिखा छंद अगर कुछ सुधार दें तो कविता और सुन्दर हो जाएगी....

    "मुश्किल हूँ मैं
    या वक़्त मुश्किल है मेरा
    मिलता भी नहीं कभी
    जब साथ मांगती हूँ तेरा "

    इसकी जगह अगर ये होता तो छंद और सुन्दर बन जाते...

    मुश्किलों में. मैं रही, या,
    वक्त मुश्किल, है मेरा...
    मिल नहीं, पाता है मुझको...
    साथ मांगूं, जो तेरा...

    ये मात्र सुझाव है कृपया इसे अन्यथा न लीजियेगा...

    कविता बहुत सुन्दर लिखी है इसका कोई जवाब नहीं है...

    दीपक....

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  5. Last lines are devotionally beautiful.

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  6. बहुत अच्छी प्रस्तुति।

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  7. कुछ वियोगी मन हुआ
    तन भी ना अब साथ दे
    कोई ऐसा पल नहीं
    जो मन को मेरे साध दे
    गुनगुनाने को मजबूर करती प्रस्तुति

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  8. नेह की बूंदे कभी कुछ
    मुख पे मेरे डाल दे
    बहुत बिखरी हूँ प्रिये
    तू ही मुझे संवार दे..

    भावपूर्ण प्रस्तुति ....

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  9. प्रेम की यह अनुपम अभिव्यक्ति कृत्रिम नहीं हो सकती। अनुभव से चल कर आयी है यह कविता।

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  10. बहुत अच्छी प्रस्तुति।
    राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।

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  11. सोनल जी, गहरे भाव लिए अनूठी रचना..लेकिन इस बार न जाने क्यों कुछ जल्दबाज़ी में लिखी सी प्रतीत हुई!!

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  12. मैं इतनी बुरी ना थी
    पर भली कब तक रहूँ
    मन है पीड़ा से भरा
    दर्द अब किससे कहूं
    ....gahare ehsaas...gahara dard...khubasurat rachna.

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  13. bahut badhiya likhti hai aap ..behtreen dil ko chu lene waali rachnaaye padhne ko mili aapke blog par ek baar fir se badhaai ..

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  14. जब से हर शहर को दिल्ली मुंबई की नजर से देखा जाने लगा है, हमारे सारे शहर स्माल टॉउन हो गए हैं। स्माल टॉउन शहरीकरण के भागवत संसार में अभिशाप सा लगता है। हम शहर बदलते रहते हैं लेकिन हमारे भीतर स्माल टॉउन है कि बदलता नहीं। ऐसा क्यों हो रहा है कि कोई मोतिहारी नहीं भूल पाता, कोई बरेली नहीं छोड़ पाता, कोई गोरखपुर की याद में सुलगता रहता है। कितना अच्छा होता कि किसी अपार्टमेंट का नाम होता पडरौना एवेन्यू, गाजीपुर एन्क्लेव, अरेराज कॉलोनी। महानगरों में कई नगर भी बस जाते हैं।

    सोनल रस्तोगी का ब्लॉग है कुछ कहानियां, कुछ नज्में। क्लिक कीजिए http://sonalrastogi. blogspot.com नई और पुरानी जिंदगी के बीच पब्लिक स्पेस में एक लड़की संवाद कर रही है। सोनल ने अपने परिचय में लिखा है कि वो कवि दिल वाली छोटे शहर की एक लड़की है। पढ़ना, लिखना और ख्वाब देखना अच्छा लगता है।

    टेक्नोलॉजी सेक्टर में काम करती है। गुड़गांव में रहती है, लेकिन पसंदीदा किताबों की सूची में है- साकेत, शतरंज के मोहरे और श्रीकांत। ऐसी लड़की अगर हरसिंगार और अपनी दादी को याद करे तो सोचिये कितने रिश्तों की गहराई में डूबते हुए यहां तक पहुंची होगी।

