"मैं तो खुश थी अपनी गुडिया के साथ
कहाँ माँगा था सारा आकाश
गुड्डे के साथ डोली चढ़ बैठी
नन्ही सी गुडिया गोद में आ बैठी
मैं तो फिर भी खुश थी
अपने नन्हे सोते जागते खिलौनों के साथ
मैंने तो नहीं माँगा था
कभी कोई पारिजात
तुमने हाँथ बढ़ाये तो
मुझे पाँव निकलने पड़े
अपने नन्हे मुन्हे पूरा दिन
दूसरों के पालने में डालने पड़े
बाहर संभाला घर भी देखा
चकरी की तरह घूमी भी
किसी को कोई कमी रहे ना
अपनी सेहत पीछे छूटी भी
पर तुम्हारा छिद्रान्वेषण
छलनी करता है मन को
इतने कांच कभी न चटके
जितनी बार टूटी मैं

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