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Tuesday, May 11, 2010

प्रेम के क्षण (१)


काँप गई

आलिंगन में
उन्मुक्तता है
इस बंधन में
पंख लगे है
धडकनों को
उबरू कैसे
इस उलझन से


कितने मादक कितने मोहक

नैन तुम्हारे
मौन में भी कितने मुखर
नैन तुम्हारे
इन नैनो ने विकल किया
ये तो सोये
पर जागे रात रात भर
नैन हमारे


दिन-ब-दिन

तुम चढ़ रहे हो
सीढ़िया सफलता की
मैं थक रही हूँ
नहीं चल पाती
उस रफ़्तार से
शायद मैं फिर
जुटा सकूँ
कतरा कतरा हिम्मत
जो हाँथ थाम लो
तुम प्यार से

26 comments:

  1. वाह !सुन्दर कविता .....हर पंक्ति बेहतर ...सम्पूर्ण कविता अच्छी लगी ....

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  2. निशब्द है जी हम तो आज......

    कमाल की रचना!

    कुंवर जी,

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  3. फिर से प्रशंसनीय रचना - बधाई

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  4. जुटा सकूँ
    कतरा कतरा हिम्मत
    जो हाँथ थाम लो

    बहुत ही सुंदर कविता सोनल जी
    कमाल है-शुभकामनाएं

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  5. बहुत ही सुन्दर कविताएँ हैं!

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  6. सच है .. प्यार का संबल मिल जाए तो रास्ता आसान हो जाता है ....

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  7. बेबाक अभिव्यक्ति।

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  8. कविता मे फोटोग्राफी , उत्तम ।

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  9. आप भि सफ़ल्ता कि सीढी चढती रहे बहुत सुन्दर कवित आप की

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  10. बहुत सुंदर
    http://nanhen deep.blogspot.com/
    http://adeshpankaj.blogspot.com/

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  11. sonal jiiiiiiiiii shandar bhav waah tarife kabil
    शायद मैं फिर
    जुटा सकूँ
    कतरा कतरा हिम्मत
    जो हाँथ थाम लो
    तुम प्यार से
    ye line hme pasand aayi

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  12. 1
    आलिंगन में
    उन्मुक्तता है
    इस बंधन में
    पंख लगे है
    धडकनों को
    2
    कितने मुखर
    नैन तुम्हारे
    जागे रात रात भर
    नैन हमारे

    3
    तुम चढ़ रहे हो
    सीढ़िया सफलता की
    मैं थक रही हूँ
    नहीं चल पाती
    उस रफ़्तार से
    शायद मैं फिर
    जुटा सकूँ




    सपष्ट भावबोध, रसात्मक रचनाशीलता और सौदर्यबोध

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  13. छलकते जज्बाओं की सुराही का पानी .... सुकून मिला

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  14. बहुत सुन्दर क्षणिकाएं.... स्पष्ट और सटीक...

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  15. bahut hi khubsurat kavitaayein...
    achha laga padhkar,...
    yun hi likhte rahein....
    regards..
    http://i555.blogspot.com/

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  16. बहुत सुन्दर रचना, इधर आकर अच्छा लगा :)

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  17. क्या बात है..वाह! अति सुन्दर!!

    ये फार्मेट बहुत बढ़िया है!



    एक विनम्र अपील:

    कृपया किसी के प्रति कोई गलत धारणा न बनायें.

    शायद लेखक की कुछ मजबूरियाँ होंगी, उन्हें क्षमा करते हुए अपने आसपास इस वजह से उठ रहे विवादों को नजर अंदाज कर निस्वार्थ हिन्दी की सेवा करते रहें, यही समय की मांग है.

    हिन्दी के प्रचार एवं प्रसार में आपका योगदान अनुकरणीय है, साधुवाद एवं अनेक शुभकामनाएँ.

    -समीर लाल ’समीर’

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  18. तुम चढ़ रहे हो
    सीढ़िया सफलता की
    मैं थक रही हूँ
    नहीं चल पाती
    उस रफ़्तार से
    शायद मैं फिर
    जुटा सकूँ
    कतरा कतरा हिम्मत
    जो हाँथ थाम लो
    तुम प्यार से
    .............परवीन शाकिर की याद दिला गयीं आप इस कविता के सहारे.....! बहुत ही भावनात्मक कविता ....बधाई

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  19. प्रेम की सुन्दर अनुभूति...खूबसूरत भावाभिव्यक्तियाँ....बधाई !!

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  20. पहली तो अद्भुत है ! सशक्त भी ।
    आभार ।

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  21. खूबसूरत कवितायें। छुटकी , सुन्दर!

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