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Saturday, March 20, 2010

जितनी बार टूटी मैं

"मैं तो खुश थी अपनी गुडिया के साथ

कहाँ माँगा था सारा आकाश

गुड्डे के साथ डोली चढ़ बैठी

नन्ही सी गुडिया गोद में आ बैठी



मैं तो फिर भी खुश थी

अपने नन्हे सोते जागते खिलौनों के साथ

मैंने तो नहीं माँगा था

कभी कोई पारिजात



तुमने हाँथ  बढ़ाये तो

मुझे पाँव निकलने पड़े

अपने नन्हे मुन्हे पूरा दिन

दूसरों के पालने में डालने पड़े



बाहर  संभाला घर भी देखा

चकरी की तरह घूमी भी

किसी को कोई कमी रहे ना

अपनी सेहत पीछे छूटी भी


पर तुम्हारा छिद्रान्वेषण

छलनी करता है मन को

इतने कांच कभी  न चटके

जितनी बार टूटी मैं

13 comments:

  1. सोना टूट कर भी जुड जाता है.....
    माँ होती ही ऐसी है.....
    दिल से निकली कविता ऐसी ही होती है.....
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  2. nice poem with realistic approach of life.

    -you can read my poem-
    http://drashokpriyaranjan.blogspot.com

    -my article-
    http://www.ashokvichar.blogspot.com
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  3. पर तुम्हारा छिद्रान्वेषण
    छिद्रान्वेषण......
    छिद्रान्वेषण.....
    Haunting.
    hmmm. Kuch kehne ko baki nahin raha.
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  4. पर तुम्हारा छिद्रान्वेषण
    छलनी करता है मन को
    इतने कांच कभी न चटके
    जितनी बार टूटी मैं

    वाह क्या एहसास पिरोया है.
    बहुत सुन्दर्
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  5. बढ़िया अभिव्यक्ति....
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  6. naari man ka khoobsurat chitran...aabhar
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  7. वाह...नारी मन की व्यथा का बहुत ही भावपूर्ण चित्रण किया है आपने.
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  8. are aapto gurgoan ki hai...humare hi rajya ki..
    i m from hisar
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  9. Ye chhidranvesan mujh jaise purus ko ek aaina dikha gaya..

    Dhanyavaad
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