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Sunday, June 20, 2010

साँसों को सिसकने नहीं देते

अपने दर्द को


आँखों में उभरने नहीं देते

उभर भी आये तो

गालों पे बिखरने नहीं देते

इस जद्दोजहद में

भारी हो जाता है दिल

सँभालते है खुदको

धडकनों को सुबकने नहीं देते

मुस्कान गहरी होती जाती है

बढती तकलीफ के साथ

ठहाको में दबा देते है

साँसों को सिसकने नहीं देते

बहुत कोशिशे होती है

हमदर्दों की ,हमराहों की

दिल की उस गहराई में 

हम किसी को उतरने नहीं देते

18 comments:

  1. bahut gahari se man ke bhavon ko aapne prastut kiya hai ......bahut hi uttam rachna .

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  2. सँभालते है खुदको

    धडकनों को सुबकने नहीं देते


    बहुत ही बढ़िया सम्प्रेषण....
    आनंद आया
    http://manojkhatrijaipur.blogspot.com/

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  3. manaa log zakhmon per namak rakhte hain
    per koi n koi hamdard hota hai kahin ....

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  4. हमारे साथ जुड़ने का आभार... आपकी अभिव्यक्ति बड़ी कोमल है, और हर किसी की समवेदनाओं से जुड़ी है...जनाब मुनव्वर राना का एक शेर ख़ास आपकी नज़रः
    शगुफ़्ता लोग भी टूटे हुए होते हैं अंदर से,
    बहुत रोते हैं वो जिनको लतीफ़े याद होते हैं.

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  5. यह तो ऐसा लगा कि मेरे दिल की गहराईयों से कविता बनकर निकली है,

    दिल जोर से धड़क गया, अपने दिल की बातें पढ़कर, बेहतरीन रचना।

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  6. वाह क्या बात है!
    दर्द रिसते-रिसते पलकों के कोरों पर ठहर जायेगा
    ढरक जायेगा चुपके से
    हाय !
    मेरे दर्द
    दृश्यमान हो जायेगा.

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  7. achhi hai ..bt ye aap ke level se zaraa si kam rah gayi ...mujhe aisa lag raha hai ..

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  8. bahut khoob
    apki ye rachna dil me utargai

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  9. मंगलवार 22- 06- 2010 को आपकी रचना ... चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर ली गयी है


    http://charchamanch.blogspot.com/

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  10. बहुत खुद्दार रचना है आपकी...बेहद खूबसूरत...बधाई..
    नीरज

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  11. बहुत खूबसूरत रचना..

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  12. वाह्……………गज़ब के भाव समाये हैं।

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  13. रचना अच्छी है, मगर मैं विवेक रस्तोगी जी की बज़ से आया था - रचना तो सोनल जी की निकली?

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  14. अच्छा है। अब इसके बाद वाली कविता और अच्छी लगने लगी।

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