    सोनल लिखती हैं कि दादी क्वार के मौसम में सवा लाख हरसिंगार के फूल अपने ठाकुर जी को चढ़ाती और हम बच्चों की सेना उनको फूल लाकर देती। रात को पेड़ के नीचे चादर बिछा देते और सुबह-सुबह वो चादर सैंकड़ों फूलों से भरी होती, मानो हरसिंगार नतमस्तक होकर खुद लड्डू गोपालजी को अपने फूल अर्पित कर रहा हो। सच है कुछ खुशबू, रंग और दृश्य हमारे अस्तित्व का हिस्सा बन जाते हैं। आज मैं अपने शहर से सैकड़ों किलोमीटर दूर हूं, बचपन को गए भी अरसा हो गया पर जब भी हरसिंगार के पेड़ के सामने से गुजरती हूं, फूलों को हाथ में लेकर दादी को याद जरूर करती हूं।

    नब्बे के दशक के बाद से काफी कुछ बदला है। पुरानी स्मृतियां छोटे कस्बे और शहरों के लोगों में ही बची हैं। सोलन की कहानियों में काफी कुछ मिलता है। लिखती है कि चाय पीकर आंखें बंद कर लेट गई तो अचानक मां का चेहरा आंखों के सामने आ गया। मन करता है उड़कर पहुंच जाऊं, बांबे से कानपुर। कानपुर जाने की सोचकर ही मन फ्रेश हो गया। जहां बाम्बे में ट्रैफिक को लेकर परेशान रहती हूं, वहीं कानपुर की सड़कों पर लगा रिक्शा, साइकिल, हाथगाड़ी का जाम भी अपना सा लग रहा है।

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  15. Badhai, Badhai...Saath hi ye aapki 97th post hai....Jald hi shatak banaye.

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  16. सोनल की कविताएं भी ख्वाबों में डूबी एक लड़की की दास्तान हैं। कुछ तन्हाई, एक रजाई, बदन तोड़ती, एक अंगड़ाई, ठन्डे हाथ, तपती सांसें, अंगीठी से गायब गरमाई। एक और कविता है- इश्क पर लिखूंगी, हुस्न पर लिखूंगी, दिलों के होने वाले, हर जश्न पर लिखूंगी। खिड़की पर लिखूंगी, मैं झलक पर लिखूंगी, रात भर सो न पाई, उस पलक पर लिखूंगी। आज भी खत लिखते हैं तो जवाब आता है, बंद लिफाफे में गुलाब आता है, देख कर उनको भारी हो जाती हैं पलकें, रुखसार पर रंग लाल छाता है। अपने भीतर के अहसासों को काफी सलीके से पकड़ती हैं सोनल। अच्छा लिखती हैं.

    Soanl ji..

    Hindi dainik ' Hindustan (Delhi Edition-11/08/2010 ke editorial page par aapke blog ki charha hona ek bahut hi badi achievement hai.

    AApki is achievement par aapko Badhaai(congratulations)

    AApke blog par charcha ke liye link:-

    http://www.livehindustan.com/news/editorial/guestcolumn/57-62-132203.html

    or 11/08/2010 ka Dainik Hindustan (Hindi-Delhi Edition)Editorial page par

    Ravi Kumar ka Aalekh-
    ब्लॉग वार्ता : शहर बदलतीं लड़कियां
    रवीश कुमार

    ravish@ndtv.com

    लेखक का ब्लॉग है naisadak.blogspot.com

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  17. AApki ye post bahut hi uttam hai.

    iske liye bhi aapko BADHAAI.

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  18. AAPKE SUNHARE BHAVISHAY KE LIYE AAPKO

    I WISH YOU ALL THE BEST.

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  19. बेहद उम्दा भाव संयोजन।
    आज के पेपर मे आपके बारे मे आर्टिकल छपा था बहुत अच्छा लगा आपको हार्दिक बधाइयां इस उपलब्धि के लिये।

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  20. सोनल जी ,

    आप अपने ब्लॉग से हमारिवानी का लोगो हटा लें ..ब्लॉग नहीं खुलता है....मैं अपने कम्प्यूटर पर रिस्क ले कर यह लिख रही हूँ ..आभार

    संगीता स्वरुप

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  21. sonal ji aapko mile is samman ke liya bahut bahut badhai.

    नेह की बूंदे कभी कुछ

    मुख पे मेरे डाल दे
    बहुत बिखरी हूँ प्रिये
    -तू ही मुझे संवार दे------ati sundar----poonam.

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  22. अच्छे छंदों में सजी गीत्मय रचना ...

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