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Wednesday, July 7, 2010

!! बिना जुर्म सज़ा पाई है !!

समाज में आये दिन होने वाले एसिड अटैक पर आधारित.....

चुनरी सहेज दी है

जो गुडिया को उढाई थी

कद बढ़ते ना जाने कब

मेरे सर पर सरक आई थी

माँ ने सितारे टांके थे

मन्नतों के दुआओं के

काला टीका लगाया था

दूर रहे बुरी बलाओं से

पर .....................

आते जाते बुरी नज़र गड गई

एक पल के हादसे में

उसकी रंगत उजाड़ गई

दुआए ना बचा सकी

मेरा चेहरा तेज़ाब से

आज भी मवाद रिसता है

चुनरी के ख्वाब से

आज..........................



चीथड़े समेटकर

डस्टबिन में डाले है

झुलसी थी रात

आगे तो उजाले है

अतीत के निशाँ आईने में

रोज़ देखना दुखदाई है

कैसी मुजरिम हूँ मैं

जो बिना जुर्म सज़ा पाई है

28 comments:

  1. सशक्त अभिव्यक्ति!

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  2. इस कविता के लिए टिप्पणी देना मेरे बस की बात नहीं!

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  3. ओह, ...बहुत मार्मिक....दिल दहल गया ...पर सच्चाई है...

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  4. "अत्यंत मार्मिक....."

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  5. बहुत सशक्त और मार्मिक भी

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  6. क्या कहूँ...
    कुछ कहने की ज़रूरत है क्या ?

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  7. Hi..

    Kavita etni marmik hai ki main nishabd ho gaya hun.. Ek vedna ka ahsaas antarman ko udvelit kar gaya hai.. Hothon pe swatah ek aah aa gayi hai..

    Sach main aaye din hone wali aisi ghatnayen hamare hruday ko hila deti hain..aur man sach main vyathit ho uthta hai..

    Aapne es vishay par apni kavita ke madhyam se sabka dhyanakarshit karke..sach main prashansaneey kary kiya hai..

    Deepak..

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  8. सोनल जी,
    बहुत ही संवेदनशील नजरिए से आपने इस रचना को लिखा है.
    एकतरफा प्रेम करने वाले शैतान तेजाब की घटना को अन्जाम देते ही है. उन्हें शायद पता नहीं होता है कि जिससे प्रेम किया जाता है उसे हर हाल में खुश रखना पड़ता है.
    ये तो वही बात हुई...
    तुम मुझे न चाहो तो कोई बात नहीं..
    तुम किसी गैर को चाहोगी तो मुश्किल होगी..
    क्या मुश्किल होगी... क्या चाकू मार देगा, तेजाब डाल देगा.
    समाज में लंफगे और लुच्चों की जमात कुछ ज्यादा ही बढ़ गई है.
    आपने गुडि़या को भी चुनरी ओढ़ा दी
    बाप रे... हिल गया मैं तो.
    आपको एक बेहतर रचना के लिए बधाई.

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  9. दुआए ना बचा सकी

    मेरा चेहरा तेज़ाब से

    आज भी मवाद रिसता है

    चुनरी के ख्वाब से

    किसी भुक्तभोगी के दिल का दर्द --- ओह आँखों मे आँसू आ गये
    अतीत के निशाँ आईने में

    रोज़ देखना दुखदाई है

    कैसी मुजरिम हूँ मैं

    जो बिना जुर्म सज़ा पाई है
    मार्मिक अभिव्यक्ति। इस सश्क्त रचना के लिये बधाई

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  10. दुआए ना बचा सकी

    मेरा चेहरा तेज़ाब से

    आज भी मवाद रिसता है

    चुनरी के ख्वाब से
    .....बहुत सशक्त और मार्मिक

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  11. behan sonal ji aapki pot pdhi men mkkhn nhin lgaa rhaa hun aek bhaayi aapko usk dil kaa sch is tippni men yker kr de rhaa he aapne is post ko likhne men bhut kthin or naa mumkin krishmaa kiyaa he men kotaa men apraadhik maamlon ki pervi krtaa hun kotaa men tezaab se jaa denaa aam baat rhi he lekin jle hue logon ko nzdik se siskte mene dekhaa he men is drd ko smjhtaa thaa mehsus krtaa thaa lekin mere paas ise pirone ke liyen shbd nhin the jo kmaal aapne maarmik shbdon ki maalaa bnaa kr is post men kr dikhaayaa he aek baar fir is sch ko logon ke saamne usi mrm ke saath rkhne ke liyen bdhaayi. akhtar khan akela kota rajsthan

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  12. बेहतरीन अभिव्यक्ति
    मार्मिक रचना, डरा कर धडकने बढाती
    प्रणाम

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  13. "मेरा चेहरा तेज़ाब से
    आज भी मवाद रिसता है
    चुनरी के ख्वाब से"

    घिनौने कृत्य की मार्मिक प्रस्तुति

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  14. Wo khawab ke mavad se padhte hi..jee na jane kaisa ho gaya.. Behad achhi rachana..

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  15. चीथड़े समेटकर
    डस्टबिन में डाले है
    झुलसी थी रात
    आगे तो उजाले है
    अतीत के निशाँ आईने में
    रोज़ देखना दुखदाई है
    कैसी मुजरिम हूँ मैं
    जो बिना जुर्म सज़ा पाई है

    मार्मिकता से परिपूर्ण भावपूर्ण रचना..सोनल जी बढ़िया प्रस्तुति के लिए बधाई

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  16. चीथड़े समेटकर
    डस्टबिन में डाले है
    झुलसी थी रात
    आगे तो उजाले है
    अतीत के निशाँ आईने में
    रोज़ देखना दुखदाई है
    कैसी मुजरिम हूँ मैं
    जो बिना जुर्म सज़ा पाई है ...

    मार्मिक अभिव्यक्ति है .... बहुत दर्द है आपकी रचना में ....

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  17. बहुत सुन्दर रचना.............

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  18. अत्यंत गंभीर और मार्मिक रचना !

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  19. दिल चीत्कार कर उठा इस कविता को पढ़ कर.

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  20. आपके लेखन का तेज़ाब इन बदमाशों को कहीं का नहीं छोड़ेगा..

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  21. ऑंखें नम कर गई मार्मिक रचना

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  22. गंभीर और मार्मिक रचना !

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  23. कविता पढ़कर ऐसे हादसे होने के बाद जीने वाली लड़कियों की बात सोचकर मन दुखी सा हो गया।

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