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Sunday, July 18, 2010

रजनीगंधा बन महक उठूँ

मैं सोने सी कुछ आग सी

कभी चमक उठूँ कभी दहक उठूँ

ना जाने किस पल लहक उठूँ

दरिया को संग बहा लूं मैं

बिन मेघ भी जल बरसा लूं मैं

दुनिया के तंग घरौंदे में

गौरया बन मैं चहक उठूँ

खुद के रहस्य में उलझी मैं

टूट गई ना सुलझी मैं

ना जाने कोई किस रात में

ध्रुव तारे सी चमक उठूँ

खुशबू मेरे तन का हिस्सा

हर रंग मुझी से बावस्ता

ना जाने कब किस क्यारी में

रजनीगंधा बन महक उठूँ

25 comments:

  1. बहुत प्रवाहमयी और सुन्दर रचना... यूँ ही महकती रहो , लहकती रहो , चमकती रहो :):)

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  2. रजनीगंधा की महक आ रही है।
    कल (19/7/2010) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट देखियेगा।
    http://charchamanch.blogspot.com

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  3. रजनीगंधा तो मेरा प्रिय फूल है और इस नाम से बनी फिल्म जिसमें विद्या सिन्हा ने काम किया था वह भी मुझे बहुत पंसन्द है.
    जो कुछ आपने कविता में लिखा है वह आपके जीवन में सच साबित हो इन्हीं शुभकामनाओं के साथ.
    कविता अच्छी है और सच के करीब लगती है इसलिए यह लिख दिया..
    बुरा मत मानिएगा

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  4. रजनीगंधा से भीनी महक आती है आपकी रचनाओं से।

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  5. आस्था और आशावादिता से भरपूर स्वर इस कविता में मुखरित हुए हैं।

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  6. बहुत खूब! महकने, चहकने, लहकने का क्रम बना रहे। हमेशा।

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  7. Hi..

    Aha..

    na jaane kab kis kyari main,
    rajnigandha ki mahak uthun..

    Wah.. Kya baat hai..

    Deepak

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  8. वाह क्या बात है। कब क्या हो जांएं पता ही नहीं। पर हर बार प्रवाह और शक्ति का प्रतीक बनी रहेंगी। कई लोगो के साथ मुझे भी रजनीगंधा फिल्म की याद आ रही थी। रजनीगंधा के फूल है मेरे घर में।

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  9. रजनीगंधा सी ही खुशबू शामिल है इस कविता में ...यूँ ही मकती रहें ..शुभकामनायें ...!

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  10. मंगलवार २० जुलाई को आपकी रचना ... चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर ली गयी है आभार

    http://charchamanch.blogspot.com/

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  11. beautiful poem from the beautiful heart
    keep it up!! :)

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  12. ना जाने कब किस क्यारी में

    रजनीगंधा बन महक उठूँ ....यूँ ही मकती रहें ..शुभकामनायें ...!

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  13. बहुत ही सुंदर .... एक एक पंक्तियों ने मन को छू लिया ...

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  14. खुशबू मेरे तन का हिस्सा

    हर रंग मुझी से बावस्ता

    ना जाने कब किस क्यारी में

    रजनीगंधा बन महक उठूँ


    ye chaar lines to main kabhi churaunga..aur bataunga bhi nahi...hehehe

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  15. दुनिया के तंग घरौंदे में
    गौरया बन मैं चहक उठूँ

    यही वह ख्वाहिश है जहाँ इंसान के एहसास उड़ान भरने लगते हैं
    बहुत सुन्दर लिखा है

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  16. रजनीगंधा सी प्यारी और निश्छल लगी ये कविता

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  17. रचना का प्रवाह ..... एक महक बन कर छा रहा है .... लाजवाब रचना है ...

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  18. रजनीगंधा की खुशबू यहाँ भी पहुंची...बधाई. कभी हमारे 'शब्द-शिखर' पर भी पधारें.

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  19. वाह...मन भावन कविता...प्यारे प्यारे मासूम ख्यालों से सजी हुई...बधाई..

    नीरज

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  20. बहुत अच्छा....मेरा ब्लागः"काव्य कल्पना" at http://satyamshivam95.blogspot.com .........साथ ही मेरी कविता "हिन्दी साहित्य मंच" पर भी.......आप आये और मेरा मार्गदर्शन करे...धन्यवाद

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